Monday, April 02, 2012

अब मैं तुम्हारे नाम से जानी जाती हूँ !

विपिन चौधरी
विपिन चौधरी की कविताएँ पढ़ने के बाद, बहुत दिनों तक मन बौराया-सा रहता है। एक अजीब-सा आकर्षण है उनकी कविताओं में। जैसे एक छोटी-सी बच्ची आपके कमरे में आकर पूछे, क्या हम अंदर आ सकते हैं?’ और आप चुपचाप उसकी शक्ल देखते हुए सोचें कि कमरे के भीतर आकर, भीतर आने की इजाज़त माँग रही है! ये कविताएँ भी पहले आपके अंदर अपना घरौंदा तैयार कर लेती हैं, फिर कुछ और सोचने पर मजबूर करती हैं। आज विपिन चौधरी की जन्मतिथि है। विपिन जी को जन्मतिथि की अशेष शुभकामनाओं के साथ प्रस्तुत हैं कुछ ताज़ातरीन-बेहतरीन कविताएँ : बीइंग पोएट

नाभि नाल से उठती धुन 
मैं अपनी हथेली पर कई बरसों का इंतज़ार लिए खड़ी हूँ
इंतज़ार का रुख़ घटाटोप बादलों और
वक़्त का मिजाज़ उन हवाओं-सा अनिश्चित
जो एक बार आती दिखती हैं
तो दूसरे पल लौटने की तैयारी कर रही होती हैं
क्षितिज का अमूर्त विस्तार
कच्छ का रेतीला भार 
धार का असीम सौंदर्य
हिमालय का दर्प
इंतजार के भारी-भरकम पाँवों तले दम तोड़ चुके हैं  
ना जीवन की इस क़तर-ब्योंत का कोई सानी रहा
ना ही तीन पहरों की राजदारी का
समूची कायनात बरसों पहरों की राजदारी करते बूढ़ी हो गई है
पर इस घड़ी ज़िंदगानी के पैंतरे भी
दुनियादारी-सी रंगरेजी छाप छोड़ने लगे हैं  
इसका कोई शरणार्थी कोना मेरे नजदीक आकर
अपनी छाया छोड़ता नहीं दिखता
मैंघने बियाबान के एक तीखे झुरमुट में
अपने एकमात्र इंतज़ार के साथ
ज़िंदगी कमाल पाशा की जादूगरी नहीं है
यह काफी पहले जान चुकी थी
फिर 
ऊल-जलूल हरकतें करती 
उछलती-कूदती-फर्लागती जिन्दगी
आखिर मुझसे कहना चाहती क्या है ?
धर्म शास्त्रों की नैतिकता का पलड़ा मेरी ओर अपनी आस्था दिखता है  
फिर भी विज्ञान के सभी अनुशासनों का दंड मुझे हर हाल में भोगना ही है 
ऊपर से ये भारी इंतज़ार
सहस्त्र द्वार से कुंडलनी तक
बेरोकटोक बहता एक सुख
जिसे बाहर का एक भी रास्ता मालूम नहीं
इस सुख ने हर बार दुनिया का मलिन चेहरा देखने से साफ़ इनकार कर दिया है  
अब मै शदीद प्यास में बदल चुकी हूँ
जब मैंने पाया कि

भीतर का यही सुख मेरे इंतज़ार से दोस्ती गाँठ चुका है
मुझे एक रोशनदान चाहिए
एक नेक नीयत
और चाय की एक प्याली।
अब मैं तुम्हारे नाम से जानी जाती हूँ
एक समय के बाद  याद  का एक बेहतर कोना घिस कर 
नुकीला हो गया है
जबकि तीनों कोने अपनी-अपनी जगह दुरुस्त हैं  
ज़्यादा इस्तेमाल से चीज़े अपना आकार खो देती हैं
इस डर से तुम्हे याद करने का पुराना शऊर भी भुला बैठी हूँ   
और सच तो यह है कि 
तुम्हे याद करते रहने के लिए मैने प्रेम नहीं किया था 
और भूल जाने के लिये भी नहीं
बीच के उस समय में जब
मैं किसी शपथ पुस्तिका पर हाथ रख कर प्रण लेने से इंकार कर रही थी
उस वक़्त  के लिये भी नहीं  
प्रेम मैंने अपने जिन्दा रहने के लिए किया था ताकि 
कोई तो कायदे का काम हो मेरे खातिर  
बाद की बातों को बाद में याद करना चाहिए
शुरुआ़त की बातों को सबसे पहले 
प्रेम के उस दस्तक से शुरू करते हैं
जो मेरे सुकून पर बिजली की तरह गिरी
और मैं पूरी तरह भस्म 
अब मेरी राख उड़ती है पश्चिम में तो रात होती है
मैं रोती हूं तो ज्वालामुखी आते है दक्खिन में 
जब यह राख अपने मस्तिष्क पर मलती हूँ तो 
जीवन बवंडर की तरह गोल हो जाता हैं  
मैं अपनी स्थानीयता से ही खुश थी
पर तुम्हारे प्रेम ने मुझे ब्रह्माण्ड में
एक नायब चीज़ की तरह पेश किया 
अब मैं तुम्हारे नाम से जानी जाती हूँ   
ढहने से पहले हर इमारत
खूबसूरत होती है
नज़र लगने से पहले हर प्रेम बेदाग़ 
प्रेम से हट कर मैं कुछ कहूँ तो
शापग्रस्त शिला हो जाऊँ
पर सच कहूँ अब यादें मुझे सबसे अज़ीज़ दोस्त लगती हैं।
प्रेम के तहखाने से गुज़रते हुए
हर बच्चे की याद में
एक छड़ी
, मास्टर और  
हर जहन में प्रेम का एक
तहख़ाना होता है
जहाँ भूला-भटका प्रेम
यादों की गर्म भट्टी पर पकता है
बिछड़े हुए प्रेम की यादों को इतना कुरेदा जाता है
  
कि उसके कोयले हमेशा सुलगते रहते हैं
उन कोयलों को उसी अवस्था में ढाँप कर
सब अपने काम-काज में जुट जाते हैं
और जब लौटते हैं तो फिर
सुलगते कोयलों पर हवा करने बैठ जाते हैं
इस तरह यह शगल अपनी पकड़ हमेशा बनाए रखती है

हालांकि प्रेम अब इतनी दूर जा चुका है कि
  
यादों की रंगीन पतंगो तक ही पहुंचा जा सकता है
और
ख़ुदा के हाथों में है बंदे की तक़दीर से
कदमताल करते हुए
  
बंदा अपनी यादों की कमान को
मजबूती से थामे रखता है

प्रेम की ध्यानावस्था में दिन-रात
यादों का जाप चलता है
वो प्रेम की मधुर सांठ-गाँठ
वो चुलाबजियाँ
वो कभी ना बोलने की कसमें
और रेल पटरी पर लेट मरने की झूठी मक्कारियां
प्रेम की बाजीगिरी भी अद्भुत है
संवेदना में ना बहे तो प्रेम भी एक
गोरखधंधा है
जहाँ ब्लैक एंड व्हाइट में फ़र्क मिट जाता है
 

हर साल प्रेम में पड़ने वालों के हाथों में भी
प्रेम की एक ही रेखा खींची होती है
फिर भी प्रेम के दुर्लभ ख़ुदाओं की नाज़ुक ख़ुदाई में
दखल ना देते हुए
उन्हें प्रेम के लिए लंबा अवकाश देना चाहिए
ताकि
प्रेम के इन नामचीन खुदाओं पर शोध कर
नकलची प्रकाश में आ सकें।
  
गुमशुदगी
मुझे मेरे होने का तब तक पता नहीं चला
जब तक एक नई-नवेली नाड़ी ने मेरी आत्मा को खोद-खोद कर
उसके भीतर अपना घर नहीं बना डाला
एक मैराथनी दौड़ लगभग समाप्ति पर थी
पर मेरे पाँव अब भी दूरियों की मांग कर रहे थे
जीवन के इस लाज़िमी हक़ में
मेरी वह पसंद शामिल नहीं थी
जिसकी तलाश में मैंने कई नए खुदा तलाश डाले थे
मैंने खुशी की पहली उठान के साथ
ऊब का आखिरी हिस्सा भी सफ़र के
पहले पड़ाव में देख लिया था
बिना आवाज़ के कोई मेरी ज़िंदगी से बाहर हो रहा था
और मैं उसके पदचाप की बेवफ़ाई पर रोते-बिलखते
अपने और नज़दीक आ गई थी
सच लगे तो टिके रहो
झूठ मानो तो जाने दो
यादों के इर्द-गिर्द सात फेरे लगा कर
उसे मलमल के लाल कपड़े में समेट
रख दिया है
और वर्तमान की ताप में बैठ
अतीत के दो पत्थरों को रगड़
मैंने वर्तमान का चेहरा देखना चाहा तो
सामने वही बन्दर बाट थी
जिससे मैंने हर मोड़ पर कन्नी काटी थी
उसी वक्त मैंने अपने हाथों से
अपना पता गुम कर दिया
दुनिया में जमे रह कर
गुमशुदगी का खूबसूरत नाटक
कई लाइलाज बीमारियों का सटीक हल है।  
स्त्रियों के नाम सावधानी के कई परतें
कुछ धनी प्रक्रियाओं में शामिल आवाज़ों से  
उनका घनत्व और भी बढ़ जाता है

घनत्व के इसी भार के भीतर नहाती हैं
हमारी ग्रामीण औरते
खाट या चादर की ओट में
तो कभी दुपट्टे की छत्र-छाया तले
   

नहाने का साबुन ना होने पर
  
बिना किसी हो हल्ले के
  
कपड़े धोने की टिकिया से भी उनका काम चल जाता है

नाहन पटरी पर कमर को धनुष बना
वे व्यस्त हो जाती हैं केवल अपने लिए
 

पत्थर की रगड़ से जब उनकी एड़ियाँ उजली हो रही होती हैं
तो उस पल
 
समूचा सौंदर्य-शास्त्र उनके नाज़ुक क़दमों
तले पनाह मांगता दिखता है

रसोईघर का एक शांत कोना
 
पुरुष नाम का प्राणी
  के घर से प्रस्थान करने के बाद 
काम काज निपटा कर
वे रसोई के एक कोने को नाहनघर में तब्दील कर देती हैं
  

पूरी तरह निवस्त्र औरत
नहाते हुए भी चौकनी रहती है
  
कि सुई की नोक बराबर भी देह का कोना
उजागर ना हो जाये

खेल-खेल में उसके करीब आई गेंद को
अपने छः साल के गोनू की तरफ फेंक कर कहती है
बेटा इधर ना देख्यो

नाहते समय संसार की हर स्त्री उतनी सुन्दर होती है
जितना सुंदर एक स्त्री को होना चाहिये
  

केलि क्रीड़ाएं करती रीतिकालीन नायिकाएं
 
खंडर महलों के बड़े-बड़े कुंड में रानियों की जीवित याद को देख
गांव की वे स्त्रियों याद आती हैं
जो एक बाल्टी पानी में नाहने का सोंधा काम करती है
 

अधजली लकड़ियों की गंधशुदा पानी
उनके देह से मिल कर अपनी पुरानी गंध खो बैठता है

कोई स्त्री नहाते-नहाते सोचने लगती है
कहीं इस वक्त खुदा की आँख तो खुली ना रह गयी हो
यह सोच
पानी का डब्बा उसके सिर से कुछ ऊपर थम सा जाता है
फिर कुछ सोच औरत खुद ही शर्माती है
धत्

भोर होते ही
गुडुप गुडुप और छन-छन की आवाजें
  
बांध लेती है कुएं की मुंडेर का गोल दायरा
 
गांव की पुरानी बहुएँ चुपचाप नहा कर
आ जाती है अपनी चौखट पर

नई बहुएँ सुबह कुएं पर नहीं नहातीं
 
कुछ वर्षों के बाद ही वे अपनी सास और ददिया सास
का अनुकरण कर कुएं पर स्नान का लुत्फ़ उठाएंगी
तब तक वे सावधानी की कई परतों को अपने
पल्लू से बाँध चुकी होंगीं
और वे भी खुले में नाहते हुए सावधान रहेंगी

जब तक एक भी औरत भोर के अंधेरे में
 
कुएँ की मुंडेर पर स्नान का सहज आनंद उठा लेती हैं
 
तब तक दुनिया पर भरोसा रखा जा सकता है। 

7 comments:

  1. जन्‍मदिन पर इन कविताओं को पढ़ना विपिन जी की संवेदनाओं के संसार को कुछ और गहराई से देखने के लिए कहता है। निश्‍चय ही उनके पास एक बेहद संश्लिष्‍ट अनुभव संसार है, जिसमें ग्रामीण और शहरी जीवन की अनुपम छवियां हैं। उनके यहां एक मामूली किस्‍म का अनुभव भी कविता में बहुत खूबसूरती से ढलकर आता है और पाठक को समृद्ध कर जाता है। और प्रेम की सघनता तो उनके काव्‍य की सबसे अलहदा चीज है, जो उन्‍हें अपने समकालीनों से अलग करती है और उनके प्रति आश्‍वस्‍त करती है। धन्‍यवाद और आभार।

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  2. स्त्रियों के नाम सावधानी की कई परतें . बेहद दिलचस्प कविता है . आशय की कई परतें एक दूसरे से खेलती टकराती हैं .

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  3. खुर्शीद अनवरApril 2, 2012 at 11:53 AM

    सुन्दर कविताएं

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  4. excellent...........
    these poems and the whole blog..........
    thanks a lot.

    anu

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