Tuesday, December 18, 2012

देखता हूँ 'उफ़क़ के उस पार' जा कर !

यह नज़्म 07 नवम्बर 2008 को लिखी थी मैंने। तब मैं ग्रेजुएशन का छात्र हुआ करता था। उन्हीं दिनों हिंदू कॉलेज में प्रतियोगिता के दौरान इस नज़्म को पुरस्कृत भी की गई थी। आज आपके लिए 'उफ़क़ के उस पार' : त्रिपुरारि कुमार शर्मा
देखता हूँ 'उफ़क़ के उस पार' जा कर
कहीं सफ़ेद अँधेरा
कहीं स्याह उजाला
खो दिया है दर्द ने एहसास अपना
क़
रीबी इतनी कि
देख तक नहीं सकते
कोयला सुलग रहा है
अंगीठी जल रही है बदन में
भुने हुए हर्फ़
काग़ज़ पर गिरते हैं जब
तो 'छन्' से आवाज़ आती है
गले में अटक जाता है
साँस का टुकड़ा  
मेरी पलकें नोचता है कोई
फिर देखती है नंगी आँखें
'एक छिली हुई रूह'
बिल्कुल चाँद की तरह
सोचता हूँ सन्नाटा बुझा दूँ
बहने लगती है उंगलियाँ
बिखरने लगता है वजूद
सोच पिघलती है धुआं बनकर
सहसा सूख जाती है नींद की ज़मीन
रात की दीवार में दरार हो जैसे
फ़्रेम
ख़ाली है अब तक
मुस्कराहट बाँझ हो गई
कुछ हर्फ़-सा नहीं मिलता
बहुत उदास हैं टूटे हुए नुक़्ते
समय के माथे पर ज़ख़्म-सा क्या है ?
जमने लगी है चोट की परत
चीखते हैं मुरझा हुए मौसम
अभी बाक़ी है मरासिम कोई
अब तो दिन रात यही करता हूँ
उफ़क़
से जब भी लहू रिसता है
देखता हूँ 'उफ़क़ के उस पार' जा कर।