Tuesday, March 12, 2013

काग़ज़ का जीवन गल कर बह जाएगा किसी नाली में !

इला जोशी
आज प्रस्तुत हैं इला जोशी (जन्म: 13 जनवरी 1988) की कविताएँ। इला की कविताएँ किसी स्टेशन पर छूटती हुई ट्रेन में बैठे यात्री की हथेली का वह नर्म स्पर्श है, जिसे चाहकर कर भी भुलाया नहीं जा सकता। जहाँ, होंठों पर चुप की मुहर लगा लेना एक मात्र उपाय है। जहाँ, जीवन का बेलिबास अनुभव अपनी ही नंगी आँखों आँसू बनकर ठहर जाता है। ऐसे में, ये कविताएँ सियाह समय की सफ़ेद सतह पर तैरती हुई महसूस होती हैं : बीइंग पोएट
1.
मैं एक पत्थर हूँ—
उस सड़क का,
जो बन रही है नदी के बीच

मैं एक अंकुर हूँ—
जो उग आया है,
आसमान के किसी गड्ढे में

मैं एक भूला हुआ दिन हूँ—
उस रिमझिम बरसात का
,
जो पतझड़ के मौसम में भटक गया

मैं एक जीवन हूँ—
जो उन सबके होने में खो चुका है
जिनके अस्तित्व में कभी नहीं थी मैं!
2.
रंग-बिरंगी वो फटी पतंग
इंतज़ार में थी एक बारिश की
कि धुल जाएँ उसके चटख रंग
जो अब थे बेमतलब, बेकाम, बेकार और बोझ
उसके क्षणभर के जीवन पर...
कागज़ का वो जीवन
झेल न पाया उस तेज़ हवा को
पगली वो पतंग
सोचती है
बारिश से सिर्फ धुलेंगे उसके रंग
भूल बैठी है वो
कागज़ का उसका जीवन 
गल कर बह जाएगा किसी नाली में
या मिल जाएगी वो मिट्टी में
जो हर रोज़ रौंदी जाएगी...
उसके वो चटख रंग नहीं हैं
कोई बोझ, असल बोझ तो है
वो बचा हुआ क्षणभर का जीवन....
3.
वो कहते हैं— 
तुम्हारी उम्र और शरीर दो दशकों का अंतर है...
मानो उम्र ने भी
तुम्हारे जन्म के समय ही
तुम्हारे चेहरे पर दस्तक दे दी…
आंधी के बीचों-बीच
कुछ रेत ठहर कर
बिछ गई आँखों में
काजल की परत-सी
एक ही अनुपात में
एक बराबरी के अहसास से
एक-सा ही दोनों का नम होना...
हाँ वो दोनों,
जिन्हें चूम कर वो आंधी
अपनी निशानी छोड़ 
बढ़ गई आगे
महसूस कर रही थी
बिलकुल एक जैसा...
मगर वो मन,
जिसे न आंधी ने छुआ था,
न ही मिली थी निशानी कोई,
बस गालियाँ ही दे रहा था
मानो कुछ उसका अपना 
लूट कर ले गई थी वो मुई आंधी...
4.
मेरे ज़िंदा होने में उलझे
कुछ मरे हुए दिन
जिनकी गली हुई हड्डियाँ
अक्सर
सफाई में निकल आती हैं...
मांगती हैं वो मुझसे
थोड़ी-सी ताज़ा हवा
कुछ उधार की सांसें
और अपने मरने का हिसाब...
परत-दर-परत
जमी हुई वो ख़ून की परतें
अब बस बिखरी काली स्याही-सी लगती हैं...
और फिर भी मैं हिचकिचाती हूँ हटाने में
वो खींचे हुए परदे
जो इतने सालों में खुद अवशेष बन गए...
वो मरे हुए दिन डराते हैं
मेरे ज़िंदा पलों को
और मैं अपनी बेबसी से सिहर जाती हूँ...
समेट लेती हूँ अपने आज को
आंसू भरी आँखों में
जैसे कल मेरे लबों ने
मेरे आंसुओं को समेट लिया था...
5.
अक्सर अकेले में ढूँढती हूँ
उन छः महीनों का हाल
बस खुद को यकीं दिलाने को
कि हाँ, शायद मैं बचा सकती थी तुम्हें....
खंगालती हूँ अपने दिमाग़ का हर एक कोना
याद करने को उस ताले का नंबर
जिसमें छुपाए तुम्हारी डायरी के कुछ पन्ने
शायद अब भी इंतज़ार करते होंगे मेरा...
तुम्हारी काबिलियत पर कभी भी
शक न था मुझे
तभी तो आज भी हर रोज़
मैं हारती हूँ तुम्हारी बनाई हर पहेली से...
मगर ये हार
उस हार से ज़्यादा बदसूरत नहीं

जो तमाम कोशिशों के बावजूद
तुम्हे ज़िन्दा न रख सकी...
फिर भी तुम्हारा न होना
ज़रूरी है मेरे लिए
क्यूंकि मेरे सुकूं का वजूद
छुपा है उसमे...
सबने मुझे स्वार्थी कहा
और हाँ, मैं हूँ स्वार्थी
क्यूंकि—
तुम्हारी जड़ता की बलि नहीं चढ़ना चाहती थी मैं...
नहीं मानती मैं खुद को ज़िम्मेदार
तुम्हारी तड़प के लिए
तुम्हारे अधूरे सपनों के लिए
तुम्हारी असमय मृत्य के लिए...
तुम्हारे न होने की
न तो ख़ुशी है, न कोई गम
क्यूंकि अगर तुम न जाते
तो शायद ये कविता
मेरे लिए तुम लिख रहे होते...