Friday, August 03, 2012

शकील बदायूँनी की जन्मतिथि !

शकील बदायूँनी
आज हिंदी सिनेमा के मशहूर गीतकार और शायर शकील बदायूँनी की जन्मतिथि है। चौदहवीं का  चाँद हो  या  आफ़ताब हो’, हुस्न वाले तेरा  जवाब  नहीं’, कहीं दीप जले कहीं  दिल आदि गीतों के लिए फ़िल्म फेयर अवार्ड से नवाज़े गए शकील (03 अगस्त 1916 - 20 अप्रैल 1970) का जन्म उत्तर प्रदेश के बदायूँ में हुआ था। उनकी जन्मतिथि के मौक़े पर पेश हैं कुछ गीत-ग़ज़लें : बीइंग पोएट
1.
कोई आरज़ू नहीं है कोई मु़द्आ नहीं है
तेरा ग़म रहे सलामत मेरे दिल में क्या नहीं है
कहां जाम-ए-ग़म की तल्ख़ी कहां ज़िन्दगी का रोना
मुझे वो दवा मिली है जो निरी दवा नहीं है
तू बचाए लाख दामन मेरा फिर भी है ये दावा
तेरे दिल में मैं ही मैं हूँ कोई दूसरा नहीं है
तुम्हें कह दिया सितमगर ये कुसूर था ज़बां का
मुझे तुम मुआफ़ कर दो मेरा दिल बुरा नहीं है
मुझे दोस्त कहने वाले ज़रा दोस्ती निभा ले
ये मताल्बा है हक़ का कोई इल्तिज़ा नहीं है
ये उदास-उदास चेहरे ये हसीं-हसीं तबस्सुम
तेरी अंजुमन में शायद कोई आईना नहीं है
मेरी आँख ने तुझे भी बाख़ुदा शकीलपाया
मैं समझ रहा था मुझसा कोई दूसरा नहीं है
2.
कैसे कह दूँ कि मुलाकात नहीं होती है 
रोज़ मिलते हैं मगर बात नहीं होती है 
आप लिल्लाह न देखा करें आईना कभी 
दिल का आ जाना बड़ी बात नहीं होती है 
छुप के रोता हूँ तेरी याद में दुनिया भर से 
कब मेरी आँख से बरसात नहीं होती है 
हाल-ए-दिल पूछने वाले तेरी दुनिया में कभी 
दिन तो होता है मगर रात नहीं होती है 
जब भी मिलते हैं तो कहते हैं कैसे हो शकील 
इस से आगे तो कोई बात नहीं होती है 
3.
आंखों से दूर सुब्ह के तारे चले गए
नींद आ गई तो ग़म के नज़ारे चले गए
दिल था किसी की याद में मसरूफ़ और हम
शीशे में ज़िन्दगी को उतारे चले गए
अल्लाह रे बेखुदी कि हम उनके रू-ब-रू
बे-अख़्तियार उनको पुकारे चले गए
मुश्किल था कुछ तो इश्क़ की बाज़ी का जीतना
कुछ जीतने के ख़ौफ़ से हारे चले गए
नाकामी-ए-हयात का करते भी क्या गिला
दो दिन गुज़ारना थे
, गुज़ारे चले गए
जल्वे कहां जो ज़ौके़-तमाशा नहीं शकील
नज़रें चली गईं तो नज़ारे चले गए
4.
ऐ! मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया
जाने क्यों आज तेरे नाम पे रोना आया
यूँ तो हर शाम उम्मीदों में गुज़र जाती थी
आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया
कभी तक़्दीर का मातम कभी दुनिया का गिला
मंज़िल-ए-इश्क़ में हर गाम पे रोना आया 
जब हुआ ज़िक्र ज़माने में मोहब्बत का 'शकील'
मुझ को अपने दिल-ए-नाकाम पे रोना आया
5.
उन से उम्मीद-ए-रूनुमाई है
क्या निगाहों की मौत आई है
दिल ने ग़म से शिकस्त खाई है
उम्र-ए-रफ़्ता तेरी दुहाई है
दिल की बर्बादियों पे नाज़ाँ हूँ
फ़तह पाकर शिकस्त खाई है
मेरे माअबद् नहीं है दैर-ओ-हरम
एहतियातन जबीं झुकाई है
वो हवा दे रहे हैं दामन की
हाय! किस वक़्त नींद आई है
खुल गया उन की आरज़ू में ये राज़
ज़ीस्त अपनी नहीं पराई है
दूर हो ग़ुन्चे मेरी नज़र से
तू ने मेरी हँसी चुराई है
गुल फ़सुर्दा चमन उदास 'शकील' 
यूँ भी अक्सर बहार आई है
6.
आँख से आँख मिलाता है कोई 
दिल को खीँचे लिए जाता है कोई 
वा-ए-हैरत कि भरी महफ़िल में 
मुझ को तन्हा नज़र आता है कोई
चाहिए ख़ुद पे यक़ीन-ए-कामिल 
हौसला किस का बढ़ाता है कोई
सब करिश्मात-ए-तसव्वुर है शकील 
वरना आता है न जाता है कोई
7.
जीने वाले क़ज़ा से डरते हैं 
ज़हर पीकर दवा से डरते हैं 
ज़ाहिदों को किसी का ख़ौफ़ नहीं 
सिर्फ़ काली घटा से डरते हैं 
आह जो कुछ कहे हमें मंज़ूर 
नेक बंदे ख़ुदा से डरते हैं 
दुश्मनों के सितम का ख़ौफ़ नहीं 
दोस्तों की वफ़ा से डरते हैं 
अज़्म-ओ-हिम्मत के बावजूद शकील
इश्क़ की इब्तदा से डरते हैं 
8.
शायद आग़ाज़ हुआ फिर किसी अफ़साने का 
हुक्म आदम को है जन्नत से निकल जाने का 
उन से कुछ कह तो रहा हूँ मगर अल्लाह न करे 
वो भी मफ़हूम न समझे मेरे अफ़साने का 
देखना, देखना ये हज़रत-ए-वाइज़ ही न हों 
रास्ता पूछ रहा है कोई मैख़ाने का 
बेताल्लुक़ तेरे आगे से गुज़र जाता हूँ 
ये भी एक हुस्न-ए-तलब है तेरे दीवाने का 
हश्र तक गर्मी-ए-हंगामा-ए-हस्ती है शकील
सिलसिला ख़त्म न होगा मेरे अफ़साने का 
9.
मेरी ज़िन्दगी है ज़ालिम, तेरे ग़म से आश्कारा 
तेरा ग़म है दर-हक़ीक़त मुझे ज़िन्दगी से प्यारा 
वो अगर बुरा न माने तो जहाँ-ए-रंग-ओ-बू में 
मैं सुकून-ए-दिल की ख़ातिर कोई ढूँढ लूँ सहारा 
ये फ़ुलक फ़ुलक हवायेँ ये झुकी झुकी घटाएँ 
वो नज़र भी क्या नज़र है जो समझ न ले इशारा
मुझे आ गया यक़ीं-सा यही है मेरी मंज़िल 
सर-ए-रह जब किसी ने मुझे दफ़्फ़'अतन पुकारा 
मैं बताऊँ फ़र्क़ नासिह, जो है मुझ में और तुझ में 
मेरी ज़िन्दगी तलातुम, तेरी ज़िन्दगी किनारा 
मुझे गुफ़्तगू से बढ़कर ग़म-ए-इज़्न-ए-गुफ़्तगू है 
वही बात पूछ्ते हैं जो न कह सकूँ दोबारा 
कोई ऐ 'शकील' देखे, ये जुनूँ नहीं तो क्या है 
के उसी के हो गए हम जो न हो सका हमारा 
10.
मेरे हम-नफ़स, मेरे हम-नवा, मुझे दोस्त बनके दग़ा न दे
मैं हूँ दर्द-ए-इश्क़ से जाँवलब, मुझे ज़िन्दगी की दुआ न दे
मेरे दाग़-ए-दिल से है रोशनी, उसी रोशनी से है ज़िन्दगी
मुझे डर है ऐ मेरे चारागर, ये चराग़ तू ही बुझा न दे
मुझे छोड़ दे मेरे हाल पर, तेरा क्या भरोसा है चारागर
ये तेरी नवाज़िश-ए-मुख़्तसर, मेरा दर्द और बढ़ा न दे
मेरा अज़्म इतना बलंद है कि पराये शोलों का डर नहीं
मुझे ख़ौफ़ आतिश-ए-गुल से है, ये कहीं चमन को जला न दे
वो उठे हैं लेके होम-ओ-सुबू, अरे ओ 'शकील' कहाँ है तू 
तेरा जाम लेने को बज़्म में कोई और हाथ बढ़ा न दे