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Thursday, August 30, 2012

गीतकार ‘शैलेंद्र’ की जन्मतिथि !

शंकरदास केसरीलाल 'शैलेन्द्र'
आज हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े गीतकार शंकरदास केसरीलाल 'शैलेन्द्र' (30 अगस्त 1923 - 14 दिसंबर 1966) की जन्मतिथि है। शैलेंद्र को 'ये मेरा दीवानापन है...' (यहूदी,1958), 'सब कुछ सीखा हमने...' (अनाडी,1959) और 'मै गाऊं तुम सो जाओ...' (ब्रह्मचारी,1968) के लिए बेहतरीन गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला। 50 और 60 के में उन्होंने फ़िल्मों के लिए कई मशहूर गीत लिखे। फ़िल्मी गीतों के अलावा, इनकी 32 कविताओं का एकमात्र संग्रह है न्यौता और चुनौती,जो 1955 में प्रकाशित हुई थी। जन्मतिथि के मौक़े पर पेश हैं कुछ कविताएँ : बीइंग पोएट
नादान प्रेमिका से
तुमको अपनी नादानी पर
जीवन भर पछताना होगा!
मैं तो मन को समझा लूंगा
यह सोच कि पूजा था पत्थर--
पर तुम अपने रूठे मन को
बोलो तो, क्या उत्तर दोगी?
नत शिर चुप रह जाना होगा!
जीवन भर पछताना होगा!
मुझको जीवन के शत संघर्षों में
रत रह कर लड़ना है ;
तुमको भविष्य की क्या चिन्ता,
केवल अतीत ही पढ़ना है!
बीता दुख दोहराना होगा!
जीवन भर पछताना होगा!
यदि मैं कहूं
यदि मैं कहूं कि तुम बिन मानिनि
व्यर्थ ज़िन्दगी होगी मेरी,
नहीं हंसेगा चांद हमेशा
बनी रहेगी घनी अंधेरी--
बोलो, तुम विश्वास करोगी?
यदि मैं कहूं कि हे मायाविनि
तुमने तन में प्राण भरा है,
और तुम्हीं ने क्रूर मरण के
कुटिल करों से मुझे हरा है--
बोलो, तुम विश्वास करोगी?
यदि मैं कहूं कि तुम बिन स्वामिनि,
टूटेगा मन का इकतारा,
बिखर जाएंगे स्वप्न
सूख जाएगी मधु-गीतों की धारा--
बोलो, तुम विश्वास करोगी?
क्यों प्यार किया
जिसने छूकर मन का सितार,
कर झंकृत अनुपम प्रीत-गीत,
ख़ुद तोड़ दिया हर एक तार,
मैंने उससे क्यों प्यार किया?
बरसा जीवन में ज्योतिधार,
जिसने बिखेर कर विविध रंग,
फिर ढाल दिया घन अंधकार,
मैंने उससे क्यों प्यार किया?
मन को देकर निधियां हज़ार,
फिर छीन लिया जिसने सब कुछ,
कर दिया हीन चिर निराधार,
मैंने उससे क्यों प्यार किया?
जिसने पहनाकर प्रेमहार,
बैठा मन के सिंहासन पर,
फिर स्वयं दिया सहसा उतार,
मैंने उससे क्यों प्यार किया?
आज मुझको मौत से भी डर नहीं लगता
आज मुझको मौत से भी डर नहीं लगता
राह कहती,देख तेरे पांव में कांटा न चुभ जाए
कहीं ठोकर न लग जाए;
चाह कहती, हाय अंतर की कली सुकुमार
बिन विकसे न कुम्हलाए;
मोह कहता, देख ये घरबार संगी और साथी
प्रियजनों का प्यार सब पीछे न छुट जाए!
किन्तु फिर कर्तव्य कहता ज़ोर से झकझोर
तन को और मन को,
चल, बढ़ा चल,
मोह कुछ, ' ज़िन्दगी का प्यार है कुछ और!
इन रुपहली साजिशों में कर्मठों का मन नहीं ठगता!
आज मुझको मौत से भी डर नहीं लगता!
आह, कितने लोग मुर्दा चांदनी के
अधखुले दृग देख लुट जाते;
रात आंखों में गुज़रती,
और ये गुमराह प्रेमी वीर
ढलती रात के पहले न सो पाते!
जागता जब तरुण अरुण प्रभात
ये मुर्दे न उठ पाते!
शुभ्र दिन की धूप में चालाक शोषक गिद्ध
तन-मन नोच खा जाते!
समय कहता--
और ही कुछ और ये संसार होता
जागरण के गीत के संग लोक यदि जगता!
आज मुझको मौत से भी डर नहीं लगता!
निंदिया
पास देख अनजान अतिथि को--
दबे पाँव दरवाज़े तक आ,
लौट गई निंदिया शर्मीली!
दिन भर रहता व्यस्त, भला फुर्सत ही कब है?
कब आएँ बचपन के बिछुड़े संगी-साथी,
बुला उन्हें लाता अतीत बस बीत बातचीत में जाती
शून्य रात की घड़ियाँ आधी
और झाँक खिड़की से जब तब
लौट-लौट जाती बचारी नींद लजीली!
रजनी घूम चुकी है, सूने जग का
थककर चूर भूल मंज़िल अब सोता है पंथी भी मग का
कब से मैं बाहें फैलाए जलती पलकें बिछा बुलाता
आजा निंदिया, अब तो आजा!
किन्तु न आती, रूठ गई है नींद हठीली!
जिस ओर करो संकेत मात्र
जिस ओर करो संकेत मात्र, उड़ चले विहग मेरे मन का,
जिस ओर बहाओ तुम स्वामी,बह चले श्रोत इस जीवन का!
तुम बने शरद के पूर्ण चांद, मैं बनी सिन्धु की लहर चपल,
मैं उठी गिरी पद चुम्बन को, आकुल व्याकुल असफल प्रतिपल,
जब-जब सोचा भर लूं तुमको अपने प्यासे भुज बन्धन में,
तुम दूर क्रूर तारक बन कर, मुस्काए निज नभ आंगन में,
आहें औ' फैली बाहें ही इतिहास बन गईं जीवन का!
जिस ओर करो संकेत मात्र!
तुम काया, मैं कुरूप छाया, हैं पास-पास पर दूर सदा,
छाया काया होंगी न एक, है ऎसा कुछ ये भाग्य बदा,
तुम पास बुलाओ दूर करो, तुम दूर करो लो बुला पास,
बस इसी तरह निस्सीम शून्य में डूब रही हैं शेष श्वास,
हे अदभुद, समझा दो रहस्य, आकर्षण और विकर्षण का!
जिस ओर करो संकेत मात्र!

Saturday, August 18, 2012

गुलज़ार की जन्मतिथि !

गुलज़ार
आज हिंदी सिनेमा के मशहूर गीतकार, कथाकार और फ़िल्मकार गुलज़ार (जन्म : 18 अगस्त 1934) की जन्मतिथि है। इस मौक़े पर पेश हैं उनकी कुछ नज़्में : बीइंग पोएट

1.
कई पिंजरों का क़ैदी हूँ
कई पिंजरों में बसता हूँ
मुझे भाती हैं क़ैदें काटना
और अपनी मर्ज़ी से
चुनाव करते रहना
अपने पिंजरों का
मियादें तय नहीं करता मैं रिश्तों की
असीरी ढूँढ़ता रहता हूँ मैं
असीरी अच्छी लगती है

2.
शहर की बिजली गई
बंद कमरे में बहुत देर तक कुछ भी दिखाई न दिया
तुम गई थीं जिस दिन
उस रोज़ भी ऐसा ही हुआ था
और बहुत देर के बाद
आँखें तारीकी से मानूस हुईं तो
फिर से दरवाज़े का खाका-सा नज़र आया था

3.
टूटी-सी नींदें उठाना
जमा करना ख़्वाबों के टुकड़े
जो तकिए से गिरे हों,
करवटों की सिलवटों को खोलना
उनको पिरोना।

जिस्म की कच्ची दरारें ढूँढ़ना
टूटे फूटे लोग ले जाकर
सजा लेता हूँ अपने ताक़चों में
मैं कबाड़ी -
ख़ाली 
डिब्बों बोतलों में नज़्में भरके बेचता हूँ... 

Friday, August 03, 2012

शकील बदायूँनी की जन्मतिथि !

शकील बदायूँनी
आज हिंदी सिनेमा के मशहूर गीतकार और शायर शकील बदायूँनी की जन्मतिथि है। चौदहवीं का  चाँद हो  या  आफ़ताब हो’, हुस्न वाले तेरा  जवाब  नहीं’, कहीं दीप जले कहीं  दिल आदि गीतों के लिए फ़िल्म फेयर अवार्ड से नवाज़े गए शकील (03 अगस्त 1916 - 20 अप्रैल 1970) का जन्म उत्तर प्रदेश के बदायूँ में हुआ था। उनकी जन्मतिथि के मौक़े पर पेश हैं कुछ गीत-ग़ज़लें : बीइंग पोएट
1.
कोई आरज़ू नहीं है कोई मु़द्आ नहीं है
तेरा ग़म रहे सलामत मेरे दिल में क्या नहीं है
कहां जाम-ए-ग़म की तल्ख़ी कहां ज़िन्दगी का रोना
मुझे वो दवा मिली है जो निरी दवा नहीं है
तू बचाए लाख दामन मेरा फिर भी है ये दावा
तेरे दिल में मैं ही मैं हूँ कोई दूसरा नहीं है
तुम्हें कह दिया सितमगर ये कुसूर था ज़बां का
मुझे तुम मुआफ़ कर दो मेरा दिल बुरा नहीं है
मुझे दोस्त कहने वाले ज़रा दोस्ती निभा ले
ये मताल्बा है हक़ का कोई इल्तिज़ा नहीं है
ये उदास-उदास चेहरे ये हसीं-हसीं तबस्सुम
तेरी अंजुमन में शायद कोई आईना नहीं है
मेरी आँख ने तुझे भी बाख़ुदा शकीलपाया
मैं समझ रहा था मुझसा कोई दूसरा नहीं है
2.
कैसे कह दूँ कि मुलाकात नहीं होती है 
रोज़ मिलते हैं मगर बात नहीं होती है 
आप लिल्लाह न देखा करें आईना कभी 
दिल का आ जाना बड़ी बात नहीं होती है 
छुप के रोता हूँ तेरी याद में दुनिया भर से 
कब मेरी आँख से बरसात नहीं होती है 
हाल-ए-दिल पूछने वाले तेरी दुनिया में कभी 
दिन तो होता है मगर रात नहीं होती है 
जब भी मिलते हैं तो कहते हैं कैसे हो शकील 
इस से आगे तो कोई बात नहीं होती है 
3.
आंखों से दूर सुब्ह के तारे चले गए
नींद आ गई तो ग़म के नज़ारे चले गए
दिल था किसी की याद में मसरूफ़ और हम
शीशे में ज़िन्दगी को उतारे चले गए
अल्लाह रे बेखुदी कि हम उनके रू-ब-रू
बे-अख़्तियार उनको पुकारे चले गए
मुश्किल था कुछ तो इश्क़ की बाज़ी का जीतना
कुछ जीतने के ख़ौफ़ से हारे चले गए
नाकामी-ए-हयात का करते भी क्या गिला
दो दिन गुज़ारना थे
, गुज़ारे चले गए
जल्वे कहां जो ज़ौके़-तमाशा नहीं शकील
नज़रें चली गईं तो नज़ारे चले गए
4.
ऐ! मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया
जाने क्यों आज तेरे नाम पे रोना आया
यूँ तो हर शाम उम्मीदों में गुज़र जाती थी
आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया
कभी तक़्दीर का मातम कभी दुनिया का गिला
मंज़िल-ए-इश्क़ में हर गाम पे रोना आया 
जब हुआ ज़िक्र ज़माने में मोहब्बत का 'शकील'
मुझ को अपने दिल-ए-नाकाम पे रोना आया
5.
उन से उम्मीद-ए-रूनुमाई है
क्या निगाहों की मौत आई है
दिल ने ग़म से शिकस्त खाई है
उम्र-ए-रफ़्ता तेरी दुहाई है
दिल की बर्बादियों पे नाज़ाँ हूँ
फ़तह पाकर शिकस्त खाई है
मेरे माअबद् नहीं है दैर-ओ-हरम
एहतियातन जबीं झुकाई है
वो हवा दे रहे हैं दामन की
हाय! किस वक़्त नींद आई है
खुल गया उन की आरज़ू में ये राज़
ज़ीस्त अपनी नहीं पराई है
दूर हो ग़ुन्चे मेरी नज़र से
तू ने मेरी हँसी चुराई है
गुल फ़सुर्दा चमन उदास 'शकील' 
यूँ भी अक्सर बहार आई है
6.
आँख से आँख मिलाता है कोई 
दिल को खीँचे लिए जाता है कोई 
वा-ए-हैरत कि भरी महफ़िल में 
मुझ को तन्हा नज़र आता है कोई
चाहिए ख़ुद पे यक़ीन-ए-कामिल 
हौसला किस का बढ़ाता है कोई
सब करिश्मात-ए-तसव्वुर है शकील 
वरना आता है न जाता है कोई
7.
जीने वाले क़ज़ा से डरते हैं 
ज़हर पीकर दवा से डरते हैं 
ज़ाहिदों को किसी का ख़ौफ़ नहीं 
सिर्फ़ काली घटा से डरते हैं 
आह जो कुछ कहे हमें मंज़ूर 
नेक बंदे ख़ुदा से डरते हैं 
दुश्मनों के सितम का ख़ौफ़ नहीं 
दोस्तों की वफ़ा से डरते हैं 
अज़्म-ओ-हिम्मत के बावजूद शकील
इश्क़ की इब्तदा से डरते हैं 
8.
शायद आग़ाज़ हुआ फिर किसी अफ़साने का 
हुक्म आदम को है जन्नत से निकल जाने का 
उन से कुछ कह तो रहा हूँ मगर अल्लाह न करे 
वो भी मफ़हूम न समझे मेरे अफ़साने का 
देखना, देखना ये हज़रत-ए-वाइज़ ही न हों 
रास्ता पूछ रहा है कोई मैख़ाने का 
बेताल्लुक़ तेरे आगे से गुज़र जाता हूँ 
ये भी एक हुस्न-ए-तलब है तेरे दीवाने का 
हश्र तक गर्मी-ए-हंगामा-ए-हस्ती है शकील
सिलसिला ख़त्म न होगा मेरे अफ़साने का 
9.
मेरी ज़िन्दगी है ज़ालिम, तेरे ग़म से आश्कारा 
तेरा ग़म है दर-हक़ीक़त मुझे ज़िन्दगी से प्यारा 
वो अगर बुरा न माने तो जहाँ-ए-रंग-ओ-बू में 
मैं सुकून-ए-दिल की ख़ातिर कोई ढूँढ लूँ सहारा 
ये फ़ुलक फ़ुलक हवायेँ ये झुकी झुकी घटाएँ 
वो नज़र भी क्या नज़र है जो समझ न ले इशारा
मुझे आ गया यक़ीं-सा यही है मेरी मंज़िल 
सर-ए-रह जब किसी ने मुझे दफ़्फ़'अतन पुकारा 
मैं बताऊँ फ़र्क़ नासिह, जो है मुझ में और तुझ में 
मेरी ज़िन्दगी तलातुम, तेरी ज़िन्दगी किनारा 
मुझे गुफ़्तगू से बढ़कर ग़म-ए-इज़्न-ए-गुफ़्तगू है 
वही बात पूछ्ते हैं जो न कह सकूँ दोबारा 
कोई ऐ 'शकील' देखे, ये जुनूँ नहीं तो क्या है 
के उसी के हो गए हम जो न हो सका हमारा 
10.
मेरे हम-नफ़स, मेरे हम-नवा, मुझे दोस्त बनके दग़ा न दे
मैं हूँ दर्द-ए-इश्क़ से जाँवलब, मुझे ज़िन्दगी की दुआ न दे
मेरे दाग़-ए-दिल से है रोशनी, उसी रोशनी से है ज़िन्दगी
मुझे डर है ऐ मेरे चारागर, ये चराग़ तू ही बुझा न दे
मुझे छोड़ दे मेरे हाल पर, तेरा क्या भरोसा है चारागर
ये तेरी नवाज़िश-ए-मुख़्तसर, मेरा दर्द और बढ़ा न दे
मेरा अज़्म इतना बलंद है कि पराये शोलों का डर नहीं
मुझे ख़ौफ़ आतिश-ए-गुल से है, ये कहीं चमन को जला न दे
वो उठे हैं लेके होम-ओ-सुबू, अरे ओ 'शकील' कहाँ है तू 
तेरा जाम लेने को बज़्म में कोई और हाथ बढ़ा न दे

Wednesday, August 01, 2012

मीना कुमारी की जन्मतिथि !

मीना कुमारी
आज हिंदी सिनेमा की मशहूर अदाकारा “ट्रेजडी क्वीन” मीना कुमारी की जन्मतिथि है। उनका असली नाम माहजबीं बानो (1 अगस्त, 1932 - 31 मार्च, 1972) था। कभी मीना कुमारी ने ख़ुद कहा था कि वो अगर अदाकारा न होतीं, तो एक शायरा होतीं। उनकी जन्मतिथि के मौक़े पर पेश है उनकी कुछ नज़्में : बीइंग पोएट
1.
मेरे महबूब
जब दोपहर को
समंदर की लहरें
मेरे दिल की धड़कनों से हमआहंग होकर उठती हैं
तो आफ़ताब की हयात आफ़री शुआओं से मुझे
तेरी जुदाई को बर्दाश्त करनें की क़ुव्वत मिलती है।
2.
मुहब्बत
क़ौस ए कुज़ह की तरह
क़ायनात के एक किनारे से
दूसरे किनारे तक तनी हुई है
और इसके दोनों सिरे
दर्द के अथह समुन्दर में डुबे हुए हैं।
3.
हर मसर्रत
एक बरबादशुदा ग़म है
हर ग़म
एक बरबादशुदा मसर्रत
और हर तारीकी एक तबाहशुदा रौशनी है
और हर रौशनी एक तबाहशुदा तारिकी
इसी तरह
हर हाल
एर फ़नाशुदा माज़ी
और हर माज़ी
एक फ़नाशुदा हाल
4.
रात काटे से भी नहीं कटती
रात और दिन के इस तसलसुल में
उम्र बांटे से भी नही बंटती
अकेलेपन के अन्धेरें में दूर-दूर तलक
येह एक ख़ौफ़ जी पे धुँआ बनके छाया है
फिसल के आँख से ये छन पिघल न जाए कहीं
पलक पलक ने जिसे राह से उठाया है
शाम का उदास सन्नाटा
धुंधलका
, देख, बढ़ जाता है
नहीं मालूम यह धुंआ क्यों है
दिल तो ख़ुश है कि जलता जाता है
तेरी आवाज़ में तारे से क्यों चमकने लगे
किसकी आँखों की तरन्नुम को चुरा लाई है
किसकी आग़ोश की ठंडक पे है डाका डाला
किसकी बांहों से तू शबनम उठा लाई है
5.
मुहब्बत
बहार की फूलों की तरह मुझे अपने जिस्म के रोएं रोएं से
फूटती मालूम हो रही है
मुझे अपने आप पर एक
ऐसे बजरे का गुमान हो रहा है जिसके रेशमी बादबान
तने हुए हों और जिसे
पुरअसरार हवाओं के झोंके आहिस्ता-आहिस्ता दूर-दूर
पुरसुकून झीलों
रौशन पहाड़ों और
फूलों से ढके हुए गुमनाम ज़ंजीरों की तरफ लिए जा रहे हों
वोह और मैं
जब ख़ामोश हो जाते हैं तो हमें
अपने अनकहे
, अनसुने अल्फ़ाज़ में
जुगनुओं की मानिंद रह रहकर चमकते दिखाई देते हैं
हमारी गुफ़्तगू की ज़बान
वही है जो
दरख़्तों
, फूलों, सितारों और आबसारों की है
ये घने जंगल
और तारीक रात की गुफ़्तगू है जो दिन निकलने पर
अपने पीछे
रौशनी और शबनम के आँसु छोड़ जाती है
, महबूब
आह
मुहब्बत!
6.
ये रात ये तन्हाई
ये दिल के धड़कने की आवाज़

ये सन्नाटा
ये डूबते तारों की

ख़ामोश ग़ज़ल खवानी
ये वक्त की पलकों पर

सोती हुई वीरानी
जज़्बात-ए-मुहब्बत की

ये आख़िरी अंगड़ाई
बजाती हुई हर जानिब

ये मौत की शहनाई
सब तुम को बुलाते हैं

पल भर को तुम आ जाओ
बंद होती मेरी आँखों में
मुहब्बत का
एक ख्वाब़ सजा जाओ
7.
रात सुनसान है
तारीक है दिल का आंगन
आसमां पर कोई तारा न ज़मीं पर जुगनू
टिमटिमाते हैं मेरी तरसी हुइ आँखों में
कुछ दिए
तुम जिन्हे देखोगे तो कहोगे
 - आंसू
दफ़्फ़अतन जाग उठी दिल में वही प्यास, जिसे
प्यार की प्यास कहूं मैं तो जल उठती है ज़बां
सर्द एहसास की भट्टी में सुलगता है बदन
प्यास - यह प्यास इसी तरह मिटेगी शायद
आए ऐसे में कोई ज़हर ही दे दे मुझको
8.
सियाह नक़ाब में उसका संदली चेहरा
जैसे रात की तारीकी में
किसी ख़ानक़ाह का
खुला और रौशन ताक़
जहां मोमबत्तियाँ जल रही हो
ख़ामोश
बेज़बान मोमबत्तियाँ
या
वह सुनहरी जिल्दवाली किताब जो
ग़मगीन मुहब्बत के मुक़द्दस अशआर से मुंतख़ीब हो
एक पाकीज़ा मंज़र
सियाह नक़ाब में उसका संदली चेहरा
9.
सुबह से शाम तलक
दुसरों के लिए कुछ करना है
जिसमें ख़ुद अपना कुछ नक़्श नहीं
रंग उस पैकरे-तस्वीर ही में भरना है
ज़िन्दगी क्या है
, कभी सोचने लगता है यह ज़हन
और फिर रूह पे छा जाते हैं
दर्द के साये
, उदासी सा धुंआ, दुख की घटा
दिल में रह रहके ख़्याल आता है
ज़िन्दगी यह है तो फिर मौत किसे कहते हैं
?
प्यार इक ख़्वाब था
, इस ख़्वाब की ता'बीर न पूछ
क्या मिली जुर्म-ए-वफ़ा की ता
'बीर न पूछ
10.
मेरा माज़ी
मेरी तन्हाई का ये अंधा शिगाफ़
ये कि सांसों की तरह मेरे साथ चलता रहा
जो मेरी नब्ज़ की मानिन्द मेरे साथ जिया
जिसको आते हुए जाते हुए बेशुमार लम्हे
अपनी संगलाख़ उंगलियों से गहरा करते रहे, करते गए
किसी की ओक पा लेने को लहू बहता रहा
किसी को हमनफ़स कहने की जुस्तुजू में रहा
कोई तो हो जो बेसाख़्ता इसको पहचाने
तड़प के पलटे, अचानक इसे पुकार उठे
मेरे हम-शाख़
मेरे हम-शाख़ मेरी उदासियों के हिस्सेदार
मेरे अधूरेपन के दोस्त
तमाम ज़ख्म जो तेरे हैं
मेरे दर्द तमाम
तेरी कराह का रिश्ता है मेरी आहों से
तू एक मस्जिद-ए-वीरां है, मैं तेरी अज़ान
अज़ान जो अपनी ही वीरानगी से टकरा कर
थकी छुपी हुई बेवा ज़मीं के दामन पर
पढ़े नमाज़ ख़ुदा जाने किसको सिज़दा करे

Sunday, April 15, 2012

हसरत जयपुरी की जन्मतिथि !

हसरत जयपुरी
आज हिंदी फ़िल्मों के मशहूर गीतकार हसरत जयपुरी (15 अप्रैल, 1918 - 17 सिंतबर, 1999) की जन्मतिथि है। महज फ़िल्म से जुड़े लोग ही जानते हैं कि हसरत जयपुरी का मूल नाम इकबाल हुसैन है। जब भी 'टाइटल सॉन्ग' की बात होती है, तो हसरत जयपुरी का नाम बड़े अदब के साथ लिया जाता है। हसरत जयपुरी ने संगीतकार शंकर जयकिशन के साथ सबसे अधिक काम किया। 1966 में फिल्म सूरज के गीत 'बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है' और 1971 मे फिल्म अंदाज में 'जिंदगी एक सफर है सुहाना' जैसे गीत के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार पाने वाले हसरत, वर्ल्ड यूनिवर्सिटी टेबुल के डाक्ट्रेट अवार्ड और उर्दू कान्फ्रेंस में जोश मलीहाबादी अवार्ड से भी सम्मानित किए गए। फिल्म मेरे हुजूर में हिन्दी और ब्रज भाषा में रचित गीत झनक झनक तोरी बाजे पायलिया के लिए वह अम्बेडकर अवार्ड से सम्मानित किए गए। हसरत जयपुरी ने तीन दशक लंबे अपने सिने कैरियर में 300 से अधिक फिल्मों के लिए लगभग 2000 गीत लिखे। उनकी जन्मतिथि के मौक़े पर पेश हैं कुछ ग़ज़लें : बीइंग पोएट
1.
वो अपने चेहरे में सौ आफ़ताब रखते हैं
इसीलिये तो वो रुख़ पे नक़ाब रखते हैं
वो पास बैठें तो आती है दिलरुबा ख़ुश्बू
वो अपने होठों पे खिलते गुलाब रखते हैं
हर एक वर्क़ में तुम ही तुम हो जान-ए-महबूबी
हम अपने दिल की कुछ ऐसी किताब रखते हैं
जहान-ए-इश्क़ में सोहनी कहीं दिखाई दे
हम अपनी आँख में कितने चेनाब रखते हैं
2.
शोले ही सही आग लगाने के लिये आ
फिर तूर के मंज़र को दिखाने के लिये आ
ये किस ने कहा है मेरी तक़दीर बना दे
आ अपने ही हाथों से मिटाने के लिये आ
ऐ दोस्त मुझे गर्दिश-ए-हालात ने घेरा
तू ज़ुल्फ़ की कमली में छुपाने के लिये आ
दीवार है दुनिया इसे राहों से हटा दे
हर रस्म मुहब्बत की मिटाने के लिये आ
मतलब तेरी आमद से है दरमाँ से नहीं
'हसरत' की क़सम दिल ही दुखाने के लिये आ
3.
यारो मुझे मु'आफ़ करो मैं नशे में हूँ
अब थोड़ी दूर साथ चलो मैं नशे में हूँ
जो कुछ भी कह रहा हूँ नशा बोलत है ये
इसका न कुछ ख़याल करो मैं नशे में हूँ
उस मैकदे की राह मे गिर जाऊँ न कहीं
अब मेरा हाथ थाम तो लो मैं नशे में हूँ
मुझको तो अपने घर का पता याद ही नहीं
तुम मेरे आस पास रहो मैं नशे में हूँ
कैसी गुज़र रही है मुहब्बत में ज़िंदगी
'हसरत' कुछ अपना हाल कहो मैं नशे में हूँ
4.
इस तरह हर ग़म भुलाया कीजिये
रोज़ मैख़ाने में आया कीजिये
छोड़ भी दीजिये तकल्लुफ़ शेख़ जी
जब भी आयें पी के जाया कीजिये
ज़िंदगी भर फिर न उतेरेगा नशा
इन शराबों में नहाया कीजिये
ऐ हसीनों ये गुज़ारिश है मेरी
अपने हाथों से पिलाया कीजिये
5.
ये कौन आ गई दिलरुबा महकी महकी
फ़िज़ा महकी महकी हवा महकी महकी
वो आँखों में काजल वो बालों में गजरा
हथेली पे उसके हिना महकी महकी
ख़ुदा जाने किस-किस की ये जान लेगी
वो क़ातिल अदा वो सबा महकी महकी
सवेरे सवेरे मेरे घर पे आई
ऐ 'हसरत' वो बाद-ए-सबा महकी महकी
6.
हम रातों को उठ उठ के जिनके लिये रोते हैं
वो ग़ैर की बाहों में आराम से सोते हैं
हम अश्क जुदाई के गिरने ही नहीं देते
बेचैन सी पलकों में मोती से पिरोते हैं
होता चला आया है बेदर्द ज़माने में
सच्चाई की राहों में काँटे सभी बोतें हैं
अंदाज़-ए-सितम उन का देखे तो कोई 'हसरत' 
मिलने को तो मिलते हैं नश्तर से चुभोते हैं