Thursday, August 16, 2012

नेमिचन्द्र जैन की जन्मतिथि !

नेमिचन्द्र जैन
आज हिंदी के प्रसिद्ध कवि और आलोचक नेमिचन्द्र जैन (16 अगस्त 1919 – 24 मार्च 2005) की जन्मतिथि है। इस अवसर पर प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कविताएँ : बीइंग पोएट
जन्मदिन
परसों फिर
हमेशा की तरह
पत्नी बच्चे और शायद
कुछ मित्र
कहेंगे
मुबारक हो।
बार-बार आए यह दिन।
मुबारक।
कब तक मुबारक?
बार-बार
और कितनी बार चौहत्तर के बाद?
मेरे मन में उठते हैं सवाल
उठते रहते हैं
कोई ठीक उत्तर नहीं मिलता
लालसा हो चाहे जितनी अदम्य
भले हो अनन्त
क्षीण होती शक्ति
और ऊर्जा
लगातार जर्जर होते अंग
कर ही देंगे उजागर
कि अब इस दिन का और आना
ख़ुशी से भी अधिक
यातना की नई शुरूआत है।
जो हम नहीं हैं
जो हम नहीं हैं
हम वही हैं जो हम नहीं हैं
भाव जो कभी मूर्त न हुए
शब्द जो कभी कहे नहीं गए
जीने की व्यथा में डूबे हुए स्वर
जो ध्वनित नहीं हो पाए
राग नहीं बने
जीवन के अचीन्हे सीमान्त के
चरम क्षण
होने न होने के
अपनी अनन्तता में ठहरे रहे
निरन्तर अपनी अतीन्द्रिय सम्पूर्णता में
जीते रहे
पर बीते नहीं भोगे नहीं गए...
आकार-रूप-हीन आघात
जो बस सहे ही गए
अनजाने-अनचाहे
आँखों की कोरों में
उमड़े हुए आँसू-से अनदीखे
अटके ही रहे झरे नहीं
वही हैं हम
जो नहीं हैं।
हैसियत
दरज़े दो ही हैं
दूसरा पहला
खचाखच भरा है दूसरा
पहले में नहीं है भीड़
मारामारी
कहाँ है तुम्हारी जगह
कोशिश कर सकते हो तुम
चढ़ने की
पहले दरज़े में भी
यदि हो वहाँ आरक्षण
तुम्हारे लिए
भागकर जबरन चढ़ोगे
तो उतारे जाओगे
अपमान, लांछन
मुमकिन है सज़ा भी
घूस देकर टिके रहो शायद
अगर यह कर सको
मुमकिन पर यह भी तो है
जिसे तुम समझे थे पहला
वह दूसरा ही निकले
धक्कम-धक्के / शोर-शराबे से भरा
वहाँ भी / क्या भरोसा
जगह तुम्हें मिले ही
कोई और बैठा हो तुम्हारी जगह
बेधड़क, रौब के साथ
ताकत से
या किसी हिकमत
चतुराई से
सूझबूझ के बल
बहरहाल
तुम्हारे लिए
शायद नहीं है
कोई जगह कहीं भी
कुछ भी तुम करो
हैसियत तुम्हारी
है
रहेगी
बेटिकट यात्री की।
कहाँ गये सारे लोग
कहाँ गये सारे लोग
कहाँ गये सारे लोग जो यहाँ थे,
या कहा गया था कि यहाँ होंगे
लग रहा था बहुत शोर है,
एक साथ कई तरह की आवाजें
उभरती थीं बार-बार
बन्द बड़े कमरे में
पुराने एयर-कण्डीशनर की सीलन-भरी खड़खड़ाहट
सामने छोटे-मंच पर
आत्मविश्वास से अपनी-अपनी बातें सुनाते हुए
बड़े जिम्मेदार लोग
या उनसे भी ज्यादा जिम्मेदार
सुनने की कोशिश में एक साथ बोलते हुए
सवाल पूछते हुए
सामनेवालों से
आपस में
नारियल की शक्ल का जूड़ा बनाये
और मोटा-मोटा काजल आँजे
एक महिला का
रह-रह कर
किसी अपरिचित राग का आलाप-
लग रहा था बहुत शोर है,बहुत आवाजें हैं-
पर फिर क्या हुआ
कहाँ सब गायब हो गया
क्या कोई तार प्लग से निकल गया है
बेमालूम
कि कोई आवाज नहीं आती
कहीं कोई हिलता-डोलता नही
कुछ दिखाई भी नहीं पड़ता
कहीं ऐसा तो नहीं कि
बड़ा कमरा खाली है
हर चीज दूसरी से अलग हुई
थमी, बेजान है
या कि इतनी सारी आवाजों के
लोगों के बीच
मैं ही कहीं खो गया
अकेला हो गया।
चांदनी रात
चांदनी रात है--
किसी अबोध कुमारी के सरल नैनों-सी
अथाह भेद भरी गीली...
अलस वसन्त की अनुराग भरी गोद
खुली फैली है
मौन सुधियों के राजहंस दूर-दूर उड़े जाते हैं...
चांदनी रात का सुनसान
है फीका-फीका
गन्ध के भार से सन्त्रस्त-सी वातास
है उन्मत्त काटती चक्कर
रुद्ध पथभ्रष्ट और विक्षिप्त
वासना-सी अतृप्त...
कहीं पे दूर कभी रुक-रुक कर
किसी के प्यार भरे गीत के टूटे-से स्वर
भूल से जाग कर
मानो तभी सो जाते हैं।
चांदनी रात है चुपचाप समर्पित
मोहित
अचल दिगन्त के आश्लेष में
सोई
खोई अबूझ स्वप्न में,
जैसे तुम ही कभी
चुपचाप अनायास
मेरी गोद में सो जाती हो...
चांदनी रात ओ!
चट्टानें
मैं जूझ रहा चट्टानों से अपने मन की
पड़ रहीं अनवरत चॊटें जीवन के घन की
हो उठे प्राण उद्दीप्त एक अभिलाषा से
है चाह न मुझको आज किसी आश्वासन की
परिभाषा
निस्तब्ध समर्पित मन की अभिलाषा क्या है?
बन्दी के अन्तर में रीती आशा क्या है?
अनगिनती तागे उलझे हैं जाने कब से
इस उलझन की क्या जाने परिभाषा क्या है?
जाने क्यों
जाने क्यों, प्रिय,
जी भर कर बातें हो न सकीं
बढ़ गया दर्द इतना ये आँखें रो न सकीं
बहुतेरा ही दुलराया-बहलाया मन को
पर जगी हुई काली छायाएँ सो न सकीं।
सुनसान
भारी सुनसान को लाचार लपेटे कस के
आज बाँहें किसी सपने में मौन डूबी हैं
होंठ रह जाते हैं बेचैन तड़प के यों ही
उन पे गाने को कोई गीत भी बाकी न रहा
अधखुले रूप की जलती हुई दो नोकें-सी
जी में रह-रह के लगातार चुभी जाती हैं
दिल के राही को आज राह का कुछ होश नहीं
एक निर्जन में बियाबान में खोया-सा है
सुधियाँ उड़ते हुए पतझर के विवश पत्तों-सी
मन के आकाश में झरती ही चली जाती हैं...।
रूप की इस अजब रात में अब चाँद निकल आया है
आज मन को किसी आश्वास भरी गोद में सो जाने दो।