Friday, August 17, 2012

अनामिका की जन्मतिथि !

अनामिका
आज हिंदी की मशहूर कवियित्री अनामिका (17 अगस्त 1961) की जन्मतिथि है। इस अवसर पर प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कविताएँ : बीइंग पोएट 
दरवाज़ा

मैं एक दरवाज़ा थी 
मुझे जितना पीटा गया 
मैं उतना ही खुलती गई। 

अंदर आए आने वाले तो देखा– 
चल रहा है एक वृहत्चक्र– 
चक्की रुकती है तो चरखा चलता है 
चरखा रुकता है तो चलती है कैंची-सुई 
गरज यह कि चलता ही रहता है 
अनवरत कुछ-कुछ ! 

और अन्त में सब पर चल जाती है झाड़ू 
तारे बुहारती हुई 
बुहारती हुई पहाड़, वृक्ष, पत्थर– 
सृष्टि के सब टूटे-बिखरे कतरे जो 
एक टोकरी में जमा करती जाती है 
मन की दुछत्ती पर।

रिश्ता
वह बिलकुल अनजान थी! 
मेरा उससे रिश्ता बस इतना था 
कि हम एक पंसारी के ग्राहक थे 
नए मुहल्ले में। 
वह मेरे पहले से बैठी थी 
टॉफ़ी के मर्तबान से टिककर 
स्टूल के राजसिंहासन पर। 
मुझसे भी ज्यादा थकी दीखती थी वह 
फिर भी वह हँसी! 
उस हँसी का न तर्क था 
न व्याकरण 
न सूत्र 
न अभिप्राय! 
वह ब्रह्म की हँसी थी। 
उसने फिर हाथ भी बढ़ाया 
और मेरी शाल का सिरा उठाकर 
उसके सूत किए सीधे 
जो बस की किसी कील से लगकर 
भृकुटि की तरह सिकुड़ गए थे। 
पल भर को लगा, उसके उन झुके कंधों से 
मेरे भन्नाए हुए सिर का 
बेहद पुराना है बहनापा।
मरने की फुर्सत
(एक रेड इण्डियन लोकगीत के आधार पर पल्लवित)
ईसा मसीह
औरत नहीं थे
वरना मासिक धर्म
ग्यारह बरस की उमर से
उनको ठिठकाए ही रखता
देवालय के बाहर!
वेथलेहम और यरूजलम के बीच
कठिन सफर में उनके
हो जाते कई तो बलात्कार
और उनके दुधमुँहे बच्चे
चालीस दिन और चालीस रातें
जब काटते सडक पर,
भूख से बिलबिलाकर मरते
एक-एक कर
ईसा को फुर्सत नहीं मिलती
सूली पर चढ जाने की भी।
मरने की फुर्सत भी
कहाँ मिली सीता को
लव-कुश के
तीरों के
लक्ष्य भेद तक?
ओढ़नी
मैट्रिक के इम्तिहान के बाद 
सीखी थी दुल्हन ने फुलकारी! 
दहेज की चादरों पर 
माँ ने कढ़वाये थे 
तरह-तरह के बेल-बूटे,
तकिए के खोलों पर 'गुडलक' कढ़वाया था! 
कौन माँ नहीं जानती, जी, ज़रूरत 
दुनिया में 'गुडलक' की! 
और उसके बाद? 
एक था राजा, एक थी रानी 
और एक थी ओढ़नी-
लाल ओढ़नी फूलदार! 
और उसके बाद?
एक था राजा, एक थी रानी 
और एक ख़तम कहानी! 
दुल्हन की कटी-फटी पेशानी 
और ओढ़नी ख़ूनम-ख़ून!
अपने वजूद की माटी से 
धोती थी रोज इसे दुल्हन 
और गोदी में बिछा कर सुखाती थी
सोचती सी यह चुपचाप-
तार-तार इस ओढ़नी से 
क्या वह कभी पोंछ पाएगी
खूंखार चेहरों की खूंखारिता 
और मैल दिलों का?
घर का न घाट का-
उसका दुपट्टा 
लहराता था आसमानों पर- 
'गगन में गैब निसान उडै़' की धुन पर-
आहिस्ता-आहिस्ता!
मौसियाँ
वे बारिश में धूप की तरह आती हैं 
थोड़े समय के लिए और अचानक 
हाथ के बुने स्वेटर, इंद्रधनुष, तिल के लड्डू 
और सधोर की साड़ी लेकर 
वे आती हैं झूला झुलाने 
पहली मितली की ख़बर पाकर 
और गर्भ सहलाकर 
लेती हैं अन्तरिम रपट 
गृहचक्र, बिस्तर और खुदरा उदासियों की। 
झाड़ती हैं जाले, संभालती हैं बक्से 
मेहनत से सुलझाती हैं भीतर तक उलझे बाल 
कर देती हैं चोटी-पाटी 
और डाँटती भी जाती हैं कि री पगली तू 
किस धुन में रहती है 
कि बालों की गाँठें भी तुझसे 
ठीक से निकलती नहीं। 
बालों के बहाने 
वे गाँठें सुलझाती हैं जीवन की 
करती हैं परिहास, सुनाती हैं किस्से 
और फिर हँसती-हँसाती 
दबी-सधी आवाज़ में बताती जाती हैं 
चटनी-अचार-मूंगबड़ियाँ और बेस्वाद संबंध 
चटपटा बनाने के गुप्त मसाले और नुस्खे 
सारी उन तकलीफ़ों के जिन पर 
ध्यान भी नहीं जाता औरों का। 
आँखों के नीचे धीरे-धीरे 
जिसके पसर जाते हैं साये 
और गर्भ से रिसते हैं महीनों चुपचाप 
ख़ून के आँसू-से 
चालीस के आसपास के अकेलेपन के उन 
काले-कत्थई चकत्तों का 
मौसियों के वैद्यक में 
एक ही इलाज है 
हँसी और कालीपूजा 
और पूरे मोहल्ले की अम्मागिरी। 
बीसवीं शती की कूड़ागाड़ी 
लेती गई खेत से कोड़कर अपने 
जीवन की कुछ ज़रूरी चीजें 
जैसे मौसीपन, बुआपन, चाचीपंथी, 
अम्मागिरी मग्न सारे भुवन की।
बेजगह
अपनी जगह से गिर कर
कहीं के नहीं रहते
केश
, औरतें और नाख़ून” -
अन्वय करते थे किसी श्लोक को ऐसे
हमारे संस्कृत टीचर।
और मारे डर के जम जाती थीं
हम लड़कियाँ अपनी जगह पर।
जगह? जगह क्या होती है?
यह वैसे जान लिया था हमने
अपनी पहली कक्षा में ही।
याद था हमें एक-एक क्षण
आरंभिक पाठों का

राम
, पाठशाला जा !
राधा
, खाना पका !
राम
, आ बताशा खा !
राधा
, झाड़ू लगा !
भैया अब सोएगा
जाकर बिस्तर बिछा !
अहा
, नया घर है !
राम
, देख यह तेरा कमरा है !
और मेरा ?’
ओ पगली,
लड़कियाँ हवा
, धूप, मिट्टी होती हैं
उनका कोई घर नहीं होता।"
जिनका कोई घर नहीं होता
उनकी होती है भला कौन-सी जगह
?
कौन-सी जगह होती है ऐसी
जो छूट जाने पर औरत हो जाती है।
कटे हुए नाख़ूनों,
कंघी में फँस कर बाहर आए केशों-सी
एकदम से बुहार दी जाने वाली
?
घर छूटे, दर छूटे, छूट गए लोग-बाग
कुछ प्रश्न पीछे पड़े थे
, वे भी छूटे!
छूटती गई जगहें
लेकिन
, कभी भी तो नेलकटर या कंघियों में
फँसे पड़े होने का एहसास नहीं हुआ!
परंपरा से छूट कर बस यह लगता है
किसी बड़े क्लासिक से
पासकोर्स बी.ए. के प्रश्नपत्र पर छिटकी
छोटी-सी पंक्ति हूँ

चाहती नहीं लेकिन
कोई करने बैठे
मेरी व्याख्या सप्रसंग।
सारे संदर्भों के पार
मुश्किल से उड़ कर पहुँची हूँ
ऐसी ही समझी-पढ़ी जाऊँ
जैसे तुकाराम का कोई
अधूरा अंभग!