Tuesday, August 28, 2012

सफ़दर इमाम क़ादरी की जन्मतिथि !

आज सफ़दर इमाम क़ादरी (जन्म : 28 अगस्त 1965) की जन्मतिथि है। इस मौक़े पर हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओं में मुख्यतः आलोचना-शोध के क्षेत्र में सक्रिय सफ़दर साहिब की कुछ नज़्में : बीइंग पोएट
ख़्वाब का चेहरा
पत्थर, मिट्टी, पेड़, बर्फ़
बादल और आकाश
रौशनी और रोमानी धूप
ख़्वाब का चेहरा कैसा होगा?
आओ, इस वादी में
तकमील की क़समें पूरी कर लें!
कहानी की तकमील
दाएँ पहाड़ पर मिट्टी है
बाएँ ऊँचे-ऊँचे पेड़
आगे गहरी खाई
आँखें जब ऊपर करता हूँ
बादल झुक कर पर्वत पर
अपने नाज़ुक होंठों से
लम्स का नज़राना टपकाते हैं
एक कहानी पूरी हो जाती है
दुआ
हमारे कथाकार दोस्त
कासिम ख़ुरशीद ने पूछा
शिमले से हमारे लिए क्या लाए
आप की उन्नति के लिए
आठ हज़ार फ़ुट ऊँचाई से दुआ की
शिमला से आसमान की दूरी कम हो जाती है
अर्श नज़दीक होता है
बन्दे और ख़ुदा के बीच की दूरी
घट जाती है
दुआ कुबूल हो जाती है
पहाड़ की सबसे ऊँची चोटी पर खड़े होकर
आँखें बन्द करके
हवाओं में बाँहें फैलाओ
"ख़ुदा बन्दे से ख़ुद पूछे
बता तेरी रज़ा क्या है?"
धूप
सूखे और ऊँचे पहाड़ों को
मटियाले रंगों की चमक दे जाती है
अपनी पहाड़ी से अलग
दूसरी पहाड़ी पर
सुरमई हो जाती है
उचटती नज़र डालो
तो धुआँ-धुआँ
बादलों की छाँव की तरह
दिखाई देती है
नंगी आँखों से देखो
तो लूट लेने या खा जाने को जी चाहे
ऐसी रौशन और चमकदार
बदन के पोर-पोर में
उतरने वाली धूप
कुछ कहना चाहती है!!!
हिमाचल की औरतें
हिमाचल की औरतें 
ललचाती नहीं
सौ-पचास में
अद्वितीय सुन्दरी भी
नज़र आ जाती है
लेकिन उसेलेकर
भाग जाने को जी नहीं चाहता
थोड़ी देर देख कर
जी में ठंडक भर लेने से
काम चल जाता है
माल रोड पर
करवाचौथ की रात
शिमला की तमाम ख़ूबसूरत
औरतों के हुस्न
और सजावट के सैलाब में भी
पूए चांद की रौशनी में
टहलते हुए
उन दस-बीस हज़ार औरतों को
एक बार देखते हुए गुज़रना 
काफ़ी मालूम हुआ
किसी-किसी शाम
छह-सात डिग्री तापमान के बावजूद
कोई हसीना हलके कपड़ों
स्वेटर और जैकेट के बग़ैर
खुले घेरों के सहारे
खुला निमंत्रण देने की कोशिश करती मिली
लेकिन उसके पीछे भागने की ख़्वाहिश नहीं हुई
क्या उन सुन्दरियों के सारे प्रोवेकेशन
यहाँ के पहाड़ों, धूप, आसमान
और हवाओं ने छीन लिए हैं!
अविश्वासी मौसम
एक रोज़
ज़्यादा ऊँचाई की तरफ़ हम बढ़ रहे थे
कार के बंद शीशे से दूर
पहाड, आसमान और बादलों का खेल
बिल्कुल अनजाना लग रहा था
मौलाना रोम ने सहवास के समय
औरतों के ज़िस्म को
नान-बा के हाथ में
ख़मीर आटे की हर क्षण
बनती और बदलती शक्लों और सूरतों से
स्पष्ट किया था
उस रोज़ पहाड़ के ज़िस्म-व-जान के हाल्कुछ ऐसे ही रहे होंगे
मेरे मुँह से निकल गया--
ये पहाड़ कितने नर्म और मुलायम हैं!
ड्राइवर ने इशारा किया...
शायद आप 'स्नो-फ़ाल' देख सकें
तो क्या बादल और पहाड़ के 'मधुर-मिलन' से
बर्फ़बारी होती है?
साढ़े ग्यारह हज़ार फ़ुट पहुँचते ही
अचानक सर्दी का एहसास बढ़ा
अंदर से गुदगुदी होने लगी
मौसम ज़रा भारी हो गया
हमने जैकेट पर देखा
बर्फ़ के फाहे
अपनी शक्ल जाहिर कर रहे हैं
घोड़ों पर सवार होकर
तीन-चार किलोमीटर ऊपर पहुँचते ही
जिस रौशन धूप ने हमारा स्वागत किया
वह देखने लायक था
मुझे पहाड़ों के बदलते मौसमों का
अविश्वासी होना अच्छा लगा!