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Wednesday, February 27, 2013

आख़िर क्यों दो नीली आँखें अनंत चीज़ें हो जाती हैं !

जेनिफर रीसर
अपने पहले कविता-संग्रह के लिए वर्ड प्रेसपुरस्कार से सम्मानित जेनिफर रीसर (जन्म : 1968, लुइसियाना) अमेरिकी कवयित्री और लेखिका हैं। जेनिफर की कविताओं में एक बेचैन मुहावरा नई अभिव्यक्ति के साथ प्रकट होता है। जेनिफर अपने में एक जंगल समेटे बारिश की प्रतीक्षा करती हुई रचनाकार हैं। जब बारिश आती है, तो स्मृतियों के सारे टाँके खुल जाते हैं। फैलता हुआ जंगल समंदर की ओर बढ़ने लगता है। फिर समंदर में एक सिहरन पैदा होती है। यही सिहरन कविता में मूल ध्वनि बनकर उभरती है, जिसे शब्दों की सुगबुगाहट के बीच महसूस किया जा सकता है। प्रस्तुत हैं जेनिफर रीसर की कुछ कविताएँ : बीइंग पोएट 
स्मारिका
कई सुबहों की नींद मेरे आसूँओं में खुलती है
जागता हूँ एक स्वप्न से
स्वप्न
, जिसमें मैं उसकी कब्र पर रो रहा होता हूँ
लेकिन वह हमेशा वहाँ थी
, सुरक्षित और मजबूत
पाउडर या ओरिएंटल मसाले के साथ सुगंधित
सही शब्द और एक ठंडे आराम के साथ

केवल प्यार
, जो मैंने हमेशा बहुत समय तक किया।
बिछुड़ने का ढंग
उन्होंने मुझसे कहा—
उसे हमारे बिछुड़ने का ढंग सिखाना था
कि विदाई एक लंबी चुप्पी के साथ होती है
,
तब कॉफी का भाप हवा के खिलाफ उड़ने दो।
उसे देखना ही रोज़गार था लेकिन

आख़िर क्यों दो नीली आँखें अनंत चीज़ें हो जाती हैं
,
और विभिन्नताएँ मतभेद को जन्म देती हैं
?
शहर हमारे चमकीले इतिहास से नामालूम लगता है
उसकी तुलना में मुझे ज़्यादा पता है
शोकगीत जो अपने पंखों में इंतजार करता है
;
लेकिन
, आधी रात के बाद
शब्द और प्रेम बाँटते हैं अपनी उदारता
तनाव मुक्त रहने के लिए
और छतों पर चमकते हुए
मध्यम
जलते हुए स्ट्रीटलैम्प रास्तों पर भटकने से बचाते हैं
जब तक कि उसकी रोशनी उसे दृष्टि नहीं दे देती।
संदेहयुक्त प्रेम को परखने के लिए...
अपने संदेहयुक्त प्रेम को परखने के लिए, मैं खूब रोई,
और निराशा के आनंद से झन्ना उठी
,
अतीत के अपमान में उल्लसित हुई
,
फिर बालों के बीच उगते सबसे नए सफ़ेद बाल को छुआ
,
अंततः तुम्हारे तिरस्कृत दिनों के साथ ख़ुश मिली
,
जितना उनके बस में था
, उन्होंने मेरा ध्यान रखा
कई-कई तरीकों से जो वे कर सकते थे
मैं सपनाती हूँ कि तुम मेरे लिए मर भी सकते हो
, चोट खा सकते हो
तुम्हारी चुप्पी मुझे घाव नहीं देगी
,
और घृणा के शब्द तुम प्रयोग नहीं करोगे
मधुमक्खियों और पक्षियों से बचाओगे
,
जब तक कि तुम कह नहीं देते
मैं संतुष्ट हूँ,
मेरी परिस्थिति में एक रंग खोजने के लिए
जो कुछ-कुछ प्रतिशोध की मिठास की तरह हो।
एक दोस्त के लिए जो ख़ामोश हो गया
मैं नहीं जान सकती कि कौन-सी वजह
तुम्हें ख़ामोश रहने के लिए उकसाती है
लेकिन जब मैं डाकिया के आने का इंतज़ार करती हूँ
मुझे याद आती है तुम्हारी हँसी
जो पुराने नए ऑरलियन्स के संस्कार में है
,
एक रेशमी रवैया के पूरक के रूप में
जिसने मुझे उस दिन तुम्हें दोस्त कहने पर मजबूर किया।
वियुक्स कैरे के साथ एक खुली हुई दुकान में
जो मुझे एक तरल उदारता में बाँधे हुए है
तुम वहाँ आए
, एक काले और मोती जड़े पोशाक को 
नए ढंग से बनवाने के लिए
वहाँ कोई अंगूठी नहीं थी
जो एक-तिहाई हवा के साथ उड़ जाती
पत्थरी बटन ठहरे थे
जैसे तुम्हारे पदचाप का आभास हो गया था
और फिर
, जैसा कि अब कोई पक्षी गाने के लिए नहीं है
जैसे यह प्रेम की परकाष्ठा थी जो मैंने एक दोस्त से सुनी थी।
मैक्सिम के लिए गाथा
मैंने सपने में उसे मरते हुए, जहां उसके सभी छोटे अंगों ने
एक खिड़की के निकट ही आत्मसमर्पण कर दिया
युद्ध के लिए जिसे मैंने न तो प्यार किया नहीं नाम जाना

उन लोरी और भजन से बहुत दूर रखा
मैंने उसे एक आख़िरी बार प्रतिज्ञा में गाना चाहा
,
वह दूरी
, अपने आप में, स्वप्न में बदल गया।
उसके चेहरे और मासूमियत को छूना
मेरी आत्मा की आवश्यकता बन गई
, मेरी एकमात्र सनक,
तबतक
, जबतक कि वह पहुंच के दूसरे किनारे पर खुल नहीं गया 
अपने सिसकने से मैं शर्मिंदा और शोक से भर उठा
उससे भी बढ़कर एक वैश्विक योजना में
,
वह एक छोटी-सी जगह के लिए तड़पा जहाँ मरना था।
लेकिन ज्यादातर लड़ाई के बाद
, यह प्रतीत हुआ
किसी ने उसे नहीं देखा और न कोई उसके लिए रोया।
मैं फिर अनंतकाल को मनन करती रही हूँ
जब तक मैं एक छोटी-सी बच्ची थी,
रात में अपने बिस्तर पर एक चुप्पीपन रखती थी
देखने के जिद्द में
अनंत काल के दूरतम निशानों को
जब तक मेरे दिमाग़ में
दिन पर दिनों का अम्बार नहीं लग जाता
प्रत्येक क्षण एक-दूसरे पर चढ़ जाता
मेरे भीतर एक लकवा-सा डर समा जाता
मैं उन बेसब्र विचारों को उलटती-पलटती रहती
जानते
(समय में) हुए कि ये हमेशा नहीं रह सकते।
उन पलों के बाहर प्रतिमान तलाशते हुए,
मैं हमेशा घंटों तक लगातार सोचने के लिए मजबूर थी
जैसे बच्चे अपनी ग़लतियों के लिए प्रायश्चित नहीं करते
आत्मविश्लेषण के लिए
सॉरी से ज़्यादा नहीं,
फिर सोने के लिए
बिस्तर के बगल में जलती मोमबत्ती बंद करती
,
इस भरोसे के साथ कि इसके प्रकाश की अनुपस्थिति बनी रहेगी।
नीचे उतरना
दिन, कुमुदनी को घेरे रहता है
और उसके पेड़ों के छालों को धागे में गूँथकर
सुबह का डोला बर्फ के बीच से निकलता है
अंगूँर की पतली और ताज़ा बेलों पर
जैसे मैं तुम्हें छूती हूँ घुटनों पर किसी और समय में जागते हुए 
जब ओस की बूँद हवाओं के साथ बहती है।
जीवन का पता देता यह मुलायम चांदी जैसी जोड़
हमारे दशकों के झुकाव में अब आसानी से मुड़ जाता है
और अगर मैं एक बार फिर अकेली हुई
,
मैं तुम्हें चुनना पसंद करूँगी
जहाँ शाम और वादा एक दूसरे से मिलते हैं
जहां आत्मशक्ति मजबूत और प्रत्यक्ष हो जाती है।
मैंने तुम्हें देखा है, चुप्पी के सियाह दिल में,
जीवित चाकुओं के धार से तुम्हारे हाथ मुक्त है
चाहती हूँ कि मासूमियत हमेशा झाड़ती रहे
तुम्हारे उत्तल जीवन की अभिव्यक्तियों के खिलाफ
,
तनाव और संघर्ष को कम करने के लिए।
मैंने देखा है तुम्हारी सोती हुई आँखों को,
ऐसा लगा जैसे मुलायम पलकें
मेरी उंगलियों को आकर्षित कर रही हैं
,
परिदृश्य की धुँधली छाया को जानने के लिए
,
उनकी नीली झपकियों और सिकुड़ती हुई दृष्टि
जैसे सपना बढ़ता है।
मैंने मूक विचारों की शून्यता में कामना की है,
कि समय का स्नान दुःख को माँज दे
,
उम्मीद है पलों में बहता पानी खरीद ले
हमें एक साथ धो दे एक आने वाले शुद्ध कल में

ताकि हम ख़ुशी खरीद सकें न कि उधार लें

साफ चिंताओं
, पट्टियों को लगातार खंगाल सके,
क्षणभंगुरता से एक साधारण दिन की ओर।
मेरा विचार एक उघड़ते हुए सीवन से अधिक कुछ नहीं है,
लेकिन इस पल की झपकी के बावजूद
एक ज़िद्दी सूरज और रोशनी रखता है।

Tuesday, December 04, 2012

राइनेर मारिया रिल्के की जन्मतिथि !

राइनेर मारिया रिल्के
आज जर्मन कवि राइनेर मारिया रिल्के (4 दिसंबर 1875 - 29 दिसंबर 1926) की जन्मतिथि है। आधुनिक यूरोप के साहित्य को अपने संवेदनात्मक भाषा और शिल्प से प्रभावित करने वाले रिल्के की काव्य शैली गीतात्मक और भावबोध में रहस्योन्मुखता है। उनके जन्मदिन के मौक़े पर पेश हैं दो कविताएँ, जिसका अनुवाद क्रमश: रामधारी सिंह दिनकर और धर्मवीर भारती ने किया है : बीइंग पोएट
काढ़ लो दोनों नयन मेरे
काढ़ लो दोनों नयन मेरे,
तुम्हारी ओर अपलक देखना तब भी न छोड़ूँगा।
तुम्हारे पाँव की आहट इसी सुख से सुनूँगा,
श्रवण के द्वार चाहे बंद कर दो।
चरण भी छीन लो यदि;
तुम्हारी ओर यों ही रात-दिन चलता रहूँगा।
कथा अपनी तुम्हारे सामने कहा न छोड़ूँगा,
भले ही काट दो तुम जीभ
, मुझको मूक कर दो।
भुजाएँ तोड़ कर मेरी भले निर्भुज बना दो,
तुम्हें आलिंगनों के पाश में बाँधे रहूँगा।
हृदय यदि छीन लोगे,
उठेंगी धड़कनें कुछ और होकर तीव्र मानस में।
जला कर आग यदि मस्तिष्क को भी क्षार कर दोगे,
रूधिर की वीचियों पर मैं तुम्हें ढोला फिरूँगा।        
मेरे बिना तुम प्रभु
जब मेरा अस्तित्व न रहेगा, प्रभु, तब तुम क्या करोगे?
जब मैं– तुम्हारा जलपात्र
, टूटकर बिखर जाऊँगा?
जब मैं तुम्हारी मदिरा सूख जाऊँगा या स्वादहीन हो जाऊँगा
?
मैं तुम्हारा वेश हूँ, तुम्हारी वृत्ति हूँ
मुझे खोकर तुम अपना अर्थ खो बैठोगे
?
मेरे बिना तुम गृहहीन निर्वासित होगे, स्वागत-विहीन
मैं तुम्हारी पादुका हूँ
, मेरे बिना तुम्हारे
चरणों में छाले पड़ जाएँगे
, वे भटकेंगे लहूलुहान!
तुम्हारा शानदार लबादा गिर जायेगा
तुम्हारी कृपादृष्टि जो कभी मेरे कपोलों की
नर्म शय्या पर विश्राम करती थी
निराश होकर वह सुख खोजेगी
जो मैं उसे देता था–
दूर चट्टानों की ठंडी गोद में
सूर्यास्त के रंगों में घुलने का सुख
प्रभु, प्रभु मुझे आशंका होती है
मेरे बिना तुम क्या करोगे
?
       

Sunday, November 18, 2012

फिलिपिनो कवि संतिअगो विल्लाफनिया की कविताएँ


हाल में बोधि प्रकाशन से फिलिपिनो कवि संतिअगो विल्लाफनिया का एक कविता-संग्रह आया है प्रेमांजलि। कविताओं का हिंदी अनुवाद किया है विजया कांडपाल ने। उसी पुस्तक से प्रस्तुत हैं कुछ कविताएँ : बीइंग पोएट
एक विद्रोही कवि के लिए
तुमने स्याही से लिखा एक कटु जीवन
कागज़ लहूलुहान हुआ, जला तुम्हारे रक्त से
और समस्त आँसू बह गए।
अपनी रिक्त आँखों से तुमने अच्छे दिनों की कामना की होगी
लड़ते हुए अदृश्य हो।
सुना मैंने प्रेरक देवियों का रुदन
जब मृत्यु तुम्हें ले गई सौ-सौ बार
गोलियों ने भेदा तुम्हारा मुँह
और रक्त की अंतिम बूँद रंग गई ज़मीन
तुम्हारी आखरी कविता के साथ।
नदी का अंतिम गीत
सुना उस रात मैंने
नदी का अंतिम गीत
नाम रहित प्रेमियों की आहें
चुराती एक क्षण
जैसे अनंत काल तक।
एक मुसाफिर पक्षी का
शोक-नाद
विराम चिन्ह लगाता
रात की शांति में।
प्रतीक्षित था मैं
दिन के उठने के लिए
महसूस करता धरा की
धडकनें
और आकाश गंगा का स्पंदन।
एटलस की एक ऊँगली ने
शुरू किए कम्पन
और नदी में सुनामी के
पंख फड़फड़ाने लगे।
मृत्यु आई निरर्थक
बिना चेतावनी के
उनकी ओर, जिन्होंने सुने
स्तोत्र 
अचेतन में।
उस रात
मैंने सुना नदी का अंतिम गीत
जाने वालो का शोकनाद।
सिसीफस के पुत्र
हम पीड़ित हैं
नैसर्गिक प्रेम के लिए,
प्रेम, मनुष्य का मनुष्य के लिए
जो जोड़ता है मानवताओं को।
हम वो श्रमिक हैं, जो
श्रम करते हैं, इस कुपोषित धरती को
प्रचुर बनाने के लिए,
परिवर्तित करते हैं इस प्रचुरता को मृत्युहीन सुगंध में
खेतों में आवाजें हैं और भूतहा पैर किसानों के
गिरे हुए पीली घास की तरह भूमि के वक्ष पर।
वो आये और बहाया पसीना
खौलते सूर्य के तले
जीवन जिए अपने, उन्होंने
और खोजा जो खोजा जाना था।
वे सब अब मात्र आवाजें हैं
हवाओं से मेल-जोल बढ़ाती
उनके अपने जो पीछे आते हैं
ठोस हृदयों को नर्म करते
उनका जो अपना पौरुष करते हैं, बर्बाद
बंजर धरती पर।
वो अनजान हैं, कवि नहीं,
वे कविता नहीं करते
बस रोज़मर्रा का परिश्रम
वे अचिंतित, जीते हैं बस एक क्षण के लिए।
बस रात को रुकते हैं, सुबह फिर
धकेलते पत्थर
जैसे ही सूर्य चढ़ता है अपनी प्राचीन चट्टानों पर।
रजनीगंधा
तुम्हारी आँखें
निम्न बनातीं सुबह के सूर्य को
प्रज्वल्लित है तुम्हारी मुस्कान अब तक मेरे हृदय में,
तुम्हारा सौंदर्य, हक़दार एक नाम का,
पर मैं तुम्हें क्या दूं?
सिवाय एक गीत के
गीत, जो गा सके मेरे प्रेम को
विश्व के पुनर्निर्मित होने तक
ये रात शांत है, प्रेयसी
और समय जा रहा है धीरे-धीरे
ओस से चुम्बित शाम की हवा की साँसे हल्की हो रही हैं
बेहद मीठा है यह सपना
के जागना है मुझे तुम्हारे लिए
तुम्हारा कोमल, सजीला चेहरा
हमेशा स्पर्शित मेरे प्रेम से
देखकर इसी चेहरे को
दफ़न ग़म विदा लेता है
रात की ख़ामोशी में
हमेशा याद आते हैं मुझे, तुम्हें भाने वाले
मेरे प्रेम-स्पर्श
तुम्हारी याद है मेरे साथ
मेरे कफ़न तक, प्रेयसी
बेपरवाह
मैं बदमाश हूँ
ढूंढो मुझे झुग्गियों में पयाटास की
या फिर लोकल ट्रेन के भीतर
दफना दो मुझे चीथड़ों में
या फिर कागज के कम्बलों में रात को
जब में स्वप्न देखता हूँ एक घर का
अपना कहने के लिए
तैरता हूँ मैं दूषित नदियों में
मनुष्यों के द्वारा गन्दी की गयी
जिनकी आत्माएं पासिंग नदी से भी काली हो गयी हैं
चलता हूँ मैं मनीला की गलियो की
सघन हवा में
धुआं डकारती गाड़ियों से
चट्टानों सी ऊंची
इकठ्ठा करता हूँ गन्दगी
शहर की
शहर जो औजीयां अस्तबलों से भी गन्दा है
बारिश के दिनों में
दिन की रौशनी में यूँ ही चलते हुए
मालों में
देखता हूँ गनिकाएं व्यापार करती देह का
चंद पैसों के लिए
आह!
यह क्या भविष्य देखता हूँ मैं

Monday, October 08, 2012

हंगरियन कवि बलाज्स अत्तिला की कविताएँ !

Balázs F. Attila
आज हंगरियन कवि बलाज्स अत्तिला की कविताएँ। अनुवाद किया है युवा कवि-पत्रकार विजया कांडपाल ने : बीइंग पोएट
तुम्हारी याद
तुम्हारी याद, भीतर मेरे
और इसी निरीहता में मैं बुनता दुःख की आधी मौजेक
कवि शैतान होते हैं
बचाए रखना अपनी खूबसूरती उनसे
मैं चूमता धुंए को
इससे पहले के वो खो जाये आसमान की हथेली पर
क्यूंकि सुबह की ओंस को ही बताऊंगा मैं तुम्हारे राज़
मौत का सम्बन्धी
न मैं मुर्दा हूँ
न जिंदा
सीखता हूँ मैं ज़मीन की जुबां
बागी बनने के लिए
मुझे मरना चाहिए बार-बार
भले ही मौत मर जाये मेरे साथ
खाब है यह मेरा के बनूँ मैं मौत का सम्बन्धी
पर अभी वक़्त नहीं आया इसका प्रिय!
इस दुनियाँ में जो खुद को देती है
सूली पर चढ़ा
मौत के लिए
ग्रीष्म
ग्रीष्म तुम्हारे दरवाज़े पर पुता सा
गर्म करता तुम्हारी सीढ़ियों को
जैसे की वो यही चाहता है
वो ढूंढता चाबियाँ
खराब करता इवी की डालियाँ
झुकता
झांकता
देखने के लिए
के क्या तुम खोलोगी दरवाज़ा?
तो झोंक देगा वो आँखों में धुल तुम्हारी
और अगर तुम फलों के स्वाद से भूख मिटाओगी
तो  चुरा लोगी इसकी छाया
और आराम पाओगी इसके बिस्तर पर
अपने बिस्तर सा
परदे के पीछे
कोई नहीं कहता के
नहीं है उसका कोई
वो खोता हुआ बड़ी सी दुनियाँ में
पिर्घलता हुआ झुकते से आसमान में
काँपता सा ख़त मालगाड़ी में बैठा लिखा हुआ
एक संकेत है उस आदमी के इतिहास का
एक खोया सुराग
पर क्या यह सच है
या केवल कल्पना की ज़मीन?
पुरानी सजावटों पर तुड़ा मुड़ा सा वह चेहरा था उस मेज़ पर
जहाँ हमने खाया था अजनबियों की तरह
जहाँ मौत की जवानी ढूंढ़ रही थी अपनी ज़िन्दगी
और जब नहीं ढूंढ़ पाती
अनाथ सी रहती खड़ी
पर जीवित हैं उसके माता- पिता
जो चीज़ हमें दिखा सकती है
नहीं मर रही
और केवल मौत है जो जी जा सकती है
पर क्या इसके संकेत रोक दिए गए हैं?
क्या हम सोचें के
घूमती है दुनिया इसी के इर्द गिर्द
कुछ खोया-सा
मेरा जीवन कुछ खो रहा है
एक प्रेम कहानी का उदाहरण देने के लिए
(शायद इसे मुझे बड़े अक्षरों में लिखना चाहिए था)
समीप उसके शायद मैंने जिया होता जीवन अपना
जैसे कोई युवा अपने सपनों में करता है
और जैसा एक बूढ़े की यादों में ही संभव है
जिस तरह एक पियक्कड़ को खदेड़ दिया जाता है,
वैसे ही कल्पनाएँ हैं खदेड़ी जातीं
एक दिन आएगा जब लौटूंगा मैं
चमकता चेहरा लिए
पुरानी प्रवृति लिए
एक दिन आएगा जब शापित मैं
दुनिया पर खड़ा
तोडूंगा फूल तुम्हारे लिए
एक खूबसूरत ज़मीन से
और गिनूंगा साथ बैठकर हवाओं की पंखुडियां
एक रात आएगी जब
हम चाँद देखेंगे
भूसे की गंध के साथ
एक पल होगा जब अर्थ खो देंगे शब्द
और फिर भी हम एक दुसरे को समझेंगे
अब हमारा कोई तालमेल नहीं
मृत्यु के गोद लिए बच्चों से
और धुल से
हम सरकते जायेंगे
पृथ्वी की ओर,
जो हमें समा लेगी अपनी बड़ी सी बनावट में|
प्राग
काव्य के मैग्मा पर बहता शहर
तूफान से पहले की सी शांति, उत्साह, स्वर्ग और नरक के बीच की घूमघुमैया,
यहाँ मिलेंगे आपको राजा, संत, मूर्ख, वैज्ञानिक, सन्यासी, शूरवीर, संगीतकार, आज-कल के कवि
सच्चा आरोप असली और नकली का, इतिहास का और पुरानी कहावतों का
रोशनियाँ और पर्छाइयाँ, रोशनियाँ बिना पर्छाइयों के और कुछ अमर पर्छाइयाँ
फूसफुसाहटें  दफ्न ट्राम की आवाज़ों में
पार्क, जो भरते हुए से और खाली होते हुए से अजीब से कानूनों पर
तीखी भीड़, आलसी नदी जैसी
घुमते  आकार, आज़ाद, खुश, ऊट पटांग ज़िन्दगी और आरामों के लिए तैयार
सुन्दर इंग्लिश आदमी खूबसूरत जापानी औरतों के साथ गले लगते गाड़ियों में
उत्तरी क्षेत्र के वृद्द एक उदास दिखावे और आर्थिक सुरक्षा से ढके सुन्दर छतों पर बैठे, चबाते हुए हसीं
कला के खाने लायक नमूने सुन्दर मेजों पर
जवान पर्यटक लादे हुए झोला, होटलों के सामने देखते मेनू
बेपरवाह समलेंगिक, हाथ में सिटी गाइड लिए
बेघर बदकिस्मतों के झुण्ड, बड़ी जेबों मैं बोतलें लिए मांगते भीख में सिगरेट पर्यटकों से
जैसे ही पुलिस जाती हो अदृश्य डरे और पागल कुत्तों के साथ
इमारतें: बैचैन हाथ स्वर्ग की ओर बढे हुए
पुल: छोटे छोटे विराम बहते खोये वक़्त पर
जीवित और मृत घटनाएं, पल, अमर चित्र, कैद कैमरों में
बेबीलोन, जहाँ भाषा मिलती है घुलती है, पर लोग समझ जाते है एक दुसरे को
हर्बल के साथ एक बीएर उसके पसंदीदा पब में, मुचा का एक दौरा, जच्य्म, टोपोल और हवेल के साथ
एक सैर किलों तक
काफ्का आपके नमस्कार को  नज़रंदाज़ करते, खोते हुए दुखी हो खिडकियों से
एक बार आओ कल्पना में ही, उड़ती प्रवासी चिड़ियों की तरह
प्राग:  इतिहास की भूमिका

Friday, March 09, 2012

हरिमोहन झा और खट्टर ककाक तरंग...

हरिमोहन झा

साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हरिमोहन झा मैथिली भाषा के सुप्रसिद्ध लेखक थे। इनकी कई रचनाओं में खट्टर ककाक तरंग एक ऐसी रचना है, जो मैथिली की श्रेष्ठ कृति (व्यंग्य) होने के साथ-साथ, अन्य भाषाओं में भी मैथिली की प्रतिष्ठा का कारण बनी। प्रस्तुत है खट्टर ककाक तरंग के एक अंश का हिन्दी अनुवाद : बीइंग पोएट

वेद का भेद (मैथिली-व्यंग्य)

उस दिन फगुआ (होली) था। खट्टर कका तीन बार पी चुके थे और चौथे की तैयारी कर रहे थे।
मैंने कहा - खट्टर कका, उस फगुआ में आपने कहा था कि वेद में श्रृंगार रस भरा हुआ है।
खट्टर कका गुलाबी नशा में थे। यह सुनते ही आँखें लाल हो गईं। बोले – ग़लत क्या कहा था? श्रृंगार वो भी ऐसा वैसा? ऐसा ऐसा वर्णन है कि कालिदास में भी मिल जायेगा?
मैंने कहा - खट्टर कका, कहाँ वैदिक ऋषि और कहाँ रसिक शिरोमणि कालिदास! खट्टर कका हाथ में सोंटा लेते हुए बोले – सुनो, वैदिक ऋषि कालिदास के नाना थे। ऐसे ऐसे उपमा दे गये हैं कि बाल-बच्चों के सामने कहा नहीं जा सकता है। तो मेरे विचार से विद्यार्थी और ब्रह्मचारी को वेद नहीं पढ़ने देना चाहिए।
मैंने कहा - खट्टर कका, आपका सब गप तो अदभूत होता है। वेद में कहीं अश्लीलता होती है?
खट्टर कका कुंडी में भांग की पत्ती घोंटते हुए बोले – तो सुन लो। इसी तरह ऊखरि (लकड़ी का बर्तन जिसमें अनाज कूटा जाता है) में सोम की पत्ती कूटा जा रहा था। मूसर की चोट पड़ रही थी। यह देख कर ऋचाकार ने उत्प्रेक्षा की है –
यत्र द्वाविव जघनाधिपवरण्या
उलूखल सुतानामवेद्विनदुजल्गुल:। - ऋ0 1/27/2
मैंने कहा - खट्टर कका, इसका अर्थ क्या हुआ?  
खट्टर कका ने कहा – “जैसे कोई विवृतजघना युवती अपने दोनों जाँघों को फलकाये हुए हो और उसमें...” तुम भतीजा हो। अधिक खोल कर कैसे कहूँ? यह मत समझना कि वे लोग शुद्ध वैदिक थे।
मैंने कहा - खट्टर कका, आप तो ऐसी बात कह देते हैं कि मेरा मुँह बंद हो जाता है।
खट्टर कका ने लोटा के मुँह में गमछा लगा कर भांग का गोला उस पर रखा और ऊपर से जल ढारते हुए अंगुली से घोरने लगे। फिर विहुँस कर बोले – देखो, इसी तरह अंगुली चलते हुए एक ऋषि कहते हैं –
अभित्वा योषणो दश, जारं न कन्या नूषत, मृज्यसे सोम सायते। - ऋ0 9/56/3
यह मंत्र गायत्री छंद में है। इसका अर्थ समझते हो?
मैंने कहा - नहीं।  
खट्टर कका – तो सुनो। मंत्रकार उत्प्रेक्षा कहते हैं कि कामातुर कन्या अपने यार को बुलाने के लिए इसी तरह दसों अंगुलियों से इशारा करती है।
मैंने चकित हो कर पूछा – ऐं! वैदिक युग में भी व्यभिचार होता था?
खट्टर कका मुस्कुराते हुए बोले – केवल होता ही नहीं था। वैदिक ऋषि को उसमें रस भी मिलता था।
खट्टर कका कलशी में भांग ढारने लगे। ढारते ढारते हँसी आ गई।
मैंने कहा - खट्टर कका, हँसी क्यों आई?  
खट्टर कका ने कहा – देखो, इसी तरह कलशी में रस ढारते हुए एक ऋषि लहर में आ कर क्या कहते हैं?
मर्य इव युवतिभि: समर्षति सोम: कलशे शतयाम्ना पथा – ऋ0 9/86/16
अर्थात कलश में अनेक धार से रस का फोहार छूट रहा है जैसे युवती के...
मैंने कहा - खट्टर कका, वैसे दाढ़ी वाले ऋषि को ऐसी ऐसी उपमा कैसे सूझी?
खट्टर कका ने कहा – ऋषि लोगों को यह उपमा ऐसा रसीला लगता है कि बार बार दोहराते हैं। देखो दूसरा मंत्र भी कहता हूँ –
सरज्जारो न योषणां,वरो न योनिमासदम् – ऋ0 9/101/14
अर्थात यह रस वैसे ही कलश में जा रहा है जैसे युवती में यार का...
मैंने कहा – आश्चर्य! वेद में कहीं यार का वर्णन हो!
खट्टर कका ने कहा – अह! उस दिन में यार का कितना महत्व था यह तो इस गायत्री छंद से समझो।
अभिगावो अनूषत, योषा जारमिव प्रियम्, अगन्नाजिं यथाहितम्। - ऋ0 9/32/5
अर्थात “हे सोम, मैं उसी प्रकार से आपको मना रही हूँ जैसे कोई स्त्री अपने यार को।” यह यार की चर्चा हज़ार जगह मिलेगी। समझो तो वेद में स्वामी से अधिक यार की चलती थी।
मैंने कहा - खट्टर कका, इन सभी मत्रों से तो यही सिद्ध होता है कि वैदिक युग में स्त्री को अधिक स्वतंत्रता थी।
खट्टर कका – उसके कोई संदेह? वैदिक स्त्री स्वतंत्र होती थी। कहीं कुँवारे यार को बुलाती थी तो कहीं विवाहित यार को मनाती थी। यार प्रेयसी से कैसे रमण करते थे और युवती को युवा यार मिलने से कैसी तृप्ति होती थी इसका वर्णन भी वेद में मिल जायेगा।
मैंने कहा – तब तो वैदिक युग में यार से भी संतान होता था।
खट्टर कका - उसमें संदेह? व्यभिचार से अनेकों स्त्रियों को गर्व रह जाता था। उर्वशी के पेट से वशिष्ठ का जन्म हुआ। दीर्घतमा की गर्भिनी माता ने वृस्पति के साथ सम्भोग कर वर्णसंकर पुत्र को उत्पन्न किया। पुरूकुत्स की स्त्री ने सप्तऋषि की कृपा से त्रसदस्यु नामक पुत्र पाया। कितनी स्त्रियाँ गुप्त रूप से प्रसव करती थी। कहाँ तक कहूँ? अगर सारे व्यभिचार प्रसंग गिनवाने लगूँ तो पाँचवां वेद बन जायेगा। इसीलिए तो मैं वेद का भाषाटीका घर में नहीं रखता हूँ। अगर रखूँ तो स्त्रीगण दूर हो जायेगी। मैं तो समझता हूँ कि इसी वजह से स्त्रियों को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं दिया गया है।
मैंने कहा - खट्टर कका, यह तो मौलिक गप (बात) आपने कहा। मैं तो समझता था कि वैदिक युग में ब्रह्मचर्य का डंका बजता था...
खट्टर कका – अब तो समझे कि किस डंका पर चोट पड़ती थी!
मैंने कहा - खट्टर कका, मान लिया जाय यह बात सत्य। तथापि ऋषि लोगों का क्या यह खुल्लमखुल्ला उघाड़िमहंकरिष्ये उचित था?
खट्टर कका – सुनो, जो रात दिन सोम के नशा में बुत्त रहेगा वो और क्या बोलेगा?
खट्टर कका – परंतु यदि वे लोग भांग के तरंग में लिख गये तो वैसी वैसी गूढ़ बातों की विवेचना कैसे की है?
खट्टर कका ने एक लोटा भांग चढ़ाते हुए कहा – सुनो, नशा में जैसी जैसी बातें मुँह से बाहर आनी चाहिए वैसी वैसी तो बाहर आई हैं। देखो, सोम के तरंग में एक ऋषि कितनी दूर तक बहक जाता है!
शेपो रोमण्वंतौ भेदो वारिन्मंडूक इच्छ्तींद्रायेंदो परिस्त्रव। - ऋ0 9/112/4
अब इससे अधिक गूढ़ बात क्या होगी?
मैंने कहा - खट्टर कका, इसका अर्थ बता दीजिए।
खट्टर कका – अर्थ यही है कि ‘…..यह (कामदंड) रोमाच्छदित.... (विवर) में प्रवेश करने हेतु इच्छुक है। हे सोम। आप चुब जाईये। ... अब तुम्हीं कहो, इस से अधिक कोई मदक्की क्या बोल सकता है!
मैंने क्षुब्द होते हुए कहा - खट्टर कका, मैं तो यही समझता था कि ऋचाकार लोग द्रष्टा और मनीषी थे। ऋषिका (स्त्री-ऋषि) भी आजन्म ब्रह्मचारिणी रह कर वेदमंत्र की रचना करती थी।
खट्टर कका भभा कर हँस पड़े। बोले – ऋषिका लोग तो और जुलुम करती थी। उन ब्रह्मचारिणी सब ने तो ऐसे ऐसे मंत्र की रचना की है कि विवाहितों का भी कान काटती है।
मेरा मुँह देखते हुए खट्टर कका बोले – देखो, एक घोषा नामक ब्रह्मचारिणी कहती है –
को वा शयुत्रा विधवेव देवरं मर्यं न योषा कृणुते। - ऋ0 9/40/2
अर्थात विधवा स्त्री शयनकाल में अपने देवर को बुला लेती है उसी तरह से मैं यज्ञ में आपको बुला रही हूँ।
मैंने कहा – बाप रे बाप! कुँवारी के मुँह से ऐसी बात?
खट्टर कका भंगघोटना साफ़ करते हुए बोले – तुम इतने में बपहाड़ि तोड़ने लगे? देखो, अंगिरा ऋषि की कन्या शश्वती देवी एक युवा पुरूष (आसंग) के नग्न अंग को देख कर कैसे उन्मत्त हो जाती है –
अन्वस्य स्थुरं ददृशे पुरस्तादनस्थं उरूरवरम्बमाण:
शश्वती नार्यभिचक्ष्याह सुभद्रमर्य भोजनं विभर्षि। - ऋ0 9/1/34
मैं - खट्टर कका, इसका अर्थ बुझा कर कहिए।
खट्टर कका की आँखें नशा से और अधिक लाल हो गईं। बोले – “दोनों जाँघों के बीच में लटकता हुआ, पुष्ट, लम्बायमान... देख कर शश्वती ने कहा – वाह! यह तो खूब सुंदर भोग करने के योग्य... धारण किये हुए हैं।”
मैंने कान मुँदते हुए कहा - खट्टर कका, हद्द हो गई। ऐसे तो वो युवती बोलेगी जो पी कर उन्मत्त हो।
खट्टर कका बोले – वो सब मदोन्मत्ता थी। सूर्या नामक एक ब्रह्मचारिणी कहती है –
यस्यां बीजं मनुष्या वपन्ति, या न उरू उशती विश्रया,
ते यस्यामुशन्त प्रहाराम शेपम्। - ऋ0 10/85/37
मैं – इसका अर्थ समझ में नहीं आया।
खट्टर कका – उरू मतलब दोनों जाँघ। विश्रय मतलब पसारना। शेप मतलब जननेंद्रिय। प्रहराम मतलब चोट मारना। अब तो ख़ुद ही अर्थ लगा लो। यदि फिर भी नहीं समझ आये तो किसी वैदिक से पूछ लेना।
मैंने देखा कि खट्टर कका भांग के तरंग में बहे जा रहे हैं। भासते भासते कहँ से कहाँ पहुँच जायेंगे उसका कोई ठीक नहीं है। मैंने कहा - खट्टर कका, मुझे नहीं पता था कि वेद में भी इतनी अश्लीलता होगी।
खट्टर कका बोले – अश्लीलता देखनी हो तो ऋगवेद के दशवें मंडल में देखो कि कैसे इंद्र और इंद्राणी मत्त हो कर काम-क्रीड़ा करते हैं।
मैंने कहा - खट्टर कका...
परंतु खट्टर कका अपने सूर में बढ़ते गये – इंद्राणी ताल ठोक कर कहती है –
वृषभो नतिग्मशृन्गोS न्तर्यूथेषु रोरूवत्। - ऋ0 10/86/85
अर्थात जैसे टेढ़ सिंह वाला साँढ़ मस्त हो कर ढकरते हुए, रमण करता है उसी तरह आप भी मेरे साथ कीजिए। उसके बाद जो सम्भोग का नग्न चित्र है वो काश्मीरी कोकशास्त्र के भी काटता है।
मैंने पुन: टोका - खट्टर कका...
परंतु उनकी प्रवाह रोकना असम्भव था। वो अपने धुन में बढ़ते गये – युवती लोमशाक सम्भोग वर्णन पढ़ोगे तो दंग रह जाओगे। लोमशा यौवन के मद से मत्त हो कर अपने सारे वस्त्र उतार फेंकती है और राजा स्वनय से कहती है कि –
उपोप मे परामृश मामेदभ्राणि मन्यथा
सर्वाहमस्मि रोमशा गांधारीणामवाविका। - ऋ0 1/126/7
अर्थात “आप मेरे पास आईये और निर्धोख हो कर खूब धरिये। देखिए, जो मेरी भेड़ी के रोइयाँ की तरह कितना...।” अब इस से बढ़ कर निर्लज्जता किसी युवती के लिए क्या हो सकती है? और उसके बाद जो रति-संग्राम मचता है वो कहने सुनने लायक नहीं है। लोमशा इस तरह से आवेष्टित करती है कि राजा उसी समय गदगद होकर उसको रति मल्लिका का सर्टिफिकेट दे देते हैं –
अगाधिता परिगाधिता या कशीकेव जंगहे
ददाति मह्यं यादुरी याशनां भोज्या शता। - ऋ0 1/126/7
अर्थात यह युवती सपनौर की तरह पूरी देह से लिपट कर इस तरह रमण करती है कि रस से शराबोर कर देती है।
मैंने क्षुब्ध होते हुए कहा - खट्टर कका, आप भांग के नशे में तो कहीं यह सब बोल रहे हैं?
खट्टर कका बोले – तुम इतने में घबरा गये? ज़रा यम-यमीक सम्भाषण पढ़ोगे तो समझोगे कि सहोदर भाई बहन में किस तरह का सम्भोग वार्ता चलता है! ऐसी ऐसी अश्लील गप है कि अभी भांग के नशा में भी मेरे मुँह से बाहर नहीं आ सकता। विश्वास नहीं है तो ऋगवेद का दशम मंडल उलटा कर देखो।
मैं - खट्टर कका, आप वेद की बात कह रहे हैं कि वाममार्ग का?
खट्टर कका की आँखें अरहुल के फूल की तरह लाल हो गईं। बोले – मुझे वेद और वाममार्ग में कोई अंतर नहीं लगता। जब पिता-पुत्री के सम्भोग वर्णन को पढ़ोगे कि प्रजापति कैसे युवती कन्या में सींचन करते हैं तो रोमांच हो जायेगा!
मैंने कान पर हाथ रखते हुए बोला – पाप शांत हो। यह तो वाममार्ग को भी पार कर गया।
खट्टर कका बोले – जैसा कि मैं जानता हूँ वेद से ही वाममार्ग की उत्पत्ति हुई है। मदिरा, मांस और मैथुन – इसी सभी के वर्णन से तो वेद भरा हुआ है। वाममार्गी क्या पंचमकार कहीं और से लाये हैं।
मैं - खट्टर कका, तब तो ऋषि लोगों ने चार्वाक के भी कान काट दिये?
खट्टर कका – हाँ, वैदिक ऋषि चार्वाक के गुरू थे। देखो, अगस्त्य मुनि खुल्लमखुल्ला लोपामुद्रा का उपदेश देते थे कि मनुष्य को आजीवन खूब भोग करना चाहिए। यही बात चार्वाक कहते हैं तो नास्तिक मान लिये गये। और अगस्त्य मुनि बोले तो आस्तिक ही बने रहे। परंतु मैं तो स्पष्ट वक्ता हूँ। वेद को लिखने वाले घोर नास्तिक थे। लोग कहते हैं – नास्तिको वेदनिंदक:। मैं कहता हूँ – नास्तिको वेदलेखक:।
मैं - खट्टर कका, आप तो ऐसी ऐसी बात कहते हैं कि मुझे कुछ सूझता ही नहीं है। मदिरा, मांस, मैथुन! तब तो वेद में यही है या और कुछ?
खट्टर कका शांत भाव से बोले – और भी बहुत कुछ है। जूआ! चोरी! हत्या!
मैं – ऐं! जूआ, चोरी, हत्या! खट्टर कका आप तो होश में हैं न?
खट्टर कका बोले – तुम्हें विश्वास नहीं होता है तो स्वयं देख लो। ऋगवेद का एक अध्याय केवल जूआ और जुआड़ी से भरा हुआ है। उस समय में 53 प्रकार का पासा था। एक ऋषि कहते हैं – जैसे स्त्री अपने यार के घर जाती है उसी तरह मैं भी जूआ के अड्डे पर दौड़ते हुए जाता हूँ। कहीं इंद्र चोरी करते हैं। कहीं अग्नि चोरी करते हैं। कहीं पाणी गाय चुराते हैं। कहीं बैल लूटा जा रहा है। और हत्या का तो कोई हद्द-हिसाब नहीं है। कहीं वृत्र बध, कहीं नमुचि बध, कहीं शुष्ण बध, कहीं कुयव बध। समझो तो वेद का पन्ना रक्तपात से भरा हुआ है। जब मानव का यह हाल है तो पशु की क्या गणना?
मैंने विषण्ण हो कर पूछा - खट्टर कका, वैदिक युग में ऐसी ऐसी बात! सो क्यों?
खट्टर कका नोसि लेते हुए बोले – जो रात दिन मदिरा में डूबा रहेगा वो और क्या कर सकता है? सब देवता में श्रेष्ठ इंद्र का चरित्र देखो। कोई भी काम उनसे छूटा हुआ है? उन्होंने गर्ववती स्त्री की हत्या तक की है। साँढ़ का मांस तक खाये हुए हैं।
मैं - खट्टर कका, वैदिक युग में खाने का विचार नहीं था?
खट्टर कका – यदि ऐसा ही होता तो घोड़ा के मांस का वर्णन होता? और यहीं तक नहीं कुत्ता के अँतड़ी तक के पका कर खाने का वृतांत है।
मैं – राम राम! वीभत्स की पराकाष्ठा हो गई।
खट्टर कका – तो इसमें मेरा क्या दोष? जो है वो कह रहा हूँ। मद्य और मांस का वर्णन तो सुन ही चुके हो। उसके बाद तो मैथुन ही होता है। वो वेद में देखो। कहीं शिश्नदेव का वर्णन, कहीं भगदेवता की पूजा। कहीं व्यभिचारिणी की चर्चा। कहीं कुँवारी का सम्भोग। कहीं गर्भिणी पर बलात्कार। कहीं गुप्त प्रसव की बात। कहीं भाई-बहन में अनुचित प्रस्ताव। कहीं पिता-पुत्री में। कहीं यार के संतान का जन्म। कहीं अप्राकृतिक व्यभिचार। एक ऋषि को कुछ नहीं मिला तो घड़े में रेत:पात कर दिया।
मेरे मुँह से बाहर आ गया – हरे राम! हरे राम! मैं तो समझता था कि वेद में सिर्फ़ धर्म की बात होगी।
खट्टर कका बोले – हँ, बहुत लोग ऐसा ही समझते हैं। परंतु मैंने तो टीकाकार के अनुसार अर्थ कहा है। वेद में नाना प्रकार की वस्तुएँ हैं। एक से एक अलबेड-ल बात। सौतिन को मारने के उपाय भी। कहीं बूढ़े का विवाह युवती से हो रहा है। कहीं बूढ़िया का विवाह युवा से। कहीं घोड़ी रथ में जोती जा रही है। कहीं स्त्री की पलटन पुरूष से लड़ रही है। कहीं नपुंसक स्त्री को पुत्र हो रहा है। कहीं गर्व में ही शिशू झग़ड़ा कर रहा है कि मैं पेट से बाहर नहीं आऊँगा। कहीं घोड़ी से गाय का जन्म हो रहा है। कहीं पुत्र अपनी माँ को जन्म दे रहा है। ऐसी ऐसी उटपटाँग बात भरी हुई है कि बुद्धि काम नहीं करती है।
मैंने क्षुब्द होते हुए पूछा - खट्टर कका, ऐसी ऐसी बात वेद में कैसे आई? यह सब क्षेप तो नहीं है?
खट्टर कका आँख मुँदते हुए बोले – कौन जानता है? सोम-रस के प्रवाह में जिसको जो फुराया बोल गये। मैं अपने तरंग में कितनी बातें कह जाता हूँ वो तो तुम मोजर (मूल्य) नहीं देते हो। और वे लोग जो कह गये वो वेदवाक्य हो गया। ... बताओ, कुछ गलत-सलत तो नहीं बोल गया मैं? 
मैंने कहा - खट्टर कका, फगुआ के दिन सब कुछ माफ़ होता है। और उसमें भी आपका।
तब तक काकी एक थाली चाशनीदार मालपूआ और मिठाई लेकर पहुँच गई। खट्टर कका उल्लसित हो कर बोले – देखो, असली यज्ञ की सामग्री आ गई।
मुझे मुँह ताकते देख कर कहा – वैदिक यज्ञ का रहस्य क्या है? हवन कुंड है उदर (पेट) कुंड का प्रतीक। ज्वाला है जठराग्नि (पेट की आग) का प्रतीक। समिधा का अर्थ भोज्य पदार्थ। तैं कस्मै देवाय हविषा विधेम – इस प्रश्न का असली उत्तर मैं समझता हूँ उदरदेवाय
मैं – परंतु...
खट्टर कका – परंतु की? वैदिक ऋचा का स्त्रोत है मधुर भोजन। मीठे खाकर छंद फुराता (सूझता) है। अभी भी और उस दिन भी। हमलोग के पूर्वज को कहीं मीठा गुल्लर भी मिल जाता था तो गीत उठा (गाते) देते थे –
चरन् वै मधु विन्दति, चरन् स्वादुमुदुम्बरम्।
मधु वा घृत भेटि गेने आनंद सँ नाचि उठति –
मधुश्चुतं धृतमिवं सुपूतम् ...।
गाछ-वृक्ष, जल, स्थल, आकाश, सबमें मधुर ही मधुर है –
मधुमतीरोषधीर्द्याव आपो मधुमन्नो भवन्तु ...।
सम्पूर्ण विश्व में उन लोगों को मधुर ही मधुर दिखाई देता था। आनंद से मधु-पान कर के मधु पाठ करते थे –
मधुवाता ऋतायते। मधु क्षरंति सिंधव:।
माध्वीर्न संतु: ओषधी:। मधु नक्तमुतोषसो।
मधुमत् पार्थिवं रज:। मधु द्यौरस्तु न: पिता।
मधुमान् नो वनस्पति:। मधुमान् अस्तु सूर्य:।
माध्वीर्गावो भवंतु न:।
अरे इस देश में तो मुइलो उत्तर पितर को ओम् मधु मधु मधु कह कर तृप्त किया जाता है। ऐसी मधुर प्रेमी जाति और कौन होगा? अच्छा, अब मधुरेण समापयेत् करो।
मैंने कहा - खट्टर कका, आजकल मुझे मिष्टान वर्जित है।
खट्टर कका बोले – मिष्टान ही तो शिष्टान है। वो भी वर्जित है, तो खाओगे क्या? धृष्टान? अरे मधुरेण समापयेत् इसका असली अर्थ समझते हो? मतलब मधुर खाते-खाते यह जीवन समाप्त करना चाहिए। यही हमारे पूर्वजों का मूलमंत्र था। बल्कि, मैं तो एक अक्षर परिष्कार भी कर देता हूँ जो – मधुरे न समापयेत अर्थात मधुर मिलता जाये तो हाथ बारना (खाना छोड़ देना) ही नहीं चाहिए।
यह कह कर खट्टर कका सस्वर वेद पाठ करने लगे –
जिह्वया अग्रे मधु में जिह्वामूले मधूलकम्
मधुवन्मे निक्रमणं, मधुमन्मे परायणम्।
वाचा ददामि मधुमद् भूयासं मधुसंदृशम्।
फिर बोले – इसका अर्थ समझ आया? जीवन भर मधुर खाते रहना चाहिए और मधुर बोलते रहना चाहिए। यह वेद का सबसे मधुर मंत्र है। ... लो, फगुआ का प्रसाद पाओ। 

(अनुवाद : त्रिपुरारि कुमार शर्मा)