Friday, July 06, 2012

बादलों से टूट रहा है पानी...


जब इतनी गर्मी के बाद इतनी बारिश हो, तो 'कवि-दिल' मचलना लाज़िम है। बग़ैर किसी भूमिका के पेश है यह कविता 'बादलों से टूट रहा है पानी' : त्रिपुरारि कुमार शर्मा   

आज फिर बादलों से टूट रहा है पानी 
आज फिर छातियों में आग-सी लग जाएगी

आज फिर ओस-सी गिरी है ख़ाली आँखों में
आज फिर धड़कनों में प्यास उमड़ आएगी

आज फिर वादियों में ताज़ा बर्फ़ उतरी है
आज फिर बूँद में एक नदी सिमट आएगी

आज फिर चीख उठा है कोई काला जंगल
आज फिर देर तक आवाज़ सुगबुगाएगी

आज फिर चाहतों ने ली है एक अंगराई
आज फिर चाँदनी ख़ुद बदन में चुभाएगी

आज फिर ख़्वाब के खेतों में चाँद आएगा
आज फिर रात बहुत जोर से चिल्लाएगी

आज फिर साँस में सूखी कटार उभरी है
आज फिर रूह की रंगत बहुत रुलाएगी

आज फिर पुतलियों में तैरता है साया-सा
आज फिर आँच उसी हुस्न की झुलसाएगी

आज फिर बादलों से टूट रहा है पानी
आज फिर छातियों में आग-सी लग जाएगी