Saturday, March 16, 2013

तुम क्यों द्रौपदी की भाषा में बिलख रही हो ?

पंखुरी सिन्हा
कथाकार और कवि पंखुरी सिन्हा (जन्म: 18 जून 1975) हिंदी पाठकों के लिए एक जाना-पहचाना नाम है। पंखुरी की प्रकाशित पुस्तकों में कोई भी दिन और क़िस्सा--कोहिनूर कहानी-संग्रह हैं। ककहरा नामक कविता-संग्रह जल्द ही प्रकाशित होने वाला है। इनकी कविताएँ विभिन्न भाषाओं में अनुदित हो चुकी हैं। कई पुरस्कारों से सम्मानित पंखुरी सिन्हा की दो कविताएँ प्रस्तुत हैं : बीइंग पोएट
रात का सूर्योदय
रात जिसका सूर्योदय न हो,
कहीं नहीं
,
न कोई आखिरी पहर
,
ऐसी स्याह
, काली रात,
दिन पर छाई हुई
,
मैला किए उसे
,
किए उसे गंदूमी
,
कि सूरज गिरफ्त में हो
,
हिरासत में रौशनी
,
वो काम जो मुक़म्मल करना था
,
उसके लिए कोई कल नहीं
,
कोई कल नहीं
,
न आने वाला
,
न होने वाला
,
कहनी थी बात जो उससे
,
कोई कल नहीं उसके लिए
,
संभालनी थी
, अलगनी पर,
किताब जो
,
उसके लिए कोई कल नहीं
,
सवांरने थे जो शब्द किताब में
,
कोई कल नहीं उसके लिए।
धर्मराज को स्वर्ग
धर्मराज को स्वर्ग,
सशरीर
,
युधिष्ठिर को स्वर्ग
,
तुम क्यों द्रौपदी की भाषा में बिलख रही हो
?
प्यार भी द्रौपदी की भाषा में कर रही हो
?
क्यों जोड़ रही हो
,
चाँद और तारों से नाता
?
चाँद और सूरज ने तो बहुतों को छुआ नहीं
,
लेकिन क्या सम्राट भी सबकुछ दांव पर लगाया करते हैं
?
कभी
?
सौ पुत्रों की मौत
?
अपनी भी मौत
?
क्या खेले गए पासे कभी और यों
?
क्या ऐसे भेजे गए चौपड़ के निमंत्रण कभी और
?
क्या लड़ाई की ऐसी रचना की गयी कभी
?
क्या विध्वंस का ऐसा अनुष्ठान
,
ऐसा आह्वान
,
किया गया कभी
?
क्या इश्वर को पुकारा है
,
कभी किसी ने
,
जैसे द्रौपदी ने
?
पांचाली ने
?
अंतरिक्ष सतत है
,
आसमान सनातन
,
अव्यय हैं सूर्य की किरणें
,
अनश्वर चन्द्रमा का प्रकाश
,
पर तुम क्यों जोड़ रही हो नाता
,
परिभाषा से परे
,
किरणों से
,
हिरणों से
?
क्या है यह प्रकृति साधना
,
खुद को प्रतिष्ठित करना
,
चाँद और सूरज की परिधि में
?
किरणों के दायेरे में उनकी
?
बाहर और भीतर
?