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Saturday, March 16, 2013

तुम क्यों द्रौपदी की भाषा में बिलख रही हो ?

पंखुरी सिन्हा
कथाकार और कवि पंखुरी सिन्हा (जन्म: 18 जून 1975) हिंदी पाठकों के लिए एक जाना-पहचाना नाम है। पंखुरी की प्रकाशित पुस्तकों में कोई भी दिन और क़िस्सा--कोहिनूर कहानी-संग्रह हैं। ककहरा नामक कविता-संग्रह जल्द ही प्रकाशित होने वाला है। इनकी कविताएँ विभिन्न भाषाओं में अनुदित हो चुकी हैं। कई पुरस्कारों से सम्मानित पंखुरी सिन्हा की दो कविताएँ प्रस्तुत हैं : बीइंग पोएट
रात का सूर्योदय
रात जिसका सूर्योदय न हो,
कहीं नहीं
,
न कोई आखिरी पहर
,
ऐसी स्याह
, काली रात,
दिन पर छाई हुई
,
मैला किए उसे
,
किए उसे गंदूमी
,
कि सूरज गिरफ्त में हो
,
हिरासत में रौशनी
,
वो काम जो मुक़म्मल करना था
,
उसके लिए कोई कल नहीं
,
कोई कल नहीं
,
न आने वाला
,
न होने वाला
,
कहनी थी बात जो उससे
,
कोई कल नहीं उसके लिए
,
संभालनी थी
, अलगनी पर,
किताब जो
,
उसके लिए कोई कल नहीं
,
सवांरने थे जो शब्द किताब में
,
कोई कल नहीं उसके लिए।
धर्मराज को स्वर्ग
धर्मराज को स्वर्ग,
सशरीर
,
युधिष्ठिर को स्वर्ग
,
तुम क्यों द्रौपदी की भाषा में बिलख रही हो
?
प्यार भी द्रौपदी की भाषा में कर रही हो
?
क्यों जोड़ रही हो
,
चाँद और तारों से नाता
?
चाँद और सूरज ने तो बहुतों को छुआ नहीं
,
लेकिन क्या सम्राट भी सबकुछ दांव पर लगाया करते हैं
?
कभी
?
सौ पुत्रों की मौत
?
अपनी भी मौत
?
क्या खेले गए पासे कभी और यों
?
क्या ऐसे भेजे गए चौपड़ के निमंत्रण कभी और
?
क्या लड़ाई की ऐसी रचना की गयी कभी
?
क्या विध्वंस का ऐसा अनुष्ठान
,
ऐसा आह्वान
,
किया गया कभी
?
क्या इश्वर को पुकारा है
,
कभी किसी ने
,
जैसे द्रौपदी ने
?
पांचाली ने
?
अंतरिक्ष सतत है
,
आसमान सनातन
,
अव्यय हैं सूर्य की किरणें
,
अनश्वर चन्द्रमा का प्रकाश
,
पर तुम क्यों जोड़ रही हो नाता
,
परिभाषा से परे
,
किरणों से
,
हिरणों से
?
क्या है यह प्रकृति साधना
,
खुद को प्रतिष्ठित करना
,
चाँद और सूरज की परिधि में
?
किरणों के दायेरे में उनकी
?
बाहर और भीतर
?

Tuesday, January 01, 2013

उदय प्रकाश की जन्मतिथि !

उदय प्रकाश
आप सब को नया साल बहुत मुबारक़ हो। आज मेरे प्रिय कवि-कथाकार और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित उदय प्रकाश की जन्मतिथि (जन्म : 01 जनवरी 1951) है। कथाकार के रूप में अधिक प्रसिद्धि पाने वाले उदय प्रकाश मूलत: कवि हैं। उदय जी को ख़ूब सारी शुभकामनाओं सहित इस अवसर पर प्रस्तुत हैं कुछ छोटी कविताएँ : बीइंग पोएट
पत्थर
इस पत्थर के भीतर
एक देवता ज़रूर है
उस देवता के मंत्र से
यह पत्थर है
जैसे हम सब
पत्थर हैं किसी देवता के मंत्र से।  
व्यवस्था
दोस्त चिट्ठी में
लिखता है--
'मैं सकुशल हूँ।'
मैं लिखता हूँ--
'मैं सकुशल हूँ।'
दोनों आश्चर्यचकित हैं।
खेल
जो लड़का
सिपाही बना था
उससे दूसरे लड़के ने
अकड़कर कहा--
'अबे राजा की पूँछ के बाल
मैं चोर नहीं हूँ'
और खेल
बिगड़ गया।
गांधीजी
गांधी जी
कहते थे--
'अहिंसा'
और डंडा लेकर
पैदल घूमते थे।
वसंत
रेल गाड़ी आती है
और बिना रुके
चली जाती है।
जंगल में
पलाश का एक गार्ड
लाल झंडियाँ
दिखाता रह जाता है।
पिंजड़ा
चिड़िया
पिंजड़े में नहीं है।
पिंजड़ा गुस्से में है
आकाश ख़ुश।
आकाश की ख़ुशी में
नन्हीं-सी चिड़िया
उड़ना सीखती है।
कुतुबमीनार की ऊँचाई
कुतबुद्दीन ऎबक को
अब ऊपर से
नीचे देख पाने के लिए
चश्मे की ज़रूरत पड़ती
इतनी ऊँचाई से गिर कर
चश्मा
टूट जाता।
रात
इतने घुप्प अंधेरे में
एक पीली पतंग
धीरे-धीरे
आकाश में चढ़ रही है।
किसी बच्चे की नींद में है
उसकी गड़ेरी
किसी माँ की लोरियों से
निकलती है डोर!
मारना
आदमी
मरने के बाद
कुछ नहीं सोचता।
आदमी
मरने के बाद
कुछ नहीं बोलता।
कुछ नहीं सोचने
और कुछ नहीं बोलने पर
आदमी
मर जाता है।
रंगा-बिल्ला
एक था रंगा
एक था बिल्ला
दोनों भाई-भाई नहीं थे
लेकिन दोनों को फाँसी हो गयी।
एक थे टाटा
एक है बिरला
दोनों भाई-भाई हैं
लेकिन दोनों को फाँसी नहीं हुई।
क़ैदी
वे तीन थे
और जैसे किसी जेल में थे
भीतर थी एक संकरी-सी कोठरी
जिसके भीतर सिर्फ़ उनका ही संकरा-सा जीवन
और उनकी ही थोड़ी-सी साँसे थीं
एक संतरी की तरह टहलता था
दूसरा वार्डेन की तरह देता था हिदायतें
कविता के सख़्त क़ायदों के बारे में
तीसरे को
दोनों ऎसे देखते थे
जैसे देखा जाता है कोई क़ैदी।
शरारत
छत पर बच्चा
अपनी माँ के साथ आता है।
पहाड़ों की ओर वह
अपनी नन्हीं उंगली दिखाता है।
पहाड़ आँख बचा कर
हल्के-से पीछे हट जाते हैं 
माँ देख नहीं पाती।
बच्चा 
देख लेता है।
वह ताली पीटकर उछलता है
--देखा माँदेखा
उधर अभी
सुबह हो जाएगी।
झाड़ी
इसी बग़ीचे में किसी पेड़ के पीछे
छुपा बैठा होगा
थानू
मैं पुकारता हूँ
बीस साल की दूरी से
...था ... नू...
उस पेड़ के पीछे झड़ियों के बीच
फँस कर अटका होगा समय
वहाँ अभी तक
थानू छिपा होगा
थानू और मृत्यु के बीच
अभी भी ज़रूर
एक दूरी होगी।
बस में पिता
मैंने बिल्कुल साफ़-साफ़ देखा
उस बस पर बैठे
कहीं जा रहे थे पिता
उनके सफ़ेद गाल, तम्बाकू भरा उनका मुँह
किसी को न पहचानती उनकी आँखें
उस बस को रोको
जो अदृश्य हो जाएगी अभी
उस बस तक
क्या
पहुँच सकती है
मेरी आवाज़?
उस बस पर बैठ कर
इस तरह क्यों चले गए पिता?
दिल्ली
समुद्र के किनारे
अकेले नारियल के पेड़ की तरह है
एक अकेला आदमी इस शहर में।
समुद्र के ऊपर उड़ती
एक अकेली चिड़िया का कंठ है
एक अकेले आदमी की आवाज़
कितनी बड़ी-बड़ी इमारतें हैं दिल्ली में
असंख्य जगमग जहाज
डगमगाते हैं चारों ओर रात भर
कहाँ जा रहे होंगे इनमें बैठे तिज़ारती
कितने जवाहरात लदे होंगे इन जहाजों में
कितने ग़ुलाम
अपनी पिघलती चरबी की ऊष्मा में
पतवारों पर थक कर सो गए होगे।
ओनासिस! ओनासिस!
यहाँ तुम्हारी नगरी में
फिर से है एक अकेला आदमी। 

Saturday, November 03, 2012

प्रभात रंजन की कहानी ‘मोनोक्रोम’

डॉ. प्रभात रंजन
आज हिंदी के कथाकार प्रभात रंजन (जन्म : 03 नवम्बर 1970) की जन्मतिथि है। प्रभात रंजन के व्यक्तित्व में कवि-पक्ष किसी पेड़ की जड़ों की तरह (ज़मीन के अंदर होने की वजह से) नहीं दिखाई देता है। सिर्फ़ तना-डाली-पत्ते-फूल-फल (जो ज़मीन के बाहर है) की तरह हम देख पाते हैं उनका कथाकार-पक्ष। यह बात और है कि उनके व्यक्तित्व के कई पहलू है, फिलहाल खूब सारी शुभकामनाओं सहित, उनकी जन्मतिथि के अवसर पर प्रस्तुत है कहानी मोनोक्रोम’, जो उनके पहले कहानी-संग्रह जानकीपुल में संकलित है : बीइंग पोएट
अल कौसर के बाहर चहलकदमी करते हुए वह अब थोड़ा उकताने लगा था।
जानबूझ कर समय नहीं देख रहा था। समय को वह भूल जाना चाहता था। वह भूल जाना चाहता था कि उसे यहाँ टहलते आधा घंटा हो चुका है।
...कि साढ़े सात बज चुके हैं और बात सात बजे मिलने की थी। न चाहते हुए भी अपनी घड़ी के नीचे डायल पर उसकी आँखें ठहर गईं।
अगर गुज़रे बरस होते तो वह यह सोचता टहलता रहता कि वह एक बार फिर पीछे से धमधम करती आएगी और जब तक वह उन पैरों की आवाज़ को आँखों से सही करने पीछे मुड़ेगा, कहेगी-
सॉरी राहुल! जैम में फँस गई थी। आय ऐम रियली सॉरी।
और वह बड़े नाज़ से अपना गुस्सा वापस ले लेगा।
वक़्त पीछे छूट गया था। वक़्त पीछे छूटता जा रहा था और साथ में यह अहसास भी कि वह आएगी। बीते दिनों की यादें ही रह जाती हैं...
और कभी-कभी मिलने को पुराना रेस्तराँ।
उसे अपने इस ख़याल पर हँसी आ गई। उसे ध्यान आया कि वह अक्सर सड़कों के किनारे पटरियों पर लोगों को इसी तरह हँसते, अपने-आप से बातें करते देखता है और सोचता है कहीं वे पागल तो नहीं है। उसने इधर-उधर देखा और आश्वस्त हुआ कि अँधेरे में उसे कोई देख नहीं रहा है।
वह बाहर पटरी पर एक फटा अख़बार बिछाकर बैठ गया और सामने तेज़ी से भागती गाड़ियों के ब्रांड पहचानने का खेल खेलने लगा। बरसों पुराना खेल कि किस ब्रांड की गाड़ियाँ सड़क पर ज़्यादा दिखती हैं। अक्सर ऊबकर वह यही खेल खेलने लगता। बरसों प्रतीक्षा ने उसे इस खेल का आदी बना दिया था।
सामने एक ऑटो आकर रूकी।
उसकी आँखों में बरसों पुरानी पहचान लौट आई थी। इतनी रोशनी नहीं थी कि किसी को आसानी से पहचाना जा सके। मगर उसे खुशी हुई कि उसने पहचान लिया था, ऑटो से लिच्छवि उतर रही थी। उसने यह भी पहचान लिया था कि उसने नीले बाँधनी का सूट पहन रखा था। उसे याद आया नीले रंग के कपड़ों में लिच्छवि उसे बहुत अच्छी लगती थी। वह अलकौसर से छ्नकर आती नीलीरोशनी में उठा और धीरे-धीरे ऑटो की ओर बढ़ने लगा।
“हाय!”
राहुल ने धीरे से कहा।
“ओ! हाय!”
लिच्छवि ने ऐसे चौंक कर कहा मानो वह यहाँ उससे नहीं किसी और से मिलने आई हो और उसे वहाँ पाकर चौंक गई हो।
राहुल को थोड़ी-सी राहत इस बात से मिली कि वह अब भी उसकी आवाज़ पहचानता था। वही खनक और थोड़ा-सा लड़कपन लिए। हाँ, अब वह उतनी बेपरवाह नहीं लग रही थी। वह थोड़ा निराश हुआ कि उसकी मुस्कुराहट में वह पहचान नहीं थी जो बरसों तक, पाँच बरस तक सिर्फ़ उसके लिए थी।
“मुझे लग रहा था कि तुम नहीं आओगी” राहुल बोला।
“क्यों जब कहा था आऊँगी तब ऐसा क्यों लगा?’
राहुल ने महसूस किया लिच्छवि की आवाज़ में अब पहले वाली हड़बड़ाहट नहीं थी। अब वह काफी सधी हुई लगती थी।
“यों ही मुझे लगा शायद काम में फँस गई होगी।” राहुल बोला।
“काम तो था, लेकिन... ” लिच्छवि वाक्य अधूरा छोड़कर अपने बालों का रबड़ ठीक करने लगी।
राहुल कहना चाहता था कि तुम अब भी उतनी सुंदर लगती हो और तुम ठीक कहती थीं हल्का काजल लगा लेने से तुम्हारी आँखें और भी ज़्यादा सुंदर लगने लगती हैं- एकदम काले पके अंगूर-सी बाहर को निकलती। पर उसने कहा नहीं। दूरियों के लम्बे बरसों की दीवार बीच में आ गई थी। उसे याद आया वह सब कहने के लिए तो लिच्छवि से मिलने नहीं आया था। उसे तो एक काम की बात करनी थी।
इतने बरसों में राहुल एक प्रोफेशनल राइटर बन चुका है। अपने विजिटिंग कार्ड पर यही लिखता। अख़बारों में लिखने से लेकर रेडियो-टेलीविज़न के छोटे-मोटे कार्यक्रम लिखने वाला राहुल शर्मा बन चुका है। चैट शो, गेम शो, काउंटडाउन शो लिखने वाला राहुल शर्मा।
शो-बिजनेस के छोटे-मझोले निर्माता उसका नाम जानते थे। उसका फोन नम्बर, पेजर नम्बर अपनी डायरी में लिखकर रखने लगे थे। इन दिनों वह एक फिक्शन यानी धारावाहिक की तलाश में था। हर प्रोफेशनल राइटर की असली मंज़िल। वह एक सफल लेखक का लेबल लगाना चाहता था अपने ऊपर। अपना एक ब्रांड नेम बनाना चाहता था- राहुल शर्मा। 
लिच्छवि एक टेलीविज़न एंकर बन चुकी थी। लेकिन चैनलों की बढ़ती भीड़ में वह जिस चैनल की एंकर पर्सन थी, उस पर बहुत कम दर्शकों का रिमोट ठहरता था।
वह एक अख़बार में हाई सोसायटी पार्टियों पर कॉलम लिखती थी। हालांकि अंग्रेज़ी के जिस अख़बार में लिच्छवि का कॉलम छपता था, वह अख़बार भी ज़्यादा नहीं पढ़ा जाता था।
पर कम-से-कम राहुल तो उसे पढ़ता ही था। हर इतवार की सुबह वह उस कॉलम को पढ़ता और कई कारणों से उदास हो जाता। एक यह कि वह कभी लिच्छवि के साथ किसी पार्टी में नहीं गया। तब वे दोनों पार्टियों में जाते भी कहाँ थे।
शायद इस कारण भी कि लिच्छवि ऐसी पार्टियों में जाने लगी थी जहाँ जाने का सौभाग्य राहुल को अब तक नहीं मिला था।
...और थोड़ा इसीलिए भी शायद कि भले ही लिच्छवी सेलिब्रिटी नहीं बन पाई हो अब तक, पर पैसा तो अच्छा कमा ही रही थी।
ज़िंदगी की दौड़ में वह उससे इतना आगे निकल चुकी थी कि आज उसे अपनी ज़िंदगी की गाड़ी पटरी पर लाने के लिए उसकी ज़रूरत आ पड़ी थी। शायद उसे भरोसा था लिच्छवि पर-अपने बीते प्यार पर।
उसी की बरसों पुरानी डोर थामकर उसने लिच्छवी को आज अल कौसर में डिनर के लिए बुलाया था।
“अल कौसर तुम्हारी फेवरिट जगह थी... याद है!” राहुल बातों को पीछे ले जाना चाह रहा था।
“हाँ! पर अब तो टाइम ही नहीं मिलता यहाँ आने का। पर यहाँ-वहाँ पार्टियों में यहाँ के काकोरी कबाब मिल जाते हैं। वैसे भी यहाँ आना अब इनथिंग नहीं रह गया है...।” लिच्छवि ऐसे कह रही थी जैसे उसे किसी जगह न बुलाया गया हो।
राहुल को लगा जैसे लिच्छवि उसे छोटा दिखाने के लिए ही ऐसा कह रही है। उसे लगा जैसे उसने लिच्छवि से मिलकर कोई ग़लती कर दी हो। पर एक उम्मीद थी जिसकी लौ के सहारे वह उससे मिलने आया था।
“इधर सुना, तुम्हारा टॉक शो बहुत पॉपुलर हो गया है। मैं देख तो नहीं पाता पर पीछे कहीं अख़बार में पढ़ा था। वैसे मॉर्निंग इको में तुम्हारा कॉलम पढ़ता रहता हूँ। अच्छा लिखने लगी हो।”
राहुल को बातचीत का एक सिरा पकड़ना चाहता था। एक ऐसा सिरा जिसके सहारे बीच का ठंडापन ख़त्म हो सके।
“हाँ, देख तो मैं खुद भी नहीं पाती हूँ। टाइम ही नहीं मिलता... कॉलम तो वैसे ही है- टाइमपास। थोड़ी-सी गॉसिप हो जाती है- ठीक-ठाक पैसे मिल जाते हैं। वैसे इन दिनों मैं एक नॉवेल लिख रही हूँ दिल्ली के सोशलाइट लाइफ़ स्टाइल के बैकड्रॉप में लव स्टोरी होगी। रविदयाल से बातचीत चल रही है...”
और तुम्हारी कोई ख़बर ही नहीं मिलती। बीच में सुना था कबीर के लिए चंडीगढ़ पर कोई डॉक्यूमेंट्री लिखी थी तुमने। इनफैक्ट वह खुद ही बता रहा था... कह रहा था ठीक ठाक लिखता है। पर तुम तो जानते ही हो मेरी हिंदी का हाल... अब तो और बुरी हो गई है...”
बात का कोई भी सिरा राहुल के हाथ नहीं आ पा रहा था। लग रहा था कि लिच्छवि की आवाज़ किसी और दुनिया से आ रही हो, जिसे समझने का कोड उसकी दुनिया में था ही नहीं। यह अहसास और बढ़ता जा रहा था कि वह वाकई इस दुनिया में पीछे छूट गया है...राहुल कुछ नहीं बोला...चुपचाप अलकौसर का दरवाज़ा खोलकर अंदर घुस गया और लिच्छवि के आने की प्रतीक्षा करने लगा।
“कोने वाली टेबल ख़ाली नहीं है। याद है तुम्हें, उस टेबल के ख़ाली होने की हम कितनी-कितनी देर प्रतीक्षा करते थे।” राहुल धीरे-धीरे खोई आवाज़ में बोल रहा था।
“ओ हाँ! कहीं और बैठ जाते हैं। मुझे जल्दी जाना है। काबुकी स्टुडियो में रिकॉर्डिंग है” ...राहुल ने महसूस किया लिच्छवी थोड़ी बेचैन हो गई थी।
लिच्छवि उस दुनिया में नहीं लौटना चाहती थी। राहुल बार-बार अपनी स्मृतियों की उस दुनिया को लौटना चाह रहा था। लिच्छवि और अपनी साझी स्मृतियों की दुनिया... पर लग रहा था लिच्छवि की स्मृतियों में वह दुनिया में वह दुनिया थी ही नहीं।
दोनों बीच की एक ख़ाली टेबल पर बैठ गए।
“दो काकोरी कबाब और... तुम अब भी सिर्फ कोक ही पीती हो या...” राहुल ऑर्डर देते-देते थोड़ा रुक गया।
“मैं कुछ भी लेती हूँ। वैसे डिनर पर तुमने बुलाया है... जो भी पिलाओगे पी लूँगी।” लिच्छवि मुस्कुराते हुए बोली।
राहुल ने लिच्छवि की आवाज़ में पहली बार ऐसा कुछ पाया जो उसे अपना लगा। उसे लगा कि यह सही मौक़ा है जब अपनी बात शुरू कर देनी चाहिए।
पिछले हफ़्ते उसने अख़बार में युवा निर्देशक सुकांत के साथ एक डांस पार्टी में लिच्छवि की तस्वीर देखी थी। उसी अख़बार अख़बार में सुकांत का इंटरव्यू भी छपा था जिसमें उसने अपने अगले डेली सोप के बारे में बताया था। उसने कहा था उसे लेखकों की नई टीम की तलाश है।
उसे उम्मीद थी अगर वह लिच्छवि को सुकांत से मिलवाए जाने की बात करे तो शायद उसके करियर को एक नया मोड़ मिल जाए। लिच्छवि अगर उसकी मदद करे तो वह अपना करियर ग्राफ बदल सकता है।
“पिछले हफ़्ते मैंने सुकांत के साथ तुम्हारी तस्वीर देखी थी।” राहुल काकोरी कबाब के टुकड़े को कोक के साथ निगलते हुए बोला।
“ओ यस! ही इज़ ए गुड फ्रेंड ऑफ़ माइन। दरअसल, उसी ने मुझे सिखाया था कि इस माध्यम में अगर बड़ा बनना है तो ब्लैक एंड व्हाइट को ब्लैक एंड व्हाइट नहीं मोनोक्रोम कहना चाहिए।”
राहुल ने नोट किया, वह अब भी पहले की तरह जल्दी-जल्दी खाती है।
“असल में बात यह है कि सुकांत एक नया डेली सोप बना रहा है और उसे कुछ नए राइटर चाहिए। तुम अगर... ” राहुल कह तो लिच्छवि से कह रहा था पर देख ऐसे रहा था जैसे अपनी अनुगूँज से कह रहा हो।
“तो इसीलिए तुमने मुझे यहाँ बुलाया था... देखो राहुल, मैं तुम्हें प्रोफेशनली तो जानती नहीं हूँ... और तुम जानते हो इस मीडियम में... एनी वे... तुम्हें एक काम करना होगा। मैं तुम्हें उसका फोन नम्बर देती हूँ। उसकी बीबी को ये पसंद नहीं कि मैं उसके घर फोन करूँ। फोन वह मुझे खुद ही करता है। तुम फोन करके उसे यहाँ बुला लो... कहना मैं बैठी हूँ। चाहो तो कह सकते हो- मैं उसका इंतज़ार कर रही हूँ... आय ऐम वेटिंग फॉर हिम...” 
राहुल ने महसूस किया लिच्छवि की आवाज़ में अपने कुछ होने का अहसास बढ़ गया है।
राहुल पहली बार इस मुलाक़ात पर शर्मिंदा महसूस कर रहा था। जैसे लग रहा था सफलता की इच्छा ने उसे आज भिखमंगा बना दिया हो। बातचीत इसी मोड़ पर ख़त्म की जा सकती थी। पर इससे नुकसान तो उसका ही होता न। या तो वह अपना स्वाभिमान बचा सकता था या अपना करियर। बरसों की असफलताओं से वह जान गया था कि उसके स्वाभिमान में बचाने लायक कुछ बचा नहीं है।
“पता है जब तुम्हारी याद आती है मैं क्या करता हूँ?” राहुल बातों को कोई मोड़ देना चाह रहा था।
“क्या?” लिच्छवि ने पहली बार राहुल की आँखों में आँखें डालते हुए पूछा।
“मैं ख़ूब मिठाई खाने लगता हूँ। ...तुम्हें मिठाई खाना बहुत अच्छा लगता था न।” राहुल ने लिच्छवि की आँखों से अपनी आँखें बचाते हुए कहा।
“मिठाई तो मैं अब भी नहीं पचा पाती। बहुत फैटी होती है। खैर... तुम सुकांत का नम्बर नोट करो... इट्स 5142773...”
राहुल को लगा इस प्यार के खेल को अपने बरसों पुराने झोले में वापस डाल देना चाहिए। अपने-आपको और गिराने से बेहतर है कि जल्दी से काम निपटाकर लिच्छवि से विदा ले।
राहुल चुपचाप उठा और रिसेप्शन से फोन करने लगा।
“उसने कहा है वह पाँच मिनट में आ रहा है” राहुल लौटकर बताया।
“बिल आ गया है, पैसे हैं या दूँ?” लिच्छवि ने राहुल से पूछा।
“डिनर पर मैंने तुम्हें बुलाया था...” राहुल पर्स से पैसे निकालने लगा।
लिच्छवि उठकर बाहर चली गई थी। राहुल भी पीछे-पीछे आ गया।
“तुम्हारे घर का फोन नम्बर...” राहुल ने वक़्त काटने के लिए लिच्छवि से पूछा।
लिच्छवि कुछ देर चुपचाप देखती रही। अपनी बार-बार देखी आँखों में अनजानापन लिए।
“पापा के नहीं रहने के बाद मम्मी आजकल मेरे साथ ही रहती हैं। उन्हें तुम्हारा फोन करना अच्छा नहीं लगेगा। वह आज भी मेरे बहक जाने का जिम्मेदार तुम्हें मानती हैं। मेरे इस करियर का...” लिच्छवि अपनी सधी हुई एंकर पर्सन वाली आवाज़ में बोल रही थी।
“ओह! आय ऐम सॉरी...खैर...तुम्हारे ऑफिस का नम्बर तो है ही।” राहुल ने इस प्रसंग को समाप्त करते हुए कहा।
सामने एक काली सिएलो कार रुकी। राहुल ने महसूस किया लिच्छवि की आँखों में किसी की पहचान चमकने लगी थी। वह तेज़ी से कार की ओर बढ़ गई।
“सुकांत, ये राहुल शर्मा हैं। कॉलेज में मेरे सीनियर थे। कबीर की चंडीगढ़ वाली डॉक्यूमेंट्री इन्होंने ही लिखी है...” लिच्छवि सुकांत से राहुल का परिचय करवा रही थी!
“ओ नाइस मीटिंग यू। सुना था किसी से आपके बारे में। आप कल-परसों फोन करके मेरे पास आ जाइए... गल्लाँ-सल्लाँ करते हैं” ...सुकांत ने राहुल से हाथ मिलाते हुए कहा।
राहुल को लगा अब वहाँ फालतू बने रहना अच्छा नहीं। विदा लेनी चाहिए। उन्हें और भी बातें करनी होंगी।
“अच्छा मैं चलता हूँ...” राहुल ने लिच्छवि से कहा और सुकांत की ओर देखते हुए बोला, “मैं कल दोपहर में आपको फोन करूँगा।”
“ओह श्योर” सुकांत ने तपाक से बोला। राहुल पीछे मुड़ चुका था।
“फोन करना... कीप इन टच”, उसने सुना। लिच्छवि की आवाज़ थी।
वह कुछ नहीं बोला। बस पीछे मुड़कर एक बार लिच्छवि को देखा, हाथ मिलाया और वापस मुड़कर तेज़ी से चलने लगा... वैसे ही जैसे बरसों पहले आख़िरी बार वह लिच्छवि से जुदा हुआ था।
आगे अँधेरी सड़क थी, जिस पर गाड़ियों की जलती-बुझती भागती रोशनी न जाने क्यों उसे अपने गाँव की पगडंडियों की याद दिला रही थी जो रात में जुगनुओं की जगर-मगर से भर जाती थी।
वह दूर अँधेरे में गुम हो रहा था।
“कोई पुराना चक्कर” सुकांत ने गाड़ी का पावर विंडो बंद करते हुए पूछा।
“बताया न मेरा सीनियर था कॉलेज में... अंड ही वाज आल्वेज वेरी नाइस टू मी... वेरी हेल्पफुल- अंड आई थिंक बदले में मुझे उसके लिए कुछ करना चाहिए...” लिच्छवि गाड़ी का एसी ऑन कर चुकी थी।
“शुक्र है तुम्हें इतना तो याद है कि तुम्हें किसके लिए कितना क्या करना है...” सुकांत गाड़ी स्टार्ट करते हुए बोला।
दोनों हँसने लगे। लिच्छवि वही जोरदार हँसी हँस रही थी जिसकी अनुगूँज राहुल की स्मृतियों में अभी बाक़ी थी। जो इस समय सड़क पर चलते-चलते यही सोच रहा था शायद वैसी ही हँसी हँस रही होगी।
लिच्छवि और सुकांत की गाड़ी तेज़ी से उसके बगल से गुज़र गई। 

Tuesday, August 28, 2012

‘फ़िराक़’ गोरखपुरी की जन्मतिथि !

फ़िराक़ गोरखपुरी
आज उर्दू के मशहूर शायर, पद्मभूषण 'फ़िराक़' गोरखपुरी (रघुपति सहाय, 28 अगस्त 1982 – 3 मार्च 1982) की जन्मतिथि है। फ़िराक़ उर्दू के पहले रचनाकार हैं, जिनको (उनकी कृति गुल-ए-नग़्मा के लिए) ज्ञानपीठ पुरस्कार  मिला। इसी कृति के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड से भी सम्मानित किया गया। ग़ज़ल और नज़्म के सिवा, उन्होंने उपन्यास और कहानियाँ लिखीं। इस मौक़े पर पेश है उनकी कुछ ग़ज़लें : बीइंग पोएट  
1.     
किसी का यूं तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी
ये हुस्न-ओ-इश्क़ तो धोका है सब
मगर फिर भी
हज़ार बार ज़माना इधर से गुज़रा है
नई नई है मगर कुछ तेरी रहगुज़र फिर भी
खुशा इशारा-ए-पैहम, जेह-ए-सुकूत नज़र
दराज़ हो के फ़साना है मुख़्तसर फिर भी
झपक रही हैं ज़मान-ओ-मकाँ की भी आँखें
मगर है काफ्ला आमादा-ए-सफ़र फिर भी
तेरी निगाह से बचने में उम्र गुज़री है
उतर गया रग-ए-जां में ये नश्तर फिर भी
2.
मुझको मारा है हर इक दर्द-ओ-दवा से पहले
दी सज़ा इश्क ने हर ज़ुर्म-ओ-खता से पहले
आतिश-ए-इश्क़ भड़कती है हवा से पहले
होंठ जलते हैं मुहब्बत में दुआ से पहले
अब कमी क्या है तेरे बेसर-ओ-सामानों को
कुछ ना था तेरी कसम तर्क-ओ-फ़ना से पहले
इश्क़-ए-बेबाक को दावे थे बहुत ख़लवत में
खो दिया सारा भरम शर्म-ओ-हया से पहले
मौत के नाम से डरते थे हम ऐ शौक-ए-हयात
तूने तो मार ही डाला था कज़ा से पहले
हम उन्हें पा के फ़िराक कुछ और भी खोते गए
ये तकल्लुफ़ तो ना थे अहद-ए-वफ़ा से पहले
3.
तहों में दिल के जहां कोई वारदात हुई 
हयात-ए-ताज़ा से लबरेज़ क़ायनात हुई 
तुम्हीं ने बायसे-ग़म बारहा किया दरयाफ़्त
कहा तो रूठ गए यह भी कोई बात हुई 
हयात राज़े-सुकूँ पा गई अज़ल ठहरी 
अज़ल में थोड़ी-सी लर्ज़िश हुई हयात हुई 
थी एक काविशे-बेनाम दिल में फ़ितरत के 
सिवा हुई तो वही आदमी की ज़ात हुई 
बहुत दिनों में मुहब्ब़त को ये हुआ मालूम 
जो तेरे हिज़्र में गुज़री वो रात रात हुई 
फ़ि‍राक को कभी इतना ख़मोश देखा था 
जरूर ऐ! निगाह-ए-नाज़ कोई बात हुई 
4.
होकर अयाँ वो ख़ुद को छुपाए हुए-से हैं 
अहले-नज़र ये चोट भी खाए हुए-से हैं 
वो तूर हो कि हश्रे-दिल अफ़्सुर्दगाने-इश्क़
हर अंजुमन में आग लगाए हुए-से हैं 
सुब्हे-अज़ल को यूँ ही ज़रा मिल गई थी आंख 
वो आज तक निगाह चुराए हुए-से हैं 
हम बदगु़माने-इश्क़ तेरी बज़्म-ए-नाज़ से 
जाकर भी तेरे सामने आए हुए-से हैं
ये क़ुर्बो-बोद भी हैं सरासर फ़रेब-ए-हुस्न
वो आके भी ‘फ़िराक़ न आए हुए-से हैं
5.
गैर क्या जानिये क्यों मुझको बुरा कहते हैं
आप कहते हैं जो ऐसा तो बज़ा कहते हैं
वाकई तेरे इस अन्दाज को क्या कहते हैं
ना वफ़ा कहते हैं जिस को ना ज़फ़ा कहते हैं
हो जिन्हे शक, वो करें और खुदाओं की तलाश
हम तो इन्सान को दुनिया का ख़ुदा कहते हैं
तेरी सूरत नजर आई तेरी सूरत से अलग
हुस्न को अहल-ए-नज़र हुस्न नुमां कहते हैं
शिकवा-ए-हिज़्र करें भी तो करें किस दिल से
हम खुद अपने को भी अपने से जुदा कहते हैं
तेरी रूदाद-ए-सितम का है बयान नामुमकिन
फायदा क्या है मगर यूं जो ज़रा कहते हैं
लोग जो कुछ भी कहें तेरी सितमकोशी को
हम तो इन बातों को अच्छा ना बुरा कहते हैं
औरों का तजुर्बा जो कुछ हो मगर हम तो फ़िराक
तल्ख़ी-ए-ज़ीस्त को जीने का मज़ा कहते हैं
6.
सकूत-ए-शाम मिटाओ बहुत अंधेरा है 
सुख़न की शमा जलाओ बहुत अंधेरा है 
दयार-ए-ग़म में दिल-ए-बेक़रार छूट गया 
सम्भल के ढूँढ़ने जाओ बहुत अंधेरा है 
ये रात वो कि सूझे जहाँ न हाथ को हाथ 
ख़यालों दूर न जाओ बहुत अंधेरा है 
लटों को चेहरे पे डाले वो सो रहा है कहीं 
ज़या-ए-रुख़ को चुराओ बहुत अंधेरा है 
हवा-ए-नीम शबी हों कि चादर-ए-अंजुम 
नक़ाब रुख़ से उठाओ बहुत अंधेरा है 
शब-ए-सियाह में गुम हो गई है राह-ए-हयात 
क़दम सम्भल के उठाओ बहुत अंधेरा है 
गुज़श्ता अह्द की यादों को फिर करो ताज़ा 
बुझे चिराग़ जलाओ बहुत अंधेरा है 
थी एक उचकती हुई नींद ज़िंदगी उसकी 
'
फ़िराख़' को न जगाओ बहुत अंधेरा है
7.
सर में सौदा भी नहीं दिल में तमन्ना भी नहीं
लेकिन इस तर्क़-ए-मुहब्बत का भरोसा भी नहीं
यूँ तो हंगामा उठाते नहीं दीवाना-ए-शौक़
मगर ऐ दोस्त
, कुछ ऐसों का ठिकाना भी नहीं
मुद्दतें गुजरी, तेरी याद भी आई ना हमें
और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं
ये भी सच है कि मुहब्बत में नहीं मैं मजबूर
ये भी सच है कि तेरा हुस्न कुछ ऐसा भी नहीं
बदगुमाँ हो के मिल ऐ दोस्त जो मिलना है तुझे
ये झिझकते हुऐ मिलना कोई मिलना भी नहीं
शिकवा-ए-शौक करे क्या कोई उस शोख़ से जो
साफ़ कायल भी नहीं, साफ़ मुकरता भी नहीं
मेहरबानी को मुहब्बत नहीं कहते ऐ! दोस्त
आह! मुझसे तो मेरी रंजिश-ए-बेजां भी नहीं
बात ये है कि सूकून-ए-दिल-ए-वहशी का मकाम
कुंज़-ए-ज़िन्दां भी नहीं, वुसअत-ए-सहरा भी नहीं
मुँह से हम अपने बुरा तो नहीं कहते कि फ़िराक
है तेरा दोस्त मगर आदमी अच्छा भी नहीं
8.
रात भी नींद भी कहानी भी
हाय! क्या चीज़ है जवानी भी
एक पैगाम-ए-ज़िन्दगानी भी
आशिक़ी मर्गे-नागहानी भी
इस अदा का तेरी जवाब नहीं
मेहरबानी भी सरगरानी भी
दिल को अपने भी ग़म थे दुनिया में
कुछ बलाएँ थी आसमानी भी
मंसबे-दिल खुशी लुटाता है
ग़मे-पिन्हां भी पासबानी भी
दिल को शोलों से करती है सैराब
ज़िन्दगी आग भी है पानी भी
शादकामों को ये नहीं तौफ़ीक़
दिले-गमगीं की शादमानी भी
लाख हुस्न-ए-यकीं से बढ़कर है
इन निगाहों की बदगुमानी भी
तंगना-ए-दिले-मलाल में है
देहर-ए-हस्ती की बेकरानी भी
इश्क़-ए--नाक़ाम की है परछाई
शादमानी भी कामरानी भी
देख दिल के निगारख़ाने में
ज़ख्म-ए-पिन्हां की है निशानी भी
ख़ल्क क्या-क्या मुझे नहीं कहती
कुछ सुनूं मैं तेरी जुबानी भी
आए तारीक-ए-इश्क़ में सौ बार
मौत के दौर दरमियानी भी
अपनी मासूमियों के परदे में
हो गई वो नजर सयानी भी
दिन को सूरजमुखी है वो नौगुल
रात को वो है रातरानी भी
दिल-ए-बदनाम तेरे बारे में 
लोग कहते हैं इक कहानी भी
नज़्म करते कोई नई दुनिया
कि ये दुनिया हुई पुरानी भी
दिल को आदाब-ए-बंदगी भी ना आए
कर गए लोग हुक्मरानी भी
जौरे-कम कम का शुक्रिया बस है
आप की इतनी मेहरबानी भी
दिल में एक हूक-सी उठे ऐ दोस्त
याद आए तेरी जवानी भी
सर से पा तक सुपुर्दगी की अदा
एक अन्दाज़-ए-तुर्कमानी भी
पास रहना किसी का रात की रात
मेहमानी भी मेजबानी भी
जो ना अक्स-ए-जबीं-ए-नाज़ की है
दिल में इक नूर-ए-कहकशानी भी
ज़िन्दगी ऐन दीद-ए-यार फ़िराक़
ज़िन्दगी हिज़्र की कहानी भी
9.
सितारों से उलझता जा रहा हूँ 
शब-ए-फ़ुरक़त बहुत घबरा रहा हूँ 
तेरे ग़म को भी कुछ बहला रहा हूँ 
जहाँ को भी समझा रहा हूँ 
यक़ीं ये है हक़ीक़त खुल रही है 
गुमाँ ये है कि धोके खा रहा हूँ 
अगर मुमकिन हो ले ले अपनी आहट 
ख़बर दो हुस्न को मैं आ रहा हूँ 
हदें हुस्न-ओ-इश्क़ की मिलाकर 
क़यामत पर क़यामत ढा रहा हूँ 
ख़बर है तुझको ऐ ज़ब्त-ए-मुहब्बत 
तेरे हाथों में लुटाता जा रहा हूँ 
असर भी ले रहा हूँ तेरी चुप का
तुझे कायल भी करता जा रहा हूँ 
भरम तेरे सितम का खुल चुका है
मैं तुझसे आज क्यों शरमा रहा हूँ 
तेरे पहलू में क्यों होता है महसूस
कि तुझसे दूर होता जा रहा हूँ 
जो उलझी थी कभी आदम के हाथों
वो गुत्थी आज तक सुलझा रहा हूँ 
मुहब्बत अब मुहब्बत हो चली है
तुझे कुछ भूलता-सा जा रहा हूँ 
ये सन्नाटा है मेरे पाँव की चाप
फ़िराक़ अपनी कुछ आहट पा रहा हूँ 
10.
रात आधी से ज्यादा गई थी, सारा आलम सोता था
नाम तेरा ले ले कर कोई दर्द का मारा रोता था
चारागरों, ये तस्कीं कैसी, मैं भी हूं इस दुनिया में
उनको ऐसा दर्द कब उठा, जिनको बचाना होता था
कुछ का कुछ कह जाता था मैं फ़ुरकत की बेताबी में
सुनने वाले हँस पड़ते थे होश मुझे तब आता था
तारे अक्सर डूब चले थे, रात को रोने वालों को
आने लगी थी नींद-सी कुछ, दुनिया में सवेरा होता था
तर्के-मोहब्बत करने वालों, कौन ऐसा जग जीत लिया
इश्क़ के पहले के दिन सोचो, कौन बड़ा सुख होता था
उसके आँसू किसने देखे, उसकी आहें किसने सुनी
चमन चमन था हुस्न भी लेकिन दरिया दरिया रोता था
पिछला पहर था हिज़्र की शब का, जागता रब, सोता इन्सान
तारों कि छांव में कोई फ़िराकसा मोती पिरोता था