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Tuesday, April 02, 2013

आत्मा की त्वचा पर पहले प्रेम के दाग़ छूटाए नहीं छूटते !

विपिन चौधरी
विपिन चौधरी ऐसी रचनाकार हैं, जिनकी कविताएँ समय के साथ बालिग होती गई हैं। इन्होंने उम्र के हर नए पड़ाव पर एक नई परिपक्वता प्राप्त की है। इस परिपक्वता में न सिर्फ़ उजाले का गाढ़ापन है, बल्कि आलोक का झीनापन भी सम्मिलित है। ऐसे में अंधेरा और भी रचनात्मक हो कर, कविता को एक नया आयाम देने लगता है। विपिन, क्षणों को खुरचकर एक बोतल में एकत्रित करती हैं और अपने अस्तित्व की बाजी लगाकर शब्दों को चुनौती देती हैं। फिर कविता अक्षरों के बीच ठीक वैसे ही समाती है, जैसे सुगंध फूलों में, हमारे तन-मन में समाहित होती है। अगर आप आँख पैदा करने की कला जानते हैं, तो आप कविता को उपलब्ध हो सकते हैं। हम इन्हें पहले भी यहाँ और यहाँ पढ़ चुके हैं। आज (2 अप्रैलउनके जन्मदिन पर ढेर सारी शुभकामनाओं सहित आईए पढ़ते हैं विपिन चौधरी की कुछ नई कविताएँ : बीइंग पोएट
1.
बारिश,
का स्वाद
सबसे पहले मिट्टी ही चखती है
ऊन
,
अपने जिस्म पर सालईयों की छूअन से जागती है
आत्मा की त्वचा पर
पहले प्रेम के दाग़ छूटाए नहीं छूटते
शुरुआत सदा शुरुआत जैसी ही रहती है
खामोश और गुनगुनी
2.
समय रहते
एक-एक अस्थियाँ शिथिल हो मृत्यु की तरफ सरकती जाती हैं
मुझे भी समय रहते
जीवन जीने के बहानों की निशानदेही कर ही लेनी चहिए
3.
पतझड़ के झरते पत्तों की मानिंद
मन के भीतर यादों की कोशिकाएँ रोज़ झरती हैं
दुनिया की दिशा में जाने वाली गली की राह 
इन्हीं पहाड़ों की चोटी पर से उतरने-चढ़ने पर ही
खुलती है!
4.
अपने आँगन में उतरती हुई
सांझ को झट से पहचान लेती है
मेरी उदासी
उसकी पहली पदचाप सुनते ही बालकनी में रखी
फोल्डिंग कुर्सी खुल जाती है
फिर सांझ वही चीज़े मांगती है
उसे जिसकी लत लग चुकी है
गर्म चाय
,
पाँव टिकाने के लिए एक छोटा मेज
और पीछे मुड़ कर देखने के लिए पिछला जीवन
5.
मेजपोश पर चाय
जीवन का सबसे सुलझा हुआ सिद्धांत है
जिसे सबसे पहले कप से उठती हुई भाप ने पकड़ा
हम सबकी ओढी हुई दार्शनिकता को चाय
पहली चुस्की में ही समझ लेती है
उसके बाद चाय
हमको पीने लगती है
जैसे आप पहले अपनी पसंद को चुनते है
फिर उसका मोल चुकाने लगते हैं
6.
मैं तुम्हे प्रेम करता हूँ
देखो मैंने कह दिया इसे
अब मैं अच्छी नींद सोऊंगा
—लड़के ने कहा।
लड़की ने सुना और दिल में कई लहरों ने एक साथ अंगड़ाइयां ली 
मन पहले से भी मुलायम हो गया मगर
अब मेरी जिन्दगी पहली-सी आसान नहीं रही
लड़की ने थोडा उदास होते हुए कहा!
7.
मेरे मौन में तुम्हारी आवाज़
एक लम्बी रस्सी के सहारे से उतरती है
मेरी आत्मा का मीठा जल ले कर लौट जाती है
तुम्हारे पास
जहां तुम अपने भरे-पूरे संसार में 
गुम हो
तुम्हारे पास की गर्म ज़मीन पर इस जल से छिड़काव के बाद 
वातावरण में नरमी उतर आती है
इधर मेरा मौन
फिर से अपनी ऊर्जा को समेटता है
तुम्हारी ही किसी ख़ुशी में खर्च होने के लिए
8.
जैसे
का अर्थ समझाओ
—लड़की ने कहा!
जैसे मेरा प्रेम,
ये दूर तक फैले पर्वत
,
ये शतुरमुर्ग के गर्दन-सी ऊँची प्यास
—लड़के ने समझाया!
प्यास,
जो किनारों पर ठहर जाती है
पर्वत
,
जो अकड़ कर जीना सीख गए हैं
और प्रेम उसे ही कहते हैं न!
जिसमें तुम दुनियादारी में खो जाओगे और
मैं तुम्हारी बाट जोहती रह जाऊँगी
—लड़की का कहा।
इतना सच था कि उसका कोई तैयार जवाब नहीं था लड़के के पास!
9.
आईना हमारे जीवन में
इसीलिए नहीं था कि हम जवानी में हंसे
और बुढापे की झुरियों में छुप कर रोए
इसलिए भी नहीं
हमारी कमीनीगीरों को छुपा
सफेदपोश बन कर
उसके सामने अपना लिपा पुता चेहरा ले कर आए
आईना इसलिए था
कि जिसे हम कबूल ना करना चाहते हों
उसे जबरन कबूलवाएँ
अपनी इस आत्मस्वीकृत पहचान के बाद
आईना हर रोज़ एक नया राज़ मेरे सामने रख रहा है
और मैं आजकल अपने लगातार छोटे हुए जा रहे क़द से
परेशान होती जा रही हूँ।
10.
बारिश से पहले
मुझे बादल बनना पड़ा
रोशनी से पहले
गति
जीवन से पहले
अणु
प्रेम से पहले लाज़िम था
मेरा मनुष्य होना
मामला इस मोड़ पर आकर
मेरे हाथ से फिसल गया
आकाश के गर्भ से उत्पन्न बूँद
धरती पर आ खिलखिलाई
एकदम ताज़ा टटकी बूँद की चमड़ी
परत-भर भी नहीं छिली
इधर दुनिया की नदी पार करते हुए
मनुष्यता की चमड़ी छिलती चली गई
और मैं प्रेम के पहले
मनुष्य नहीं बन सकी 

Sunday, March 31, 2013

मैं शर्मिंदा हूँ समाज के दोगलेपन पर !

कनुप्रिया
आज प्रस्तुत हैं कनुप्रिया (जन्म-17 अगस्त, 1987) की कविताएँ। इनकी कविताओं में एक ओर स्त्री का स्वर प्रस्फुटित होता है, वहीं दूसरी ओर वर्तमान समय में होने वाली कृत्यों को लेकर गुस्सा भी है। साधारण शब्दों में सीधी बात करने वाली ये कविताएँ एक विशेष अर्थ लिए हुए हैं : बीइंग पोएट   
ध्वस्त
चीत्कारती सिंह मर्दिनी,
दहारती है, वेदना में
छत-विछत, लज्जा
द्वेष से, आक्रोश से
भीगी हुई, लाल रंग, कराहती,
सेकती है घावों को,
पोछती है आँचल से
काली सुरंगों से आती आवाजें,
चिल्लाते लोग,
बजती घंटियाँ, प्राथनाएं
उसके लिए
आह...
कानों में पड़ती,
सैकडों रुदन कि
अनवरत विचलित ध्वनियाँ
पस्त पड़ी, घुटनों पर,
शून्य में ताकती
चुनती है टुकड़े,
आत्मसम्मान के
हौसला कर देखती है सड़कों पर,
अनियंत्रित भीड़
, चिल्लाते लोग,
हँसती है और फ़ैल जाती है
एक वितृष्णा, घृणा
उस गहरी चमकती आँखों में...
मैं स्थिर हूँ
अँधेरी दीवारों पर
मोमबत्ती की रौशनी
कितनी तस्वीरें
बनाई थीं,
खेल-खेल में
अचानक ही कुछ आकार,
स्वरूप लेता

कुछ अटपटा-सा
रह जाता।
किताबों के बीच
बैठकर अक्षरों से
हंसी ठिठोली,
बातें अनवरत होती थीं,
सवालों से

गणित की अबूझी दुनिया,
रहस्मयी लगती थी
,
मन कोसों घूम कर आ जाता था
छोटे से शहर
में भी मेरी आँखों में,
दुनिया,
पिता की किताबें
,
एक गलियारा

थी,
मेरी उम्मीदों को हौसला देती
,
उजास-सी हंसी मेरी,
उन्मादों से भरी

रोमांच था
हर क्षण,
संगति संगीत की लहरों से
,
सामंजस्य बैठाती
,
जीवन के पड़ावों में,
आज मैं कटती
अपनी रहस्मयी तिलस्मी दुनिया से
,
धरातल पर तैरती,
पनीली मेरी आँखें
निहारती हैं आईना,
कोई गलियारा
शायद खुला छोड़ा है,
मेरी अल्हरता ने

हवाएं आ रही हैं
हलकीहलकी सुगन्धित...
निर्वस्त्र पौरुषता का दंभ
उन गलियों में जाना चाहती हूँ एक बार
उसी तरह,
महक कर मदहोशी में
,
समझने को अंतर

चाहे अनचाहे संबंधों का,
सुलझाना चाहती हूँ,
कई अवांक्षित
, अघटित होती घटनाएं
क्या स्त्रियां निर्वस्त्र समझ पाती होंगी
अंतर देह का
, वैचारिकता का
धकेलती उन सडांध गलियों में
कई औरतें, मर्ज़ी ना-मर्ज़ी
मगर उनका क्या?
जो बेचना चाहती हैं स्कोर के कंडोम,
और पहुचना चाहती हैं,
कई अनजान रास्तों पर,
इतनी कशमकश कि
अंतर ही धूमिल हो जाता है,
उस खुशनुमा-महकती, फूलों वाली गलिओं का
और हर उस छमिया का जो
हाई प्रोफाइल पार्टिओं की शान होती है
मैं नहीं घृणा करती
उन वेश्यांओं से,
मैं शर्मिंदा हूँ
समाज के दोगलेपन पर
उनके बनाए कुंठित दायरों पर
तुमने औरत को ख़रीदा-बेचा,
लज्जित किया...नगर बधु बनाया

लो! उसने लज्जा ही उतार दी
अब कितना लोगे... स्त्री देह के सौंदर्य का मज़ा
उन गलिओं में, फाइव स्टार्स में
मौजूद हैं हम, उतारे सारे कपडे, खड़े निर्वस्त्र
लज्जा बची कहाँ...लज्जित होने को,
निःशब्द, भोग लो,
क्योंकि तुम अब मौन हो,
निरुत्तर
तुमने ही तो
गढा था षड़यंत्र
पहुंचा दिया, कोठे पर, दे दी कई उपाधियाँ
अब तुम्हारी लगाम है
हमारे पास,
क्या करोगे, स्त्री देह के बिना?
तुम सोचो!
कल्पना करो, महकती गलिओं की या
चमचमाते बार्स की
जहाँ तुम भी निर्वस्त्र हो लज्जित
और हम है कामयाब सम्भोगित करने में
,
पौरुषता का दंभ!!

Wednesday, March 27, 2013

कुछ काफ़िर नैन मटकते हों, तब देख बहारें होली की !


प्रिय पाठकों को होली मुबारक़। इस मौक़े पर पेश है नज़ीर अकबराबादी की नज़्म : बीइंग पोएट

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ (चंग) के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।
ख़म शीश-ए-जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की।
        महबूब नशे में छकते हों तब देख बहारें होली की ।।1।।

हो नाच रंगीली परियों का बैठे हों गुलरू रंग भरे।
कुछ भीगी तानें होली की कुछ नाज़ो-अदा के ढंग भरे।
दिल भूले देख बहारों को और कानों में आहंग भरे।
कुछ तबले खड़के रंग भरे कुछ ऐश के दम मुँहचंग भरे।
        कुछ घुँघरू ताल झनकते हों तब देख बहारें होली की ।।2।।

सामान जहाँ तक होता है इस इशरत के मतलूबों का।
वो सब सामान मुहैया हो और बाग़ खिला हो ख़ूबों का।
हर आन शराबें ढलती हों और ठठ हो रंग के डूबों का।
इस ऐश मज़े के आलम में इक ग़ोल खड़ा महबूबों का।
        कपड़ों पर रंग छिड़कते हों तब देख बहारें होली की।।3।।

गुलज़ार खिले हों परियों के, और मजलिस की तैयारी हो।
कपड़ों पर रंग के छीटों से ख़ुशरंग अजब गुलकारी हो।
मुँह लाल, गुलाबी आँखें हों, और हाथों में पिचकारी हो।
उस रंग भरी पिचकारी को, अँगिया पर तककर मारी हो।
        सीनों से रंग ढलकते हों, तब देख बहारें होली की।।4।।

इस रंग रंगीली मजलिस में, वह रंडी नाचने वाली हो।
मुँह जिसका चाँद का टुकड़ा हो औऱ आँख भी मय की प्याली हो।
बदमस्त, बड़ी मतवाली हो, हर आन बजाती ताली हो।
मयनोशी हो बेहोशी हो 'भड़ुए' की मुँह में गाली हो।
        भड़ुए भी भड़ुवा बकते हों, तब देख बहारें होली की।।5।।

और एक तरफ़ दिल लेने को महबूब भवैयों के लड़के।
हर आन घड़ी गत भरते हों कुछ घट-घट के कुछ बढ़-बढ़ के।
कुछ नाज़ जतावें लड़-लड़ के कुछ होली गावें अड़-अड़ के।
कुछ लचकें शोख़ कमर पतली कुछ हाथ चले कुछ तन फ़ड़के।
        कुछ काफ़िर नैन मटकते हों तब देख बहारें होली की।।6।।

यह धूम मची हो होली की और ऐश मज़े का छक्कड़ हो।
उस खींचा-खींच घसीटी पर और भडुए रंडी का फक्कड़ हो।
माजून शराबें, नाच, मज़ा और टिकिया, सुलफ़ा, कक्कड़ हो।
लड़-भिड़के 'नज़ीर' फिर निकला हो कीचड़ में लत्थड़-पत्थड़ हो।
        जब ऐसे ऐश झमकते हों तब देख बहारें होली की।।7।।

Saturday, March 16, 2013

तुम क्यों द्रौपदी की भाषा में बिलख रही हो ?

पंखुरी सिन्हा
कथाकार और कवि पंखुरी सिन्हा (जन्म: 18 जून 1975) हिंदी पाठकों के लिए एक जाना-पहचाना नाम है। पंखुरी की प्रकाशित पुस्तकों में कोई भी दिन और क़िस्सा--कोहिनूर कहानी-संग्रह हैं। ककहरा नामक कविता-संग्रह जल्द ही प्रकाशित होने वाला है। इनकी कविताएँ विभिन्न भाषाओं में अनुदित हो चुकी हैं। कई पुरस्कारों से सम्मानित पंखुरी सिन्हा की दो कविताएँ प्रस्तुत हैं : बीइंग पोएट
रात का सूर्योदय
रात जिसका सूर्योदय न हो,
कहीं नहीं
,
न कोई आखिरी पहर
,
ऐसी स्याह
, काली रात,
दिन पर छाई हुई
,
मैला किए उसे
,
किए उसे गंदूमी
,
कि सूरज गिरफ्त में हो
,
हिरासत में रौशनी
,
वो काम जो मुक़म्मल करना था
,
उसके लिए कोई कल नहीं
,
कोई कल नहीं
,
न आने वाला
,
न होने वाला
,
कहनी थी बात जो उससे
,
कोई कल नहीं उसके लिए
,
संभालनी थी
, अलगनी पर,
किताब जो
,
उसके लिए कोई कल नहीं
,
सवांरने थे जो शब्द किताब में
,
कोई कल नहीं उसके लिए।
धर्मराज को स्वर्ग
धर्मराज को स्वर्ग,
सशरीर
,
युधिष्ठिर को स्वर्ग
,
तुम क्यों द्रौपदी की भाषा में बिलख रही हो
?
प्यार भी द्रौपदी की भाषा में कर रही हो
?
क्यों जोड़ रही हो
,
चाँद और तारों से नाता
?
चाँद और सूरज ने तो बहुतों को छुआ नहीं
,
लेकिन क्या सम्राट भी सबकुछ दांव पर लगाया करते हैं
?
कभी
?
सौ पुत्रों की मौत
?
अपनी भी मौत
?
क्या खेले गए पासे कभी और यों
?
क्या ऐसे भेजे गए चौपड़ के निमंत्रण कभी और
?
क्या लड़ाई की ऐसी रचना की गयी कभी
?
क्या विध्वंस का ऐसा अनुष्ठान
,
ऐसा आह्वान
,
किया गया कभी
?
क्या इश्वर को पुकारा है
,
कभी किसी ने
,
जैसे द्रौपदी ने
?
पांचाली ने
?
अंतरिक्ष सतत है
,
आसमान सनातन
,
अव्यय हैं सूर्य की किरणें
,
अनश्वर चन्द्रमा का प्रकाश
,
पर तुम क्यों जोड़ रही हो नाता
,
परिभाषा से परे
,
किरणों से
,
हिरणों से
?
क्या है यह प्रकृति साधना
,
खुद को प्रतिष्ठित करना
,
चाँद और सूरज की परिधि में
?
किरणों के दायेरे में उनकी
?
बाहर और भीतर
?

Tuesday, March 12, 2013

काग़ज़ का जीवन गल कर बह जाएगा किसी नाली में !

इला जोशी
आज प्रस्तुत हैं इला जोशी (जन्म: 13 जनवरी 1988) की कविताएँ। इला की कविताएँ किसी स्टेशन पर छूटती हुई ट्रेन में बैठे यात्री की हथेली का वह नर्म स्पर्श है, जिसे चाहकर कर भी भुलाया नहीं जा सकता। जहाँ, होंठों पर चुप की मुहर लगा लेना एक मात्र उपाय है। जहाँ, जीवन का बेलिबास अनुभव अपनी ही नंगी आँखों आँसू बनकर ठहर जाता है। ऐसे में, ये कविताएँ सियाह समय की सफ़ेद सतह पर तैरती हुई महसूस होती हैं : बीइंग पोएट
1.
मैं एक पत्थर हूँ—
उस सड़क का,
जो बन रही है नदी के बीच

मैं एक अंकुर हूँ—
जो उग आया है,
आसमान के किसी गड्ढे में

मैं एक भूला हुआ दिन हूँ—
उस रिमझिम बरसात का
,
जो पतझड़ के मौसम में भटक गया

मैं एक जीवन हूँ—
जो उन सबके होने में खो चुका है
जिनके अस्तित्व में कभी नहीं थी मैं!
2.
रंग-बिरंगी वो फटी पतंग
इंतज़ार में थी एक बारिश की
कि धुल जाएँ उसके चटख रंग
जो अब थे बेमतलब, बेकाम, बेकार और बोझ
उसके क्षणभर के जीवन पर...
कागज़ का वो जीवन
झेल न पाया उस तेज़ हवा को
पगली वो पतंग
सोचती है
बारिश से सिर्फ धुलेंगे उसके रंग
भूल बैठी है वो
कागज़ का उसका जीवन 
गल कर बह जाएगा किसी नाली में
या मिल जाएगी वो मिट्टी में
जो हर रोज़ रौंदी जाएगी...
उसके वो चटख रंग नहीं हैं
कोई बोझ, असल बोझ तो है
वो बचा हुआ क्षणभर का जीवन....
3.
वो कहते हैं— 
तुम्हारी उम्र और शरीर दो दशकों का अंतर है...
मानो उम्र ने भी
तुम्हारे जन्म के समय ही
तुम्हारे चेहरे पर दस्तक दे दी…
आंधी के बीचों-बीच
कुछ रेत ठहर कर
बिछ गई आँखों में
काजल की परत-सी
एक ही अनुपात में
एक बराबरी के अहसास से
एक-सा ही दोनों का नम होना...
हाँ वो दोनों,
जिन्हें चूम कर वो आंधी
अपनी निशानी छोड़ 
बढ़ गई आगे
महसूस कर रही थी
बिलकुल एक जैसा...
मगर वो मन,
जिसे न आंधी ने छुआ था,
न ही मिली थी निशानी कोई,
बस गालियाँ ही दे रहा था
मानो कुछ उसका अपना 
लूट कर ले गई थी वो मुई आंधी...
4.
मेरे ज़िंदा होने में उलझे
कुछ मरे हुए दिन
जिनकी गली हुई हड्डियाँ
अक्सर
सफाई में निकल आती हैं...
मांगती हैं वो मुझसे
थोड़ी-सी ताज़ा हवा
कुछ उधार की सांसें
और अपने मरने का हिसाब...
परत-दर-परत
जमी हुई वो ख़ून की परतें
अब बस बिखरी काली स्याही-सी लगती हैं...
और फिर भी मैं हिचकिचाती हूँ हटाने में
वो खींचे हुए परदे
जो इतने सालों में खुद अवशेष बन गए...
वो मरे हुए दिन डराते हैं
मेरे ज़िंदा पलों को
और मैं अपनी बेबसी से सिहर जाती हूँ...
समेट लेती हूँ अपने आज को
आंसू भरी आँखों में
जैसे कल मेरे लबों ने
मेरे आंसुओं को समेट लिया था...
5.
अक्सर अकेले में ढूँढती हूँ
उन छः महीनों का हाल
बस खुद को यकीं दिलाने को
कि हाँ, शायद मैं बचा सकती थी तुम्हें....
खंगालती हूँ अपने दिमाग़ का हर एक कोना
याद करने को उस ताले का नंबर
जिसमें छुपाए तुम्हारी डायरी के कुछ पन्ने
शायद अब भी इंतज़ार करते होंगे मेरा...
तुम्हारी काबिलियत पर कभी भी
शक न था मुझे
तभी तो आज भी हर रोज़
मैं हारती हूँ तुम्हारी बनाई हर पहेली से...
मगर ये हार
उस हार से ज़्यादा बदसूरत नहीं

जो तमाम कोशिशों के बावजूद
तुम्हे ज़िन्दा न रख सकी...
फिर भी तुम्हारा न होना
ज़रूरी है मेरे लिए
क्यूंकि मेरे सुकूं का वजूद
छुपा है उसमे...
सबने मुझे स्वार्थी कहा
और हाँ, मैं हूँ स्वार्थी
क्यूंकि—
तुम्हारी जड़ता की बलि नहीं चढ़ना चाहती थी मैं...
नहीं मानती मैं खुद को ज़िम्मेदार
तुम्हारी तड़प के लिए
तुम्हारे अधूरे सपनों के लिए
तुम्हारी असमय मृत्य के लिए...
तुम्हारे न होने की
न तो ख़ुशी है, न कोई गम
क्यूंकि अगर तुम न जाते
तो शायद ये कविता
मेरे लिए तुम लिख रहे होते...

Thursday, February 14, 2013

मधुरतम आनंद और क्रुरतम दुख है प्रेम !


वेलेंटाइन डे के मौक़े पर पेश है कुछ कथन जो विद्वानों और दार्शनिकों द्वारा कहे गए हैं : बीइंग पोएट
  • प्रेम एक गम्भीर मानसिक रोग है। - प्लेटो
  • प्रेम में प्रत्येक व्यक्ति अंधा होता है। - प्रोर्टियस
  • मधुरतम आनंद और क्रुरतम दुख है प्रेम। - बेली
  • दिमाग़ की अव्वल दर्ज़े की कमजोरी है प्रेम। - ड्राइडेन
  • हमारा पहला और अंतिम प्यार है ख़ुद का प्यार। - बोबी
  • प्रेम ख़ुद मिलता है, इसे ख़रीदा नहीं जा सकता। - लांगफेलो
  • जब किसी ने भी प्यार किया, पहली नज़र में नहीं किया। - मार्लोवे
  • वे कितने ही बुद्धिमान क्यों न हों, प्यार में मूर्ख ही होते हैं। - जोशु कुक
  • यदि आप प्यार पाते हैं तो प्यार और भी प्यारा हो जाता है। - फ्रैंकलिन
  • प्यार चाहना अच्छा है, पर प्यार देना उससे भी अच्छा है। - शेक्सपीयर
  • प्रेमी-प्रेमिका एक साथ होने पर भी नहीं उबते क्योंकि ये सिर्फ़ अपने बारे में बात करते हैं। - लॉ रोचेफोकोल्ड
  • आदमी थोड़ा और बार-बार प्यार करता है, जबकि औरत हद से अधिक पर कभी कभी ही करती है। - बस्ता
  • नीली आँखें कहती हैं- मुझे प्यार करो नहीं तो मर जाऊँगी। काली आँखें कहती हैं- मुझे प्यार करो नहीं तो तुम्हें मार दूँगी। - स्पेनिश कहावत 
  • आदमी का प्रेम प्यार से शुरू हो कर औरत पर समाप्त हो जाता है जबकि औरत का प्रेम आदमी से शुरू हो कर प्यार पर समाप्त होता है। - रेमी डे गौरमेंट
  • यह कहना पूरी ज़िंदगी आप सिर्फ़ एक को प्यार करेंगे। ठीक वैसे ही है जैसे यह कहना कि आपकी पूरी ज़िंदगी तक एक ही मोमबत्ती जलती रहेगी। - टॉलस्टाय
:: कुछ शेर ::
  • इश्क़ मिन्नत-कशे-क़रार नहीं / हुश्न मज़बूरे-इंतज़ार नहीं - फ़ैज़
  • इश्क़ ही इश्क़ है जहाँ देखो / सारे आलम में भर रहा है इश्क़ - मीर
  • इश्क़ मासूक़ इश्क़ आशिक़ है / यानि अपना ही मुब्तिला है इश्क़ - मीर
  • मरहले तय इश्क़ के अकसर हुए / मंज़िल-ए-दुश्वार बाक़ी रह गयी - दाग़
  • मज़े इश्क़ के बस वही जानते हैं / कि जो मौत को ज़िंदगी जानते हैं - दाग़
  • इश्क़ मुझको नहीं वहशत ही सही / मेरी वहशत तेरी शोहरत ही सही - ग़ालिब
  • इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया / वर्ना हम भी आदमी थे काम के - ग़ालिब
  • रोने से और इश्क़ में बेबाक़ हो गये / धोये गये हम ऐसे कि बस पाक हो गये - ग़ालिब
  • इश्क़ हसरत को है ग़ज़ल के सिवा / न कसीदे, न मसनबी की हवस - हसरत जयपूरी
  • सीने में दाग़े-इश्क़ को रहने दे यारा साज़ / शायद वे बादे-मर्ग चिराग़े-मज़ार हो - जफ़र
  • इस इश्क़-ए-ख़ास को हर एक से छुपाए हुए / गुज़र गया ज़माना गये लगाये हुए - फ़ैज़
  • इश्क़ पर जोर नहीं है ये वो आतिश ग़ालिब / कि लगाये न लगे और बुझाये न बुझे - ग़ालिब
  • इश्क़ ही अपना रहबर है इश्क़ ही है रहनुमा / ऐ जफ़र हाजत किसी की रहनुमाई की नहीं - जफ़र
  • तुम्हारे इश्क़ में हम ऐ बुतो क्या-क्या न रखते हैं / जिगर सदचाक रखते हैं, दिले-दीवाना रखते है - जफ़र 
  • हज़ारों इश्क़ में ऐ हज़रते-दिल रंजो-ग़म पहुँचे / पर अफसोस अपने मकसद के न तुम पहुँचे न हम पहुँचे - जफ़र

Wednesday, January 16, 2013

अशोक वाजपेयी की जन्मतिथि !

अशोक वाजपेयी
आज मेरे पसंदीदा और हिंदी के वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी (जन्म : 16 जनवरी 1941) की जन्मतिथि है। अशेष शुभकामनाओं सहित इस अवसर पर प्रस्तुत हैं कुछ कविताएँ : बीइंग पोएट 
पहला चुंबन
एक जीवित पत्थर की दो पत्तियाँ
रक्ताभ, उत्सुक
काँपकर जुड़ गई
मैंने देखा:
मैं फूल खिला सकता हूँ।
प्रतीक्षा
प्रतीक्षा धूप में चिड़ियों का स्पन्दन है,
हरी पत्तियों का नीरव उजला गान है,
प्रतीक्षा
दरवाज़े पर दस्तक के अनसुने रहने पर
छोड़े गए शब्द हैं-
रचना
कुछ प्रेम
कुछ प्रतीक्षा
कुछ कामना से
रची गई है वह,
हाड़माँस से तो
बनी थी बहुत पहले।
सिर्फ़ शब्दों से नहीं
सिर्फ़ शब्दों से नहीं,
बिना छुए उसे छूकर,
बिना चूमे उसे चूमकर
बिना घेरे उसे बाँहों में घेरकर,
दूर से उसे पँखुरी-पँखुरी खोलते हुए
बिना देखे उसे दृश्य करते हुए
मैंने उससे कहा।
प्रेम के लिए जगह
उसने अपने प्रेम के लिए जगह बनाई
बुहार कर अलग कर दिया तारों को
सूर्य-चन्द्रमा को रख दिया एक तरफ़
वनलताओं को हटाया
उसने पृथ्वी को झाड़ा-पोंछा
और आकाश की तहें ठीक कीं
उसने अपने प्रेम के लिए जगह बनाई
उससे पूछो
हवा से नहीं, उससे पूछो:
वह शब्दों से अब तक अदृश्य क्यों रही?
शब्दों से नहीं, उससे जानो:
वह शब्दों की पकड़ में क्यों नहीं आती?
मौन से नहीं, उससे पता करो:
उसका ठिकाना आवाज़ों से दूर
कितना दूर और कहाँ है?
टोकनी
यकायक पता चला कि टोकनी नहीं है
पहले होती थी
जिसमें कई दुख और
हरी-भरी सब्ज़ियाँ रखा करते थे
अब नहीं है...
दुख रखने की जगहें
धीरे-धीरे कम हो रही हैं।
पत्ती
जितना भर हो सकती थी
उतना भर हो गई पत्ती
उससे अधिक हो पाना उसके बस में न था
न ही वृक्ष के बस में
जितना काँपी वह पत्ती
उससे अधिक काँप सकती थी
यह उसके बस में था
होने और काँपने के बीच
हिलगी हुई वह एक पत्ती थी
युवा जंगल
एक युवा जंगल मुझे,
अपनी हरी पत्तियों से बुलाता है।
मेरी शिराओं में हरा रक्त बहने लगा है
आँखों में हरी परछाइयाँ फिसलती हैं
कंधों पर एक हरा आकाश ठहरा है
होंठ मेरे एक हरे गान में काँपते हैं:
मैं नहीं हूँ और कुछ
बस एक हरा पेड़ हूँ
हरी पत्तियों की एक दीप्त रचना!
ओ युवा जंगल
बुलाते हो
आता हूँ
एक हरे बसंत में डूबा हुआ
आऽताऽ हूं...।
छाता
छाते से बाहर ढेर सारी धूप थी
छाता-भर धूप सिर पर आने से रुक गई थी
तेज़ हवा को छाता
अपने-भर रोक पाता था
बारिश में इतने सारे छाते थे
कि लगता था कि लोग घर बैठे हैं
और छाते ही सड़क पर चल रहे हैं
अगर धूप, तेज़ हवा और बारिश न हो
तो किसी को याद नहीं रहता
कि छाते कहाँ दुबके पड़े हैं
जूते
जूते वहीं थे
उनमें पैर नहीं थे
बीच-बीच में उनमें फफूंद लग जाता था
क्योंकि कोई पहनता नहीं था
निरुपयोग से वे कुछ सख़्त भी पड़ गए थे,
उनके तलों में धूल या कीचड़ नहीं लगा था
उन्हें कोई हटाता नहीं था
क्योंकि वे दिवंगत पिता के थे
फिर एक दिन वो बिला गए,
शायद अँधेरे में मौक़ा पाकर
वे ख़ुद ही अंत की ओर चले गए
अधपके अमरूद की तरह पृथ्वी
खरगोश अँधेरे में
धीरे-धीरे कुतर रहे हैं पृथ्वी।
पृथ्वी को ढोकर
धीरे-धीरे ले जा रही हैं चींटियाँ।
अपने डंक पर साधे हुए पृथ्वी को
आगे बढ़ते जा रहे हैं बिच्छू।
एक अधपके अमरूद की तरह
तोड़कर पृथ्वी को
हाथ में लिये है
मेरी बेटी।
अँधेरे और उजाले में
सदियों से
अपना ठौर खोज रही है पृथ्वी
कोई नहीं सुनता
कोई नहीं सुनता पुकार--
सुनती है कान खड़े कर
सीढियों पर चौकन्नी खड़ी बिल्ली,
जिसे ठीक से पता नहीं कि
डर कर भाग जाना चाहिए या
ठिठककर एकटक उस ओर देखना चाहिए।
कोई नहीं सुनता चीख़--
सुनती है खिड़की के बाहर
हरियाये पेड़ पर अचानक आ गई नीली चिड़िया,
जिसे पता नहीं कि यह चीख़ है
या कि आवाज़ों के तुमुल में से एक और आवाज़।
कोई नहीं सुनता प्रार्थना--
सुनती है अपने पालने में लेटी दुधमुंही बच्ची,
जो आदिम अंधेरे से निकलकर उजाले में आने पर
इतनी भौंचक है
कि उसके लिए अभी आवाज़
होने, न होने के बीच का सुनसान है।
गाढे अंधेरे में
इस गाढे अंधेरे में
यों तो हाथ को हाथ नहीं सूझता
लेकिन साफ़-साफ़ नज़र आता है:
हत्यारों का बढता हुआ हुजूम,
उनकी ख़ूंख़्वार आंखें,
उसके तेज़ धारदार हथियार,
उनकी भड़कीली पोशाकें
मारने-नष्ट करने का उनका चमकीला उत्साह,
उनके सधे-सोचे-समझे क़दम।
हमारे पास अंधेरे को भेदने की कोई हिकमत नहीं है
और न हमारी आंखों को अंधेरे में देखने का कोई वरदान मिला है।
फिर भी हमको यह सब साफ़ नज़र आ रहा है।
यह अजब अंधेरा है
जिसमें सब कुछ साफ़ दिखाई दे रहा है
जैसे नीमरोशनी में कोई नाटक के दृश्य।
हमारे पास न तो आत्मा का प्रकाश है
और न ही अंतःकरण का कोई आलोक :
यह हमारा विचित्र समय है
जो बिना किसी रोशनी की उम्मीद के
हमें गाढे अंधेरे में गुम भी कर रहा है
और साथ ही उसमें जो हो रहा है
वह दिखा रहा है:
क्या कभी-कभार कोई अंधेरा समय रोशनी भी होता है?

Tuesday, January 01, 2013

उदय प्रकाश की जन्मतिथि !

उदय प्रकाश
आप सब को नया साल बहुत मुबारक़ हो। आज मेरे प्रिय कवि-कथाकार और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित उदय प्रकाश की जन्मतिथि (जन्म : 01 जनवरी 1951) है। कथाकार के रूप में अधिक प्रसिद्धि पाने वाले उदय प्रकाश मूलत: कवि हैं। उदय जी को ख़ूब सारी शुभकामनाओं सहित इस अवसर पर प्रस्तुत हैं कुछ छोटी कविताएँ : बीइंग पोएट
पत्थर
इस पत्थर के भीतर
एक देवता ज़रूर है
उस देवता के मंत्र से
यह पत्थर है
जैसे हम सब
पत्थर हैं किसी देवता के मंत्र से।  
व्यवस्था
दोस्त चिट्ठी में
लिखता है--
'मैं सकुशल हूँ।'
मैं लिखता हूँ--
'मैं सकुशल हूँ।'
दोनों आश्चर्यचकित हैं।
खेल
जो लड़का
सिपाही बना था
उससे दूसरे लड़के ने
अकड़कर कहा--
'अबे राजा की पूँछ के बाल
मैं चोर नहीं हूँ'
और खेल
बिगड़ गया।
गांधीजी
गांधी जी
कहते थे--
'अहिंसा'
और डंडा लेकर
पैदल घूमते थे।
वसंत
रेल गाड़ी आती है
और बिना रुके
चली जाती है।
जंगल में
पलाश का एक गार्ड
लाल झंडियाँ
दिखाता रह जाता है।
पिंजड़ा
चिड़िया
पिंजड़े में नहीं है।
पिंजड़ा गुस्से में है
आकाश ख़ुश।
आकाश की ख़ुशी में
नन्हीं-सी चिड़िया
उड़ना सीखती है।
कुतुबमीनार की ऊँचाई
कुतबुद्दीन ऎबक को
अब ऊपर से
नीचे देख पाने के लिए
चश्मे की ज़रूरत पड़ती
इतनी ऊँचाई से गिर कर
चश्मा
टूट जाता।
रात
इतने घुप्प अंधेरे में
एक पीली पतंग
धीरे-धीरे
आकाश में चढ़ रही है।
किसी बच्चे की नींद में है
उसकी गड़ेरी
किसी माँ की लोरियों से
निकलती है डोर!
मारना
आदमी
मरने के बाद
कुछ नहीं सोचता।
आदमी
मरने के बाद
कुछ नहीं बोलता।
कुछ नहीं सोचने
और कुछ नहीं बोलने पर
आदमी
मर जाता है।
रंगा-बिल्ला
एक था रंगा
एक था बिल्ला
दोनों भाई-भाई नहीं थे
लेकिन दोनों को फाँसी हो गयी।
एक थे टाटा
एक है बिरला
दोनों भाई-भाई हैं
लेकिन दोनों को फाँसी नहीं हुई।
क़ैदी
वे तीन थे
और जैसे किसी जेल में थे
भीतर थी एक संकरी-सी कोठरी
जिसके भीतर सिर्फ़ उनका ही संकरा-सा जीवन
और उनकी ही थोड़ी-सी साँसे थीं
एक संतरी की तरह टहलता था
दूसरा वार्डेन की तरह देता था हिदायतें
कविता के सख़्त क़ायदों के बारे में
तीसरे को
दोनों ऎसे देखते थे
जैसे देखा जाता है कोई क़ैदी।
शरारत
छत पर बच्चा
अपनी माँ के साथ आता है।
पहाड़ों की ओर वह
अपनी नन्हीं उंगली दिखाता है।
पहाड़ आँख बचा कर
हल्के-से पीछे हट जाते हैं 
माँ देख नहीं पाती।
बच्चा 
देख लेता है।
वह ताली पीटकर उछलता है
--देखा माँदेखा
उधर अभी
सुबह हो जाएगी।
झाड़ी
इसी बग़ीचे में किसी पेड़ के पीछे
छुपा बैठा होगा
थानू
मैं पुकारता हूँ
बीस साल की दूरी से
...था ... नू...
उस पेड़ के पीछे झड़ियों के बीच
फँस कर अटका होगा समय
वहाँ अभी तक
थानू छिपा होगा
थानू और मृत्यु के बीच
अभी भी ज़रूर
एक दूरी होगी।
बस में पिता
मैंने बिल्कुल साफ़-साफ़ देखा
उस बस पर बैठे
कहीं जा रहे थे पिता
उनके सफ़ेद गाल, तम्बाकू भरा उनका मुँह
किसी को न पहचानती उनकी आँखें
उस बस को रोको
जो अदृश्य हो जाएगी अभी
उस बस तक
क्या
पहुँच सकती है
मेरी आवाज़?
उस बस पर बैठ कर
इस तरह क्यों चले गए पिता?
दिल्ली
समुद्र के किनारे
अकेले नारियल के पेड़ की तरह है
एक अकेला आदमी इस शहर में।
समुद्र के ऊपर उड़ती
एक अकेली चिड़िया का कंठ है
एक अकेले आदमी की आवाज़
कितनी बड़ी-बड़ी इमारतें हैं दिल्ली में
असंख्य जगमग जहाज
डगमगाते हैं चारों ओर रात भर
कहाँ जा रहे होंगे इनमें बैठे तिज़ारती
कितने जवाहरात लदे होंगे इन जहाजों में
कितने ग़ुलाम
अपनी पिघलती चरबी की ऊष्मा में
पतवारों पर थक कर सो गए होगे।
ओनासिस! ओनासिस!
यहाँ तुम्हारी नगरी में
फिर से है एक अकेला आदमी।