Sunday, April 29, 2012

वो कमरा याद है तुमको ?


आज प्रस्तुत है एक कविता वो कमरा याद है तुमको जो मैंने हाल में ही लिखी है : त्रिपुरारि कुमार शर्मा

अपनी ही बाहों में बहता वक़्त का दरिया
न जाने कहाँ से चलकर कहाँ को पहुंचे
मगर मैं जानता हूँ एक लम्हे को
जो ठहरा हुआ है अब भी मेरे एक कमरे में
वो कमरा याद है तुमको ?
जहाँ हम रोज़ मिलते थे
ज़रा-सा प्यार करते थे और खूब झगड़ते थे
क्या तुमको याद है कुछ भी ?
एक बार जब मैंने तुम्हें बोसा किया था
तो किस तरह दीवार भी शरमा गई थी
और जब चुपचाप तुम आगोश में सिमटी
तो मुंह फेर लिया था छत ने भी अपना
और जब हमने कपड़े उतारे थे
पर्दे के पीछे जाकर छुप गई थी खिड़की
बेचारे दरवाज़े ने आँखें मूँद ली थीं
कुछ देर तक जब प्यार में खोते रहे हम
दो बदन से एक रूह-सी होते रहे हम
कितना लाल हो गया था बेडसीट का चेहरा
हमारी धड़कनों की रफ़्तार बढ़ गई थी
तकिए का हाँफना वो याद है तुमको 
?
जब उलझ-उलझ रहा था साँस का गुच्छा
और हम कैसे पसीने में डूबे थे
जैसे कि हल्की बारिश में भीग जाए कोई
होंठों पे मुस्कुराहट
, आँखों में हँसी थी
पलकों पे उजालों के टूटे हुए क़तरे थे 
सारे कमरे में एक अजब-सी रोशनी थी
बिछुड़ते हुए तुमने जो
लिप-किस किया था
कुछ और बढ़ गई थी कमरे की रोशनी भी
वो रोशनी अब तक मौजूद है वहाँ
और वो लम्हा अभी गुज़रा नहीं है
वो ठहरा हुआ है अब भी उसी कमरे में
वो कमरा याद है तुमको ?
वो कमरा आज भी तुमको बहुत मिस करता है!