Wednesday, July 17, 2013

कविता की मुलायम बेल, दार्शनिकता की सीधी-सपाट दीवार पर बमुश्किल ही चढ़ पाती है, पर एक कवि के रूप में समर्थ वशिष्ट ऐसा कर सकने में पूर्णत समर्थ जान पड़ते हैं। उनकी कविताओं में जीवन-दर्शन की बारीकियां दर्ज़ हैं, जो कविता के शब्दों में आसानी से चाशनी की तरह घुल-मिल जाती हैं। दर्शन के दैनंदिनी सिद्धांत जो सामान्यतः आज के दौर में एक ढेले की तरह सड़क के किनारे कर दिए गए हैं, उन्हीं नज़रंदाज़ कर दिए गए दार्शनिकता के सिद्धांतों को कवि समर्थ एक धातु की तरह इस्तेमाल कर सटीक समिक्ष्रण बनाते हैं, जो कविता की नर्म तासीर को यथावत बनाए रखता है। समर्थ की कविता गहरी समझ की कविता है, जो खरगोश की तरह सरपट न भाग कर एक कछुए की तरह इंतज़ार की आहटों को गुना करती हैं। आईए समर्थ वशिष्ट की इन कविताओं से रूबरू हुआ जाए - विपिन चौधरी

स्त्रियाँ
मैंने देखा है उन्हें
ऐन पगलाहट के क्षणों में भी
होश संभाले
चीख़ते-चिल्लाते
तानाशाह के क़दमों से
अपने मारे जा चुके बेटों को उठाते
विशाल सेनाएं कदमताल करतीं हैं
क्षितिज तक 
आती हैं उन दिशाओं से जिनके बारे कोई नहीं जानता
चिंता में डूबी उनकी आंखों से गुज़र जाती हैं
उनके पास सिर्फ़ एक तिहाई इतिहास है
और सारी की सारी अफ़वाहें
वो धूल भरा पंख है
किसी शक्तिशाली सिंहासन के मुकुट में लगा हुआ
किसी चमकते हुए दिन पति छोड़ जाता है
लौटकर आते हैं बेटे भिक्षुओं के भेस में
एक स्त्री ढूंढ़ती है अपनी नींद के पाँच घंटे
रात की मुर्दार शांति में सुबकती है मेरी मां
ऊंघते हुए मुझे कहानियां सुनाती है
मेरी बांहों में पिघलती एक स्त्री
मेरे शरीर के सब अंगों को
जोड़े रखती है एक साथ
हज़ारों साल से जारी है इंतज़ार
औरतें जो चली गईं
उनका बाक़ी नहीं कोई निशान
एक स्त्री के पास जाने को
कोई जगह नहीं होती।
शेष
मुझे याद नहीं रहते हैं चेहरे
इसकी आप ऐसे व्याख्या भी कर सकते हैं
कि मुझे भूल जाते हैं चेहरे
पर नहीं
मुझे याद नहीं रहते चेहरे
मुझे याद रहती हैं भवें, ओंठ
कलमों के कटाव भी
पर इस सभी से
एक मुक़्कमल चेहरा नहीं जोड़ पाता है
मेरा दिमाग़
गहरी नींद से तपककर उठाता है
मुझे जो दु:स्वप्न
उसमें झुका रहता है मुझपर
बिल्कुल सपाट चेहरे वाला कोई
फ़िल्में देखते भी अक़्सर
खूबसूरत चेहरों से ज़्यादा
इंतज़ार रहता है मुझे
पुष्ट नितंबों का
बहरहाल, हालत ये है कि
मुझे लगने लगा है
सैंकड़ों आंखों सी मेरी आंखों
और हज़ारों नाकों सी मेरी नाक
कोई भी सोच नहीं पाएगा
कोई एक साथ
कैसा लगूंगा स्मृतियों में मैं?
शायद याद रहे मेरी गेंद सी तोंद!
माँ
सिरहाने ’मीर’ के आहिस्ता बोलो...
सोचते-सोचते
नींद में प्रवेश कर गया होगा
उसका मस्तिष्क
जिव्हा के कसैलेपन को
आत्मसात करते
धीरे-धीरे
घुल रहें होंगे
रक्त प्रवाह में
दवाइयों के अवयव
गिर रही होगी
शर्करा।
कैसे कल्पित करूं
उसके डरावने सपनों के रंग
उनमें हाथ
थोड़ा गीला किए बगैर?
धीरे से छोड़ दूं
माथे पर एक चुंबन
इससे पहले कि
वो उठे
और पूछे वे प्रश्न
जिनके उत्तर 
वो जानती है
पर जानना नहीं चाहती।
जीना
वैसे नहीं
मेरे बच्चे
जैसे काठ की कोठरी में
क़ैद रहती है अखरोट की गिरी
तोड़े जाने का करती इंतज़ार
वैसे नहीं जैसे
बढ़ती जाती हैं कुछ मूर्ख नौकाएँ
रेडियो पर गूँज रहीं
तूफ़ान की चेतावनियों के बावजूद
रहना तरल
पेड़ की पत्तियों के बीच
टपकती बूंद के मानिंद
मिले जब किसी सीप की ओट
धड़कती, जीवित
कर लेना अपना एक घर सुदृढ़
लड़ना
कि सबको नहीं मिलता
यहाँ एक घर
अपनी धुन की सुनना
सूरज रखेगा तुम्हारे सर पर हाथ
गुरुत्व
पेट भर खा लेने के बाद
अलसा जाते हैं जैसे
हाथी भी चींटी भी
अपनी ही टांगों पर ढह जाने का
जोखि़म लिए चलता है जैसे
ट्रायनोसॉरस रेक्स
आखिरी चमक की कौंध में सिकुड़कर
बनता जाता है जैसे कोई रक्तदानव
ब्लैक होल
सिक्के से भारी होते हैं हम कहीं भीतर
हीलियम से हल्के ज़्यादातर।
जन्म लेता है एक शब्द
हौले-हौले जन्म लेता है
एक शब्द
जैसे जुड़ी हो उसके साथ
भरे-पूरे किरदारों वाली
कोई कथा
आप कहेंगे ज़मीन
तो मौजूद हो सकती है वहां
बख़्तरबंद सिपाहियों की पूरी कतार
भूमि पर चढ़ाई करती
यूंही नहीं कह सकते
आप किसी फल को आम
अपनी जिव्हा पर टपक आए
रस का आस्वादन किए बगैर
पीड़ा से बिलबिला उठेंगे आप
ततैया के दंश से
पर कुछ भी नहीं होगा वह
भिरड़ के लड़ने के दर्द के मुक़ाबले
बैंगलोर्ड हो जाएगा अमरीका में कोई
डूब जाएगी आर्नल्ड श्वाज़ेनेगर की छवि
प्लूटो के ग्रहत्व की तरह।
हौले-हौले जन्म लेता है एक शब्द
उसे गढ़ता है तीन साल का एक बच्चा
भूल जाता है, फिर करता है याद 
तीन बरस के अपने बच्चे से खेलता हुआ।
नदी सा बन जाता है कभी कोई शब्द
जैसमीन के फूल की सफ़ेदी में
जुड़ जाता है क्रांति का रंग
हौले-हौले यूं बना कोई शब्द
जब देता है शब्दकोश पर दस्तक
तो चौंक जाती है अचानक भाषा
कि अरे, देखा ही नहीं मैंने
आते हुए दबे-पांव तुम्हें!
इराक़, एक प्रार्थना
मेरी
     धूसर-हरी 
                ज़मीन पर
वज्रपात
        गड़गड़ाहट
                      चुप्पी
                            रक्त
मेरी
    धूसर-हरी
              ज़मीन पर
पास्ता, कैचॅप
             भागम-भाग
                        निंदनीय
                                 मेज़ के सलीक़े
मेरी अंजुरी में
              रौशनी
रौशनी
        छूता हूँ मैं
रौशनी
      ये मेरा संसार
रौशनी
      तुम धूल में मिला देती हो
                                     मुझे
जैसे कोई नन्हा दानव
                            सीख रहा हो 
                                          अपने त्रिशूल का उपयोग
प्रभु मेरे!
      धृष्टताओं के
                   रंगों के
                         अग्नि के
जैसे 
    कोई चायवाला
                उबालता है अपना दूध
                                        बारम्बार
जैसे
   जंग खाया 
            कोई कवि
                    जोड़ता है शब्द
भरो
    मेरे घाव
           पूरे करो
                   मोटापे में देखे ख़्वाब
लौट आओ
दो जय
       दो पराजय
दो जीवन
       दो मृत्यु
विद्रोह
जब एक क्षण मक्की के दाने की तरह फूटता है 
तब ही हमें अपनी उंगलियाँ गिनना सूझता है
मरणासन्न नेता रैलियों में पेसमेकर संभालते हैं
अर्थशास्त्री की नपी-तुली आवाज़ 
टीवी से करती है अचरज 
धरती पर कहाँ जीने की कीमत धरती है?
कविता तक अपनी सहिष्णुता का अस्त्र खो बैठती है 
सर्दियों के ओले भूल जाते हैं कब लौटना है घर —
कहीं कोई जिस पर हमें सदा विश्वास था 
हमारी प्रार्थनाओं से फेर लेता है मुँह
और तब हमारी जड़ें मांगती हैं जुंबिश 
ध्येय खोजती बाज़ुएँ खुलती जाती हैं 
और हर नारा एक ही भाषा बोलता है —
अब उठें भाई!
इससे पहले कि साँझ का आखिरी दरवाज़ा 
भन्नाया जाए हम पर
कितनी तकनीकी, स्वामीनाथन
कितनी तकनीकी, स्वामीनाथन
कि ग्रीष्म से झुलसी सड़क पर
चलते तुम्हारे पांव
पाएँ कुछ आराम
सत्तर पार की इस उम्र में
सुबह जब तुम लौटाओ
किसी परेड में तैनात
सिपाही सी कड़क मेरी कमीज़ें
विस्मय से भरीं तुम्हारी आंखें
समझें मेरे लैपटॉप की टिमटिमाती बत्तियां
फोन के छुअन से चलने का विज्ञान
मन करता है स्वामीनाथन
करूं तुमसे बहुत सी बातें
पूछूं तुम्हारे पोतों के नाम
जानूं तुम्हारे महानायकों के
काले चश्मे पहनने का रहस्य
तुम जानते भी हो स्वामीनाथन
पहली दुनिया में गिना जाने वाला है
भारत
कितनी तकनीकी
कि हमें मिल जाए चार शब्दों की एक भाषा
जिसमें बतिया पाएं सिर्फ़ एक बार खुलकर
तमिल की छंटी क्यारियों
और हिन्दी के सुघड़ स्तनों
से परे
नवगीत
खाली हो टंकी जब सूखे हों नल
शॉवर में रहता है थोड़ा सा जल
ऐसे ही जाता है जीवन निकल
जगमग उजालों से लगता है डर
घर लौटूं, तकिए पे रखूं जो सर
राहत कि जैसे हो गर्मी में ज्वर
दिनभर निकलते ही रहते हैं काम
खाली सी आंखों में दुनिया तमाम
इंसान होने के सब ताम-झाम
चिल्लाती सुबहों में फैले उजास
जागूं मैं ज्यूं ही इक कविता उदास
जम्हाई लेती सी आ बैठे पास।