Showing posts with label ग़ज़ल. Show all posts
Showing posts with label ग़ज़ल. Show all posts

Saturday, August 03, 2013

सिराज फ़ैसल ख़ान की ग़ज़लें

'सिराज' फ़ैसल ख़ान ऐसा शायर है, जिसकी ग़ज़लों में रंग-ए-सियासत और रंग-ए-मुहब्बत समंदर के साहिल की तरह मौजूद है। एक आँख से देखने पर ये रंग दो दिखाई देते हैं, मगर दोनों आँखों से ये रंग दो नज़र नहीं आते। ख़ुशी होती है और ख़ुद पर यक़ीन आता है जब कोई शायर अपने शेरों में वजूद के बारीक टुकड़ों को बिखेरता भी है और समेटता भी। ऐसे में हवा के होंठों पर ग़ज़ल चस्पां हो जाती है और शायर बज़्म-ए-बहार में तन्हाई के नए फूल चुनने की ख़्वाहिश करता है। कलियाँ अपने आप चटकने लगती हैं। शायर इस बात से हैरान भी होता है और परेशान भी। मगर एक चीज़ जो शायर कभी नहीं भूलता वो  है- वक़्त के सफ़ेद सफ़हे पर सियाह हर्फ़ों को दर्ज़ करना। 'सिराज' को यह काम बख़ूबी आता है। फिलहाल, 'सिराज' फ़ैसल ख़ान की कुछ ग़ज़लें - त्रिपुरारि कुमार शर्मा 

1
ख़ौफ़ कब तक भेड़ियोँ से खायेगा 
मेमना ख़ुद भेड़िया बन जायेगा
झूठ मुझको देखकर मुस्कायेगा 
सच मुझे सूली पे जब चढ़वायेगा
जिस फ़ज़ा मेँ जी रही है ज़िन्दगी 
मौत रुक जाये तो दम घुट जायेगा
तीरगी से जंग कर के इक दिया 
गोद मेँ फिर सुब्ह की सो जायेगा
अब तभी मैँ पास उसके जाऊँगा 
जब वही लेने मुझे ख़ुद आयेगा
भूख होटोँ पर लिये निकलेगा दम 
गर मेरे हिस्से की रोटी खायेगा
यूँ लगा मुर्दे ने मानो ये कहा 
जा रहा हूँ आज कल तू आयेगा
सौपकर दीवान दुनिया को सिराज 
मीर के कदमोँ तले सो जायेगा
2
मुल्क़ को तक़सीम कर के क्या मिला है 
अब भी जारी नफ़रतोँ का सिलसिला है
क्योँ झगड़ते हैँ सियासी चाल पर हम 
मुझको हर हिन्दोस्तानी से गिला है
दी है क़ुर्बानी शहीदोँ ने हमारे 
मुल्क़ तोहफ़े मेँ हमेँ थोड़ी मिला है
हुक्मरानोँ ने चली है चाल ऐसी 
आम लोगोँ के दिलोँ मेँ फ़ासिला है
अब नज़र आता नहीँ कोई मुहाफ़िज़ 
हाँ, लुटेरोँ का मगर इक क़ाफ़िला है
लुट रहा है मुल्क़ अब अपनोँ के हाथोँ 
सोचिये आज़ाद होकर क्या मिला है
3
वो बड़े बनते हैँ अपने नाम से 
हम बड़े बनते हैँ अपने काम से
वो कभी आग़ाज़ कर सकते नहीँ 
ख़ौफ़ लगता है जिन्हेँ अन्जाम से
इक नज़र महफिल मेँ देखा था जिसे 
हम तो खोये हैँ उसी मेँ शाम से
दोस्ती, चाहत, वफ़ा इस दौर मेँ 
काम रख अय दोस्त अपने काम से
जिनसे कोई वास्ता भी अब नहीँ 
क्योँ वो जलते हैँ हमारे नाम से
उसके दिल की आग ठंडी पड़ गयी 
मुझको शोहरत मिल गयी इल्ज़ाम से
4
होटोँ पे उनके प्यार के गुल भी खिले रहे 
पर दिल मेँ नफ़रतोँ के भी काँटे भरे रहे
मुझको भी जंग के लिये उकसा के बारहा 
गद्दार दुश्मनोँ से भी मेरे मिले रहे
वो खुदकुशी की राह में अड़ कर खड़ी रही 
ताउम्र ज़िन्दगी से बहुत जूझते रहे
मौसम, जहाँ, ख़यालोँ मेँ तब्दीलियाँ हुयी 
कुछ ज़ख़्म ऐसे थे जो हरे के हरे रहे
मज़हब की वो छुरी थी सियासत के हाथ में 
एक दूसरे का लोग गला काटते रहे
वैसे तो बेज़मीरोँ की बस्ती मेँ मैँ रहा 
लेकिन मेरे ज़मीर के सिक्के खरे रहे
पीते रहे वो बैठ के हुजरे मेँ ख़ुद शराब 
लानत भी मयकशों पे मगर भेजते रहे
5
छोड़कर सारे कारवाँ हमने 
ख़ुद लिखी अपनी दास्ताँ हमने
बन गया वो मेरा वबाले जाँ 
जिसको समझा था अपनी जाँ हमने
आग नफ़रत की ख़ुद लगायी है 
ख़ुद ही फूँका है ये जहाँ हमने
वापसी की कोई डगर है क्या 
कुछ भी छोड़ा है क्या यहाँ हमने
झूठ कहने की आई मजबूरी 
काटकर फेँक दी ज़ुबाँ हमने
सबकी दस्तार आ गिरी "फ़ैसल" 
पाँव रक्खे जहाँ जहाँ हमने
6
बुरे और भले लोग मिलते रहे 
के मिलते हुये सब से चलते रहे
ज़माने मेँ कोई भी अपना नहीँ 
परत दर परत राज़ खुलते रहे
बने चाँद तो अब्र ने ढक लिया 
जो सूरज बने हाय! जलते रहे
किसी रहगुज़र पे भी साया न था 
बदन मोम जैसे पिघलते रहे
मोहब्बत, ग़ज़ल, दोस्ती, दुश्मनी 
जवानी के दिन यूँ निकलते रहे
उन्हेँ ज़िद थी वो छत पे आये नहीँ 
हमेँ ज़िद थी हम भी टहलते रहे
मैँ ग़म मेँ भी ख़ुश हो के जीता रहा 
पड़ोसी मेरे मुझसे जलते रहे
सितारा कोई छू न पाये मगर 
तमन्नाओँ के पर निकलते रहे
ग़ज़ल तेरा दामन हमेँ मिल गया
के ग़म शे'र बन के निकलते रहे

Thursday, April 11, 2013

कुछ अपने आप से भी वो खफ़ा है मेरे लिए !

मुग़नी तबस्सुम
मुग़नी तबस्सुम (1930 - 2012) का नाम ऐसे शायरों में शुमार किया जाता है, जिन्होंने उम्र भर उर्दू की ख़िदमत की। उस्मानिया यूनीवर्सिटी में प्रोफ़ेसर रहे मुग़नी को उर्दू अकादमी आंध्रा प्रदेश के अवार्ड के अलावा, ग़ालिब अवार्ड, आलमी फ़रोग़ उर्दू अवार्ड से नवाज़ा गया। तो पेश हैं मुग़नी तबस्सुम की ग़ज़लें : बीइंग पोएट
1.
अज़ाब हो गई ज़ंजीर-ए-दस्त-ओ-पा मुझ को
जो हो सके तो कहीं दार पे चढ़ा मुझ को
तरस गया हूँ मैं सूरज के रोशनी के लिए
वो दी है साया-ए-दीवार ने सज़ा मुझ को
जो देखे तो इसी से है ज़िंदगी मेरे
मगर मिटा भी रही है यही हवा मुझ को
उसी नज़र ने मुझे तोड़ कर बिखेर दिया
उसी नज़र ने बनाया था आईना मुझ को
सराब-ए-उम्र-ए-तमन्ना की तिश्नगी हूँ मैं
अगर है चश्मा-ए-फैयाज़ तो बुझा मुझ को
कभी तो अपने बदन के चराग़ रौशन कर
कभी तो अपने लहू से भी आज़मा मुझ को
2.
फ़ज़ा में नग़मा-ए-आवाज़ पा है मेरे लिए
कराँ से ता-ब-कराँ इक निदा है मेरे लिए
मैं अपनी ज़ात में लौटा तो फिर मिला न मुझे
वो एक शख़्स जो रोता रहा है मेरे लिए
सबब है रंज का कुछ ख़ू-ए-इज़्तिराब मेरी
कुछ अपने आप से भी वो खफ़ा है मेरे लिए
फ़लक तमाम आगोश-ए-बाब-ए-महरूमी
शजर शजर यहाँ दस्त-ए-दुआ है मेरे लिए
किसी फ़िराक़ की तम्हीद बन के रह जाना
तेरे विसाल की तस्कीं भी क्या है मेरे लिए
3.
रंज-ए-गिरान-ए-शौक़ का हासिल न कह इसे
तर्क-ए-सफ़र किया है तू मंज़िल न कह इसे
ये ज़ब्त ज़ब्त-ए-ग़म नहीं इक बेदिली सी है
ये दिल हरीफ़-ए-दर्द नहीं दिल न कह इसे
तुग़यानीयाँ कुछ और हैं मौजों में रेत की
मैं डूबता हूँ इशरत-ए-साहिल न कह इसे
मरता नहीं हूँ मौत की बे-हासिली पे मैं
जीता अगर हूँ उल्फ़त-ए-हासिल न कह इसे
मिलना सफ़र का और बिछड़ना सफ़र का है
दुनिया तो रह-गुज़ार है महफ़िल न कह इसे
4.
नाम ही रह गया इक अंजुमन-आराई का
छुप गया चाँद भी अब तो शब-ए-तन्हाई का
दिल से जाती नहीं ठहरे हुए क़दमों की सदा
आँख ने स्वांग रचा रखा है बीनाई
एक इक याद को आहों से जलाता जाऊँ
काम सौंपा है अजब उस ने मसीहाई का
अब न वो लम्स निगाहों का न ख़ुश-बू की सदा
दिल ने देखा था मगर ख़्वाब शनासाई का
साअत-ए-दर्द फ़िरोज़ाँ है बहा लें आँसू
टूटने को है कड़ा वक़्त शकीबाई का
5.
क्या कोई दर्द दिल के मुक़ाबिल नहीं रहा
या एक भी दिल दर्द के क़ाबिल नहीं रहा
उन के लहू की दहर में अर्ज़ानियाँ न पूछ
जिन का गवाह दामन-ए-क़ातिल नहीं रहा
अपनी तलाश है हमें आँखों के शहर में
आईना जब से अपने मुक़ाबिल नहीं रहा
सर-गर्मी-ए-हयात है बे-मक़्सद-ए-हयात
सब रह नवर्द-ए-शौक़ हैं महमिल नहीं रहा
उस का ख़याल आता है अपने ख़याल से
अब वो भी अपनी याद में शामिल नहीं रहा
6.
छुपा रखा था यूँ ख़ुद को कमाल मेरा था
किसी पे खुल नहीं पाया जो हाल मेरा था
हर एक पा-ए-शिकस्ता में थी मेरी ज़ंजीर
हर एक दस्त-ए-तलब में सवाल मेरा था
मैं रेज़ा रेज़ा बिखरता चला गया ख़ुद ही
के अपने आप से बचना मुहाल मेरा था
हर एक सम्त से संग-ए-सदा की बारिश थी
मैं चुप रहा के यही कुछ मआल मेरा था
ता ख़याल था ताज़ा हवा के झोंके में
जो गर्द उड़ा के गई है मलाल मेरा था
मैं रो पड़ा हूँ तबस्सुम सियाह रातों में
ग़ुरुब-ए-माह में शायद ज़वाल मेरा था 

Thursday, January 10, 2013

पाकिस्तानी शायर ज़फर इक़बाल की ग़ज़लें !

मियाँ ज़फर इक़बाल
आज पेश हैं पाकिस्तानी शायर ज़फ़र इक़बाल की ग़ज़लें। पेशे से पत्रकार ज़फ़र ने ग़ज़ल की दुनिया में अपना अलग मुक़ाम बनाया है। आईए पढ़ते हैं : बीइंग पोएट
1.
ख़ामोशी अच्छी नहीं इंकार होना चाहिए
ये तमाशा अब सरे बाज़ार होना चाहिए 
ख़्वाब की ताबीर पर इसरार है जिनको अभी
पहले उनको ख़्वाब से बेदार होना चाहिए
अब वही करने लगे दीदार से आगे की बात
जो कभी कहते थे बस दीदार होना चाहिए
बात पूरी है अधूरी चाहिए ऐ जान-ए-जाँ
काम आसां है इसे दुश्वार होना चाहिए
दोस्ती के नाम पर कीजे न क्यूँ कर दुश्मनी
कुछ न कुछ आख़िर तरीकेकार होना चाहिए
झूठ बोला है तो उस पर क़ायम भी रहो ज़फ़र
आदमी को साहिब-ए-क़िरदार होना चाहिए
2.
लर्ज़िश-ए-पर्दा-ए-इज़हार का मतलब क्या है
है ये दीवार तो दीवार का मतलब क्या है 
जिसका इंकार हथेली पे लिए फिरता हूँ
जानता ही नहीं इंकार का मतलब क्या है
बेचना कुछ नहीं उसने तो ख़रीदार हैं क्यूँ
आख़िर इस गर्मी-ए-बाज़ार का मतलब क्या है
उसकी राहों में बिखर जाए ये ख़ाक़ इस तरह चश्म
और अपने लिए दीदार का मतलब क्या है
रब्त बाक़ी नहीं अल्फ़ाज़-ओ-मानी में ज़फ़र
क्या कहें उसको इस प्यार का मतलब क्या है
3.
यहाँ किसी को भी कुछ हस्ब--आरज़ू मिला
किसी को हम मिले और हम को तू मिला
गिज़ाल--अश्क सर--सुबह दूब--मिज़्गाँ पर
कब अपनी आँख खुली और लहू लहू न मिला
चमकते चाँद भी थे शहर-ए-शब के एवान में
निगार-ए-ग़म सा मगर कोई शमा-रू न मिला
उन्हीं की रम्ज़ चली है गली गली में यहाँ
जिन्हें इधर से कभी इज़्न-ए-गुफ़्तगू न मिला
फिर आज मैकदा-ए-दिल से लौट आए हैं
फिर आज हम को ठिकाने का सुबू न मिला

Saturday, December 08, 2012

नासिर काज़मी की जन्मतिथि !

'नासिर' काज़मी
आज उर्दू के मशहूर शायर नासिर काज़मी (08 दिसंबर 1925 - 02 मार्च 1972) की जन्मतिथि है। इस मौक़े पर पेश हैं कुछ ग़ज़लें : बीइंग पोएट
1.
दिल धड़कने का सबब याद आया
वो तेरी याद थी अब याद आया
आज मुश्किल था सम्भलना ऐ दोस्त
तू मुसीबत में अजब याद आया
दिन गुज़ारा था बड़ी मुश्किल से
फिर तेरा वादा-ए-शब याद आया
तेरा भूला हुआ पैमान-ए-वफ़ा
मर रहेंगे अगर अब याद आया
फिर कई लोग नज़र से गुज़रे
फिर कोई शहर-ए-तरब याद आया
हाल-ए-दिल हम भी सुनाते लेकिन
जब वो रुख़सत हुए तब याद आया
बैठ कर साया-ए-गुल में नासिर
हम बहुत रोये वो जब याद आया
2.
अपनी धुन में रहता हूँ
मैं भी तेरे जैसा हूँ
ओ पिछली रुत के साथी
अब के बरस मैं तन्हा हूँ
तेरी गली में सारा दिन
दुख के कंकर चुनता हूँ
मुझ से आँख मिलाये कौन
मैं तेरा आईना हूँ
मेरा दिया जलाये कौन
मैं तेरा ख़ाली कमरा हूँ
तू जीवन की भरी गली
मैं जंगल का रस्ता हूँ
अपनी लहर है अपना रोग
दरिया हूँ और प्यासा हूँ
आती रुत मुझे रोयेगी
जाती रुत का झोंका हूँ
3.
किसे देखें कहाँ देखा न जाये
वो देखा है जहाँ देखा न जाये
मेरी बरबादियों पर रोने वाले
तुझे महव-ए-फुगाँ देखा न जाये
सफ़र है और गुरबत का सफ़र है
गम-ए-सद-कारवाँ देखा न जाये
कहीं आग और कहीं लाशों के अंबार
बस ऐ दौर-ए-ज़मीँ देखा न जाये
दर-ओ-दीवार वीराँ, शमा मद्धम
शब-ओ-गम का सामाँ देखा न जाये
पुरानी सुहब्बतें याद आती है
चरागों का धुआँ देखा न जाये
भरी बरसात खाली जा रही है
सराबर-ए-रवाँ देखा न जाये
कहीं तुम और कहीं हम, क्या गज़ब है
फिराक-ए-जिस्म-ओ-जाँ देखा न जाये
वही जो हासिल-ए-हस्ती है नासिर
उसी को मेहरबाँ देखा न जाये
4.
कौन इस राह से गुज़रता है
दिल यूँ ही इंतज़ार करता है
देख कर भी न देखने वाले
दिल तुझे देख-देख डरता है
शहर-ए-गुल में कटी है सारी रात
देखिये दिन कहाँ गुज़रता है
ध्यान की सीढ़ियों पे पिछले पहर
कोई चुपके से पाँव धरता है
दिल तो मेरा उदास है नासिर
शहर क्यों सायँ-सायँ करता है
5.
नीयत-ए-शौक़ भर न जाये कहीं
तू भी दिल से उतर न जाये कहीं
आज देखा है तुझे देर के बाद
आज का दिन गुज़र न जाये कहीं
न मिला कर उदास लोगों से
हुस्न तेरा बिखर न जाये कहीं
आरज़ू है के तू यहाँ आये
और फिर उम्र भर न जाये कहीं
जी जलाता हूँ और ये सोचता हूँ
रायेगाँ ये हुनर न जाये कहीं
आओ कुछ देर रो ही लें नासिर
फिर ये दरिया उतर न जाये कहीं
6.
करता उसे बेकरार कुछ देर
होता अगर इख्तियार कुछ देर
क्या रोयें फ़रेब-ए-आसमाँ को
अपना नहीं ऐतबार कुछ देर
आँखों में कटी पहाड़ सी रात
सो जा दिल-ए-बेक़रार कुछ देर
ऐ शहर-ए-तरब को जाने वालों
करना मेरा इंतजार कुछ देर
बेकैफी-ए-रोज़-ओ-शब मुसलसल
सरमस्ती-ए-इंतज़ार कुछ देर
तकलीफ-ए-गम-ए-फिराक दायम
तकरीब-ए-विसाल-ए-यार कुछ देर
ये गुंचा-ओ-गुल हैं सब मुसाफिर
है काफिला-ए-बहार कुछ देर
दुनिया तो सदा रहेगी नासिर
हम लोग हैं यादगार कुछ देर
7.
तेरे मिलने को बेकल हो गये हैं
मगर ये लोग पागल हो गये हैं
बहारें लेके आये थे जहाँ तुम
वो घर सुनसान जंगल हो गये हैं
यहाँ तक बढ़ गये आलाम-ए-हस्ती
कि दिल के हौसले शल हो गये हैं
कहाँ तक ताब लाये नातवाँ दिल
कि सदमे अब मुसलसल हो गये हैं
निगाह-ए-यास को नींद आ रही है
मुसर्दा पुरअश्क बोझल हो गये हैं
उन्हें सदियों न भूलेगा ज़माना
यहाँ जो हादसे कल हो गये हैं
जिन्हें हम देख कर जीते थे नासिर
वो लोग आँखों से ओझल हो गये हैं
8.
तेरे ख़याल से लौ दे उठी है तनहाई
शब-ए-फ़िराक़ है या तेरी जल्वाआराई
तू किस ख़याल में है ऐ मंज़िलों के शादाई
उन्हें भी देख जिन्हें रास्ते में नींद आई
पुकार ऐ जरस-ए-कारवाँ-ए-सुबह-ए-तरब
भटक रहे हैं अँधेरों में तेरे सौदाई
राह-ए-हयात में कुछ मर्हले तो देख लिये
ये और बात तेरी आरज़ू न रास आई
ये सानिहा भी मुहब्बत में बारहा गुज़रा
कि उस ने हाल भी पूछा तो आँख भर आई
फिर उस की याद में दिल बेक़रार है नासिर
बिछड़ के जिस से हुई शहर-शहर रुसवाई
9.
ज़िन्दगी को न बना दें वो सज़ा मेरे बाद
हौसला देना उन्हें मेरे ख़ुदा मेरे बाद
कौन घूंघट उठाएगा सितमगर कह के
और फिर किस से करेंगे वो हया मेरे बाद
हाथ उठते हुए उनके न देखेगा
किस के आने की करेंगे वो दुआ मेरे बाद
फिर ज़माना-ए-मुहब्बत की न पुरसिश होगी
रोएगी सिसकियाँ ले-ले के वफ़ा मेरे बाद
वो जो कहता था कि 'नासिर' के लिए जीता हूं
उसका क्या जानिए, क्या हाल हुआ मेरे बाद
10.
होती है तेरे नाम से वहशत कभी-कभी
बरहम हुई है यूँ भी तबीयत कभी-कभी
ऐ दिल किसे नसीब ये तौफ़ीक़-ए-इज़्तिराब
मिलती है ज़िन्दगी में ये राहत कभी-कभी
तेरे करम से ऐ अलम-ए-हुस्न-ए-आफ़रीन
दिल बन गया है दोस्त की ख़िल्वत कभी-कभी
दिल को कहाँ नसीब ये तौफ़ीक़-ए-इज़्तिराब
मिलती है ज़िन्दगी में ये राहत कभी-कभी
जोश-ए-जुनूँ में दर्द की तुग़यानियों के साथ
अश्कों में ढल गई तेरी सूरत कभी-कभी
तेरे क़रीब रह के भी दिल मुतमईन न था
गुज़री है मुझ पे भी ये क़यामत कभी-कभी
कुछ अपना होश था न तुम्हारा ख़याल था
यूँ भी गुज़र गई शब-ए-फ़ुर्क़त कभी-कभी
ऐ दोस्त हम ने तर्क-ए-मुहब्बत के बावजूद
महसूस की है तेरी ज़रूरत कभी-कभी

Wednesday, December 05, 2012

जोश मलीहाबादी की जन्मतिथि !

'जोश' मलीहाबादी
आज उर्दू के मशहूर शायर जोश मलीहाबादी (05 दिसंबर 1898 - 22 फरवरी 1982) की जन्मतिथि है। इस मौक़े पर पेश हैं कुछ ग़ज़लें : बीइंग पोएट
1.
अशवों को चैन नहीं आफ़त किये बग़ैर
तुम, और मान जाओ शरारत किये बग़ैर
अहल-ए-नज़र को यार दिखाना राह-ए-वफ़ा
ऐ काश! ज़िक्र-ए-दोज़ख-ओ-जन्नत किये बग़ैर
अब देख उस का हाल कि आता न था करार
खुद तेरे दिल को, जिस पे इनायत किये बग़ैर
ऐ हमनशीं मुहाल है नासेह का टालना
यह, और यहाँ से जाएँ नसीहत किये बग़ैर
तुम कितने तुन्द-खू हो कि पहलू से आज तक
एक बार भी उठे न क़यामत किये बग़ैर
2.
ये दिन बहार के अब के भी रास न आ सके
कि ग़ुंचे खिल तो सके खिल के मुस्कुरा न सके
मेरी तबाही दिल पर तो रहम खा न सकी
जो रोशनी में रहे रोशनी को पा न सके
न जाने आह! कि उन आँसूओं पे क्या गुज़री
जो दिल से आँख तक आये मिश्गाँ तक आ न सके
रहें ख़ुलूस-ए-मुहब्बत के हादसात जहाँ
मुझे तो क्या मेरे नक़्श-ए-क़दम मिटा न सके
करेंगे मर के बक़ा-ए-दवाम क्या हासिल
जो ज़िंदा रह के मुक़ाम-ए-हयात पा न सके
नया ज़माना बनाने चले थे दीवाने
नई ज़मीं, नया आसमाँ बना न सके
3.
क़सम है आपके हर रोज़ रूठ जाने की
के अब हवस है अजल को गले लगाने की
वहाँ से है मेरी हिम्मत की इब्तिदा अल्लाह
जो इंतिहा है तेरे सब्र आज़माने की
फूँका हुआ है मेरे आशियाँ का हर तिनका
फ़लक को ख़ू है तो है बिजलियाँ गिराने की
हज़ार बार हुई गो मआलेगुल से दोचार
कली से ख़ू न गई फिर भी मुस्कुराने की
मेरे ग़ुरूर के माथे पे आ चली है शिकन
बदल रही है तो बदले हवा ज़माने की
चिराग़-ए-दैर-ओ-हरम कब के बुझ गए ऐ जोश
हनोज़ शम्मा है रोशन शराबख़ाने की
4.
ख़ुद अपनी ज़िन्दगी से वहशत-सी हो गई है
तारी कुछ ऐसी दिल पे इबरत-सी हो गई है
ज़ौक़े-तरब से दिल को होने लगी है वहशत
कुछ ऐसी ग़म की जानिब रग़बत-सी हो गई है
सीने पे मेरे जब से रक्खा है हाथ तूने
कुछ और दर्द-ए-दिल में शिद्दत-सी हो गई है
मुमकिन नहीं के मिलकर रसमन ही मुस्कुरा दो
तुमको तो जैसे हमसे नफ़रत-सी हो गई
अब तो है कुछ दिनों से यूँ दिल बुझा-बुझा सा
दोनों जहाँ से गोया फ़ुरसत-सी हो गई
वो अब कहाँ हैं लेकिन ऐ हमनशीं यहाँ तो
मुड़-मुड़ के देखने की आदत-सी हो गई है
जोश रफ़्ता-रफ़्ता शायद हमारे दिल से
ज़ौक़-ए-फ़सुर्दगी को उल्फ़त-सी हो गई है
5.
नक़्श-ए-ख़याल दिल से मिटाया नहीं हनोज़
बेदर्द मैंने तुझको भुलाया नहीं हनोज़
वो सर जो तेरी राहगुज़र में था सज्दा-रेज़
मैं ने किसी क़दम पे झुकाया नहीं हनोज़
महराब-ए-जाँ में तूने जलाया था ख़ुद जिसे
सीने का वो चिराग़ बुझाया नहीं हनोज़
बेहोश हो के जल्द तुझे होश आ गया
मैं बदनसीब होश में आया नहीं हनोज़
मर कर भी आयेगी ये सदा क़ब्र-ए-जोश से
बेदर्द मैंने तुझको भुलाया नहीं हनोज़
6.
सोज़े-ग़म देके उसने ये इरशाद किया
जा तुझे कश्मकश-ए-दहर से आज़ाद किया
वो करें भी तो किन अल्फ़ाज में तिरा शिकवा
जिनको तिरी निगाह-ए-लुत्फ़ ने बर्बाद किया
दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने न दिया
जब चली सर्द हवा मैंने तुझे याद किया
इसका रोना नहीं क्यों तुमने किया दिल बरबाद
इसका ग़म है कि बहुत देर में बरबाद किया
इतना मासूम हूँ फितरत से, कली जब चटकी
झुक के मैंने कहा, मुझसे कुछ इरशाद किया
मेरी हर साँस है इस बात की शाहिद-ए-मौत
मैंने ने हर लुत्फ़ के मौक़े पे तुझे याद किया
मुझको तो होश नहीं तुमको खबर हो शायद
लोग कहते हैं कि तुमने मुझे बर्बाद किया
वो तुझे याद करे जिसने भुलाया हो कभी
हमने तुझ को न भुलाया न कभी याद किया
कुछ नहीं इस के सिवा 'जोश' हारीफ़ों का कलाम
वस्ल ने शाद किया, हिज्र ने नाशाद किया
7.
वो जोश ख़ैरगी है तमाशा कहें जिसे
बेपरदा यूँ हुए हैं के परदा कहें जिसे
अल्लाह रे ख़ाकसारिए रिंदाँने बादाख्वार
रश्क-ए-ग़ुरूर-ओ-क़ैसर-ओ-कसरा कहें जिसे
बिजली गिरी वो दिल पे जिगर तक उतर गई
इस चर्ख़-ए-नाज़ से क़द-ए-बाला कहें जिसे
ज़ुल्फ़-ए-हयात नोएबशर में है आज तक
ज़ख़्म-ए-गुनाह-ए-आदम-ओ-हव्वा कहें जिसे
कितनी हक़ीक़तों से फ़ज़ूँतर है वो फ़रेब
दिल की ज़ुबाँ में वादा-ए-फ़रदा कहें जिसे
मेरा लक़ब है जिसका लक़ब है शमीम-ए-ज़ुल्फ़
मेरी नज़र है चेहरा-ए-ज़ेबा कहें जिसे
लो आ रहा है वो कोई मस्त-ए-ख़राम से
इस चाल से के लरज़िश-ए-सेहबा कहें जिसे
तेरे निशात-ए-ख़ाना-ए-अमरोज़ में नहीं
वो बुज़दिली के ख़तरा-ए-फ़रदा कहें जिसे
ख़ंजर है जोश हाथ में दामन लहू से तर
ये उसके तौर हैं के मसीहा कहें जिसे