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Saturday, September 01, 2012

राही मासूम ‘रज़ा’ की जन्मतिथि !

राही मासूम रज़ा
आज मशहूर शायर और नस्रनिगार राही मासूम रज़ा (01 सितंबर - 15 मार्च 1992) की जन्मतिथि है। इस मौक़े पर पेश है उनकी कुछ नज़्में : बीइंग पोएट   
मर्सिया
एक चुटकी नींद की मिलती नहीं
अपने ज़ख़्मों पर छिड़कने के लिए
हाय हम किस शहर में मारे गये
घंटियाँ बजती हैं
ज़ीने पर क़दम की चाप है
फिर कोई बेचेहरा होगा
मुँह में होगी जिसके मक्खन की ज़ुबान
सीने में होगा जिसके इक पत्थर का दिल
मुस्कुराकर मेरे दिल का इक वरक़ ले जाएगा
हम तो हैं कंगाल
हम तो हैं कंगाल
हमारे पास तो कोई चीज़ नहीं
कुछ सपने हैं
आधे-पूरे
कुछ यादें हैं
उजली-मैली
जाते-जाते
आधे-पूरे सारे सपने
उजली-मैली सारी यादें
हम मरियम को दे जाएंगे
गंगोली के कच्चे घर में उगने वाला सूरज
आठ मुहर्रम की मजलिस का अफ़सुर्दा-अफ़सुर्दा हलवा
आँगन वाले नीम के ऊपर
धूप का एक शनासा टुकड़ा
गंगा तट पर
चुप-चुप बैठा
जाना-पहचाना इक लम्हा
बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई
अहमद जान के टेबल की चंचल पुरवाई
खाँ साहिब की ठुमरी की क़ातिल अंगड़ाई
रैन अँधेरी
डर लागे रे
मेरी भवाली की रातों की ख़ौफ़ भारी लरज़ाँ तन्हाई
छोटी दव्वा के घर की वो छोटी-सी सौंधी अँगनाई
अम्मा जैसा घर का आँगन
अब्बा जैसे मीठे कमरे
दव्वा जैसी गोरी सुबहें
माई जैसी काली रातें
सब्ज़ परी हो
या शहज़ादा
सबकी कहानी दिल से छोटी
फड़के
घर में आते-आते
हर लम्हे की बोटी-बोटी
मेरे कमरे में नय्यर पर हँसने का वो पहला दौरा
लम्हों से लम्हों की क़ुरबत
लम्हों से लम्हों की दूरी
गंगोली की
गंगा तट की
ग़ाज़ी पुर की हर मजबूरी
मेरे दिल में नाच रही है
जिन-जिन यादों की कस्तूरी
धुंधली गहरी
आधी-पूरी
उजली-मैली सारी यादें
मरियम की हैं
जाते-जाते
हम अपनी ये सारी यादें
मरियम ही को दे जाएँगे
अच्छे दिनों के सारे सपने
मरियम के हैं
जाते-जाते
मरियम ही को दे जाएँगे
मरियम बेटी
तेरी याद की दीवारों पर
पप्पा की परछाई तो कल मैली होगी
लेकिन धूप
तेरी आँखों के
इस आँगन में फैली होगी
लेकिन मेरा लावारिस दिल
मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी
मंदिर राम का निकला
लेकिन मेरा लावारिस दिल
अब जिस की जंबील में कोई ख़्वाब
कोई ताबीर नहीं है
मुस्तकबिल की रोशन-रोशन
एक भी तस्वीर नहीं है
बोल ऐ इंसान, ये दिल, ये मेरा दिल
ये लावारिस, ये शर्मिन्दा-शर्मिन्दा दिल
आख़िर किसके नाम का निकला
मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी
मंदिर राम का निकला
बन्दा किसके काम का निकला
ये मेरा दिल है
या मेरे ख़्वाबों का मक़तल
चारों तरफ बस ख़ून और आँसू, चीख़ें, शोले
घायल गुड़िया
खुली हुई मुर्दा आँखों से कुछ दरवाज़े
ख़ून में लिथड़े कमसिन कुरते
एक पाँव की ज़ख़्मी चप्पल
जगह-जगह से मसकी साड़ी
शर्मिन्दा नंगी शलवारें
दीवारों से चिपकी बिंदी
सहमी चूड़ी
दरवाज़ों की ओट में आवेजों की कबरें
ऐ अल्लाह, ऐ रहीम, करीम, ये मेरी अमानत
ऐ श्रीराम, रघुपति राघव, ए मेरे मर्यादा पुरुषोत्तम
ये आपकी दौलत आप सम्हालें
मैं बेबस हूँ
आग और ख़ून के इस दलदल में
मेरी तो आवाज़ के पाँव धँसे जाते हैं।