Sunday, December 02, 2012

देखो, मछलियाँ उसकी देह की क्या कहती हैं

आर. चेतनक्रांति
आज भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार से सम्मानित कवि आर. चेतनक्रांति (02 दिसम्बर 1968) की जन्मतिथि है। चेतनक्रांति की कविताएँ समाज और मनुष्य की आपसी टकराहट की कविताएँ हैं। दरअसल, इंसानी विडंबनाएँ, समाज-रूपी पत्थर पर सिर पटकती हैं मगर अपनी रुढ़ियों से तनिक भी निजाद नहीं पाना चाहतीं। एक कवि का मन इन्हीं परंपरागत रूढ़ियों को सोचते, विचारते अपने आप को लगातार गढ़ता जाता है और इसी क्रम में आर. चेतन क्रांति की कविता का चेहरा सामने आता दिखता  है। शोकनाच (2004) कविता-संग्रह के रचनाकार चेतनक्रांति इस समय 'आलोचना' पत्रिका के सहसंपादक हैं। जन्मतिथि की शुभकामनाओं सहित प्रस्तुत हैं कुछ कविताएँ : बीइंग पोएट
उसकी हँसी
एक मर्द हँसा
हँसा वह छत पर खड़ा होकर
छाती से बनियान हटाकर
फिर उसने एक टाँग निकाली
और उसे मुंडेर पर रखकर फिर हँसा
हँसा एक मर्द
मुट्ठियों से जाँघें ठोंकते हुए एक मर्द हँसा
उसने हवा खींची
गाल फुलाए और
आँखों से दूर तक देखा
फिर हँसा
हँसा वह मर्द
मुट्ठियाँ भींचकर उसने कुछ कहा
और फिर हँसा
सूरज डूब रहा था धरती उदास थी ।
परदे के पीछे शायद कोई आंख हो
उससे कहा गया कि सबसे पहले तुम्हें खुद को बचाना है उसके बाद दुनिया को 
अगर समय रहा तो पूरी ट्रेनिंग का सार बस यही था 
कि जब जरुरत हो प्रेम दिखाना मुकर जाना अगर कोई याद दिलाये 
कि तुम अपनेपन से मुस्कराये थे जब बेचने आये थे 
मॉल बिकने के बाद तुम सिर्फ कम्पनी के हो कम्पनी के मॉल की तरह 
और इसी तरह तुम्हें दिखना हैइसे जीवन शैली समझो 
यह सिर्फ ड्यूटी कि बात नहीं है
और फिर हम उन्हें देखते हैं नये बाजारों में 
टीवी के परदों पर सड़कों के सिरहानों पर सजे चमकपटों पर 
मूर्तियों सी शांत सुसज्जित लड़कियां 
जिनकी त्वचा उनसे बेगानी कर दी गई 
मुँह खोलने से पहले जो 
हथेलिओं से थामतीं हैं कृत्रिम रासायनिक सौंदर्य को 
जो दरअसल सम्पत्ति है पे मास्टर की 
बुतों कि तरह ठस खड़े जोधा लड़के 
जिनके बदन की मचलियाँ बींध दी गयीं हैं भव्य आतंक से 
और जो हंसने से पहले जाने किससे इजाजत मांगते हैं 
शायद दीवार में कोई आंख हो 
शायद परदे के पीछे कोई डोरियां फंसाये बैठा हो ...
मालिक का छत्ता
आसमान काला पड़ रहा था
धरती नीली
जब हमारे मालिक ने
अपने मासिक दौरे पर पहला क़दम दफ़्तर में रखा
दफ़्तर में बहुत सारी कोटरें थीं
शुरू में आदमी भरती किए गए थे
मालिक गुज़रा तो
हर कोटर कसमसाई, थोड़ी-सी तड़की
जैसे आकाश में बिजली कौंधी हो
और उनकी उपस्थिति को महसूस किया गया
दूर से देखो तो समाज मधुमक्खियों के छत्ते की तरह दिखाई देता है
बंद और ठोस
लेकिन उसमें रास्ते होते हैं, बहुत सारे छेद
मालिक उन सबसे गुज़रकर यहाँ तक पहुँचा है
उसके बदन से शहद टपक रहा है
सब उसके पीछे हैं
बस, एक चटखारा
हम समर्थ थे
और सुलझे हुए
और नए फ़ैशन के कपड़ों में सजे
लेकिन उस क्षण हमारे ऊपर
हमारा वश नहीं रह गया था
हम किसी भी पल सो सकते थे
हम किसी भी पल रो सकते थे
वे कुछ कह देते तो
हम तालियाँ बजाकर स्वागत करते
लेकिन वे कुछ नहीं बोले
और चले गए।
वे तुम्हें मज़बूर करेंगे
वे तुम्हें मज़बूर करेंगे
कि तुम्हारा भी एक रूप हो निश्चित
कि तुम्हारा भी हो एक दावा
कि हो तुम्हारा भी एक वादा
कि तुम्हारा भी एक स्टैण्ड हो
कि तुम्हारी भी हो कोई `से´
वे तुम्हें मज़बूर करेंगे
कि रुको
और, कि या तो हाँ कहो या ना
कि चुप मत रहो
कि कुछ भी बोलोअगर झूठ है तो वही सही
वे तुम्हें मज़बूर करेंगे
कभी गालियों से
कभी प्यार से
कभी गुस्से से
कभी मार से
कभी ठंडी उदासीनता से तुम्हें तुम्हारे कोने में अकेला छोड़
दीवार पीछे खड़े हो इन्तज़ार करेंगे
वे तुम्हें अपने धैर्य से मज़बूर करेंगे
वे तुम्हें मज़बूर करेंगे
कभी कहेंगे कि तुम फ़ालतू हो,
कि ऐसा है तो तुम्हें मर जाना चाहिए
वे तुम्हें अपने ठोस फैसलों से मज़बूर करेंगे
वे तुम्हारे सामने एक शीशा रख देंगे
और कहेंगे कि इससे डरो जो तुम्हें इसमें दिख रहा है
वे तुम्हें मज़बूर करेंगे अपनी कल्पना से
और कल्पना की प्लानिंग से
वे कहेंगे कि तुम ईश्वर हो
बल्कि उससे भी ज्यादा ताकतवर
आओ और हम पर राज करो
वे तुम्हें मज़बूर करेंगे अपने समर्पण से।
औसत के राजमार्ग पर
सर्कस जैसा कुछ था
चमत्कार की चमकार में रंग-बिरंगा
`हय-हय-हैरानी´ में नंगा
एक बौने के ऊपर
संरक्षणार्थ
या
हायरार्की के सुप्रसिद्ध कानून के हितार्थ
और, इसलिए भी कि ब्रह्मांड की सिकुड़ती नली में पृथ्वी सुरक्षित रहे
एक और बौना तैनात था
कहते थे उलझे-उलझे शब्दों में
कि राजा नहीं, प्रजा नहीं, भगवान नहीं, भक्त नहीं
कि फाज़िल नहीं, ज़ाहिल नहीं, आसान नहीं, सख़्त नहीं
सिर्फ मीडियोकर ही दुनिया को बचाएगा
कि कृष्ण का, कि राम का, कि अभीष्ट का
कि वेस्ट का और, कि ईस्ट का
मिला-जुला ख़ुदा एक आएगा
वह होगा प्रतिभा-सम्पन्न अनुगामी
सत्ता-तक-जा-पहुँचों का अन्तर्यामी
उसे कोई नहीं रोक पाएगा
जब वह रास्ते के बीच के रास्ते के भी बीच के रास्ते से
ठस खड़ी किंकर्त्तव्यविमूढ़ों की भीड़ से
सुई की तरह निकल जाएगा
और मंच पर जाकर गाएगा
एक हज़ारवीं बार मीडियोक्रेसी का राष्ट्रीय गीत
और आत्मा में अवरुद्धठूँस-ठूँसकर प्रबुद्ध
टुक-टुक असमंजस में फँसी भीड़
हल्की और मुक्त होकर तालियाँ बजाएगी
और पहले ही रेले के साथ सारी-की-सारी चली जाएगी
जहाँ होगा सबका साझा स्वर्ग
थोड़ा मीठा, थोड़ा नमकीन, थोड़ा कुरकुरा
माध्यम का।
ख़ुशी के अन्तहीन सागर में
खुशी खत्म ही नहीं होती
कुछ ऐसी मस्ती छाई है
कि रात-भर नींद नहीं आई है
फिर भी सुबह चकाचक है
हिृतिक रौशन प्यारा-प्यारा
मुन्नी की आँखों का तारा
सेवानिवृत्त दद्दू कर्नल जगदीश
बाल्कनी में जॉगिंग करते-करते हुलसे--
नायकहीन अँधेरे वक्तों का उजियारा
आमलेट के मोटे पर्दे के पीछे से
बैंक मनीजर कुक्कू ने मुस्कान उठाई--
वह देवता है खुशियों का
सुन्दर सुबहों को जगानेवाला परीजाद
देखो, मछलियाँ उसकी देह की क्या कहती हैं--
लिपिस्टिक बहू
बाथरूम के दरवाजे पर विजयपताका-सी लहराई
पर्दे के इस कोने से उस कोने तक दरिया-सी बहती हैं--
मम्मू बोलीं
साठ साल की उजले दाँतोंवाली मम्मू
नए दौर का नया ककहरा सीख रही हैं--
क ख ग घ च छ ट ठ, मेरी घटती उम्र का घटना
उसके ही शुभ-शिशु-आनन के दरशन का परताप
मुझे यह मेरे खेल-खिलौने दिन वापस देता है
इसके वह कई करोड़ लेता हैदृ
ज्ञानी मुन्ना बाबा ने खुशियों-भरी सभा में अपनी पोथी खोली
स्टारडस्ट के पण्डित’, चुप करदृदद्दू कड़के
कीमत का मत जिक्र चला, ओ निर्धन माथे
कीमत का जिक्र अशुभ होता है
तुझसे कभी किसी ने
किसी चीज की कीमत पूछी, बोल
कीमत तो है शगुन
असल चीज है खुशी
खुशी जो खत्म न हो--
डाक्यूमेंट्री फिल्मों के निर्माता
निशाचर
पापा
घर के मुखिया
खुशियों के कालीन पै पग धरते ही चहके
खुशी ही रचे उन्हें
जो करते लीड जमाने को
पिछले हफ्ते नहीं सुने थे वचन
गुरु खुशदीप कमल सिंहानीजी के ?
खुशी ने ही तो उसे रचा है
उस मुस्काते, उस उम्र घटानेवाले जादूगर नायक को
और हमें भी तो
रचा खुशी ने ही--
बेडरूम से पर्दा फाड़
भैया बड़े कृष्ण भक्त
पोप्पर्टी डीलर, बोले--
खुशी की गागर धरो सहेज
शेष कृष्णा पर छोड़ो
आँखें मूँदोदृअन्तर के संगीत में नाचो
खुशी के अन्तहीन सागर के तल पर
हृदय से झरते जल पर डोलो
(धूम धाम धाम धूम धमक धमक धन्न)
कृष्ण हरे बोलो।