Monday, May 07, 2012

रवीन्‍द्रनाथ टैगोर की जन्मतिथि !

रवीन्‍द्रनाथ टैगोर
आज गुरुदेव के नाम से मशहूर कवि, लेखक, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के एकमात्र नोबल पुरस्कार विजेता रवीन्‍द्रनाथ टैगोर की जन्मतिथि है। रवीन्द्रनाथ टैगोर (7 मई, 18617 अगस्त, 1941) एकमात्र ऐसे कवि हैं, जिनकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं। भारत का राष्ट्र-गान जन गण मन और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान आमार सोनार बाँग्ला गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं। उनकी जन्मतिथि के अवसर पर प्रस्तुत हैं गीतांजली से कुछ गीत, जिसका हिंदी अनुवाद देवेन्द्र कुमार देवेश ने किया है : बीइंग पोएट
जगत जुड़े उदार सुरे 
आनंद गान है गूंजित जिससे
जुड़ा जगत उदार सुर में,
वह गान उच्च स्वरों में कब
गूँजेगा अंतरतर में।
आकाश, प्रकाश, हवा और जल
होगा कब इनसे प्रेम-प्रसंग।
हृदय-सभा में जुटकर सारे
बैठेंगे कब नाना रूपों में।
ये नैन खुलेंगे कब
कि प्राणों को मिले खुशी
जिस पथ से चलते जाएँ
सबको हो संतुष्टि।
तुम्हारा साथ है, यह बात कब
जीवन में होगी सत्य सहज
ध्वनित होगा सब कर्मों में
तुम्हारा नाम सहज ही कब।
आमार माथा नत करे दाओ
नत कर दो तुम मस्तक मेरा
अपनी चरणधूलि के तल में।
सकल अहंकार तुम मेरे
डूबो दो अँसुवन के जल में।
आत्ममुग्ध मैं गर्वित होकर
करती बस निज का अपमान,
आत्मकेन्द्रित सोच में पड़कर
मरूँ हर पल अपने चक्कर में।
सकल अहंकार तुम मेरे
डूबो दो अँसुवन के जल में।
चाहे मैं जो भी काम करूँ
आत्म-प्रचार से रहूँ दूर-
जीवन मेरा अपनाकर तुम
इच्छा अपनी करो पूर्ण।
मैं चाहूँ तेरी परम शांति,
प्राणों में तेरी परम कांति,
सहारा देकर खड़े रहो तुम
हृदय-कमल के शतदल में।
सकल अहंकार तुम मेरे
डूबो दो अँसुवन के जल में।
आमि बहु वासनाय प्राणपणे चाइ
बहुत-सी वासनाएँ प्राणप्रिय थीं मुझको
बचाया तुमने उनसे मुझको कर वंचित।
निष्ठुर कृपा तुम्हारी है यह
मेरे जीवन भर का संचित।
न चाहने पर भी मुझे जो दिया दान,
आकाश प्रकाश तन मन प्राण,
अपनाकर मुझको दिन-प्रतिदिन तुम
उस महादान के योग्य बना
अति-इच्छा के संकट से
करते हो मुझको रक्षित।
कभी तो मैं भटकती, कभी राह चलती
तुम्हारी ही बस राह पकडे़-
पर तुम निष्ठुर, सम्मुख होकर भी
हो जाते हो मुझसे परे।
है तुम्हारी यह दया मैं जानती हूँ,
लौटाते हो जबकि तुम्हारी हूँ प्रतीक्षित,
मिलोगे इस जीवन की पूर्णता पर
अपने मिलन के योग्य बना
अधूरी इच्छा के संकट से
करते हो मुझको रक्षित।
तोमार सोनार थालाय साजाबो आज
तुम्हारी स्वर्ण-थाल में सजाऊँगा आज
दुःखों की अश्रुधार।
हे माते, गूँथूँगा मैं तुम्हारे
गले का मुक्ताहार।
चरणों से लिपटे हैं
चंद्र-सूर्य बनकर माला,
तुम्हारी छाती पर शोभित मेरे
दुःखों के अलंकार।
धन-धान्य तो सब तेरे ही,
क्या करना है, यह तो बोलो।
देना चाहो तो दे दो मुझको
लेना चाहो तो वापस लो।
दुःख तो मेरे घर की खेती,
असली रत्न, तुझे पहचान-
अपनी कृपा के बदले तू खरीदती
है इसका मुझको अहंकार।
आजि झड़ेर राते तोमार अभिसार
आज तूफानी रात में हो तुमसे अभिसार,
प्राणसखा, हे मेरे प्यार।
आकाश रोता हताश-सा,
नींद नहीं मेरी आँखों में,
द्वार खोलकर, हे प्रियतम,
चाहूँ बस तुमको बार-बार
प्राणसखा, हे मेरे प्यार। 
बाहर कुछ भी देख न पाऊँ,
तुम किस पथ पर मन में लाऊँ।
सुदूर किस नदी के पार,
किस गहन वन के पास,
कौन-सा घन अंधकार
कर रहे तुम पार।
प्राणसखा, हे मेरे प्यार।
एइ तो तोमार प्रेम, ओगो
यही तो तुम्हारा प्रेम, अहो
हृदय-हरण,
यह जो पत्तों पर थिरके प्रकाश
स्वर्ण-वरण।
यह जो मधुर आलस भरे
आकाश में मेघ तिरे,
यह जो हवा देह में करे
अमृत-क्षरण
यही तो तुम्हारा प्रेम, अहो
हृदय-हरण।
प्रभात-प्रकाश धारा में मेरे
नयन डूबे हैं।
अभी सुनकर तुम्हारी प्रेम-वाणी
प्राण जगे हैं।
यही तुम्हारा आनत मुख है,
जिसने चूमे मेरे नयन,
परस किए हैं हृदय ने मेरे
आज तुम्हारे चरण।