Sunday, March 31, 2013

मैं शर्मिंदा हूँ समाज के दोगलेपन पर !

कनुप्रिया
आज प्रस्तुत हैं कनुप्रिया (जन्म-17 अगस्त, 1987) की कविताएँ। इनकी कविताओं में एक ओर स्त्री का स्वर प्रस्फुटित होता है, वहीं दूसरी ओर वर्तमान समय में होने वाली कृत्यों को लेकर गुस्सा भी है। साधारण शब्दों में सीधी बात करने वाली ये कविताएँ एक विशेष अर्थ लिए हुए हैं : बीइंग पोएट   
ध्वस्त
चीत्कारती सिंह मर्दिनी,
दहारती है, वेदना में
छत-विछत, लज्जा
द्वेष से, आक्रोश से
भीगी हुई, लाल रंग, कराहती,
सेकती है घावों को,
पोछती है आँचल से
काली सुरंगों से आती आवाजें,
चिल्लाते लोग,
बजती घंटियाँ, प्राथनाएं
उसके लिए
आह...
कानों में पड़ती,
सैकडों रुदन कि
अनवरत विचलित ध्वनियाँ
पस्त पड़ी, घुटनों पर,
शून्य में ताकती
चुनती है टुकड़े,
आत्मसम्मान के
हौसला कर देखती है सड़कों पर,
अनियंत्रित भीड़
, चिल्लाते लोग,
हँसती है और फ़ैल जाती है
एक वितृष्णा, घृणा
उस गहरी चमकती आँखों में...
मैं स्थिर हूँ
अँधेरी दीवारों पर
मोमबत्ती की रौशनी
कितनी तस्वीरें
बनाई थीं,
खेल-खेल में
अचानक ही कुछ आकार,
स्वरूप लेता

कुछ अटपटा-सा
रह जाता।
किताबों के बीच
बैठकर अक्षरों से
हंसी ठिठोली,
बातें अनवरत होती थीं,
सवालों से

गणित की अबूझी दुनिया,
रहस्मयी लगती थी
,
मन कोसों घूम कर आ जाता था
छोटे से शहर
में भी मेरी आँखों में,
दुनिया,
पिता की किताबें
,
एक गलियारा

थी,
मेरी उम्मीदों को हौसला देती
,
उजास-सी हंसी मेरी,
उन्मादों से भरी

रोमांच था
हर क्षण,
संगति संगीत की लहरों से
,
सामंजस्य बैठाती
,
जीवन के पड़ावों में,
आज मैं कटती
अपनी रहस्मयी तिलस्मी दुनिया से
,
धरातल पर तैरती,
पनीली मेरी आँखें
निहारती हैं आईना,
कोई गलियारा
शायद खुला छोड़ा है,
मेरी अल्हरता ने

हवाएं आ रही हैं
हलकीहलकी सुगन्धित...
निर्वस्त्र पौरुषता का दंभ
उन गलियों में जाना चाहती हूँ एक बार
उसी तरह,
महक कर मदहोशी में
,
समझने को अंतर

चाहे अनचाहे संबंधों का,
सुलझाना चाहती हूँ,
कई अवांक्षित
, अघटित होती घटनाएं
क्या स्त्रियां निर्वस्त्र समझ पाती होंगी
अंतर देह का
, वैचारिकता का
धकेलती उन सडांध गलियों में
कई औरतें, मर्ज़ी ना-मर्ज़ी
मगर उनका क्या?
जो बेचना चाहती हैं स्कोर के कंडोम,
और पहुचना चाहती हैं,
कई अनजान रास्तों पर,
इतनी कशमकश कि
अंतर ही धूमिल हो जाता है,
उस खुशनुमा-महकती, फूलों वाली गलिओं का
और हर उस छमिया का जो
हाई प्रोफाइल पार्टिओं की शान होती है
मैं नहीं घृणा करती
उन वेश्यांओं से,
मैं शर्मिंदा हूँ
समाज के दोगलेपन पर
उनके बनाए कुंठित दायरों पर
तुमने औरत को ख़रीदा-बेचा,
लज्जित किया...नगर बधु बनाया

लो! उसने लज्जा ही उतार दी
अब कितना लोगे... स्त्री देह के सौंदर्य का मज़ा
उन गलिओं में, फाइव स्टार्स में
मौजूद हैं हम, उतारे सारे कपडे, खड़े निर्वस्त्र
लज्जा बची कहाँ...लज्जित होने को,
निःशब्द, भोग लो,
क्योंकि तुम अब मौन हो,
निरुत्तर
तुमने ही तो
गढा था षड़यंत्र
पहुंचा दिया, कोठे पर, दे दी कई उपाधियाँ
अब तुम्हारी लगाम है
हमारे पास,
क्या करोगे, स्त्री देह के बिना?
तुम सोचो!
कल्पना करो, महकती गलिओं की या
चमचमाते बार्स की
जहाँ तुम भी निर्वस्त्र हो लज्जित
और हम है कामयाब सम्भोगित करने में
,
पौरुषता का दंभ!!