Thursday, November 29, 2012

अली सरदार जाफ़री की जन्मतिथि !

अली 'सरदार' जाफ़री
आज ज्ञानपीठ पुरस्कार (1997) से सम्मानित मशहूर शायर अली सरदार जाफ़री (29 नवम्बर 1913 - 01 अगस्त 2000) की जन्मतिथि है। इस मौक़े पर पेश हैं कुछ ग़ज़लें : बीइंग पोएट
1.
काम अब कोई न आयेगा बस इक दिल के सिवा
रास्ते बन्द हैं सब कूचा-ए-क़ातिल के सिवा
बाइस-ए-रश्क़ है तन्हारवी-ए-रहरौ-ए-शौक़
हमसफ़र कोई नहीं दूरी-ए-मंजिल के सिवा
हम ने दुनिया की हर इक शै से उठाया दिल को
लेकिन इक शोख़ के हंगामा-ए-महफ़िल के सिवा
तेग़ मुंसिफ़ हो जहाँ दार-ओ-रसन हों शाहिद
बेगुनाह कौन है उस शहर में क़ातिल के सिवा
जाने किस रंग से आई है गुलशन में बहार
कोई नग़्मा ही नहीं शोर-ए-सिलासिल के सिवा
2.
लू के मौसम में बहारों की हवा माँगते हैं
हम क़फ़े-दस्ते-ख़िज़ाँ पर भी हिना माँगते हैं
हमनशीं सादादिली-हाए-तमन्ना मत पूछ
बेवफ़ाओं से वफ़ाओं का सिला माँगते हैं
काश कर लेते कभी काबा-ए-दिल का भी तवाफ़
वो जो पत्थर के मकानों से ख़ुदा माँगते हैं
जिसमें हो सतवते-शाहीन की परवाज़ का रंग
लबे-शाइर से वो बुलबुल की नवा माँगते हैं
ताकि दुनिया पे खुले उनका फ़रेबे-इंसाफ़
बेख़ता होके ख़ताओं की सज़ा माँगते हैं
तीरगी जितनी बढ़े हुस्न हो अफ़ज़ूँ तेरा
कहकशाँ माँग में
, माथे पे ज़िया माँगते हैं
यह है वारफ़्तगिए-शौक़ का आलम सरदार
बारिशे-संग है और बादे-सबा माँगते हैं
3.
आये हम ग़ालिब-ओ-इक़बाल के नग़्मात के बाद
मुसहफफ़े-इश्क़ो-जुनूँ हुस्न की आयात के बाद
ऐ वतन ख़ाके-वतन वो भी तुझे दे देंगे
बच गया है जो लहू अब के फ़सादात के बाद
नारे-नुम्रूद यही और यही ग़ुलज़ारे-ख़लील
कोई आतिश नहीं आतिशक़दा-ए-ज़ात के बाद
राम-ओ-गौतम की ज़मीं हुर्मते-इन्साँ की अमीं
बाँझ हो जाएगी क्या ख़ून की बरसात के बाद
हमको मालूम है वादों की हक़ीक़त क्या है
बारिशे-संगे-सितम
, ज़ामे-मुदारात के बाद
तश्नगी है कि बुझाये नहीं बुझती सरदार
बढ़ गयी कौसरो-तस्नीम की सौग़ात के बाद
4.
कोई हो मौसम थम नहीं सकता रक़्से-जुनूँ दीवानों का
ज़ंजीरों की झनकारों में शोरे-बहाराँ बाक़ी है
इश्क़ के मुजरिम ने ये मंज़र औ़ज़े-दार से देखा है
ज़िन्दाँ-ज़िन्दाँ
, महबस-महबस, हल्क़ःए-याराँ बाक़ी है
बर्गे-ज़र्द के साये में भी जूए-तरन्नुम जारी है
ये तो शिकस्ते-फ़स्ले-ख़िज़ाँ है
, सौते-हज़ाराँ बाक़ी है
मुह्तसिबों की ख़ुश्क़ी-ए-दिल पर एक ज़माना हँसता है
तर है दामन और वक़ारे-बादा-गुसाराँ बाक़ी है
फूल-से चेहरे, चाँद-से मुखड़े नज़रों से रूपोश हुए
आरिज़े-दिल पर रंगे-हिना है
, दस्ते-निगाराँ बाक़ी है
5.
एक जू-ए-दर्द दिल से जिगर तक रवाँ है आज
पिघला हुआ रगों में इक आतिश-फ़िशाँ है आज
लब सी दिये हैं ता न शिकायत करे कोई
लेकिन हर एक ज़ख़्म के मूँह में ज़बाँ है आज
तारीकियों ने घेर् लिया है हयात को
लेकिन किसी का रू-ए-हसीं दर्मियाँ है आज
जीने का वक़्त है यही मरने का वक़्त है
दिल अपनी ज़िन्दगी से बहुत शादमाँ है आज
हो जाता हूँ शहीद हर अहल-ए-वफ़ा के साथ
हर दास्तान-ए-शौक़ मेरी दास्ताँ है आज
आये हैं किस निशात से हम क़त्ल-गाह में
ज़ख़्मों से दिल है चूर नज़र गुल-फ़िशाँ है आज
ज़िन्दानियों ने तोड़ दिया ज़ुल्म का ग़ुरूर
वो दब-दबा वो रौब-ए-हुकूमत कहाँ है आज
6.
कभी ख़न्दाँ, कभी गिरियाँ, कभी रक़्साँ चलिए
दूर तक साथ तिरे
, उम्रे-गुरेज़ाँ, चलिए
ज़ौक़े-आराइश-ओ-गुलकारी-ए-अश्क़-ए-ख़ूँ से
कोई भी फ़स्ल हो
, फ़िरदौस-ब-दामाँ चलिए
रस्मे-देरीनःए-आलम को बदलने के लिए
रस्मे-देरीनःए-आलम से गुरेज़ाँ चलिए
आसमानों से बरसता है अँधेरा कैसा
अपनी पलकों पे लिए जश्ने-चराग़ाँ चलिए
शोलः-ए-जाँ को हवा देती है ख़ुद बादे-समूम
शोलः-ए-जाँ की तरह चाक-गिरीबाँ चलिए
अक़्ल के नूर से दिल कीजिए अपना रौशन
दिल की राहों से सूए-मंज़िले-इन्साँ चलिए
ग़म नयी सुब्‌ह के तारे का बहुत है लेकिन
लेके अब परचमे-ख़ुर्शीदे ज़र-अफ़शाँ चलिए
सर-ब-क़फ़ चलने की आदत में न फ़र्क़ आ जाए
कूचःए-दार में सरमस्तो-ग़ज़ल-ख़्वाँ चलिए
7.
शिकस्त-ए-शौक को तामील-ए-आरजू कहिये
के तिश्नगी को भी पैमान-ओ-सुबू कहिये
ख़याल-ए-यार को दीजिये विसाल-ए-यार का नाम
शब-ए-फिराक को गेसू-ए-मुश्कबू कहिये
चराग-ए-अंजुमन हैरत-ओ-नजारा हैं
लालारू जिनहें अब बाब-ए-आरजू कहिये
शिकायतें भी बहुत हैं हिकायतें भी बहुत
मजा तो जब है के यारों के रु-ब-रू कहिये
महक रही है गज़ल जिक्र-ए-जुल्फ-ए-खुबाँ से
नसीम-ए-सुब्ह की मानिंद कू-ब-कू कहिये
ऐ हुक्म कीजिये फिर खंजरों की दिलजारी
जहाँ-ए-जख्म से अफसाना-ए-गुलू कहिये
जुबाँ-ए-शोख से करते है पुरशिश-ए-अहवाल
और उसके बाद ये कहते हैं आरजू कहिये
है जख्म जख्म मगर क्यूँ ना जानिये उसे फूल
लहू लहू है मगर क्यूँ उसे लहू कहिये
जहाँ जहाँ भी खिजाँ है वहीं वहीं है बहार
चमन चमन यही अफसाना-ए-नुमू कहिये
जमीँ को दीजिये दिल-ए-मुद्दा तलब का पयाम
खिजाँ को वसत-ए-दामाँ-ए-आरजू कहिये
साँवरिये गज़ल अपनी बयाँ-ए-गालिब से
जबाँ-ए-मीर में भी हाँ कभू कभू कहिये
मगर वो हर्फ धड़कने लगे जो दिल की तरह
मगर वो बात जिसे अपनी गुफ्तगू कहिये
मगर वो आँख के जिसमें निगाह अपनी हो
मगर वो दिल जिसे अपनी जुस्तजू कहिये
किसी के नाम पे सरदार खो चुके हैं जिसे
उसी को अह्ल-ए-तमन्ना की आबरू कहिये