Tuesday, April 17, 2012

वह अपनी क़ब्र से आवाज़ देता है मुझको

Asif Iqbal
यह कविता मैंने अपने दोस्त आसिफ़ इक़बाल के लिए लिखी है, जो मेरे यक़ीन की आख़िरी हद था। अब, जिसका न होना ही उसके होने का एहसास है। उस एहसास, उस रिश्ता, उस दोस्ती को याद करते हुए : त्रिपुरारि कुमार शर्मा

वह अपनी क़ब्र से आवाज़ देता है मुझको  
उसकी आवाज़ मेरे कानों में यूँ पड़ती है
जैसे काँच पिघल जाए किसी बर्तन में
जैसे रात बदल जाए किसी लम्हे में
अजीब दोस्त है जब भी पुकारा करता है
मैं उसकी आहटों पे अपने पाँव रखते हुए
बदन को अपने बिस्तर में छोड़ कर यूँ ही
निकल-सा जाता हूँ उसके साथ चलने को
कहीं क्षितिज के उस पार ही टहलने को
समय की सरहदों से बाहर है जो वादी
जहाँ न जगह है, न जगह की परिधि है
हर एक चीज़ है लेकिन शक्ल कोई नहीं
हर एक शक्ल है लेकिन चीज़ कोई नहीं
मैं कैसे बोलूँ, कैसे समझाऊँ तुम्हें ?
मेरी बात पर यक़ीन करना मुश्किल है
मगर यह बात भी हर बात की तरह सच है
मेरा दोस्त, जिसे सब आसिफ़ इक़बाल कहते थे
वह अपनी क़ब्र से आवाज़ देता है मुझको