Monday, October 01, 2012

मजरूह सुल्तानपुरी की जन्मतिथि !

मजरूह सुल्तानपुरी
आज हिंदी सिनेमा के मशहूर गीतकार और शायर मजरूह सुल्तानपुरी (01 अक्तूबर 1919 - 24 मई 2000) की जन्मतिथि है। मजरूह ने चार दशक से भी ज्यादा लंबे सिने करियर में करीब 300 फ़िल्मों के लिए लगभग 4000 गीतों की रचना की। ख़ासकर फिर तीसरी मंजिल’, ‘बहारों के सपने’, ‘प्यार का मौसम’, ‘कारवां’, ‘यादों की बारात’, ‘हम किसी से कम नहींऔर जमाने को दिखाना हैफ़िल्मों के गीत ज़्यादा लोकप्रिय हैं। 1964 मे प्रदर्शित फ़िल्म दोस्तीका गीत चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे’, के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार के लिए फ़िल्मफेयर मिला। इसके अलावा, मजरूह सुल्तानपुरी को 1993 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से भी नवाजा गया। इस मौक़े पर पेश हैं कुछ ग़ज़लें : बीइंग पोएट
1.
हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह
उठती है हर निगाह ख़रीदार की तरह
इस कू-ए-तिश्नगी में बहुत है कि एक जाम
हाथ आ गया है दौलत-ए-बेदार की तरह
वो तो हैं कहीं और मगर दिल के आस पास
फिरती है कोई शय निगाह-ए-यार की तरह
सीधी है राह-ए-शौक़ प यूँ ही कभी कभी
ख़म हो गई है गेसू-ए-दिलदार की तरह
अब जा के कुछ खुला हुनर-ए-नाखून-ए-जुनून
ज़ख़्म-ए-जिगर हुए लब-ओ-रुख़्सार की तरह
'मजरूह' लिख रहे हैं वो अहल-ए-वफ़ा का नाम
हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह
2.
हम को जुनूँ क्या सिखलाते हो हम थे परेशाँ तुमसे ज़ियादा
चाक किए हैं हमने अज़ीज़ों चार गरेबाँ तुमसे ज़ियादा
चाक-ए-जिगर मुहताज-ए-रफ़ू है आज तो दामन सिर्फ़ लहू है
एक मौसम था हमको रहा है शौक़-ए-बहाराँ तुमसे ज़ियादा
जाओ तुम अपनी बाम की ख़ातिर सारी लवें शमों की कतर लो
ज़ख़्मों के महर-ओ-माह सलामत जश्न-ए-चिराग़ाँ तुमसे ज़ियादा
हम भी हमेशा क़त्ल हुए और तुमने भी देखा दूर से लेकिन
ये न समझे हमको हुआ है जान का नुकसाँ तुमसे ज़ियादा
ज़ंजीर-ओ-दीवार ही देखी तुमने तो 'मजरूह' मगर हम
कूचा-कूचा देख रहे हैं आलम-ए-ज़िंदाँ तुमसे ज़ियादा
3.
मुझे सहल हो गईं मंजिलें वो हवा के रुख भी बदल गए
तेरा हाथ हाथ में आ गया कि चिराग राह में जल गए
वो लजाए मेरे सवाल पर कि उठा सके न झुका के सर
उड़ी जुल्फ़ चेहरे पे इस तरह कि शबों के राज़ मचल गए
वही बात जो न वो कह सके मिरे शेर-ओ-नज़्मे आ गई
वही लब न मैं जिन्हें छू सका क़दहे-शराब में ढ़ल गए
तुझे चश्मे-मस्त पता भी है कि शबाब गर्मी-ए-बज्म है
तुझे तश्मे-मस्त ख़बर भी है कि सब आबगीने पिघल गए
उन्हें कब के रास भी आ चुके तिरी बज़्मे-नाज़े के हादिसे
अब उठे कि तेरी नज़र फिरे जो गिरे थे गर के संभल गए
मिरे काम आ गई आख़िरश यही काविशें यही गर्दिशें
बढी इस क़दर मिरी मंजिलें कि क़दम के खार निकल गए
4.
मसर्रतों को ये अहले-हवस न खो देते
जो हर ख़ुशी में तेरे ग़म को भी समो देते
कहां वो शब कि तेरे गेसुओं के साए में
ख़याले-सुबह से आस्ती भिगो देते
बहाने और भी होते जो ज़िन्दगी के लिए
हम एक बार तेरी आरज़ू भी खो देते
बचा लिया मुझे तूफां की मौज नें वर्ना
किनारे वाले सफ़ीना मेरा डुबो देते
जो देखते मेरी नज़रो पे बंदिशों के सितम
तो ये नज़ारे मेरी बेबसी पे रो देते
कभी तो यूं भी उमड़ते सरश्के-ग़म 'मजरूह'
कि मेरे ज़ख़्मे-तमन्ना के दाग़ धो देते
5.
निगाह-ए-साक़ी-ए-नामहरबाँ ये क्या जाने
कि टूट जाते हैं ख़ुद दिल के साथ पैमाने
मिली जब उनसे नज़र बस रहा था एक जहाँ
हटी निगाह तो चारों तरफ़ थे वीराने
हयात लग़्ज़िशे-पैहम का नाम है साक़ी
लबों से जाम लगा भी सकूँ ख़ुदा जाने
वो तक रहे थे हमीं हँस के पी गए आँसू
वो सुन रहे थे हमीं कह सके न अफ़साने
ये आग और नहीं दिल की आग है नादाँ
चिराग़ हो के न हो जल बुझेंगे परवाने
फ़रेब-ए-साक़ी-ए-महफ़िल न पूछिये मजरूह
शराब एक है बदले हुए हैं पैमाने
6.
दुश्मनों की दोस्ती है अब अहले वतन के साथ
है अब खिजाँ चमन मे नए पैराहन के साथ
सर पर हवाए जुल्म चले सौ जतन के साथ
अपनी कुलाह कज है उसी बांकपन के साथ
किसने कहा कि टूट गया खंज़रे-फिरंग
सीने पे ज़ख़्मे-नौ भी है दाग़-ए-कुहन के साथ
झोंके जो लग रहे हैं नसीम-ए-बहार के
जुम्बिश में है क़फ़स भी असीर-ए-चमन के साथ
मजरूह क़ाफ़िले कि मेरे दास्ताँ ये है
रहबर ने मिल के लूट लिया राहजन के साथ
7.
जला के मशाल-ए-जान हम जुनूं सिफ़ात चले
जो घर को आग लगाए हमारे साथ चले
दयार-ए-शाम नहीं, मंजिल-ए-सहर भी नहीं
अजब नगर है यहाँ दिन चले न रात चले
हुआ असीर कोई हम-नवा तो दूर तलक
ब-पास-ए-तर्ज़-ए-नवा हम भी साथ साथ चले
सुतून-ए-दार पे रखते चलो सरों के चिराग
जहाँ तलक ये सितम की सियाह रात चले
बचा के लाए हम ऐ यार फिर भी नकद-ए-वफ़ा
अगरचे लुटते हुए रहज़नों के हाथ चले
फिर आई फसल की मानिंद बर्ग-ऐ-आवारा
हमारे नाम गुलों के मुरासिलात चले
बुला ही बैठे जब अहल-ए-हरम तो ऐ मजरूह
बगल में हम भी लिए एक सनम का हाथ चले
8.
ख़त्म-ए-शोर-ए-तूफ़ाँ था दूर थी सियाही भी
दम के दम में अफ़साना थी मेरी तबाही भी
इल्तफ़ात समझूँ या बेरुख़ी कहूँ इस को
रह गई ख़लिश बन कर उसकी कमनिगाही भी
याद कर वो दिन जिस दिन तेरी सख़्तगीरी पर
अश्क भर के उठी थी मेरी बेगुनाही भी
शमा भी उजाला भी मैं ही अपनी महफ़िल का
मैं ही अपनी मंज़िल का राहबर भी राही भी
गुम्बदों से पलटी है अपनी ही सदा मजरूह
मस्जिदों में की जाके मैं ने दादख़्वाही भी