Saturday, May 12, 2012

एक ख़्वाहिश है अधूरी-सी कुछ महीनों से


कुछ दिनों से बहुत गर्मी थी। आज बारिश हुई तो हल्की-सी राहत मिली। जब तेज़ हवा के साथ बारिश हो, तो ऐसे में यादों के गुल्लक का टूट जाना लाज़िम ही है। पेश है 'एक ख़्वाहिश' आज के मौसम के नाम : त्रिपुरारि कुमार शर्मा

एक ख़्वाहिश है अधूरी-सी कुछ महीनों से
हर एक बूँद जो बारिश की फ़लक से उतरे
तुम्हारे जिस्म को छूता हुआ मुझ तक आए
भटक कर रास्ता अपना आँधी का टुकड़ा
सामने मेरी आँखों के यूँ गुज़र जाए
कुछ इस तरह टूटे दरख़्त की पत्ती
कई परतों में बिछकर ज़मीन को ढँक ले
हवा की सूखी हुई सतह पर
फूल की पंखुड़ी भी बहने लगे
दुआ है मेरी कि और तेज़ बारिश हो
बदन में मेरे कुछ कपकपी-सी भी उठे
दीये के लौ की तरह होंठ थरथराने लगे
सर्द मौसम में सारे दाँत किटकिटाने लगे
ठीक उस वक़्त तुम नज़र आओ
स्याह रातों में जैसे एक जुगनू
अपने बालों से तोड़ कर खुशबू
मेरी रातों में एक महक भर दो
अपनी नज़रों से बाँध कर मुझको
सर्द लम्हों को ज़रा गर्म करो
नर्म तलवों से मेरी धड़कनें सहलाते हुए
सुनहरी रूह की राहों से कभी गुज़रो न...