Thursday, October 04, 2012

कवि प्रभात रंजन की जन्मतिथि !

आज कवि प्रभात रंजन (04 अक्तूबर 19421990) की जन्मतिथि है। इलाहाबाद में पैदा हुए प्रभात के बारे में कहा जाता है कि वे 1975 के आसपास विक्षिप्त हो गए थे। उनकी 54 कविताओं का एकमात्र संकलन है सूनी घाटी के गीत। इस अवसर पर प्रस्तुत हैं कुछ कविताएँ : बीइंग पोएट
आग
क्षितिज में आग लग गई है
आकाश का कोना लाल हो गया है
धुएँ के मारे दिशाएँ काली पड़ने लग गई हैं
वह देखो आसमानी फ़रिश्तों ने धुएँ के मारे
लालटेनें जला ली हैं
जाड़े से बचने के लिए पुआल सुलगा लिया है
(
जिसकी रोशनी दूर से सीमित और पीली दिख रही है)
पुआल की आग धीमे-धीमे मद्धिम हो रही है
कुछ बुझे कोयले उनके बीच दिखाई दे रहे हैं।
आज शाम
आस्माँ पर
आज शाम
,
गुलाबों की पंखुरियाँ कौन बिछा गया है
?
पंखुरियों की पंक्तियों पर पंक्तियाँ
लाल
, पीले, श्वेत, नीले
गुलाब की पंखुरियों के
झिलमिलाते साये
कौन डाल गया है
?
चिकनी पंखुरियाँ
एक पर एक
, एक पर एक...
अनगिनत फूलों की...
गुलमुहर
, चम्पा, बेले के रेशे-
कौन बिछा गया है
?
शायद,
वे अभी
दफ़न करके लौटे हैं
सूरज को।
कुछ काले हाथ
मज़ार पर
फूल डाल आए हैं।
जीवन जीने की प्यास
हत आस्था
लहू में लथपथ
पराजित सैनिक की
कुहनियों के बल, श्लथ
मृतवत साँप-सी रेंगन
दो बूंदों की हँपहँपाती प्यास-
जीवन की,
जिजीविषु की
,
ऎसी जिजीविषा
एक शाम दो दोस्तों की बातचीत
"दोस्त! क्यों ये आँखें नम?
अच्छा
कैसी है
, कहाँ है, बताओ जरा
भई
, हमसे नहीं देखा जाता
तुम्हारा यह गम"
"नहीं, दोस्त! घर में आटा ख़तम
कहाँ आँखें नम
?
यूँ ही कुछ कोयला-वोयला पड़ गया होगा-
"अच्छा यार, मिलेंगे फिर
इस वक़्त फ़ुरसत है कम"
(वाह रे वाह आदम!)
कैसे देखूँ
डूबती साँझ की व्यथा
कैसे देखूँ-
इन सहमे उदास पेडों को
कैसे देखूँ-
इस स्तब्ध अंधियारी को
कैसे देखूँ-
यह भयावना एकाकीपन
और सूनी बोझिल शामें
यह घुट-घुट
, डूबती स्याह शामें-
पूजा घंटियों को शून्य कर देने वाली प्रतिध्वनियाँ
झाड़ियों में झींगुरों का अनवरत गुंजन
,
नयन-तट से अवश्य होते पाल
झिलमिलाते द्वीप-
कैसे
? कैसे? कैसे?... मैं
कैसे देखूँ !
एक सुबह
रात की बारिश :
सुबह की धूप।
प्राची सीमान्त पर
रंगीन बादलों के
अनगिनत शिखर उगे दीखे
रथ को राह दी-
फिर चौंधियाने वाले
प्रकाश के पीछे
छुप रहे।
हरे-हरे पत्तों पर
किरणों की पाँखें
,
तैर गईं।
झिलमिलाता गया
,
सुनहरा रूप।
रात की बारिश के बाद की धूप।
गुनगुने कपूरी रंग के
उमड़ते फव्वारे में
नन्हीं चिड़ियाएँ देर तक नहाती रहीं।
नयन खुले,
सपने अनगिनत झूठे
टूट गए।
ज्यों बूंदों झूलते
,
अनगिनत इन्द्रधनुष
,
टूट गए।
द्विधा विवशता और प्रेम
आज मैं
श्वेत कमल की
एक कली तोड़कर लाया था
सोचा
तुम्हारी राह में रख दूँ
,
तुम स्नेह से उठा लोगी।
फिर सोचा
अगर कुचल दो तो-
फिर मैंने तुम्हारी राह में कमल नहीं रखा।
मेरा
हृदय ही जानता है
,
मैं तुम्हें कितना चाहता हूँ
;
पर मैं
इस पवित्र कमल को
कुचला हुआ नहीं देख सकता।
मेरी
इस विवशता को
क्षमा करना।
शाम का अंधियारा
किसी ऊँची पहाड़ी से-
झलमल बादलों की स्वप्न-पुरी के
परकोटों को छल
,
बाँह फैला
उस ओर-
तैर जाऊँ-
जहाँ रंगों के बादलों पर
रोशनी के सोते फूट रहे होंगे।
जहाँ बादलों की मुलायम परतें
मुझे लपेट लेंगी।
जहाँ सीपियों के
महल होंगे।
जहाँ केसर की झील में
सफ़ेद हंस तैर रहे होंगे।
पर अभी
जब एक भारी सन्नाटे के साथ
अंधियारा फैल जाएगा
और चील-कौओं का रव
डूबता रह जाएगा
तब शायद
वे ही परतें
मेरे शव पर कफ़न-सी
कसी होंगी।
सेतु
सेतु रौंदा गया है हर बार
दोनों ओर से वह
ठोकरें ही आज तक खाता रहा है
और फिर भी
यात्रियों को पार पहुँचाता रहा है-
...और अबकी बार भी ओ सेतु मेरे
तुम सहो-
दाँत भींचे रहो-
पेट के बल लेट
यूँ ही पीठ पर से पैर रखकर गुज़र जाने दो इन्हें-
इस अनवरत रौंदे जाने में
चाहे तुम एक दिन जर्जर हो
ढह जाओ
यदि आज ये नहीं...
तो कभी ज़रूर
तुम्हारी ढही काया के स्थान पर
स्मारक बनाएंगे।
प्यार : बीसवीं सदी-1
एक प्यार यह कि जो
उमगता
,
पढ़-पढ़
उपन्यास
, कहानी, कविता।
सजे हुए ड्राइंग रूम,
नए माडल की कार
होटल और बार
'ओह कपूर,
व्हाट ए वन्डरफ़ुल शाट
शानदार।
'मास्टर जी
कैसे लिख लेते हैं
कविता इतनी सुन्दर
?
(मास्टर जी-
ग़रीब विद्यार्थी
,
भावुक आदर्शों में पले।)
मगर स्वप्न नहीं पूरे हुए
बहक चले
,
मास्टर जी
चलें वहाँ
मिलते हों अलग रहकर जहाँ
ज़मीं और आस्माँ...
'
'भाग गई बेटी'
है अख़बारों की सुर्ख़ी
लेकर गहने-कपड़े
नगदी
कई हज़ार !
कहते हैं लोग-बाग
कारण था महज प्यार।
(पर...
बेटी फिर वापस
मास्टर जी गिरफ़्तार
'बहकाता है
शरीफ़ों की बहू-बेटियों को
सूअर
, नालायक, मक्कार'...)
प्यार : बीसवीं सदी-2
पाए हैं आज़ाद विचार
माँ-बाप ढूंढ़ते हैं किसी रियासत का राजकुमार
,
या आई०ए०एस०
बेटी करती है शापिंग
, बोटिंग
देखती है सैकिन्ड शो
'ओह डैडी तुम कितने अच्छे हो'
(डैडी हैं कर्ज़दार
कोठी
, बावर्ची, माली, सोफ़ा, कार)
घूमती है बेबी (
?)
बिगड़े रईसों के संग
मसलन-
(भूतपूर्व)'राजा सूर्य प्रताप परमार'
(कुछ दिन चला यूँ ही
कुछ-कुछ मीठा
,
तीखा
, कुछ तीता
मज़ा
, लज्जत...)
फिर
,
आशंका
, भय...
(...एबार्शन या आत्मघात)
...प्यार-
प्यार : बीसवीं सदी-3
मुंशी रामाधार
काम क्लर्की
तनख़्वाह दस-दस
, दस बार
बच्चों की संख्या छह-सात
पत्नी कृष
, जर्जर, चिड़चिड़ाती,
घर ज्यों नरक का द्वार
,
बच्चे बीमार
,
दिन-भर चीख़ोपुकार
,
'माँ, लगी है भूख'
'आ खा ले मुझे
कट जाए
भवधार
'
मुंशी रामाधार-
तीन बेटियाँ
यौवनवती
, सुन्दरी
हीरे की ज्यों मुंदरी
ज्यों घूरे पर पन्नियाँ...
विवाह के लिए तैयार
दहेज़ पन्द्रह-बीस हज़ार
(इन्तज़ार, इन्तज़ार, इन्तज़ार।)
बगल के रईसजादे-
(शानदार)
सिनेमा के गाने
फिर ताँक-झाँक-
बिटिया
'रमो'
उम्र अट्ठाइस साल-
(तिल-तिल जला हुआ, झँवराया चेहरा}
पहले तो चन्द दिन
माता जी से
हुआ परिचय
फिर बहिन जी से बातचीत
किस्से-कहानी की क़िताबों का आदान-प्रदान
,
ख़तोक़िताबत।
फिर...फिर...फिर...-
रमा बाई-
कोठरी नम्बर अट्ठाइस
खाँसी...
घुटती धुएँ की दीवार।-
यह नहीं कि प्यार मर गया है
या सब-कुछ बदल गया है।
प्यार ज़िन्दा है।
बहुत-कुछ वह
,
जो कहा नहीं जाता।
घुटता है आदमी इतना
कि
सहा नहीं जाता
पर तब भी प्यार कहा नहीं जाता...
ये आधी गिरती
,
आधी सम्भली दीवारें
यह समाज-
इसके मूल्य
,
इसकी व्यवस्थाएँ
,
आस्थाएँ...
अर्द्ध-सत्य के धुएँ-भरे कुएँ से
घुटता
, चीख़ता, कराहता समाज।
हमसे, तुमसे, सबसे
बना हुआ समाज
यहाँ प्यार नहीं-
केवल व्यभिचार।