Friday, August 09, 2013

मनोहर श्याम जोशी की जन्मतिथि !

आज आधुनिक हिन्दी साहित्य के श्रेष्ट गद्यकार मनोहर श्याम जोशी (09 अगस्त 1933 - 30 मार्च 2006) की जन्मतिथि है। वे व्यंग्यकार, पत्रकार, दूरदर्शन धारावाहिक लेखक, जनवादी-विचारक, फिल्म पट-कथा लेखक, उच्च कोटि के संपादक, कुशल प्रवक्ता तथा स्तंभ-लेखक भी थे। दूरदर्शन के प्रसिद्ध और लोकप्रिय धारावाहिकों- ' बुनियाद' 'नेताजी कहिन', 'मुंगेरी लाल के हसीं सपने', 'हम लोग' आदि के कारण वे भारत के घर-घर में प्रसिद्ध हो गए थे। वे रंग-कर्म के भी अच्छे जानकार थे । उन्होंने धारावाहिक और फिल्म लेखन से संबंधित 'पटकथा-लेखन' नामक पुस्तक की रचना की है। दिनमान' और 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' के संपादक भी रहे। उन्होंने ‘कूर्मांचली’ के नाम से कविताएँ भी लिखी थीं। उनकी जन्मतिथि के अवसर पर प्रस्तुत हैं कुछ कविताएँ। 

रिश्ता
एक ही रिश्ता है जिसे मैं मानता हूं
कि सबके अपने सपने हैं
और फिर वे अपने हैं
जिनके कुछ अपने से सपने हैं.
मीनार पर
बहुत परिश्रम कर
एक ऊंची मीनार के शिखर पर पहुँच कर
बैठ कर पालथी मारे
मैं पूरे करने लगा अपने इरादे
हँसने लगा भभाकर
बावरी बेवकूफ दुनिया पर
पर तभी सर्र सर्र
हवा ने कहा मेरे कान पर मुँह धर
‘पगले तू इतने ऊंचे बैठा है
कि तेरी हँसी कोई नहीं सुनता है.’
यह क्षण
आंखें मिलाये हुए
बांहें उलझाये हुए
हम तुम लेटे हुए हैं दूब में
दूब में खिले हैं फूल धूप के
धूप में खिले हैं फूल रूप के
ऐसे ही लेटे रहें दूब में
आंखें मिलाये हुए, बांहें उलझाये हुए
अभी क्या? अभी तो यह कुछ भी नहीं
(लगता है लेटे हैं रोज की तरह यों ही)
पर कभी गाढ़े वक्त काम आएगी इसी क्षण की याद
क्षण का जीवन शुरु होता है क्षण के मर जाने के बाद.
कवि से
कवि यदि गाना हो तो कविता में मत गाओ
कविता दुःख सुख की अभिव्यक्ति नहीं है
और नहीं है सस्ता साधन मन की खाज मिटाने का वह
आप गुदगुदाने का
अपने तन को,
मन को बहलाने का,
या कल्पना रिझाने का.
निश्चय ही कविता
दुःख की या सुख की
अभिव्यक्ति नहीं है
कविता तो वह है जो, सुख-दुःख के आकर भर कर अंतर में
बह जाने के बाद
रहा करता है—
वह जो बच जाता है अपना.
कवि यदि वह बच पाया तो कह जाओ
कवि यदि गाना हो तो कविता में मत गाओ.
‘काफल पाको’
आओ सुनें चुपचाप चिड़िया का गान
‘काफल पाको त्वील नी चाखो’ की मधुर तान
सुनें उसे बस और कुछ न सुनें
कुछ न करें, बस सुनें सुनें
सुनते रहें चुपचाप.
न गिनें कि जंगल में देवदार कितने हैं?
कितने बांज? चीड़ कितने हैं?
न सुनें वायु का रुदन
झरनों की छल छल कल कल
पत्तों की सर सर खर खर
झींगुरों की झिंग झनन झनन
कुछ न करें बस लेटे रहें
पास पास घास पर
सुनते रहें चिड़ियों का गान
‘काफल पाको त्वील नी चाखो’ की मधुर तान 
जब तक अनायास ही
हमारे होंठों से प्यास किसी पिछले जीवन की न फूट पड़े
बन ‘काफल चाखो मील नी चाखो’ की मधुर तान