Sunday, November 18, 2012

फिलिपिनो कवि संतिअगो विल्लाफनिया की कविताएँ


हाल में बोधि प्रकाशन से फिलिपिनो कवि संतिअगो विल्लाफनिया का एक कविता-संग्रह आया है प्रेमांजलि। कविताओं का हिंदी अनुवाद किया है विजया कांडपाल ने। उसी पुस्तक से प्रस्तुत हैं कुछ कविताएँ : बीइंग पोएट
एक विद्रोही कवि के लिए
तुमने स्याही से लिखा एक कटु जीवन
कागज़ लहूलुहान हुआ, जला तुम्हारे रक्त से
और समस्त आँसू बह गए।
अपनी रिक्त आँखों से तुमने अच्छे दिनों की कामना की होगी
लड़ते हुए अदृश्य हो।
सुना मैंने प्रेरक देवियों का रुदन
जब मृत्यु तुम्हें ले गई सौ-सौ बार
गोलियों ने भेदा तुम्हारा मुँह
और रक्त की अंतिम बूँद रंग गई ज़मीन
तुम्हारी आखरी कविता के साथ।
नदी का अंतिम गीत
सुना उस रात मैंने
नदी का अंतिम गीत
नाम रहित प्रेमियों की आहें
चुराती एक क्षण
जैसे अनंत काल तक।
एक मुसाफिर पक्षी का
शोक-नाद
विराम चिन्ह लगाता
रात की शांति में।
प्रतीक्षित था मैं
दिन के उठने के लिए
महसूस करता धरा की
धडकनें
और आकाश गंगा का स्पंदन।
एटलस की एक ऊँगली ने
शुरू किए कम्पन
और नदी में सुनामी के
पंख फड़फड़ाने लगे।
मृत्यु आई निरर्थक
बिना चेतावनी के
उनकी ओर, जिन्होंने सुने
स्तोत्र 
अचेतन में।
उस रात
मैंने सुना नदी का अंतिम गीत
जाने वालो का शोकनाद।
सिसीफस के पुत्र
हम पीड़ित हैं
नैसर्गिक प्रेम के लिए,
प्रेम, मनुष्य का मनुष्य के लिए
जो जोड़ता है मानवताओं को।
हम वो श्रमिक हैं, जो
श्रम करते हैं, इस कुपोषित धरती को
प्रचुर बनाने के लिए,
परिवर्तित करते हैं इस प्रचुरता को मृत्युहीन सुगंध में
खेतों में आवाजें हैं और भूतहा पैर किसानों के
गिरे हुए पीली घास की तरह भूमि के वक्ष पर।
वो आये और बहाया पसीना
खौलते सूर्य के तले
जीवन जिए अपने, उन्होंने
और खोजा जो खोजा जाना था।
वे सब अब मात्र आवाजें हैं
हवाओं से मेल-जोल बढ़ाती
उनके अपने जो पीछे आते हैं
ठोस हृदयों को नर्म करते
उनका जो अपना पौरुष करते हैं, बर्बाद
बंजर धरती पर।
वो अनजान हैं, कवि नहीं,
वे कविता नहीं करते
बस रोज़मर्रा का परिश्रम
वे अचिंतित, जीते हैं बस एक क्षण के लिए।
बस रात को रुकते हैं, सुबह फिर
धकेलते पत्थर
जैसे ही सूर्य चढ़ता है अपनी प्राचीन चट्टानों पर।
रजनीगंधा
तुम्हारी आँखें
निम्न बनातीं सुबह के सूर्य को
प्रज्वल्लित है तुम्हारी मुस्कान अब तक मेरे हृदय में,
तुम्हारा सौंदर्य, हक़दार एक नाम का,
पर मैं तुम्हें क्या दूं?
सिवाय एक गीत के
गीत, जो गा सके मेरे प्रेम को
विश्व के पुनर्निर्मित होने तक
ये रात शांत है, प्रेयसी
और समय जा रहा है धीरे-धीरे
ओस से चुम्बित शाम की हवा की साँसे हल्की हो रही हैं
बेहद मीठा है यह सपना
के जागना है मुझे तुम्हारे लिए
तुम्हारा कोमल, सजीला चेहरा
हमेशा स्पर्शित मेरे प्रेम से
देखकर इसी चेहरे को
दफ़न ग़म विदा लेता है
रात की ख़ामोशी में
हमेशा याद आते हैं मुझे, तुम्हें भाने वाले
मेरे प्रेम-स्पर्श
तुम्हारी याद है मेरे साथ
मेरे कफ़न तक, प्रेयसी
बेपरवाह
मैं बदमाश हूँ
ढूंढो मुझे झुग्गियों में पयाटास की
या फिर लोकल ट्रेन के भीतर
दफना दो मुझे चीथड़ों में
या फिर कागज के कम्बलों में रात को
जब में स्वप्न देखता हूँ एक घर का
अपना कहने के लिए
तैरता हूँ मैं दूषित नदियों में
मनुष्यों के द्वारा गन्दी की गयी
जिनकी आत्माएं पासिंग नदी से भी काली हो गयी हैं
चलता हूँ मैं मनीला की गलियो की
सघन हवा में
धुआं डकारती गाड़ियों से
चट्टानों सी ऊंची
इकठ्ठा करता हूँ गन्दगी
शहर की
शहर जो औजीयां अस्तबलों से भी गन्दा है
बारिश के दिनों में
दिन की रौशनी में यूँ ही चलते हुए
मालों में
देखता हूँ गनिकाएं व्यापार करती देह का
चंद पैसों के लिए
आह!
यह क्या भविष्य देखता हूँ मैं