Saturday, August 03, 2013

सिराज फ़ैसल ख़ान की ग़ज़लें

'सिराज' फ़ैसल ख़ान ऐसा शायर है, जिसकी ग़ज़लों में रंग-ए-सियासत और रंग-ए-मुहब्बत समंदर के साहिल की तरह मौजूद है। एक आँख से देखने पर ये रंग दो दिखाई देते हैं, मगर दोनों आँखों से ये रंग दो नज़र नहीं आते। ख़ुशी होती है और ख़ुद पर यक़ीन आता है जब कोई शायर अपने शेरों में वजूद के बारीक टुकड़ों को बिखेरता भी है और समेटता भी। ऐसे में हवा के होंठों पर ग़ज़ल चस्पां हो जाती है और शायर बज़्म-ए-बहार में तन्हाई के नए फूल चुनने की ख़्वाहिश करता है। कलियाँ अपने आप चटकने लगती हैं। शायर इस बात से हैरान भी होता है और परेशान भी। मगर एक चीज़ जो शायर कभी नहीं भूलता वो  है- वक़्त के सफ़ेद सफ़हे पर सियाह हर्फ़ों को दर्ज़ करना। 'सिराज' को यह काम बख़ूबी आता है। फिलहाल, 'सिराज' फ़ैसल ख़ान की कुछ ग़ज़लें - त्रिपुरारि कुमार शर्मा 

1
ख़ौफ़ कब तक भेड़ियोँ से खायेगा 
मेमना ख़ुद भेड़िया बन जायेगा
झूठ मुझको देखकर मुस्कायेगा 
सच मुझे सूली पे जब चढ़वायेगा
जिस फ़ज़ा मेँ जी रही है ज़िन्दगी 
मौत रुक जाये तो दम घुट जायेगा
तीरगी से जंग कर के इक दिया 
गोद मेँ फिर सुब्ह की सो जायेगा
अब तभी मैँ पास उसके जाऊँगा 
जब वही लेने मुझे ख़ुद आयेगा
भूख होटोँ पर लिये निकलेगा दम 
गर मेरे हिस्से की रोटी खायेगा
यूँ लगा मुर्दे ने मानो ये कहा 
जा रहा हूँ आज कल तू आयेगा
सौपकर दीवान दुनिया को सिराज 
मीर के कदमोँ तले सो जायेगा
2
मुल्क़ को तक़सीम कर के क्या मिला है 
अब भी जारी नफ़रतोँ का सिलसिला है
क्योँ झगड़ते हैँ सियासी चाल पर हम 
मुझको हर हिन्दोस्तानी से गिला है
दी है क़ुर्बानी शहीदोँ ने हमारे 
मुल्क़ तोहफ़े मेँ हमेँ थोड़ी मिला है
हुक्मरानोँ ने चली है चाल ऐसी 
आम लोगोँ के दिलोँ मेँ फ़ासिला है
अब नज़र आता नहीँ कोई मुहाफ़िज़ 
हाँ, लुटेरोँ का मगर इक क़ाफ़िला है
लुट रहा है मुल्क़ अब अपनोँ के हाथोँ 
सोचिये आज़ाद होकर क्या मिला है
3
वो बड़े बनते हैँ अपने नाम से 
हम बड़े बनते हैँ अपने काम से
वो कभी आग़ाज़ कर सकते नहीँ 
ख़ौफ़ लगता है जिन्हेँ अन्जाम से
इक नज़र महफिल मेँ देखा था जिसे 
हम तो खोये हैँ उसी मेँ शाम से
दोस्ती, चाहत, वफ़ा इस दौर मेँ 
काम रख अय दोस्त अपने काम से
जिनसे कोई वास्ता भी अब नहीँ 
क्योँ वो जलते हैँ हमारे नाम से
उसके दिल की आग ठंडी पड़ गयी 
मुझको शोहरत मिल गयी इल्ज़ाम से
4
होटोँ पे उनके प्यार के गुल भी खिले रहे 
पर दिल मेँ नफ़रतोँ के भी काँटे भरे रहे
मुझको भी जंग के लिये उकसा के बारहा 
गद्दार दुश्मनोँ से भी मेरे मिले रहे
वो खुदकुशी की राह में अड़ कर खड़ी रही 
ताउम्र ज़िन्दगी से बहुत जूझते रहे
मौसम, जहाँ, ख़यालोँ मेँ तब्दीलियाँ हुयी 
कुछ ज़ख़्म ऐसे थे जो हरे के हरे रहे
मज़हब की वो छुरी थी सियासत के हाथ में 
एक दूसरे का लोग गला काटते रहे
वैसे तो बेज़मीरोँ की बस्ती मेँ मैँ रहा 
लेकिन मेरे ज़मीर के सिक्के खरे रहे
पीते रहे वो बैठ के हुजरे मेँ ख़ुद शराब 
लानत भी मयकशों पे मगर भेजते रहे
5
छोड़कर सारे कारवाँ हमने 
ख़ुद लिखी अपनी दास्ताँ हमने
बन गया वो मेरा वबाले जाँ 
जिसको समझा था अपनी जाँ हमने
आग नफ़रत की ख़ुद लगायी है 
ख़ुद ही फूँका है ये जहाँ हमने
वापसी की कोई डगर है क्या 
कुछ भी छोड़ा है क्या यहाँ हमने
झूठ कहने की आई मजबूरी 
काटकर फेँक दी ज़ुबाँ हमने
सबकी दस्तार आ गिरी "फ़ैसल" 
पाँव रक्खे जहाँ जहाँ हमने
6
बुरे और भले लोग मिलते रहे 
के मिलते हुये सब से चलते रहे
ज़माने मेँ कोई भी अपना नहीँ 
परत दर परत राज़ खुलते रहे
बने चाँद तो अब्र ने ढक लिया 
जो सूरज बने हाय! जलते रहे
किसी रहगुज़र पे भी साया न था 
बदन मोम जैसे पिघलते रहे
मोहब्बत, ग़ज़ल, दोस्ती, दुश्मनी 
जवानी के दिन यूँ निकलते रहे
उन्हेँ ज़िद थी वो छत पे आये नहीँ 
हमेँ ज़िद थी हम भी टहलते रहे
मैँ ग़म मेँ भी ख़ुश हो के जीता रहा 
पड़ोसी मेरे मुझसे जलते रहे
सितारा कोई छू न पाये मगर 
तमन्नाओँ के पर निकलते रहे
ग़ज़ल तेरा दामन हमेँ मिल गया
के ग़म शे'र बन के निकलते रहे