Showing posts with label मीना कुमारी. Show all posts
Showing posts with label मीना कुमारी. Show all posts

Wednesday, August 01, 2012

मीना कुमारी की जन्मतिथि !

मीना कुमारी
आज हिंदी सिनेमा की मशहूर अदाकारा “ट्रेजडी क्वीन” मीना कुमारी की जन्मतिथि है। उनका असली नाम माहजबीं बानो (1 अगस्त, 1932 - 31 मार्च, 1972) था। कभी मीना कुमारी ने ख़ुद कहा था कि वो अगर अदाकारा न होतीं, तो एक शायरा होतीं। उनकी जन्मतिथि के मौक़े पर पेश है उनकी कुछ नज़्में : बीइंग पोएट
1.
मेरे महबूब
जब दोपहर को
समंदर की लहरें
मेरे दिल की धड़कनों से हमआहंग होकर उठती हैं
तो आफ़ताब की हयात आफ़री शुआओं से मुझे
तेरी जुदाई को बर्दाश्त करनें की क़ुव्वत मिलती है।
2.
मुहब्बत
क़ौस ए कुज़ह की तरह
क़ायनात के एक किनारे से
दूसरे किनारे तक तनी हुई है
और इसके दोनों सिरे
दर्द के अथह समुन्दर में डुबे हुए हैं।
3.
हर मसर्रत
एक बरबादशुदा ग़म है
हर ग़म
एक बरबादशुदा मसर्रत
और हर तारीकी एक तबाहशुदा रौशनी है
और हर रौशनी एक तबाहशुदा तारिकी
इसी तरह
हर हाल
एर फ़नाशुदा माज़ी
और हर माज़ी
एक फ़नाशुदा हाल
4.
रात काटे से भी नहीं कटती
रात और दिन के इस तसलसुल में
उम्र बांटे से भी नही बंटती
अकेलेपन के अन्धेरें में दूर-दूर तलक
येह एक ख़ौफ़ जी पे धुँआ बनके छाया है
फिसल के आँख से ये छन पिघल न जाए कहीं
पलक पलक ने जिसे राह से उठाया है
शाम का उदास सन्नाटा
धुंधलका
, देख, बढ़ जाता है
नहीं मालूम यह धुंआ क्यों है
दिल तो ख़ुश है कि जलता जाता है
तेरी आवाज़ में तारे से क्यों चमकने लगे
किसकी आँखों की तरन्नुम को चुरा लाई है
किसकी आग़ोश की ठंडक पे है डाका डाला
किसकी बांहों से तू शबनम उठा लाई है
5.
मुहब्बत
बहार की फूलों की तरह मुझे अपने जिस्म के रोएं रोएं से
फूटती मालूम हो रही है
मुझे अपने आप पर एक
ऐसे बजरे का गुमान हो रहा है जिसके रेशमी बादबान
तने हुए हों और जिसे
पुरअसरार हवाओं के झोंके आहिस्ता-आहिस्ता दूर-दूर
पुरसुकून झीलों
रौशन पहाड़ों और
फूलों से ढके हुए गुमनाम ज़ंजीरों की तरफ लिए जा रहे हों
वोह और मैं
जब ख़ामोश हो जाते हैं तो हमें
अपने अनकहे
, अनसुने अल्फ़ाज़ में
जुगनुओं की मानिंद रह रहकर चमकते दिखाई देते हैं
हमारी गुफ़्तगू की ज़बान
वही है जो
दरख़्तों
, फूलों, सितारों और आबसारों की है
ये घने जंगल
और तारीक रात की गुफ़्तगू है जो दिन निकलने पर
अपने पीछे
रौशनी और शबनम के आँसु छोड़ जाती है
, महबूब
आह
मुहब्बत!
6.
ये रात ये तन्हाई
ये दिल के धड़कने की आवाज़

ये सन्नाटा
ये डूबते तारों की

ख़ामोश ग़ज़ल खवानी
ये वक्त की पलकों पर

सोती हुई वीरानी
जज़्बात-ए-मुहब्बत की

ये आख़िरी अंगड़ाई
बजाती हुई हर जानिब

ये मौत की शहनाई
सब तुम को बुलाते हैं

पल भर को तुम आ जाओ
बंद होती मेरी आँखों में
मुहब्बत का
एक ख्वाब़ सजा जाओ
7.
रात सुनसान है
तारीक है दिल का आंगन
आसमां पर कोई तारा न ज़मीं पर जुगनू
टिमटिमाते हैं मेरी तरसी हुइ आँखों में
कुछ दिए
तुम जिन्हे देखोगे तो कहोगे
 - आंसू
दफ़्फ़अतन जाग उठी दिल में वही प्यास, जिसे
प्यार की प्यास कहूं मैं तो जल उठती है ज़बां
सर्द एहसास की भट्टी में सुलगता है बदन
प्यास - यह प्यास इसी तरह मिटेगी शायद
आए ऐसे में कोई ज़हर ही दे दे मुझको
8.
सियाह नक़ाब में उसका संदली चेहरा
जैसे रात की तारीकी में
किसी ख़ानक़ाह का
खुला और रौशन ताक़
जहां मोमबत्तियाँ जल रही हो
ख़ामोश
बेज़बान मोमबत्तियाँ
या
वह सुनहरी जिल्दवाली किताब जो
ग़मगीन मुहब्बत के मुक़द्दस अशआर से मुंतख़ीब हो
एक पाकीज़ा मंज़र
सियाह नक़ाब में उसका संदली चेहरा
9.
सुबह से शाम तलक
दुसरों के लिए कुछ करना है
जिसमें ख़ुद अपना कुछ नक़्श नहीं
रंग उस पैकरे-तस्वीर ही में भरना है
ज़िन्दगी क्या है
, कभी सोचने लगता है यह ज़हन
और फिर रूह पे छा जाते हैं
दर्द के साये
, उदासी सा धुंआ, दुख की घटा
दिल में रह रहके ख़्याल आता है
ज़िन्दगी यह है तो फिर मौत किसे कहते हैं
?
प्यार इक ख़्वाब था
, इस ख़्वाब की ता'बीर न पूछ
क्या मिली जुर्म-ए-वफ़ा की ता
'बीर न पूछ
10.
मेरा माज़ी
मेरी तन्हाई का ये अंधा शिगाफ़
ये कि सांसों की तरह मेरे साथ चलता रहा
जो मेरी नब्ज़ की मानिन्द मेरे साथ जिया
जिसको आते हुए जाते हुए बेशुमार लम्हे
अपनी संगलाख़ उंगलियों से गहरा करते रहे, करते गए
किसी की ओक पा लेने को लहू बहता रहा
किसी को हमनफ़स कहने की जुस्तुजू में रहा
कोई तो हो जो बेसाख़्ता इसको पहचाने
तड़प के पलटे, अचानक इसे पुकार उठे
मेरे हम-शाख़
मेरे हम-शाख़ मेरी उदासियों के हिस्सेदार
मेरे अधूरेपन के दोस्त
तमाम ज़ख्म जो तेरे हैं
मेरे दर्द तमाम
तेरी कराह का रिश्ता है मेरी आहों से
तू एक मस्जिद-ए-वीरां है, मैं तेरी अज़ान
अज़ान जो अपनी ही वीरानगी से टकरा कर
थकी छुपी हुई बेवा ज़मीं के दामन पर
पढ़े नमाज़ ख़ुदा जाने किसको सिज़दा करे