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Monday, October 07, 2013

छोटा बाबू : एक कहानी


दोस्तों आज "छोटा बाबू" पढ़िए। यह कहानी मैंने 2010 में लिखी थी। दैनिक अख़बार नेशनल दुनिया में 4 अगस्त 2013 को प्रकाशित हो चुकी है।

एक ठहरी हुई-सी नदी है। पानी अपनी रफ़्तार से बह रहा है। एक छोटी-सी मछली पानी की सतह पर कभी डूबती है, कभी उभरती है। अचानक एक चिड़िया आती है और मछली को अपनी चोंच में दबा कर उड़ जाती है। वह चुपचाप इस दृश्य को देख रहा है। एक आँख समझती है कि चिड़िया ने नदी के माथे को चूमा है। दूसरी आँख कहती है कि नदी अपनी अंगुलियों से चिड़िया को छूते-छूते रह गई। जैसे हाथ से तितली फिसल जाती है। मगर उसका स्पर्श हथेलियों में साँस लेता है। परों का रंग अंगुलियों से सारे बदन में उतर कर लहू के साथ-साथ बहने लगता है। मगर हाथ में तितली नहीं होती है। कुछ इसी तरह से उसके बाबूजी उसकी ज़िंदगी से चले गए और वह अपने लहू में उन्हें महसूस करता रहा। उसका नाम छोटा बाबू नहीं है, पर बाबूजी उसे इसी नाम से बुलाया करते थे। बाबूजी के बाद घरवाले भी कभी-कभार इसी नाम से पुकार लेते हैं। ...प्यार से...तल्ख़ी से...पता नहीं।
उसे लगा कि वह जो कुछ भी कर रहा है, ठीक है। बारह-तेरह साल की उम्र बहुत नाज़ुक होती है। उसके दोस्त ने सिगरेट सुलगाई और वह पीने लगा। उसने पहली बार सिगरेट चखी। एक छोटा-सा कमरा है, जिसे कमरा कहना लाजिमी नहीं होगा। मकान अंडर कन्सट्रक्शन है। एक आवाज़ का टुकड़ा कान पर आ कर गिरता है
“डीएम आ रहा है।”
“किधर से?
“पीछे की सीढ़ियों से।”
“भागो...।”
सभी स्टूडेंट्स अपने-अपने बिस्तर पर लेटे हुए हैं। किसी की पलकें आधी खुली हुई हैं। किसी के हाथों में उलटी किताब। कोई कुछ खोज रहा है। कोई कुछ भी नहीं। दरवाज़ा खुलता है। डीएम कमरे में दाखिल होते हैं। सभी को देख कर खुश होते हैं। पर गुस्सा अंदर से है। एक बिस्तर है, जो अब भी ख़ाली है। आँख उसी ख़ाली बिस्तर की तरफ मुड़ती है। आँखों की लाली बातों में उतर आती है।
ये कहाँ गया?”
सभी अपने-अपने काम में मसरूफ़ हैं।
“मैने पूछा ये कहाँ गया?”
आचार्य जी हम यहाँ हैं, बाथरूम गए थे, पेट में दर्द हो रहा है।
“दवा क्यों नहीं ली?”
“अभी-अभी तो पता चला है।
“मेरे साथ आओ, दवा देता हूँ।
“जी।”
डीएम के मुड़ते ही वह अपने दोस्तों की तरफ देख, मुस्कुरा कर आँख मारता है। दोनों के जाते ही सभी आपस में बात करने लग जाते हैं। ये डीएम बहुत ख़तरनाक है। हमें तो मस्ती भी नहीं करने देता।
“डीएम मतलब?” – एक ने पूछा।
“अरे दिनेश महतो।”
“हॉस्टल इंचार्ज़?
“और कौन तेरा बाप?”
“साले, तेरी तो...।
...दवा लेकर वह सीधे बाथरूम जाता है। जहाँ सिगरेट का अधजला टुकड़ा इंतज़ार कर रहा है। उसे बाथरूम जाने की लत लग गई है। जब-तब वह बाथरूम जाने लगा है। क्योंकि यही एक महफ़ूज़ जगह है, जहाँ वह आराम से सिगरेट पी सकता है। हॉस्टल में सिगरेट पीने की इज़ाजत नहीं है। इसीलिए यह नेक काम बाथरूम में सालों तक किया जाता रहा। इस दौरान उसने कई प्रयोग भी किए। मसलन एक बार में दो-चार या आठ सिगरेट पीना। आँखों से धुआं निकालना। नाक से सिगरेट पीना। कई बार वह कामयाब भी हुआ। नाकामी भी हाथ लगी। इस आदत ने उसे अपना ग़ुलाम बना लिया था। पता नहीं वह क्यों पीता था? 
यह उसका पाँचवां पैग था। सिगरेट अब अकेली नहीं रही। शराब के साथ अपना दुख बाँटा करती है। दुनिया के रंजो-ग़म से तकलीफ जब भी परेशान हो जाती है, तो वह उसकी पनाह में आती है। ख़ुदा जाने यहाँ आकर उसे क्या मिलता है? चंद क़रार के कतरे। या कुछ बासी लम्हे, जिसे देखना, छूना, सहलाना उसे अच्छा लगता है। इस वक़्त वह जहाँ पर है। सर के उपर एक सफ़ेद छत है। जो बार-बार उसे अपनी तरफ खींच रही है। न चाहते हुए भी वह छत की तरफ देखता है। कितनी ख़ूबसूरत है। छत से टंगा पंखा घूमता ही जा रहा है। वह सोचने लगता है। जब पंखा बंद होता है, तो उसके तीन डायने होते हैं। चलते वक़्त क्यों नहीं दिखाई पड़ते? पंखे की वजह से सिगरेट जल्दी ख़त्म हो जाती है। वह उठता है और पंखे का स्वीच ऑफ कर देता है।
उसने दूसरी सिगरेट जलाई। गिलास में थोड़ी-सी और शराब डाली। वह कुछ अजीब-सा महसूस कर रहा है। कुर्सी की गोद से उठ कर वह बिस्तर की बाहों में लेट जाता है। सामने कई ट्रॉफियाँ चमक रही हैं। एक-एक कर के सभी ट्रॉफियों को देखने लगता है। हिंदू कॉलेज, खालसा कॉलेज, ज़ाकिर हुसैन कॉलेज, भीम राव अम्बेदकर कॉलेज, लेडी श्रीराम कॉलेज, जीसस एण्ड मेरी कॉलेज, माता सुंदरी कॉलेज...। धीरे-धीरे पूरी दिल्ली यूनिवर्सिटी कमरे में ज़िंदा हो उठती है। यह सबसे बड़ी वाली ट्रॉफी, जिस प्रतियोगिता में उसे फर्स्ट प्राइज़ के रूप में मिली है, कितने विद्यार्थियों ने भाग लिया था उस में? सौ से भी ज़्यादा रहे होंगे। अलग-अलग कॉलेजों के ही नहीं, अलग-अलग यूनिवर्सिटियों के भी। अलग-अलग भाषाओं की कविताएं। धीरे धीरे कई चेहरे उभरने लगते हैं। ये धुंधला-सा चेहरा किसका है?
“मैं निशा हूँ।
“फ़लक कहते हैं मुझे।
“अंदाज़ अच्छा है।
“शुक्रिया।
“आपकी कविताओं में बहुत आकर्षण है।
“पता नहीं।”
“...मगर एक उदासी भी है।
“...”
क्या उसे उदासी की वजह वाकई नहीं पता है? यही सोचते हुए उसने जवाब तलाशती आँखों को अलविदा कहा। फिर दूसरी तरफ मुड़ गया। कुछ दूर चलने पर बेचैनी उसके कदमों से लिपट गई। उसने चाहा कि वह लौट आए और बताए कि उदासी की वजह क्या है? फ़लक की सोच के साँचे में किस रंग की मिट्टी प्रतिमा बनने को तैयार है? एक सफ़ेद-ओ-स्याह पल उसकी पलकों को छू कर ज़मीन पर गिर जाता है।
“बेटा, तुम मुझसे दूर जा रहे हो। तुम्हारे बग़ैर मैं कैसे रह पाऊंगी?” – माँ ने कहा।
फ़लक ने सिर्फ़ इतना कहा – “कहो तो पढ़ना छोड़ दूँ।”
माँ की आँखों में एक सफ़ेद लकीर-सी खिंच गई। वह रोना तो बहुत चाहती थी, मगर आँसू की बूँदों को पलकों के भीतर पुतलियों में बंद कर दिया। बातचीत का लहज़ा उसकी समझ के बाहर था। देखते-देखते उसका बेटा उसकी नज़रों से ओझल हो गया। वह चाह कर भी रोक न सकी। शायद वह रोकना ही नहीं चाहती थी। क्योंकि न रोकने में ही उसके बेटे के सुनहरे भविष्य की भलाई शामिल थी।
छोटी-सी उम्र को सिर्फ़ दस तक की गिनती आती है। फ़लक पढ़ने के लिए घर से दूर जा रहा है। स्कूटर की पिछली सीट पर बैठे-बैठे वह दोनों तरफ देख रहा है। कभी खुश हो कर मुस्कुरा देता, तो कभी चुप रह कर ही हवाओं की सलामी स्वीकार कर लेता। उसे किसी चीज़ की फ़िक्र नहीं है। वह जानता है कि इस वक़्त स्कूटर ड्राइव कर रहे उसके बाबूजी उसकी ज़िंदगी के रहनुमा हैं। जब रहनुमा साथ हो, तो फ़िक्र क्या करना?
उसके बाबूजी उसकी ज़िंदगी में बहुत अहम हैं। माँ, उससे जितनी मुहब्बत करती है। उससे कहीं ज़्यादा प्यार वह अपने बाबूजी से करता है। बाबूजी के प्रति जो समर्पण है, लगाव है, झुकाव है, आकर्षण है, किसी और के लिए नहीं हो सकता। होना भी नहीं चाहिए। क्योंकि इसी सबकुछ की झलक बाबूजी के मन में अपने लिए देख पाता है, जो शायद उसे माँ के लिए भी नहीं दिखाई देती। माँ को इस बात की तक़लीफ़ भी है, मगर यह सच है। कभी-कभी व्यक्ति किसी की चाहत में इतना डूब जाता है कि किसी के होने और न होने के बीच का बारीक फ़र्क भी ख़त्म हो जाता है। ऐसे लोगों को ही दीवाना कहा जाता है। अपनी हद के उस पार जा कर प्यार करते हैं। सच! वह अपने बाबूजी का दीवाना है। हर काम की श्शुरुआत उनका नाम लेकर। हर साँस की आहट, जैसे उनको आवाज़ दे रही हो। हर धड़कन, जैसे उनका सज़दा कर रही हो। आँखों में उनके सिवा कोई और नहीं। क्या इसे पागलपन नहीं कहा जाएगा? इस बात की परवाह उसे कभी नहीं रही। शायद पागल ही है। बाबूजी तो अब रहे नहीं, मगर उनके होने का भ्रम पाले बैठा है। कोई कुछ भी कहे। वह मानता है कि उसके बाबूजी आज भी उससे रू-ब-रू होते हैं।
एक दफ़ा कुछ ऐसा हुआ। सुबह की अलसाई आँखें सूरज की दस्तक को सहला रही थी। अचानक रोने की रोशनी सारे घर में फैल गई। सारा घर महकने लगा। घर के सारे लोग एक जगह एकत्रित हो गए। देखा कि फ़लक अपने बिस्तर पर लेटा-लेटा रो रहा है। तकिए का कुछ हिस्सा भीग गया है। सबने उसे जगाया और आँसुओं का कारण पूछा। थोड़ी देर बाद जब उसने रोना बंद किया तो कहा- बाबूजी। और कुछ भी न कह सका। बाबूजी उसके सपने से निकल कर सामने सोफे पर बैठे थे। वह उन्हें देखता रहा। अंदर ही अंदर ख़ुद को भरता रहा। मुस्कुराता रहा। धीरे-धीरे सब लोग वहाँ से चले गए। जैसे चाँद के उपर से सारा स्याह बादल छट गया हो। जैसे चाँद निखर कर और भी चमक उठा हो। वाकई फ़लक पहले से ज़्यादा शांत और लबालब लग रहा था। उसकी आँखों में एक अजीब-सी चमक थी। वही चमक उसकी आँखों में अकसर देखने को मिल जाती है। सपना तो महज एक जरिया है, अपने बाबूजी से मुलाक़ात करने और बातचीत करने का।
छोटा बाबू! अचानक किसी ने आवाज़ दी। उसने देखा, तो आसपास कोई भी न था। कमरा बिल्कुल सूनसान था। उसे किसी जाते हुए कदमों की आहट सुनाई पड़ी। उसने दरवाज़े की तरफ हाथ बढ़ा कर रोकना चाहा। मगर रोक न सका। जैसे उसका किसी चीज़ पर इख़्तियार न रह गया हो। वह बहुत देर तक ख़ामोश, ख़िड़की के बाहर, कहीं ख़लाओं में एकटक देखता रहा। शायद तितली उड़ चुकी थी। सिर्फ़ परों का रंग और लम्स हथेलियों से चिपका रह गया था। शायद चिड़िया मछली को अपनी चोंच में दबा कर जा चुकी थी। नदी में बहते हुए पानी की सतह पर अब भी थोड़ी-सी, न के बराबर हलचल मौजूद थी। 

Thursday, October 03, 2013

कमल जीत चौधरी की कविताएँ

कमल जीत चौधरी ऐसे कवि का नाम है, जिन्हें कम शब्दों में बड़ी बात कहना बखूबी आता है। प्रेम को उपलब्ध होने के लिए ‘असामान्य होना’ पहली शर्त मानने वाले कवि कमल जीत जब आदमी की ओर आँख उठाते हैं, तो उन्हें इस समय आदमी एक पोस्टकार्ड की तरह दिखाई देता है। जब उनकी सोच कल्पनाओं का क्षितिज बुनती है, तो उस क्षितिज का रंग स्लेटी होना उचित है। यही स्लेटी रंग कवि का अपना रंग है। वो जानते हैं कि एक दिन यह रंग सारे रंगों को अपने में समो लेगा और पूरी पृथ्वी पर फैल जाएगा। उनकी आँख से ओझल हुईं वस्तुएँ अचानक से सफ़ेद पुतली पर आकार लेने लगती हैं, दिल-ओ-दिमाग़ पर पसर जाती हैं। ...शून्य से कविता उतरती रहती है और वो चुपचाप इस क्रिया का साक्षी बनते हैं। तो आईए पढ़ते हैं कमल जीत चौधरी की कविताएँ — त्रिपुरारि कुमार शर्मा             

नाव का हम क्या करते
वहां 
एक नदी थी 
जहां हम खड़े थे 
सिद्धस्त 
अपनी अपनी कलाओं में-
तुम डूबने से ज्यादा 
तैरना जानते थे 
मैं तैरने से ज्यादा डूबना...
नाव का हम क्या करते।
शांति
लाल और हरे 
आँगन में बैठी 
सफेद बुढ़िया 
चरखा छोड़ 
नंगी सड़कों पर उतर आई है 
उसके पास अब 
नहीं बचा
सूत इतना 
कि वह ३० जनवरी १९४८ को 
ले छुपा...
उसके पास तो अब है 
एक चीख 
एक डंडा 
एक झंडा।
आदमी-1       
आदमी 
इस समय 
सबसे अधिक है 
मशीनों में
मशीनों से 
थोड़ा-सा कम 
या फिर ज्यादा है
बाज़ारों में
सबसे कम 
या फिर न के बराबर
बचा है संग्रहालयों में।
आदमी-2
आदमी इस समय
पोस्टकार्ड हुआ जा रहा है...
प्रेम
सामान्य रहकर नहीं किया जा सकता प्रेम 
प्रेम नहीं रहने देता सामान्य।
खिड़की से
जीवन में 
एक न एक बार 
हर आदमी को 
खिड़की से ज़रूर देखना चाहिए 
खिड़की से देखना 
होता है 
अलग तरह का देखना 
चौकोना देखना 
थोड़ा देखना 
मगर साफ़ देखना।
धूमिल के लिए
काले अंग्रेजो का 
लादे बोझा 
वह घुमावदार सड़क पर 
सीधा चलता 
जयकारे लगाता
सीस नवाता 
दरबार आता जाता 
पैरों तले
पत्थर तोड़ता 
दिनों दिन 
लोहा बनता जा रहा है 
वह धार का जनक
धार जानता है 
वार नहीं...
सड़क से उतरा भी जा सकता है
पगडण्डी की उंगली थाम 
हरा समतल ढूंढा जा सकता है  
वह नहीं जानता
घोड़े की भाषा में
वह लोहे का स्वाद जानता है 
हथोड़े की भाषा में 
अपनी ताकत नहीं पहचानता 
वह नहीं जानता-
वह जनता है। 

Friday, September 27, 2013

निलय उपाध्याय की कविताएँ

निलय उपाध्याय ऐसे रचनाकार हैं, जिनकी आँख का उजाला गाँव में ‘भक्क इजोरिया’ का कारण बनता है और सोच का रेशम शहर को रंगीन बनाता है। वो जब भी शहर या गाँव के बारे में लिखते हैं, दोनों का रंग अलग होता है। वो अपनी कविता-कहानी में दोनों जगहों की समस्या, लोग, हवा, माहौल, दुख, राजनीति, व्यवसाय, मिट्टी, बाज़ार आदि के बारे में चर्चा करते हैं। शहर में बसने के बावजूद उनके भीतर जो एक गाँव अब भी कहीं बसा हुआ है, बार-बार उस गाँव की याद उनके ज़ेहन को ज़ख़्मी कर जाती है। वो शब्दों के मरहम अपनी चोट पर मलते हैं। वो हवाओं पर लिखे हुए आवाज़ों को देखते हैं, पढ़ते हैं। उसे पहचानते हैं। उसे पहनते हैं। उनकी नज़र मुड़ती है, फिसलती है, टूटती है और टूट कर साहित्याकाश पर कुछ निशान छोड़ जाती है। आईए आज हम उन्हीं निशानों को पढ़ने-समझने की कोशिश करते हैं : त्रिपुरारि कुमार शर्मा 

मूसहर टोल में बारिश : कुछ चित्र
1.
पानी से पीट रहे हैं
पंखो वाले हाथी
हवाएँ
हाड़ कूट रही हैं
किसी का छप्पर भसक गया
गिर गई किसी की दीवार
भाग रे कलुआ
लुत्ती फेंक रहा है
कहीं टूट कर गिर ना जाए
बिजली का नंगा तार
डरा हुआ सांप
डरी हुई सत्ता-सी खूंखार
मंहगाई-सी जबर
यह
मूसला धार
2.
सहजन के लासे में
दीवार से टिकुली सटी है
जिस औरत की
वह कहाँ जाएगी इस वक़्त
फूस के छ्प्पर से लगी
अलगनी पर
टंगा है जिसका कुर्ता
वह कहाँ जाएगा इस वक़्त
तिनका-तिनका चुन 
छ्प्पर बनाया
कतरा-कतरा चढ़ाई मिट्टी
मिट्टी की माचिस को कहा घर
कहाँ जाएँगे इस आफ़त में
कहाँ बिछा है उनके लिए
धरती का बिस्तर
कहाँ तना है छाते-सा आसमान
3.
बज्जर गिरा छाती पर
छ्प्पर पर मेघ गिरे
दीवार से लगी खूंटी गिरी
अलगनी गिरी
बांस गिरा
छ्प्पर से कसा बांस गिरा
चुल्हा गिरा 
थाली में माटी का लौदा गिरा
बिखर गया तसले का भात
तिनके पर 
टंगी बूंद-सा
अब गिरा तब गिरा घर
अब गिरा तब गिरा जीवन
डोल रहे हैं दिशाओ के खम्भे
खेतों के
बिल में पानी भर जाने के बाद
जैसे मूस निकलते है
रोंआ सटाए
निकल रहे है मूसहर।
4.
सिकुड़ गई है हाथ पांव की चमड़ी
फूल गई है देह की मैल
पानी की बूंदो के 
डंक मार रहे हैं मेघ
जैसे कोई उखाड़ रहा हो 
नेनुए की लतर 
पछाड़ खा रहा है नीम का पेड़
सड़क के पास
उमड़ आई नदी के धार को पछाड़ता
मिट्टी को नाखून से पकड़े
अब भी इस अरह पड़ा है सिल
जैसे धरती 
इंद्र को ठेंगा दिखा रही हो
5.
मुझे भी ले चलो
चिल्लाया जब 
बांस के खम्भे पर टंगा तसला
तो याद आया कि भीतर रह गया
टीन आटा का
एकाएक
जैसे बिजली की रास पकड़
तड़कते आसमान से 
कूद गया कोई
घर में घुसा
आटे का टीन उठाया
कुर्ता उतारा और अदेखा
तैर गया
एक पल काली पीठ दिखी
दूसरे पल उल्लास से भरा चेहरा
भद..
भद..पपड़ी गिरी
भदाक गिरा लौंदा
छप्पर समेत घर गिरा
तीसरे पल
6.
चींटियों की तरह सिर सटाए
और गोलबंद
खड़े हैं बीच सड़क पर
भीगी हुई गठरिया, 
कुते, सूअर
और बची हुई शराब की बोतल
सांस ले रहे हैं पशुओं की तरह
कटकटा रहे हैं दांत
कौन किसकी पत्नी है
कौन किसका बच्चा
टूट गए हैं 
परिवारों के अलग अलग बृत
सटकर खड़े हैं
एक दूसरे के पास, बहुत पास
जैसे धरती से निकले हो
और फ़ेंक दिया हो
टूसा
चार लोग
खम्भे की तरह
प्लास्टिक की पन्नी पर आसमान थाम
खड़े हो गए, औरतो ने बना दिया मेड़,
तो दौड़ी आ गई धरती भी
उनके पास, जानती है
कि मूसहर है
जानते है आफ़त से लडना
7.
सरकन्डा दिखा तो 
उखाड़ लिया एक औरत ने
एक बच्चे को लंबाई से नापा
और झाड़ दिया 
हाबा डाबा
जूं खुजलाती औरतों ने
अपने अपने बच्चे को देखा
किसी ने सिर सहलाया
किसी ने पकड़ा दिया स्तन
जाने कहां से
मरियल चूहा पकड़ लाए बच्चे
कांपता दिखा तो पिला दिया दारू, 
चलने लगा मटक मटक 
तो भूल गए आफ़त
हंस पडे सब के सब

Monday, August 19, 2013

समय के आईने में आरसी : त्रिपुरारि कुमार शर्मा

मेरी दृष्टि में आरसी प्रसाद सिंह ऐसे रचनाकार हैं, जिनके पाँव छायावाद की जड़ में जमे हैं और उंगलियाँ प्रगतिशीलता के पत्तों को छूती हैं। जो रोमांस के पेड़ों पर भारतीय दर्शन-चिंतन के फूल उगाते चलते हैं। जिनकी रचनाओं में न सिर्फ़ दैनिक जीवन की फ़िक्र है, बल्कि उसे सँवारने के उपाय भी। इन सबसे बढ़कर जो एक बात सामने आती है, वह है आम आदमी को एक इंसान के रूप में व्याख्यायित करना। उसके दुख-सुख को नजदीक से देखना और पार जाने के रास्ते भी बताना। इसीलिए मैं आरसी को ‘प्रेम और प्रगतिशीलता’ का कवि कहना चाहूँगा। आरसी की जन्मतिथि ((19 अगस्त) पर उनकी स्मृति को नमन करते हुए, प्रस्तुत है यह लेख  - त्रिपुरारि कुमार शर्मा 

किसे ख़बर थी कि छायावाद के तृतीय उत्थान के कवियों में विशेष स्थान रखने वाले रचनाकार के साथ समय ऐसा (निर्मम) न्याय करेगा। एक ऐसा कवि, जिसे ‘जीवन-जोश-जवानी’ और ‘आस्था-अर्पण-अध्यात्म’ का कवि कहा जाता है। एक ऐसा कथाकार, जिसकी कहानियों में वक़्त की महीन बुनावट का बेहतर नमूना मिलता है। एक ऐसा एकांकीकार, जिसके एकांकी नाटकों में सामाजिक, राजनीतिक तथा मनोवैज्ञानिक स्वरूप झलकता है। जिसके ख़िला़फ युवावस्था में ही तत्कालीन पत्रिका ‘युवक’ (सम्पादक : रामवृक्ष बेनीपुरी) में प्रकाशित रचनाओं में क्रांतिकारी शब्दों का प्रयोग करने पर अंग्रेजी हुकूमत ने गिरफ़्तारी का वारंट जारी कर दिया। जिसने न सिर्फ़ हिंदी भाषा, बल्कि मैथिली भाषा के साहित्य को भी समृद्ध किया। जिसे साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई अन्य सम्मानों से नवाज़ा गया। जो देश-प्रदेश की अनेक संस्थाओं एवं सरकार द्वारा समय-समय पर सम्मानित और पुरस्कृत होता रहा। मैं बात कर रहा हूँ उस शख़्सियत की, जो एक साथ उपमा और उपमेय दोनों है। मैं बात कर रहा हूँ महान चिंतक, विशिष्ट साधक और युगाराध्य कवि आरसी प्रसाद सिंह की।
यह बात किसी अचरज से कम नहीं कि 74 वर्षों तक (किसी भी कवि के जीवन में सबसे लम्बा रचनाकाल) लगातार लिखने के बावजूद ‘आरसी और उनके साहित्य’ का विवेचन एक व्यापक दृष्टि के तहत नहीं किया गया। आलोचक यह कह कर अपना पल्ला झाड़ते रहे हैं कि आरसी के लेखन में कोई केंद्रीय भाव नहीं है। उनकी कोई तय विचारधारा या लेखन क्षेत्र नहीं है। एक आलोचक व्यक्तिवादी गीति कविता-धारा (जिसमें आरसी भी शामिल हैं) के बारे में लिखते हैं, “इनके पास जीवन-दृष्टि नहीं थी—न तो पुरानी आध्यात्मिक जीवन-दृष्टि और न नवीन समाजवादी दृष्टि। ये कवि अपने अनुभवों से परिचालित हो रहे थे, उनके अनुभव भावुक हृदय के अनुभव थे। उनकी दृष्टि रोमानी थी, अत: वे व्यक्ति को न तो सामाजिक शक्ति से जोड़ सके न आध्यात्मिक आदर्शों से। जीवन-दृष्टि के अभाव में यह व्यक्तिवादी अनुभव निराशा, मृत्यु की छाया और नियति बोध से ग्रस्त हैं।” मैं इनकी बातों से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ। ठीक है कि आरसी (और उस समय के कवियों) के पास जीवन-दृष्टि नहीं थी। लेकिन मैं कहना चाहता हूँ कि जिनके पास जीवन-दृष्टि होती है, उनके पास जीवन नहीं होता। यह बात स्वंय साबित हो जाती है कि आरसी के पास जीवन-दृष्टि न सही, जीवन था। इसीलिए तो हम उन्हें जीवन और यौवन का कवि कहते हैं।
दूसरी बात, क्या बिना किसी दृष्टि के कविता सम्भव है? हाँ, आरसी की दृष्टि समय के साथ बदलती रही है, जिसे मैं सकारात्मक पक्ष समझता हूँ। आलोचक शायद इस बात से सहमत होंगे कि नदी तभी तक ज़िंदा मानी जाती है, जब तक उसमें प्रवाह है। अपनी रचनाओं में विविधता संजोने वाले आरसी ने गुणात्मक रूप से प्रयोग किए हैं। मुझे लगता है यही विविधता आरसी की सबसे बड़ी ख़ूबी है और सच्चा-सार्थक कवि होने का सबसे बड़ा प्रमाण भी। तीसरी बात, मैं नहीं मानता कि कविता का काम कोई आदर्श स्थापित करना नहीं है। न तो सामाजिक और न आध्यात्मिक। कविता तो सभी आदर्शों-अनादर्शों के पार ले जाती है। जहाँ से कवि की पुकार उठती है। यही पुकार आरसी को ‘उमर ख़य्याम’ की परम्परा से जोड़ती हुई आगे लेकर भी जाती है। जब आरसी कहते हैं : तेरा पथ जाता उधर जहाँ बहती निशिबासर मद-धारा / मेरे हित शूली, दमन, दंड मेरा विश्राम भवन कारा। / करबद्ध सदैव मनाता तू, मेरी मधुशाला रहे अचल। / मैं कहता, मानव की जय हो निर्भय हो जगतीतल सारा। (कलापी)
इसी सिलसिले में आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री का कथन उचित मालूम पड़ता हैं, “आरसी का काव्य मर्म-मूल से प्रलम्ब डालियों और पल्लव-पत्र-पुष्पों तक जैसा प्राण-रस संचारित करता रहा है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। किसी एक विषय, स्वर या कल्पना के कवि वह नहीं हैं। उनकी सम्वेदना जितनी विषयों से जुड़ी हुई है, उनकी अनुभूति जितनी वस्तुओं की छुअन से रोमांचित है, उनका स्वर जितने आरोहों, अवरोहों में अपना आलोक निखारता है, कम ही कवि उतने स्वरों से अपनी प्रतिभा के प्रसार के दावेदार हो सकते हैं।” आरसी ने अपने जीवन काल में जब-जब जो-जो भोगा, लिखा। अडिग चट्टान बनकर उम्र के विभिन्न पड़ावों पर आने वाली बाधाओं का डटकर मुकाबला किया। उम्र भर नियंत्रण के ख़िलाफ आक्रोश ज़ाहिर करते रहे। जीवन को ‘निर्झर’ की तरह जिया। आरसी का साहित्य सच्चे अनुभवों की आग में पकी हुई फसल है। यह बात और है कि उनकी मस्ती से भरी रचनाएँ पाठकों को अधिक प्रिय हैं। आरसी ‘नई दिशा’ शीर्षक कविता में लिखते हैं : तुम मेरी मस्ती को देखो / इतनी मस्ती, इतनी मस्ती / मैं बहका-बहका जाता हूँ। / कुछ का कुछ हूँ सुन लेता मैं / कुछ का कुछ कह जाता हूँ। / जब आती है मौज किसी की / मैं तस्वीर सजा लेता हूँ। / जब उमंग उठती है / मैं ज़ंजीर बजा लेता हूँ।
इस मस्ती की एक वजह और भी है। कवि को मालूम है कि जीवन एक यात्रा है और जन्म-मरण दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू है। इस सच से जिसका साक्षात्कार हो चुका हो वही लिख सकता है : सुंदरता अभिशाप विश्व का / सुंदरता वरदान प्रिये / इस क्षणभंगुर सुंदरता पर मत करना अभिमान प्रिये / यौवन के इस प्रखर तरणि को एक दिवस ढल जाना है / मृत्यु ताप लगते ही हिम की / इस छवि को गल जाना है। (कलापी) प्रसिद्ध आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने आरसी की कृति ‘नन्ददास’ के बारे में लिखा है, “रोमांटिक कवियों में कुछ कवि आगे चलकर अध्यात्मवाद की ओर मुड़ गए और आरसी भी उनमें से एक हैं। निराला ने ‘तुलसीदास’ की जीवन कथा के माध्यम से देशकाल के शर से विंधकर ‘जागे हुए अशेष छविधर’ छायावादी कवि की छवि देखलाकर परम्परा का विकास किया तो कवि आरसी ने ‘नन्ददास’ के माध्यम से परम्परा का पुनरालेखन किया है।”  
आरसी की कहानियों को पढ़ते हुए अक्सर जयशंकर प्रसाद का स्मरण हो उठता है। क्योंकि प्रसाद की कहानियों (उदाहरण के लिए ‘पुरस्कार’) में कई जगहों पर प्रेम और बलिदान का द्वंद्व दिखाई देता है। इस बात की पुष्टि हरीश जायसवाल के एक कथन से होती है। हरीश लिखते हैं, “आरसी बाबू की कहानियों में जहाँ प्रेम अपनी ऊँचाई पर दीख पड़ता है वहाँ बलिदान भी अपनी चरम सीमा पर स्थित मालूम होता है। सस्ते रोमांस की कमी उनकी कहानियों को और अधिक निखारने में बहुत हद तक कामयाब हुई है। प्रेम के नाम पर आधुनिक नीचता से कहानी अछूती मालूम होती है जो शुभ है।” सच तो यह है कि आरसी की कहानियों में एक विशेष प्रकार का मनोरंजक तत्व है। इसमें न सिर्फ़ भावना, कल्पना तथा यथार्थ का अद्भुत समन्वय है, बल्कि जीवन का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भी है।
जब हम एकांकी की बात करते हैं, तो इसमें भी भारतीय समाज की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आती है। उदाहरण के लिए ‘पुनर्मिलन’ और ‘वैतरणों के तीर पर’। इसके अलावा, ‘जब दुनिया अबोध थी’ एकांकी में एक अजीब तरह की ‘फैंटेसी’ देखने को मिलती है। यह ‘फैंटेसी’ आरसी के विशाल कल्पना लोक का एक हिस्सा भर है। डॉ. रामचरण महेंद्र आरसी की एकांकियों का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं, “आरसी प्रसाद सिंह एकांकियों में भी चिंतन-प्रधान गम्भीर साहित्य की सृष्टि कर सके हैं। इनमें समाज, धर्म, राजनीति, सामाजिक घटनाओं, भौतिकवाद, समाजवाद तथा साम्यवाद का विवेचन हुआ है।”  
आज के दौर में जहाँ साहित्यकार बच्चों के लिए कम लिख रहे हैं, वहीं आरसी के यहाँ बच्चों के लिए विशेष सामग्री मौजूद है। बच्चों के मनोविज्ञान पर अच्छी पकड़ रखने वाले आरसी के बारे में समालोचक प्रताप साहित्यालंकार का कहना है, “आरसी शिशुओं और बालकों की अपेक्षा किशोरों के कवि हैं। कवि की अधिकांश कविताओं की रचना 12 से 16 वर्ष की उम्र के कोमल और सुकुमार मति वाले किशोरों के लिए हुई है। यद्यपि कवि ने शिशुओं के उपयुक्त काव्य का भी निर्माण किया है, तथापि उसका हृदय किशोरों के मनोरंजन के लिए ही अधिक उन्मुख है। उसे प्रकृति की ओर से बालसुलभ हृदय उपहार में मिला है, तभी वह तथ्यों को सरल और सरस बनाने की कला में निपुण है।” बच्चों के लिए लिखी गई पुस्तकों में चंदामामा, चित्रों में लोरियाँ, ओनामासी, रामकथा, जादू की वंशी, सोने का झरना, काग़ज़ की नाव, बाल गोपाल, हीरा-मोती, कथामाला, क़लम और बंदूक, जगमग आदि प्रमुख हैं।
कहते हैं कि एक रचनाकार अपनी रचनाओं में ज़िंदा रहता है। लेकिन उनके क़रीबी और ग्रामीण श्री जीवछ प्रसाद सिंह का कहना है, “आरसी बाबू की जितनी रचनाएँ प्रकाशित हुईं हैं, उससे कहीं ज़्यादा अप्रकाशित हैं।” पता नहीं कारण क्या है? कहा तो यह भी जाता है कि पांच दर्जन से अधिक पांडुलिपियां अब भी अप्रकाशित हैं। बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग ने उनकी पांडुलिपियां जमा करवाईं, जो आज तक प्रकाशित नहीं हो सकीं। आरसी के प्रकाशित कविता संग्रह हैं : आजकल, कलापी, संचयिता, आरसी, जीवन और यौवन, नई दिशा, पांचजन्य, आरण्यक, द्वन्द्व समास, युद्ध अवश्यंभावी है, मैं किस देश में हूँ, चाणक्य शिखा, बदल रही है हवा, आस्था का अग्निकुण्ड, भारत सावित्री और पाती राम के नाम। गीतों का एकमात्र संकलन है ‘प्रेम गीत’। नंददास, संजीवनी, कुँवर सिंह, रजनीगंधा और पूर्णोदय इनके लिखे प्रबंध काव्य हैं। पंचपल्ल्व, खोटा सिक्का, काल-रात्रि, एक प्याला चाय, आँधी के पत्ते, वे तुतलाते थे और ठंडी छाया कहानी संग्रह हैं। इसके अलावा, मैथिली कविता संग्रह के नाम हैं : माटिक दीप, पूजाक फूल, मेघदूत, और सूर्यमुखी।
‘आरसी और उनके साहित्य’ पर समग्र विचार करना अब भी शेष है। मेरी दृष्टि में आरसी ऐसे रचनाकार हैं, जिनके पाँव छायावाद की जड़ में जमे हैं और उंगलियाँ प्रगतिशीलता के पत्तों को छूती हैं। जो रोमांस के पेड़ों पर भारतीय दर्शन-चिंतन के फूल उगाते चलते हैं। जिनकी रचनाओं में न सिर्फ़ दैनिक जीवन की फ़िक्र है, बल्कि उसे सँवारने के उपाय भी। इन सबसे बढ़कर जो एक बात सामने आती है, वह है आम आदमी को एक इंसान के रूप में व्याख्यायित करना। उसके दुख-सुख को नजदीक से देखना और पार जाने के रास्ते भी बताना। इसीलिए मैं आरसी को ‘प्रेम और प्रगतिशीलता’ का कवि कहना चाहूँगा। बागमती नदी के किनारे बसे गाँव एरौत की पावन धरती पर 19 अगस्त 1911 को जन्मे आरसी प्रसाद सिंह 15 नवम्बर 1996 को दुनिया से चले गए। उनकी सुलगती हुई साँसें अपने आप में सिमट कर बुझ गईं और चाहने वालों के ज़ेहन में कतराती हुई कतरनें फूटती रहीं। जब भी मुझे आरसी का ख़याल उभरता है, मेरी आँखों का कुँवारापन टूट जाता है और नींदें धज्जी-धज्जी हो जाती हैं।

Saturday, August 03, 2013

सिराज फ़ैसल ख़ान की ग़ज़लें

'सिराज' फ़ैसल ख़ान ऐसा शायर है, जिसकी ग़ज़लों में रंग-ए-सियासत और रंग-ए-मुहब्बत समंदर के साहिल की तरह मौजूद है। एक आँख से देखने पर ये रंग दो दिखाई देते हैं, मगर दोनों आँखों से ये रंग दो नज़र नहीं आते। ख़ुशी होती है और ख़ुद पर यक़ीन आता है जब कोई शायर अपने शेरों में वजूद के बारीक टुकड़ों को बिखेरता भी है और समेटता भी। ऐसे में हवा के होंठों पर ग़ज़ल चस्पां हो जाती है और शायर बज़्म-ए-बहार में तन्हाई के नए फूल चुनने की ख़्वाहिश करता है। कलियाँ अपने आप चटकने लगती हैं। शायर इस बात से हैरान भी होता है और परेशान भी। मगर एक चीज़ जो शायर कभी नहीं भूलता वो  है- वक़्त के सफ़ेद सफ़हे पर सियाह हर्फ़ों को दर्ज़ करना। 'सिराज' को यह काम बख़ूबी आता है। फिलहाल, 'सिराज' फ़ैसल ख़ान की कुछ ग़ज़लें - त्रिपुरारि कुमार शर्मा 

1
ख़ौफ़ कब तक भेड़ियोँ से खायेगा 
मेमना ख़ुद भेड़िया बन जायेगा
झूठ मुझको देखकर मुस्कायेगा 
सच मुझे सूली पे जब चढ़वायेगा
जिस फ़ज़ा मेँ जी रही है ज़िन्दगी 
मौत रुक जाये तो दम घुट जायेगा
तीरगी से जंग कर के इक दिया 
गोद मेँ फिर सुब्ह की सो जायेगा
अब तभी मैँ पास उसके जाऊँगा 
जब वही लेने मुझे ख़ुद आयेगा
भूख होटोँ पर लिये निकलेगा दम 
गर मेरे हिस्से की रोटी खायेगा
यूँ लगा मुर्दे ने मानो ये कहा 
जा रहा हूँ आज कल तू आयेगा
सौपकर दीवान दुनिया को सिराज 
मीर के कदमोँ तले सो जायेगा
2
मुल्क़ को तक़सीम कर के क्या मिला है 
अब भी जारी नफ़रतोँ का सिलसिला है
क्योँ झगड़ते हैँ सियासी चाल पर हम 
मुझको हर हिन्दोस्तानी से गिला है
दी है क़ुर्बानी शहीदोँ ने हमारे 
मुल्क़ तोहफ़े मेँ हमेँ थोड़ी मिला है
हुक्मरानोँ ने चली है चाल ऐसी 
आम लोगोँ के दिलोँ मेँ फ़ासिला है
अब नज़र आता नहीँ कोई मुहाफ़िज़ 
हाँ, लुटेरोँ का मगर इक क़ाफ़िला है
लुट रहा है मुल्क़ अब अपनोँ के हाथोँ 
सोचिये आज़ाद होकर क्या मिला है
3
वो बड़े बनते हैँ अपने नाम से 
हम बड़े बनते हैँ अपने काम से
वो कभी आग़ाज़ कर सकते नहीँ 
ख़ौफ़ लगता है जिन्हेँ अन्जाम से
इक नज़र महफिल मेँ देखा था जिसे 
हम तो खोये हैँ उसी मेँ शाम से
दोस्ती, चाहत, वफ़ा इस दौर मेँ 
काम रख अय दोस्त अपने काम से
जिनसे कोई वास्ता भी अब नहीँ 
क्योँ वो जलते हैँ हमारे नाम से
उसके दिल की आग ठंडी पड़ गयी 
मुझको शोहरत मिल गयी इल्ज़ाम से
4
होटोँ पे उनके प्यार के गुल भी खिले रहे 
पर दिल मेँ नफ़रतोँ के भी काँटे भरे रहे
मुझको भी जंग के लिये उकसा के बारहा 
गद्दार दुश्मनोँ से भी मेरे मिले रहे
वो खुदकुशी की राह में अड़ कर खड़ी रही 
ताउम्र ज़िन्दगी से बहुत जूझते रहे
मौसम, जहाँ, ख़यालोँ मेँ तब्दीलियाँ हुयी 
कुछ ज़ख़्म ऐसे थे जो हरे के हरे रहे
मज़हब की वो छुरी थी सियासत के हाथ में 
एक दूसरे का लोग गला काटते रहे
वैसे तो बेज़मीरोँ की बस्ती मेँ मैँ रहा 
लेकिन मेरे ज़मीर के सिक्के खरे रहे
पीते रहे वो बैठ के हुजरे मेँ ख़ुद शराब 
लानत भी मयकशों पे मगर भेजते रहे
5
छोड़कर सारे कारवाँ हमने 
ख़ुद लिखी अपनी दास्ताँ हमने
बन गया वो मेरा वबाले जाँ 
जिसको समझा था अपनी जाँ हमने
आग नफ़रत की ख़ुद लगायी है 
ख़ुद ही फूँका है ये जहाँ हमने
वापसी की कोई डगर है क्या 
कुछ भी छोड़ा है क्या यहाँ हमने
झूठ कहने की आई मजबूरी 
काटकर फेँक दी ज़ुबाँ हमने
सबकी दस्तार आ गिरी "फ़ैसल" 
पाँव रक्खे जहाँ जहाँ हमने
6
बुरे और भले लोग मिलते रहे 
के मिलते हुये सब से चलते रहे
ज़माने मेँ कोई भी अपना नहीँ 
परत दर परत राज़ खुलते रहे
बने चाँद तो अब्र ने ढक लिया 
जो सूरज बने हाय! जलते रहे
किसी रहगुज़र पे भी साया न था 
बदन मोम जैसे पिघलते रहे
मोहब्बत, ग़ज़ल, दोस्ती, दुश्मनी 
जवानी के दिन यूँ निकलते रहे
उन्हेँ ज़िद थी वो छत पे आये नहीँ 
हमेँ ज़िद थी हम भी टहलते रहे
मैँ ग़म मेँ भी ख़ुश हो के जीता रहा 
पड़ोसी मेरे मुझसे जलते रहे
सितारा कोई छू न पाये मगर 
तमन्नाओँ के पर निकलते रहे
ग़ज़ल तेरा दामन हमेँ मिल गया
के ग़म शे'र बन के निकलते रहे