Monday, March 26, 2012

महादेवी वर्मा की जन्मतिथि !

महादेवी वर्मा

आज छायावाद के चार स्तंभों में से एक महादेवी वर्मा (26 मार्च 1907 - 11 सितम्बर 1987) की जन्मतिथि है। उन्हें ‘आधुनिक मीराबाई’ भी कहा गया है। उनकी महानता का परिचय इस बात में झलकता है कि महाप्राण कवि निराला ने उन्हें हिन्दी के विशाल मन्दिर की सरस्वती कह कर सम्मानित किया था। उनकी जन्मतिथि के अवसर पर प्रस्तुत है कुछ कविताएँ : बीइंग पोएट
कौन तुम मेरे हृदय में?
कौन तुम मेरे हृदय में?
कौन मेरी कसक में नित

मधुरता भरता अलक्षित?
कौन प्यासे लोचनों में
घुमड़ घिर झरता अपरिचित?
स्वर्ण-स्वप्नों का चितेरा
नींद के सूने निलय में!
कौन तुम मेरे हृदय में?
अनुसरण निश्वास मेरे
कर रहे किसका निरन्तर?
चूमने पदचिन्ह किसके
लौटते यह श्वास फिर फिर
कौन बन्दी कर मुझे अब
बँध गया अपनी विजय में?
कौन तुम मेरे हृदय में?
एक करूण अभाव में चिर-
तृप्ति का संसार संचित
एक लघु क्षण दे रहा
निर्वाण के वरदान शत शत,
पा लिया मैंने किसे इस
वेदना के मधुर क्रय में?
कौन तुम मेरे हृदय में?
गूँजता उर में न जाने
दूर के संगीत सा क्या?
आज खो निज को मुझे
खोया मिला, विपरीत सा क्या
क्या नहा आई विरह-निशि
मिलन-मधु-दिन के उदय में?
कौन तुम मेरे हृदय में?
तिमिर-पारावार में
आलोक-प्रतिमा है अकम्पित
आज ज्वाला से बरसता
क्यों मधुर घनसार सुरभित?
सुन रहीं हूँ एक ही
झंकार जीवन में, प्रलय में?
कौन तुम मेरे हृदय में?
मूक सुख दुख कर रहे
मेरा नया श्रृंगार सा क्या?
झूम गर्वित स्वर्ग देता-
नत धरा को प्यार सा क्या?
आज पुलकित सृष्टि क्या
करने चली अभिसार लय में
कौन तुम मेरे हृदय में?
व्यथा की रात 
यह व्यथा की रात का कैसा सबेरा है ?
ज्योति-शर से पूर्व का रीता अभी तूणीर भी है
,
कुहर-पंखों से क्षितिज रूँधे विभा का तीर भी है,
क्यों लिया फिर श्रांत तारों ने बसेरा है ?
छंद-रचना-सी गगन की रंगमय उमड़े नहीं घन,
विहग-सरगम में न सुन पड़ता दिवस के यान का स्वन,
पंक-सा रथचक्र से लिपटा अँधेरा है ।
रोकती पथ में पगों को साँस की जंजीर दुहरी,
जागरण के द्वार पर सपने बने निस्तंद्र प्रहरी,
नयन पर सूने क्षणों का अचल घेरा है ।
दीप को अब दूँ विदा, या आज इसमें स्नेह ढालूँ ?
दूँ बुझा, या ओट में रख दग्ध बाती को सँभालूँ ?
किरण-पथ पर क्यों अकेला दीप मेरा है ?
यह व्यथा की रात का कैसा सबेरा है ?
क्यों इन तारों को उलझाते?
क्यों इन तारों को उलझाते?
अनजाने ही प्राणों में क्यों आ आ कर फिर जाते?
पल में रागों को झंकृत कर,
फिर विराग का अस्फुट स्वर भर,
मेरी लघु जीवन वीणा पर क्या यह अस्फुट गाते?
लय में मेरा चिर करुणा-धन
कम्पन में सपनों का स्पन्दन
गीतों में भर चिर सुख चिर दुख कण कण में बिखराते!
मेरे शैशव के मधु में घुल
मेरे यौवन के मद में ढुल
मेरे आँसू स्मित में हिल मिल मेरे क्यों न कहाते?
सब आँखों के आँसू उजले
सब आँखों के आँसू उजले सबके सपनों में सत्‍य पला!
जिसने उसको ज्‍वाला सौंपी उसने इसमें मकरंद भरा,
आलोक लुटाता वह घुल-घुल देता झर यह सौरभ बिखरा!
दोनों संगी
, पथ एक किंतु कब दीप खीला कब फूल जला?
वह अचल धरा को भेंट रहा शत-शत निर्झर में हो चंचल,
चिर परिधि बना भू को घेरे इसका उर्मिल नित करूणा-जल
कब सागर उर पाषाण हुआ
, कब गिरि ने निर्मम तन बदला?
नभ तारक-सा खंडित पुलकित यह क्षुर-धारा को चूम रहा,
वह अंगारों का मधु-रस पी केशर-किरणों-सा झुम रहा
,
अनमोल बना रहने को कब टूटा कंचन हीरक पिघला
?
नीलम मरकत के संपुट दो जिमें बनता जीवन-मोती,
इसमें ढलते सब रंग-रुप उसकी आभा स्‍पदन होती!
जो नभ में विद्युत-मेघ बना वह रज में अंकुर हो निकला!
संसृति के प्रति पग में मेरी साँसों का नव अंकन चुन लो,
मेरे बनने-मिटने में नित अपने साधों के क्षण गिन लो!
जलते खिलते जग में घुलमिल एकाकी प्राण चला!
सपने सपने में सत्‍य ढला!
पूछता क्यों शेष कितनी रात?
पूछता क्यों शेष कितनी रात?
छू नखों की क्रांति चिर संकेत पर जिनके जला तू
स्निग्ध सुधि जिनकी लिये कज्जल-दिशा में हँस चला तू
परिधि बन घेरे तुझे
, वे उँगलियाँ अवदात!
झर गये ख्रद्योत सारे,
तिमिर-वात्याचक्र में सब पिस गये अनमोल तारे
;
बुझ गई पवि के हृदय में काँपकर विद्युत-शिखा रे!
साथ तेरा चाहती एकाकिनी बरसात!
व्यंग्यमय है क्षितिज-घेरा
प्रश्नमय हर क्षण निठुर पूछता सा परिचय बसेरा
;
आज उत्तर हो सभी का ज्वालवाही श्वास तेरा!
छीजता है इधर तू
, उस ओर बढता प्रात!
प्रणय लौ की आरती ले
धूम लेखा स्वर्ण-अक्षत नील-कुमकुम वारती ले
मूक प्राणों में व्यथा की स्नेह-उज्जवल भारती ले
मिल
, अरे बढ़ रहे यदि प्रलय झंझावात।
कौन भय की बात।
पूछता क्यों कितनी रात
?