Thursday, December 27, 2012

मिर्ज़ा 'ग़ालिब' की जन्मतिथि !

मिर्ज़ा असदुल्लाह खाँ 'ग़ालिब'
आज मिर्ज़ा असदुल्लाह खाँ 'ग़ालिब' की जन्मतिथि (27 दिसंबर 1796 - 15 फ़रवरी 1869) है। ग़ालिब ऐसे शायर हैं जिनकी तमाम ग़ज़लें ज़्यादातर लोगों ने पढ़ रखी हैं। इसीलिए आज उनकी जन्मतिथि के मौक़े पर पेश हैं कुछ क़तआत और रुबाइयाँ। : बीइंग पोएट
क़तआत
एक अहले-दर्द ने सुनसान जो देखा क़फ़स
यों कहा आती नहीं अब क्यों सदाए-अ़न्दलीब
बाल-ओ-पर दो-चार दिखलाकर कहा सय्याद ने
ये निशानी रह गयी है अब बजाए-अन्दलीब
शब को ज़ौक़े-गुफ़्तगू से तेरा दिल बेताब था
शोख़ी-ए-वहशत से अफ़साना फ़ुसूने
-ख़्वाब था
वां हजूमे-नग़्महाए-साज़े-इशरत था
'असद'
नाख़ुने-ग़म यां सरे-तारे-नफ़स मिज़राब था
दूद को आज उसके मातम में सियहपोशी हुई
वो दिले-सोज़ाँ कि कल तक शम्ए-मातमख़ाना था
शिकवा-ए-याराँ ग़ुबारे-दिल में पिन्हाँ कर दिया
'ग़ालिब' ऐसे गंज को शायाँ यही वीराना था
रुबाइयाँ
आतिशबाज़ी है जैसे शग़्ले-अतफ़ाल
है सोज़े-ज़िगर का भी इसी तौर का हाल
था मूजीदे-इश्क़ भी क़यामत कोई
लड़कों के लिए गया है क्या खेल निकाल
दिल था की जो जाने दर्द तम्हीद सही
बेताबी-रश्क व हसरते-दीद सही
हम और फ़सुर्दन
, ऐ तज़ल्ली! अफ़सोस
तकरार रवा नहीं तो तजदीद सही
है ख़ल्क़ हसद क़माश लड़ने के लिए
वहशत-कदा-ए-तलाश लड़ने के लिए
यानी हर बार सूरते-क़ागज़े-बाद
मिलते हैं ये बदमाश लड़ने के लिए
दिल सख़्त निज़न्द हो गया है गोया
उससे गिलामन्द हो गया है गोया
पर यार के आगे बोल सकते ही नहीं
'ग़ालिब' मुंह बंद हो गया है गोया
दुःख जी के पसंद हो गया है 'ग़ालिब'
दिल रुककर बंद हो गया है
'ग़ालिब'
वल्लाह कि शब को नींद आती ही नहीं
सोना सौगन्द हो गया है
'ग़ालिब'
मुश्किल है ज़बस कलाम मेरा ऐ दिल!
सुन-सुन के उसे सुख़नवराने-कामिल
आसान कहने की करते हैं फ़रमाइश
गोयम मुश्किल वगरना गोयम मुश्किल
कहते हैं कि अब वो मर्दम-आज़ार नहीं
उश्शाक़ की पुरसिश से उसे आ़र नहीं
जो हाथ कि ज़ुल्म से उठाया होगा
क्योंकर मानूं कि उसमें तलवार नहीं
हम गरचे बने सलाम करने वाले
कहते हैं दिरंग काम करने वाले
कहते हैं कहें खुदा से
, अल्लाह अल्लाह
वो आप हैं सुबह शाम करने वाले
समाने-ख़ुरो-ख़्वाब कहाँ से लाऊं?
आराम के असबाब कहाँ से लाऊं
?
रोज़ा मेरा ईमान है
'ग़ालिब' लेकिन
ख़स-ख़ाना-ओ-बर्फ़ाब कहाँ से लाऊं
?