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Wednesday, March 27, 2013

कुछ काफ़िर नैन मटकते हों, तब देख बहारें होली की !


प्रिय पाठकों को होली मुबारक़। इस मौक़े पर पेश है नज़ीर अकबराबादी की नज़्म : बीइंग पोएट

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ (चंग) के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।
ख़म शीश-ए-जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की।
        महबूब नशे में छकते हों तब देख बहारें होली की ।।1।।

हो नाच रंगीली परियों का बैठे हों गुलरू रंग भरे।
कुछ भीगी तानें होली की कुछ नाज़ो-अदा के ढंग भरे।
दिल भूले देख बहारों को और कानों में आहंग भरे।
कुछ तबले खड़के रंग भरे कुछ ऐश के दम मुँहचंग भरे।
        कुछ घुँघरू ताल झनकते हों तब देख बहारें होली की ।।2।।

सामान जहाँ तक होता है इस इशरत के मतलूबों का।
वो सब सामान मुहैया हो और बाग़ खिला हो ख़ूबों का।
हर आन शराबें ढलती हों और ठठ हो रंग के डूबों का।
इस ऐश मज़े के आलम में इक ग़ोल खड़ा महबूबों का।
        कपड़ों पर रंग छिड़कते हों तब देख बहारें होली की।।3।।

गुलज़ार खिले हों परियों के, और मजलिस की तैयारी हो।
कपड़ों पर रंग के छीटों से ख़ुशरंग अजब गुलकारी हो।
मुँह लाल, गुलाबी आँखें हों, और हाथों में पिचकारी हो।
उस रंग भरी पिचकारी को, अँगिया पर तककर मारी हो।
        सीनों से रंग ढलकते हों, तब देख बहारें होली की।।4।।

इस रंग रंगीली मजलिस में, वह रंडी नाचने वाली हो।
मुँह जिसका चाँद का टुकड़ा हो औऱ आँख भी मय की प्याली हो।
बदमस्त, बड़ी मतवाली हो, हर आन बजाती ताली हो।
मयनोशी हो बेहोशी हो 'भड़ुए' की मुँह में गाली हो।
        भड़ुए भी भड़ुवा बकते हों, तब देख बहारें होली की।।5।।

और एक तरफ़ दिल लेने को महबूब भवैयों के लड़के।
हर आन घड़ी गत भरते हों कुछ घट-घट के कुछ बढ़-बढ़ के।
कुछ नाज़ जतावें लड़-लड़ के कुछ होली गावें अड़-अड़ के।
कुछ लचकें शोख़ कमर पतली कुछ हाथ चले कुछ तन फ़ड़के।
        कुछ काफ़िर नैन मटकते हों तब देख बहारें होली की।।6।।

यह धूम मची हो होली की और ऐश मज़े का छक्कड़ हो।
उस खींचा-खींच घसीटी पर और भडुए रंडी का फक्कड़ हो।
माजून शराबें, नाच, मज़ा और टिकिया, सुलफ़ा, कक्कड़ हो।
लड़-भिड़के 'नज़ीर' फिर निकला हो कीचड़ में लत्थड़-पत्थड़ हो।
        जब ऐसे ऐश झमकते हों तब देख बहारें होली की।।7।।

Thursday, March 21, 2013

नज़्म कहते हो तो कहो मगर ये याद रहे !


दोस्तों! आज विश्व कविता दिवस (21 मार्च) है। यूनेस्को द्वारा 1999 में घोषित यह दिन अलग-अलग देशों में अलग-अलग तारीख को मनाया जाता है। यूरोप के कुछ देशों ने रोम के महान कवि विर्गिल (पब्लियस वर्गिलिउस मारो) के जन्मतिथि 15 अक्टूबर को विश्व कविता दिवस के रूप में चुना। कनाडा और कुछ देशों में कविता दिवस नवम्बर में भी मनाने की रिवायत है। इस मौक़े पर पेश कर रहा हूँ अपनी ही एक नज़्म जिसका उनवान है मशवरा : त्रिपुरारि कुमार शर्मा    
नज़्म कहते हो तो कहो मगर ये याद रहे
कि तुम कह रहे हो नज़्म ये जिसकी ख़ातिर
उसके आँसू की कोई बूँद न आने पाए
नज़्म गीली जो अगर हो गई किसी कारण
तुम्हारी आँख की पुतली से चिपक जाएगी
सूख जाएगी जैसे सूखे लहू का धब्बा
खुरच दो भी अगर दाग़ तो रह जाएगा
एक उँगली के इशारे से लोग पूछेंगे
तुम्हारे दाग़ में दुनिया किसी की देखेंगे
जो आँख मूँद भी लो फिर भी भीगी पलकों पर
एक टूटा हुआ चेहरा किसी का उभरेगा
तुम्हारी साँस के सीने पे पाँव रखेगा
तुम्हारी धड़कनों की धज्जियाँ उड़ाते हुए
सफ़ेद ओस के टुकड़ों को भर के मुट्ठी में
चमकती चुप्पियों को चाँद में चुनवाएगा
कैसे देखोगे अपनी आह को तुम मरते हुए
अपनी आवाज़ को तुम किस तरह दफ़नाओगे
ऐसे हालात में एक नज़्म भी कह पाओगे

Tuesday, December 18, 2012

देखता हूँ 'उफ़क़ के उस पार' जा कर !

यह नज़्म 07 नवम्बर 2008 को लिखी थी मैंने। तब मैं ग्रेजुएशन का छात्र हुआ करता था। उन्हीं दिनों हिंदू कॉलेज में प्रतियोगिता के दौरान इस नज़्म को पुरस्कृत भी की गई थी। आज आपके लिए 'उफ़क़ के उस पार' : त्रिपुरारि कुमार शर्मा
देखता हूँ 'उफ़क़ के उस पार' जा कर
कहीं सफ़ेद अँधेरा
कहीं स्याह उजाला
खो दिया है दर्द ने एहसास अपना
क़
रीबी इतनी कि
देख तक नहीं सकते
कोयला सुलग रहा है
अंगीठी जल रही है बदन में
भुने हुए हर्फ़
काग़ज़ पर गिरते हैं जब
तो 'छन्' से आवाज़ आती है
गले में अटक जाता है
साँस का टुकड़ा  
मेरी पलकें नोचता है कोई
फिर देखती है नंगी आँखें
'एक छिली हुई रूह'
बिल्कुल चाँद की तरह
सोचता हूँ सन्नाटा बुझा दूँ
बहने लगती है उंगलियाँ
बिखरने लगता है वजूद
सोच पिघलती है धुआं बनकर
सहसा सूख जाती है नींद की ज़मीन
रात की दीवार में दरार हो जैसे
फ़्रेम
ख़ाली है अब तक
मुस्कराहट बाँझ हो गई
कुछ हर्फ़-सा नहीं मिलता
बहुत उदास हैं टूटे हुए नुक़्ते
समय के माथे पर ज़ख़्म-सा क्या है ?
जमने लगी है चोट की परत
चीखते हैं मुरझा हुए मौसम
अभी बाक़ी है मरासिम कोई
अब तो दिन रात यही करता हूँ
उफ़क़
से जब भी लहू रिसता है
देखता हूँ 'उफ़क़ के उस पार' जा कर। 

Saturday, September 01, 2012

राही मासूम ‘रज़ा’ की जन्मतिथि !

राही मासूम रज़ा
आज मशहूर शायर और नस्रनिगार राही मासूम रज़ा (01 सितंबर - 15 मार्च 1992) की जन्मतिथि है। इस मौक़े पर पेश है उनकी कुछ नज़्में : बीइंग पोएट   
मर्सिया
एक चुटकी नींद की मिलती नहीं
अपने ज़ख़्मों पर छिड़कने के लिए
हाय हम किस शहर में मारे गये
घंटियाँ बजती हैं
ज़ीने पर क़दम की चाप है
फिर कोई बेचेहरा होगा
मुँह में होगी जिसके मक्खन की ज़ुबान
सीने में होगा जिसके इक पत्थर का दिल
मुस्कुराकर मेरे दिल का इक वरक़ ले जाएगा
हम तो हैं कंगाल
हम तो हैं कंगाल
हमारे पास तो कोई चीज़ नहीं
कुछ सपने हैं
आधे-पूरे
कुछ यादें हैं
उजली-मैली
जाते-जाते
आधे-पूरे सारे सपने
उजली-मैली सारी यादें
हम मरियम को दे जाएंगे
गंगोली के कच्चे घर में उगने वाला सूरज
आठ मुहर्रम की मजलिस का अफ़सुर्दा-अफ़सुर्दा हलवा
आँगन वाले नीम के ऊपर
धूप का एक शनासा टुकड़ा
गंगा तट पर
चुप-चुप बैठा
जाना-पहचाना इक लम्हा
बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई
अहमद जान के टेबल की चंचल पुरवाई
खाँ साहिब की ठुमरी की क़ातिल अंगड़ाई
रैन अँधेरी
डर लागे रे
मेरी भवाली की रातों की ख़ौफ़ भारी लरज़ाँ तन्हाई
छोटी दव्वा के घर की वो छोटी-सी सौंधी अँगनाई
अम्मा जैसा घर का आँगन
अब्बा जैसे मीठे कमरे
दव्वा जैसी गोरी सुबहें
माई जैसी काली रातें
सब्ज़ परी हो
या शहज़ादा
सबकी कहानी दिल से छोटी
फड़के
घर में आते-आते
हर लम्हे की बोटी-बोटी
मेरे कमरे में नय्यर पर हँसने का वो पहला दौरा
लम्हों से लम्हों की क़ुरबत
लम्हों से लम्हों की दूरी
गंगोली की
गंगा तट की
ग़ाज़ी पुर की हर मजबूरी
मेरे दिल में नाच रही है
जिन-जिन यादों की कस्तूरी
धुंधली गहरी
आधी-पूरी
उजली-मैली सारी यादें
मरियम की हैं
जाते-जाते
हम अपनी ये सारी यादें
मरियम ही को दे जाएँगे
अच्छे दिनों के सारे सपने
मरियम के हैं
जाते-जाते
मरियम ही को दे जाएँगे
मरियम बेटी
तेरी याद की दीवारों पर
पप्पा की परछाई तो कल मैली होगी
लेकिन धूप
तेरी आँखों के
इस आँगन में फैली होगी
लेकिन मेरा लावारिस दिल
मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी
मंदिर राम का निकला
लेकिन मेरा लावारिस दिल
अब जिस की जंबील में कोई ख़्वाब
कोई ताबीर नहीं है
मुस्तकबिल की रोशन-रोशन
एक भी तस्वीर नहीं है
बोल ऐ इंसान, ये दिल, ये मेरा दिल
ये लावारिस, ये शर्मिन्दा-शर्मिन्दा दिल
आख़िर किसके नाम का निकला
मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी
मंदिर राम का निकला
बन्दा किसके काम का निकला
ये मेरा दिल है
या मेरे ख़्वाबों का मक़तल
चारों तरफ बस ख़ून और आँसू, चीख़ें, शोले
घायल गुड़िया
खुली हुई मुर्दा आँखों से कुछ दरवाज़े
ख़ून में लिथड़े कमसिन कुरते
एक पाँव की ज़ख़्मी चप्पल
जगह-जगह से मसकी साड़ी
शर्मिन्दा नंगी शलवारें
दीवारों से चिपकी बिंदी
सहमी चूड़ी
दरवाज़ों की ओट में आवेजों की कबरें
ऐ अल्लाह, ऐ रहीम, करीम, ये मेरी अमानत
ऐ श्रीराम, रघुपति राघव, ए मेरे मर्यादा पुरुषोत्तम
ये आपकी दौलत आप सम्हालें
मैं बेबस हूँ
आग और ख़ून के इस दलदल में
मेरी तो आवाज़ के पाँव धँसे जाते हैं।

Friday, August 31, 2012

अमृता प्रीतम की जन्मतिथि !

अमृता प्रीतम
आज पंजाबी की सबसे लोकप्रिय लेखिका अमृता प्रीतम (31 अगस्त 1919 - 31 अक्तूबर 2005) की जन्मतिथि है। इस मौक़े पर पेश हैं उनकी कुछ नज़्में : बीइंग पोएट

आत्ममिलन

मेरी सेज हाजिर है
पर जूते और कमीज की तरह
तू अपना बदन भी उतार दे
उधर मूढ़े पर रख दे
कोई खास बात नहीं
बस अपने अपने देश का रिवाज है

हादसा

बरसों की आरी हंस रही थी
घटनाओं के दांत नुकीले थे
अकस्मात एक पाया टूट गया
आसमान की चौकी पर से
शीशे का सूरज फिसल गया
आंखों में ककड़ छितरा गये
और नजर जख्मी हो गयी
कुछ दिखायी नहीं देता
दुनिया शायद अब भी बसती है

कुफ़्र

आज हमने एक दुनिया बेची
और एक दीन ख़रीद लिया
हमने कुफ़्र की बात की
सपनों का एक थान बुना था
एक गज़ कपड़ा फाड़ लिया
और उम्र की चोली सी ली
आज हमने आसमान के घड़े से
बादल का एक ढकना उतारा
और एक घूँट चाँदनी पी ली
यह जो एक घड़ी हमने
मौत से उधार ली है
गीतों से इसका दाम चुका देंगे

मुकाम

क़लम ने आज गीतों का क़ाफ़िया तोड़ दिया
मेरा इश्क़ यह किस मुकाम पर आ गया है
देख नज़र वाले, तेरे सामने बैठी हूँ
मेरे हाथ से हिज्र का काँटा निकाल दे
जिसने अँधेरे के अलावा कभी कुछ नहीं बुना
वह मुहब्बत आज किरणें बुनकर दे गयी
उठो, अपने घड़े से पानी का एक कटोरा दो
राह के हादसे मैं इस पानी से धो लूंगी...

राजनीति

सुना है राजनीति एक क्लासिक फिल्म है
हीरो : बहुमुखी प्रतिभा का मालिक
रोज अपना नाम बदलता है
हीरोइन : हकूमत की कुर्सी वही रहती है
ऐक्स्ट्रा : लोकसभा और राजसभा के मैम्बर
फाइनेंसर : दिहाड़ी के मज़दूर
,
कामगर और खेतिहर
(फाइनांस करते नहीं
,
करवाये जाते हैं)
संसद : इनडोर शूटिंग का स्थान
अख़बार : आउटडोर शूटिंग के साधन
यह फिल्म मैंने देखी नहीं
सिर्फ़ सुनी है
क्योंकि सैन्सर का कहना है

'नॉट फॉर अडल्स।'

चुप की साज़िश

किसी ने इन्सान की
छाती में सेंध लगाई है
रात ऊँघ रही है...
हर चोरी से भयानक
यह सपनों की चोरी है।
चोरों के निशान
हर देश के हर शहर की
हर सड़क पर बैठे हैं
पर कोई आँख देखती नहीं
,
न चौंकती है।
सिर्फ़ एक कुत्ते की तरह
एक ज़ंजीर से बँधी
किसी वक़्त किसी की
कोई नज़्म भौंकती है।

मेरा पता

आज मैंने
अपने घर का नम्बर मिटाया है
और गली के माथे पर लगा
गली का नाम हटाया है
और हर सड़क की
दिशा का नाम पोंछ दिया है
पर अगर आपको मुझे ज़रूर पाना है
तो हर देश के
, हर शहर की,
हर गली का द्वार खटखटाओ
यह एक शाप है
, यह एक वर है
और जहाँ भी
आज़ाद रूह की झलक पड़े
समझना वह मेरा घर है।

आदि स्मृति

काया की हक़ीक़त से लेकर
काया की आबरू तक मैं थी
,
काया के हुस्न से लेकर

काया के इश्क़ तक तू था।
यह मैं अक्षर का इल्म था
जिसने मैं को इख़लाक दिया।
यह तू अक्षर का जश्न था
जिसने
'वह' को पहचान लिया,
भय-मुक्त मैं की हस्ती
और भय-मुक्त तू की
, 'वह' की
मनु की स्मृति
तो बहुत बाद की बात है...

ख़ाली जगह

सिर्फ़ दो रजवाड़े थे
एक ने मुझे और उसे
बेदखल किया था
और दूसरे को
हम दोनों ने त्याग दिया था।
नग्न आकाश के नीचे
मैं कितनी ही देर

तन के मेंह में भीगती रही
,
वह कितनी ही देर
तन के मेंह में गलता रहा।
फिर बरसों के मोह को
एक ज़हर की तरह पीकर
उसने काँपते हाथों से
मेरा हाथ पकड़ा!
चल! क्षणों के सिर पर
एक छत डालें
वह देख! परे
सामने उधर
सच और झूठ के बीच

कुछ ख़ाली जगह है...

जब मैं तेरा गीत लिखने लगी

मेरे शहर ने जब तेरे कदम छुए
सितारों की मुठियाँ भरकर
आसमान ने निछावर कर दीं
दिल के घाट पर मेला जुड़ा,
ज्यूँ रातें रेशम की परियां
पाँत बाँध कर आई...
जब मैं तेरा गीत लिखने लगी
काग़ज़ के ऊपर उभर आईं
केसर की लकीरें
सूरज ने आज मेहंदी घोली
हथेलियों पर रंग गई
,
हमारी दोनों की तकदीरें

मैं तुझे फ़िर मिलूंगी

मैं तुझे फ़िर मिलूंगी
कहाँ किस तरह पता नही
शायद तेरी तख्यिल की चिंगारी बन
तेरे केनवास पर उतरुंगी
या तेरे केनवास पर
एक रहस्यमयी लकीर बन
खामोश तुझे देखती रहूंगी
या फ़िर सूरज कि लौ बन कर
तेरे रंगो में घुलती रहूंगी
या रंगो कि बाहों में बैठ कर
तेरे केनवास से लिपट जाउंगी
पता नहीं कहाँ किस तरह
पर तुझे जरुर मिलूंगी
या फ़िर एक चश्मा बनी
जैसे झरने से पानी उड़ता है
मैं पानी की बूंदें
तेरे बदन पर मलूंगी
और एक ठंडक सी बन कर
तेरे सीने से लगूंगी
मैं और कुछ नही जानती
पर इतना जानती हूँ
कि वक्त जी भी करेगा
यह जनम मेरे साथ चलेगा
यह जिस्म खतम होता है
तो सब कुछ खत्म हो जाता है
पर चेतना के धागे
कायनात के कण होते हैं
मैं उन कणों को चुनुंगी
मैं तुझे फ़िर मिलूंगी
 !!

Tuesday, August 28, 2012

सफ़दर इमाम क़ादरी की जन्मतिथि !

आज सफ़दर इमाम क़ादरी (जन्म : 28 अगस्त 1965) की जन्मतिथि है। इस मौक़े पर हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओं में मुख्यतः आलोचना-शोध के क्षेत्र में सक्रिय सफ़दर साहिब की कुछ नज़्में : बीइंग पोएट
ख़्वाब का चेहरा
पत्थर, मिट्टी, पेड़, बर्फ़
बादल और आकाश
रौशनी और रोमानी धूप
ख़्वाब का चेहरा कैसा होगा?
आओ, इस वादी में
तकमील की क़समें पूरी कर लें!
कहानी की तकमील
दाएँ पहाड़ पर मिट्टी है
बाएँ ऊँचे-ऊँचे पेड़
आगे गहरी खाई
आँखें जब ऊपर करता हूँ
बादल झुक कर पर्वत पर
अपने नाज़ुक होंठों से
लम्स का नज़राना टपकाते हैं
एक कहानी पूरी हो जाती है
दुआ
हमारे कथाकार दोस्त
कासिम ख़ुरशीद ने पूछा
शिमले से हमारे लिए क्या लाए
आप की उन्नति के लिए
आठ हज़ार फ़ुट ऊँचाई से दुआ की
शिमला से आसमान की दूरी कम हो जाती है
अर्श नज़दीक होता है
बन्दे और ख़ुदा के बीच की दूरी
घट जाती है
दुआ कुबूल हो जाती है
पहाड़ की सबसे ऊँची चोटी पर खड़े होकर
आँखें बन्द करके
हवाओं में बाँहें फैलाओ
"ख़ुदा बन्दे से ख़ुद पूछे
बता तेरी रज़ा क्या है?"
धूप
सूखे और ऊँचे पहाड़ों को
मटियाले रंगों की चमक दे जाती है
अपनी पहाड़ी से अलग
दूसरी पहाड़ी पर
सुरमई हो जाती है
उचटती नज़र डालो
तो धुआँ-धुआँ
बादलों की छाँव की तरह
दिखाई देती है
नंगी आँखों से देखो
तो लूट लेने या खा जाने को जी चाहे
ऐसी रौशन और चमकदार
बदन के पोर-पोर में
उतरने वाली धूप
कुछ कहना चाहती है!!!
हिमाचल की औरतें
हिमाचल की औरतें 
ललचाती नहीं
सौ-पचास में
अद्वितीय सुन्दरी भी
नज़र आ जाती है
लेकिन उसेलेकर
भाग जाने को जी नहीं चाहता
थोड़ी देर देख कर
जी में ठंडक भर लेने से
काम चल जाता है
माल रोड पर
करवाचौथ की रात
शिमला की तमाम ख़ूबसूरत
औरतों के हुस्न
और सजावट के सैलाब में भी
पूए चांद की रौशनी में
टहलते हुए
उन दस-बीस हज़ार औरतों को
एक बार देखते हुए गुज़रना 
काफ़ी मालूम हुआ
किसी-किसी शाम
छह-सात डिग्री तापमान के बावजूद
कोई हसीना हलके कपड़ों
स्वेटर और जैकेट के बग़ैर
खुले घेरों के सहारे
खुला निमंत्रण देने की कोशिश करती मिली
लेकिन उसके पीछे भागने की ख़्वाहिश नहीं हुई
क्या उन सुन्दरियों के सारे प्रोवेकेशन
यहाँ के पहाड़ों, धूप, आसमान
और हवाओं ने छीन लिए हैं!
अविश्वासी मौसम
एक रोज़
ज़्यादा ऊँचाई की तरफ़ हम बढ़ रहे थे
कार के बंद शीशे से दूर
पहाड, आसमान और बादलों का खेल
बिल्कुल अनजाना लग रहा था
मौलाना रोम ने सहवास के समय
औरतों के ज़िस्म को
नान-बा के हाथ में
ख़मीर आटे की हर क्षण
बनती और बदलती शक्लों और सूरतों से
स्पष्ट किया था
उस रोज़ पहाड़ के ज़िस्म-व-जान के हाल्कुछ ऐसे ही रहे होंगे
मेरे मुँह से निकल गया--
ये पहाड़ कितने नर्म और मुलायम हैं!
ड्राइवर ने इशारा किया...
शायद आप 'स्नो-फ़ाल' देख सकें
तो क्या बादल और पहाड़ के 'मधुर-मिलन' से
बर्फ़बारी होती है?
साढ़े ग्यारह हज़ार फ़ुट पहुँचते ही
अचानक सर्दी का एहसास बढ़ा
अंदर से गुदगुदी होने लगी
मौसम ज़रा भारी हो गया
हमने जैकेट पर देखा
बर्फ़ के फाहे
अपनी शक्ल जाहिर कर रहे हैं
घोड़ों पर सवार होकर
तीन-चार किलोमीटर ऊपर पहुँचते ही
जिस रौशन धूप ने हमारा स्वागत किया
वह देखने लायक था
मुझे पहाड़ों के बदलते मौसमों का
अविश्वासी होना अच्छा लगा!

Saturday, August 18, 2012

गुलज़ार की जन्मतिथि !

गुलज़ार
आज हिंदी सिनेमा के मशहूर गीतकार, कथाकार और फ़िल्मकार गुलज़ार (जन्म : 18 अगस्त 1934) की जन्मतिथि है। इस मौक़े पर पेश हैं उनकी कुछ नज़्में : बीइंग पोएट

1.
कई पिंजरों का क़ैदी हूँ
कई पिंजरों में बसता हूँ
मुझे भाती हैं क़ैदें काटना
और अपनी मर्ज़ी से
चुनाव करते रहना
अपने पिंजरों का
मियादें तय नहीं करता मैं रिश्तों की
असीरी ढूँढ़ता रहता हूँ मैं
असीरी अच्छी लगती है

2.
शहर की बिजली गई
बंद कमरे में बहुत देर तक कुछ भी दिखाई न दिया
तुम गई थीं जिस दिन
उस रोज़ भी ऐसा ही हुआ था
और बहुत देर के बाद
आँखें तारीकी से मानूस हुईं तो
फिर से दरवाज़े का खाका-सा नज़र आया था

3.
टूटी-सी नींदें उठाना
जमा करना ख़्वाबों के टुकड़े
जो तकिए से गिरे हों,
करवटों की सिलवटों को खोलना
उनको पिरोना।

जिस्म की कच्ची दरारें ढूँढ़ना
टूटे फूटे लोग ले जाकर
सजा लेता हूँ अपने ताक़चों में
मैं कबाड़ी -
ख़ाली 
डिब्बों बोतलों में नज़्में भरके बेचता हूँ... 

Sunday, August 05, 2012

तुम साँस के सिक्के उछालती रहना


दोस्तों की ख़्वाहिश है कि यह नज़्म पेश करूँ। उनवान है 'तुम साँस के सिक्के उछालती रहना' : त्रिपुरारि कुमार शर्मा

तुम साँस के सिक्के उछालती रहना
मैं गले का गुल्लक सम्भाले रक्खूँगा

तुम धमनियों में धीमा लहू बन जाना
मैं टूटी धड़कनों को सीने में चिपकाऊँगा

तुम आँख के आँगन में छुपा लेना मुझे
मैं अपनी उम्र सारी खेलकर गुज़ारूँगा

पीली धूप से जब तुम पकाओगी मौसम
लम्हा तोड़कर मैं लम्बा छाता बुन लूँगा

सूखी बारिश से जब टूटेगा प्यासा पानी
तुम्हारे होंठ के बारे में फिर से सोचूँगा

गीली रेत में जिस तरह बूँद बसती है
तुम्हारे जिस्म में अपना वजूद खोजूँगा

तुम साँस के सिक्के उछालती रहना
मैं गले का गुल्लक सम्भाले रखूँगा 

Wednesday, August 01, 2012

मीना कुमारी की जन्मतिथि !

मीना कुमारी
आज हिंदी सिनेमा की मशहूर अदाकारा “ट्रेजडी क्वीन” मीना कुमारी की जन्मतिथि है। उनका असली नाम माहजबीं बानो (1 अगस्त, 1932 - 31 मार्च, 1972) था। कभी मीना कुमारी ने ख़ुद कहा था कि वो अगर अदाकारा न होतीं, तो एक शायरा होतीं। उनकी जन्मतिथि के मौक़े पर पेश है उनकी कुछ नज़्में : बीइंग पोएट
1.
मेरे महबूब
जब दोपहर को
समंदर की लहरें
मेरे दिल की धड़कनों से हमआहंग होकर उठती हैं
तो आफ़ताब की हयात आफ़री शुआओं से मुझे
तेरी जुदाई को बर्दाश्त करनें की क़ुव्वत मिलती है।
2.
मुहब्बत
क़ौस ए कुज़ह की तरह
क़ायनात के एक किनारे से
दूसरे किनारे तक तनी हुई है
और इसके दोनों सिरे
दर्द के अथह समुन्दर में डुबे हुए हैं।
3.
हर मसर्रत
एक बरबादशुदा ग़म है
हर ग़म
एक बरबादशुदा मसर्रत
और हर तारीकी एक तबाहशुदा रौशनी है
और हर रौशनी एक तबाहशुदा तारिकी
इसी तरह
हर हाल
एर फ़नाशुदा माज़ी
और हर माज़ी
एक फ़नाशुदा हाल
4.
रात काटे से भी नहीं कटती
रात और दिन के इस तसलसुल में
उम्र बांटे से भी नही बंटती
अकेलेपन के अन्धेरें में दूर-दूर तलक
येह एक ख़ौफ़ जी पे धुँआ बनके छाया है
फिसल के आँख से ये छन पिघल न जाए कहीं
पलक पलक ने जिसे राह से उठाया है
शाम का उदास सन्नाटा
धुंधलका
, देख, बढ़ जाता है
नहीं मालूम यह धुंआ क्यों है
दिल तो ख़ुश है कि जलता जाता है
तेरी आवाज़ में तारे से क्यों चमकने लगे
किसकी आँखों की तरन्नुम को चुरा लाई है
किसकी आग़ोश की ठंडक पे है डाका डाला
किसकी बांहों से तू शबनम उठा लाई है
5.
मुहब्बत
बहार की फूलों की तरह मुझे अपने जिस्म के रोएं रोएं से
फूटती मालूम हो रही है
मुझे अपने आप पर एक
ऐसे बजरे का गुमान हो रहा है जिसके रेशमी बादबान
तने हुए हों और जिसे
पुरअसरार हवाओं के झोंके आहिस्ता-आहिस्ता दूर-दूर
पुरसुकून झीलों
रौशन पहाड़ों और
फूलों से ढके हुए गुमनाम ज़ंजीरों की तरफ लिए जा रहे हों
वोह और मैं
जब ख़ामोश हो जाते हैं तो हमें
अपने अनकहे
, अनसुने अल्फ़ाज़ में
जुगनुओं की मानिंद रह रहकर चमकते दिखाई देते हैं
हमारी गुफ़्तगू की ज़बान
वही है जो
दरख़्तों
, फूलों, सितारों और आबसारों की है
ये घने जंगल
और तारीक रात की गुफ़्तगू है जो दिन निकलने पर
अपने पीछे
रौशनी और शबनम के आँसु छोड़ जाती है
, महबूब
आह
मुहब्बत!
6.
ये रात ये तन्हाई
ये दिल के धड़कने की आवाज़

ये सन्नाटा
ये डूबते तारों की

ख़ामोश ग़ज़ल खवानी
ये वक्त की पलकों पर

सोती हुई वीरानी
जज़्बात-ए-मुहब्बत की

ये आख़िरी अंगड़ाई
बजाती हुई हर जानिब

ये मौत की शहनाई
सब तुम को बुलाते हैं

पल भर को तुम आ जाओ
बंद होती मेरी आँखों में
मुहब्बत का
एक ख्वाब़ सजा जाओ
7.
रात सुनसान है
तारीक है दिल का आंगन
आसमां पर कोई तारा न ज़मीं पर जुगनू
टिमटिमाते हैं मेरी तरसी हुइ आँखों में
कुछ दिए
तुम जिन्हे देखोगे तो कहोगे
 - आंसू
दफ़्फ़अतन जाग उठी दिल में वही प्यास, जिसे
प्यार की प्यास कहूं मैं तो जल उठती है ज़बां
सर्द एहसास की भट्टी में सुलगता है बदन
प्यास - यह प्यास इसी तरह मिटेगी शायद
आए ऐसे में कोई ज़हर ही दे दे मुझको
8.
सियाह नक़ाब में उसका संदली चेहरा
जैसे रात की तारीकी में
किसी ख़ानक़ाह का
खुला और रौशन ताक़
जहां मोमबत्तियाँ जल रही हो
ख़ामोश
बेज़बान मोमबत्तियाँ
या
वह सुनहरी जिल्दवाली किताब जो
ग़मगीन मुहब्बत के मुक़द्दस अशआर से मुंतख़ीब हो
एक पाकीज़ा मंज़र
सियाह नक़ाब में उसका संदली चेहरा
9.
सुबह से शाम तलक
दुसरों के लिए कुछ करना है
जिसमें ख़ुद अपना कुछ नक़्श नहीं
रंग उस पैकरे-तस्वीर ही में भरना है
ज़िन्दगी क्या है
, कभी सोचने लगता है यह ज़हन
और फिर रूह पे छा जाते हैं
दर्द के साये
, उदासी सा धुंआ, दुख की घटा
दिल में रह रहके ख़्याल आता है
ज़िन्दगी यह है तो फिर मौत किसे कहते हैं
?
प्यार इक ख़्वाब था
, इस ख़्वाब की ता'बीर न पूछ
क्या मिली जुर्म-ए-वफ़ा की ता
'बीर न पूछ
10.
मेरा माज़ी
मेरी तन्हाई का ये अंधा शिगाफ़
ये कि सांसों की तरह मेरे साथ चलता रहा
जो मेरी नब्ज़ की मानिन्द मेरे साथ जिया
जिसको आते हुए जाते हुए बेशुमार लम्हे
अपनी संगलाख़ उंगलियों से गहरा करते रहे, करते गए
किसी की ओक पा लेने को लहू बहता रहा
किसी को हमनफ़स कहने की जुस्तुजू में रहा
कोई तो हो जो बेसाख़्ता इसको पहचाने
तड़प के पलटे, अचानक इसे पुकार उठे
मेरे हम-शाख़
मेरे हम-शाख़ मेरी उदासियों के हिस्सेदार
मेरे अधूरेपन के दोस्त
तमाम ज़ख्म जो तेरे हैं
मेरे दर्द तमाम
तेरी कराह का रिश्ता है मेरी आहों से
तू एक मस्जिद-ए-वीरां है, मैं तेरी अज़ान
अज़ान जो अपनी ही वीरानगी से टकरा कर
थकी छुपी हुई बेवा ज़मीं के दामन पर
पढ़े नमाज़ ख़ुदा जाने किसको सिज़दा करे

Tuesday, July 17, 2012

मैं जब भी तुमसे बात करना चाहता हूँ


इस नज़्म का उनवान है 'अनाथ-सी आवाज़', इसके बारे में क्या कहूँ? आप ख़ुद समझ सकते हैं : त्रिपुरारि कुमार शर्मा  

मैं जब भी तुमसे बात करना चाहता हूँ
देर तक देखता रहता हूँ ख़लाओं में कहीं
एक अनाथ-सी आवाज़ आह भरती है
अपनी आँख में तब बात बोया करता हूँ
मेरे ख़याल के खेतों में ओस गिरती है
सफ़ेद बर्फ़-सी जम जाती है पुतली पर

लहूलुहान नज़र आती है ज़ुबान मेरी
मगर पुकार में कोई थकन नहीं मिलती
बस उम्मीद की छाती पर छाले उगते हैं
अभी तो फ़ासलों के फ़र्श पर लेटा हुआ हूँ
साँस लेती हुई हर सोच सिहर उठती है
मेरे दिमाग़ में कुछ दर्द-सा दम भरता है
बदन में बहता हुआ लाल लहू ज़िंदा है
जाने क्या सोचकर किस बात से शर्मिंदा है
मेरी
पलकों ने तुम्हें जब भी चूमना चाहा
मैंने फ़ासलों की हर फसल जलाई है
जैसे होली से पहले जलाए रात कोई
जैसे होंठ में दफ़नाई जाए बात कोई
जैसे प्यास में पोशीदा हो बरसात कोई
जैसे ख़्वाब के खेतों में मुलाक़ात कोई
जैसे नीलाम-सी हो जाए नीली ज़ात कोई 
जैसे जीत में जम्हाई ले-ले मात कोई
सिवाय इसके मुझे कुछ भी नहीं कहना है
तुम्हारी आँख के आँचल के तले रहना है

Thursday, March 08, 2012

साहिर लुधियानवी की जन्मतिथि !

साहिर लुधियानवी

आज होली है... आप सबको मुबारक़ हो! यह भी याद रहे कि आज (8 मार्च) साहिर लुधियानवी की जन्मतिथि है। साहिर ने जितनी नज़्में और ग़ज़लें लिखीं, उनमें से ज़्यादातर फ़िल्मों के माध्यम से लोगों तक पहुंच चुका है। फिर भी उनके लिखे को बार-बार पढ़ने को जी चाहता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए पेश है साहिर की दो नज़्में : बीइंग पोएट  
तेरी आवाज़ 
रात सुनसान थी, बोझल थी फज़ा की साँसें
रूह पे छाये थे बेनाम ग़मों के साए
दिल को ये ज़िद थी कि तू आए तसल्ली देने
मेरी कोशिश थी कि कमबख्त को नींद आ जाए
देर तक आंखों में चुभती रही तारों की चमक
देर तक ज़हन सुलगता रहा तन्हाई में
अपने ठुकराए हुए दोस्त की पुरसिश के लिए
तू न आई मगर इस रात की पहनाई में
यूँ अचानक तेरी आवाज़ कहीं से आई
जैसे परबत का जिगर चीर के झरना फूटे
या ज़मीनों कि मुहब्बत में तड़प कर नागाह
आसमानों से कोई शोख़ सितारा टूटे
शहद सा घुल गया तल्खा़ब-ए-तन्हाई में
रंग सा फैल गया दिल के सियहखा़ने में
देर तक यूँ तेरी मस्ताना सदायें गूंजीं
जिस तरह फूल चटखने लगें वीराने में
तू बहुत दूर किसी अंजुमन-ए-नाज़ में थी
फिर भी महसूस किया मैंने कि तू आई है
और नग्मों में छुपा कर मेरे खोये हुए ख़्वाब
मेरी रूठी हुई नींदों को मना लाई है
रात की सतह पे उभरे तेरे चेहरे के नुकूश
वही चुपचाप सी आँखें वही सादा सी नज़र
वही ढलका हुआ आँचल वही रफ़्तार का ख़म
वही रह रह के लचकता हुआ नाज़ुक पैकर
तू मेरे पास न थी फिर भी सहर होने तक
तेरी हर साँस मेरे जिस्म को छू कर गुज़रा
क़तरा क़तरा तेरे दीदार की शबनम टपकी
लम्हा लम्हा तेरी ख़ुशबू से मुअत्तर गुज़रा
अब यही है तुझे मंज़ूर तो ऐ जान-ए-बहार
मैं तेरी राह न देखूँगा सियाह रातों में
ढूंढ लेंगी मेरी तरसी हुई नज़रें तुझ को
नग़्मा-ओ-शेर की उभरी हुई बरसातों में
अब तेरा प्यार सताएगा तो मेरी हस्ती
तेरी मस्ती भरी आवाज़ में ढल जायेगी
और ये रूह जो तेरे लिए बेचैन सी है
गीत बन कर तेरे होठों पे मचल जायेगी
तेरे नग्मात तेरे हुस्न की ठंडक लेकर
मेरे तपते हुए माहौल में आ जायेंगे
चाँद घड़ियों के लिए हो कि हमेशा के लिए
मेरी जागी हुई रातों को सुला जायेंगे
कभी कभी
कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है
कि ज़िन्दगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव में
गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
ये तीरगी जो मेरी ज़ीस्त का मुक़द्दर है
तेरी नज़र की शुआओं में खो भी सकती थी
अजब न था के मैं बेगाना-ए-अलम रह कर
तेरे जमाल की रानाईयों में खो रहता
तेरा गुदाज़ बदन तेरी नीमबाज़ आँखें
इन्हीं हसीन फ़सानों में महव हो रहता
पुकारतीं मुझे जब तल्ख़ियाँ ज़माने की
तेरे लबों से हलावट के घूँट पी लेता
हयात चीखती फिरती बरहना-सर, और मैं
घनेरी ज़ुल्फ़ों के साये में छुप के जी लेता
मगर ये हो न सका और अब ये आलम है
के तू नहीं, तेरा ग़म, तेरी जुस्तजू भी नहीं
गुज़र रही है कुछ इस तरह ज़िन्दगी जैसे
इसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं
ज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूँ गले
गुज़र रहा हूँ कुछ अनजानी रह्गुज़ारों से
महीब साये मेरी सम्त बढ़ते आते हैं
हयात-ओ-मौत के पुरहौल ख़ारज़ारों से
न कोई जादह-ए-मंज़िल न रौशनी का सुराग़
भटक रही है ख़लाओं में ज़िन्दगी मेरी
इन्हीं ख़लाओं में रह जाऊँगा कभी खोकर
मैं जानता हूँ मेरी हमनफ़स मगर फिर भी
कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है