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| सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' |
आज सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' की 101वीं जन्मतिथि है। हिंदी साहित्य में 'अज्ञेय' और उनके योगदान को नमन करते हुए प्रस्तुत हैं कुछ कविताएँ : बीइंग पोएट
नाच
एक तनी हुई
रस्सी है जिस पर मैं नाचता हूँ।
जिस तनी हुई रस्सी पर मैं नाचता हूँ
जिस तनी हुई रस्सी पर मैं नाचता हूँ
वह दो खम्भों के बीच है।
रस्सी पर मैं जो नाचता हूँ
वह एक खम्भे से दूसरे खम्भे तक का नाच
है।
दो खम्भों के बीच जिस तनी हुई रस्सी पर
मैं नाचता हूँ
उस पर तीखी रोशनी पड़ती है
जिस में लोग मेरा नाच देखते हैं।
न मुझे देखते हैं जो नाचता है
न रस्सी को जिस पर मैं नाचता हूँ
न खम्भों को जिस पर रस्सी तनी है
न रोशनी को ही जिस में नाच दीखता है:
लोग सिर्फ़ नाच देखते हैं।
पर मैं जो नाचता
जो जिस रस्सी पर नाचता हूँ
जो जिन खम्भों के बीच है
जिस पर जो रोशनी पड़ती है
उस रोशनी में उन खम्भों के बीच उस रस्सी
पर
असल में मैं नाचता नहीं हूँ।
मैं केवल उस खम्भे से इस खम्भे तक दौड़ता
हूँ
कि इस या उस खम्भे से रस्सी खोल दूँ
कि तनाव चुके और ढील में मुझे छुट्टी हो
जाये -
पर तनाव ढीलता नहीं
और मैं इस खम्भे से उस खम्भे तक दौड़ता
हूँ
पर तनाव वैसा ही बना रहता है
सब कुछ वैसा ही बना रहता है।
और वही मेरा नाच है जिसे सब देखते हैं
मुझे नहीं
रस्सी को नहीं
खम्भे नहीं
रोशनी नहीं
तनाव भी नहीं
देखते हैं - नाच !
देखते हैं - नाच !
सत्य तो बहुत
मिले
खोज़ में जब निकल ही आया
सत्य तो बहुत मिले ।
सत्य तो बहुत मिले ।
कुछ नये कुछ
पुराने मिले
कुछ अपने कुछ बिराने मिले
कुछ अपने कुछ बिराने मिले
कुछ दिखावे कुछ बहाने मिले
कुछ अकड़ू कुछ मुँह-चुराने मिले
कुछ घुटे-मँजे सफेदपोश मिले
कुछ ईमानदार ख़ानाबदोश मिले ।
कुछ ईमानदार ख़ानाबदोश मिले ।
कुछ ने
लुभाया
कुछ ने डराया
कुछ ने डराया
कुछ ने परचाया-
कुछ ने भरमाया-
सत्य तो बहुत मिले
खोज़ में जब निकल ही आया ।
खोज़ में जब निकल ही आया ।
कुछ पड़े
मिले
कुछ खड़े मिले
कुछ खड़े मिले
कुछ झड़े मिले
कुछ सड़े मिले
कुछ निखरे कुछ बिखरे
कुछ धुँधले कुछ सुथरे
सब सत्य रहे
कहे, अनकहे ।
कहे, अनकहे ।
खोज़ में जब
निकल ही आया
सत्य तो बहुत मिले
सत्य तो बहुत मिले
पर तुम
नभ के तुम कि गुहा-गह्वर के तुम
मोम के तुम, पत्थर के तुम
तुम किसी देवता से नहीं निकले:
तुम मेरे साथ मेरे ही आँसू में गले
मेरे ही रक्त पर पले
अनुभव के दाह पर क्षण-क्षण उकसती
मेरी अशमित चिता पर
तुम मेरे ही साथ जले ।
तुम मेरे ही साथ जले ।
तुम-
तुम्हें तो
तुम्हें तो
भस्म हो
मैंने फिर अपनी भभूत में पाया
अंग रमाया
तभी तो पाया ।
तभी तो पाया ।
खोज़ में जब
निकल ही आया,
सत्य तो बहुत मिले-
एक ही पाया ।
सत्य तो बहुत मिले-
एक ही पाया ।
वसंत आ गया
मलयज का झोंका बुला गया
खेलते से स्पर्श से
खेलते से स्पर्श से
रोम रोम को कंपा गया
जागो जागो
जागो सखि़ वसन्त आ गया जागो
जागो सखि़ वसन्त आ गया जागो
पीपल की
सूखी खाल स्निग्ध हो चली
सिरिस ने रेशम से वेणी बाँध ली
सिरिस ने रेशम से वेणी बाँध ली
नीम के भी बौर में मिठास देख
हँस उठी है कचनार की कली
टेसुओं की आरती सजा के
बन गयी वधू वनस्थली
बन गयी वधू वनस्थली
स्नेह भरे
बादलों से
व्योम छा गया
व्योम छा गया
जागो जागो
जागो सखि़ वसन्त आ गया जागो
जागो सखि़ वसन्त आ गया जागो
चेत उठी
ढीली देह में लहू की धार
बेंध गयी मानस को दूर की पुकार
बेंध गयी मानस को दूर की पुकार
गूंज उठा दिग दिगन्त
चीन्ह के दुरन्त वह स्वर बार
"सुनो सखि!
सुनो बन्धु!
प्यार ही में यौवन है यौवन में प्यार!"
प्यार ही में यौवन है यौवन में प्यार!"
आज मधुदूत
निज
गीत गा गया
गीत गा गया
जागो जागो
जागो सखि वसन्त आ गया, जागो!
जागो सखि वसन्त आ गया, जागो!
सर्जना के
क्षण
एक क्षण भर और
रहने दो मुझे अभिभूत
रहने दो मुझे अभिभूत
फिर जहाँ मैने संजो कर और भी सब रखी हैं
ज्योति शिखायें
वहीं तुम भी चली जाना
शांत तेजोरूप!
शांत तेजोरूप!
एक क्षण भर
और
लम्बे सर्जना के क्षण कभी भी हो नहीं सकते!
लम्बे सर्जना के क्षण कभी भी हो नहीं सकते!
बूँद स्वाती की भले हो
बेधती है मर्म सीपी का उसी निर्मम त्वरा
से
वज्र जिससे फोड़ता चट्टान को
भले ही फिर व्यथा के तम में
बरस पर बरस बीतें
एक मुक्तारूप को पकते!
एक मुक्तारूप को पकते!
मैंने पूछा
क्या कर रही हो
मैंने पूछा
यह क्या बना रही हो ?
यह क्या बना रही हो ?
उसने आँखों से कहा
धुआँ पोछते हुए कहा :
मुझे क्या बनाना है ! सब-कुछ
अपने आप बनता है
मैंने तो यही जाना है ।
कह लो भगवान ने मुझे यही दिया है ।
कह लो भगवान ने मुझे यही दिया है ।
मेरी
सहानुभूति में हठ था :
मैंने कहा : कुछ तो बना रही हो
मैंने कहा : कुछ तो बना रही हो
या जाने दो, न सही –
बना नहीं रही –
क्या कर रही हो ?
वह बोली : देख तो रहे हो
छीलती हूँ
नमक छिड़कती हूँ
मसलती हूँ
निचोड़ती हूँ
कोड़ती हूँ
कसती हूँ
फोड़ती हूँ
फेंटती हूँ
महीन बिनारती हूँ
मसालों से सँवारती हूँ
देगची में पलटती हूँ
बना कुछ नहीं रही
बनाता जो है – यह सही है-
अपने–आप बनाता है
पर जो कर रही हूँ–
एक भारी पेंदे
मगर छोटे मुँह की
देगची में सब कुछ झोंक रही हूँ
दबा कर अँटा रही हूँ
सीझने दे रही हूँ ।
मैं कुछ करती भी नहीं–
मैं काम सलटती हूँ ।
मैं काम सलटती हूँ ।
मैं जो
परोसूँगी
जिन के आगे परोसूँगी
जिन के आगे परोसूँगी
उन्हें क्या पता है
कि मैंने अपने साथ क्या किया है ?

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