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Monday, August 19, 2013

समय के आईने में आरसी : त्रिपुरारि कुमार शर्मा

मेरी दृष्टि में आरसी प्रसाद सिंह ऐसे रचनाकार हैं, जिनके पाँव छायावाद की जड़ में जमे हैं और उंगलियाँ प्रगतिशीलता के पत्तों को छूती हैं। जो रोमांस के पेड़ों पर भारतीय दर्शन-चिंतन के फूल उगाते चलते हैं। जिनकी रचनाओं में न सिर्फ़ दैनिक जीवन की फ़िक्र है, बल्कि उसे सँवारने के उपाय भी। इन सबसे बढ़कर जो एक बात सामने आती है, वह है आम आदमी को एक इंसान के रूप में व्याख्यायित करना। उसके दुख-सुख को नजदीक से देखना और पार जाने के रास्ते भी बताना। इसीलिए मैं आरसी को ‘प्रेम और प्रगतिशीलता’ का कवि कहना चाहूँगा। आरसी की जन्मतिथि ((19 अगस्त) पर उनकी स्मृति को नमन करते हुए, प्रस्तुत है यह लेख  - त्रिपुरारि कुमार शर्मा 

किसे ख़बर थी कि छायावाद के तृतीय उत्थान के कवियों में विशेष स्थान रखने वाले रचनाकार के साथ समय ऐसा (निर्मम) न्याय करेगा। एक ऐसा कवि, जिसे ‘जीवन-जोश-जवानी’ और ‘आस्था-अर्पण-अध्यात्म’ का कवि कहा जाता है। एक ऐसा कथाकार, जिसकी कहानियों में वक़्त की महीन बुनावट का बेहतर नमूना मिलता है। एक ऐसा एकांकीकार, जिसके एकांकी नाटकों में सामाजिक, राजनीतिक तथा मनोवैज्ञानिक स्वरूप झलकता है। जिसके ख़िला़फ युवावस्था में ही तत्कालीन पत्रिका ‘युवक’ (सम्पादक : रामवृक्ष बेनीपुरी) में प्रकाशित रचनाओं में क्रांतिकारी शब्दों का प्रयोग करने पर अंग्रेजी हुकूमत ने गिरफ़्तारी का वारंट जारी कर दिया। जिसने न सिर्फ़ हिंदी भाषा, बल्कि मैथिली भाषा के साहित्य को भी समृद्ध किया। जिसे साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई अन्य सम्मानों से नवाज़ा गया। जो देश-प्रदेश की अनेक संस्थाओं एवं सरकार द्वारा समय-समय पर सम्मानित और पुरस्कृत होता रहा। मैं बात कर रहा हूँ उस शख़्सियत की, जो एक साथ उपमा और उपमेय दोनों है। मैं बात कर रहा हूँ महान चिंतक, विशिष्ट साधक और युगाराध्य कवि आरसी प्रसाद सिंह की।
यह बात किसी अचरज से कम नहीं कि 74 वर्षों तक (किसी भी कवि के जीवन में सबसे लम्बा रचनाकाल) लगातार लिखने के बावजूद ‘आरसी और उनके साहित्य’ का विवेचन एक व्यापक दृष्टि के तहत नहीं किया गया। आलोचक यह कह कर अपना पल्ला झाड़ते रहे हैं कि आरसी के लेखन में कोई केंद्रीय भाव नहीं है। उनकी कोई तय विचारधारा या लेखन क्षेत्र नहीं है। एक आलोचक व्यक्तिवादी गीति कविता-धारा (जिसमें आरसी भी शामिल हैं) के बारे में लिखते हैं, “इनके पास जीवन-दृष्टि नहीं थी—न तो पुरानी आध्यात्मिक जीवन-दृष्टि और न नवीन समाजवादी दृष्टि। ये कवि अपने अनुभवों से परिचालित हो रहे थे, उनके अनुभव भावुक हृदय के अनुभव थे। उनकी दृष्टि रोमानी थी, अत: वे व्यक्ति को न तो सामाजिक शक्ति से जोड़ सके न आध्यात्मिक आदर्शों से। जीवन-दृष्टि के अभाव में यह व्यक्तिवादी अनुभव निराशा, मृत्यु की छाया और नियति बोध से ग्रस्त हैं।” मैं इनकी बातों से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ। ठीक है कि आरसी (और उस समय के कवियों) के पास जीवन-दृष्टि नहीं थी। लेकिन मैं कहना चाहता हूँ कि जिनके पास जीवन-दृष्टि होती है, उनके पास जीवन नहीं होता। यह बात स्वंय साबित हो जाती है कि आरसी के पास जीवन-दृष्टि न सही, जीवन था। इसीलिए तो हम उन्हें जीवन और यौवन का कवि कहते हैं।
दूसरी बात, क्या बिना किसी दृष्टि के कविता सम्भव है? हाँ, आरसी की दृष्टि समय के साथ बदलती रही है, जिसे मैं सकारात्मक पक्ष समझता हूँ। आलोचक शायद इस बात से सहमत होंगे कि नदी तभी तक ज़िंदा मानी जाती है, जब तक उसमें प्रवाह है। अपनी रचनाओं में विविधता संजोने वाले आरसी ने गुणात्मक रूप से प्रयोग किए हैं। मुझे लगता है यही विविधता आरसी की सबसे बड़ी ख़ूबी है और सच्चा-सार्थक कवि होने का सबसे बड़ा प्रमाण भी। तीसरी बात, मैं नहीं मानता कि कविता का काम कोई आदर्श स्थापित करना नहीं है। न तो सामाजिक और न आध्यात्मिक। कविता तो सभी आदर्शों-अनादर्शों के पार ले जाती है। जहाँ से कवि की पुकार उठती है। यही पुकार आरसी को ‘उमर ख़य्याम’ की परम्परा से जोड़ती हुई आगे लेकर भी जाती है। जब आरसी कहते हैं : तेरा पथ जाता उधर जहाँ बहती निशिबासर मद-धारा / मेरे हित शूली, दमन, दंड मेरा विश्राम भवन कारा। / करबद्ध सदैव मनाता तू, मेरी मधुशाला रहे अचल। / मैं कहता, मानव की जय हो निर्भय हो जगतीतल सारा। (कलापी)
इसी सिलसिले में आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री का कथन उचित मालूम पड़ता हैं, “आरसी का काव्य मर्म-मूल से प्रलम्ब डालियों और पल्लव-पत्र-पुष्पों तक जैसा प्राण-रस संचारित करता रहा है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। किसी एक विषय, स्वर या कल्पना के कवि वह नहीं हैं। उनकी सम्वेदना जितनी विषयों से जुड़ी हुई है, उनकी अनुभूति जितनी वस्तुओं की छुअन से रोमांचित है, उनका स्वर जितने आरोहों, अवरोहों में अपना आलोक निखारता है, कम ही कवि उतने स्वरों से अपनी प्रतिभा के प्रसार के दावेदार हो सकते हैं।” आरसी ने अपने जीवन काल में जब-जब जो-जो भोगा, लिखा। अडिग चट्टान बनकर उम्र के विभिन्न पड़ावों पर आने वाली बाधाओं का डटकर मुकाबला किया। उम्र भर नियंत्रण के ख़िलाफ आक्रोश ज़ाहिर करते रहे। जीवन को ‘निर्झर’ की तरह जिया। आरसी का साहित्य सच्चे अनुभवों की आग में पकी हुई फसल है। यह बात और है कि उनकी मस्ती से भरी रचनाएँ पाठकों को अधिक प्रिय हैं। आरसी ‘नई दिशा’ शीर्षक कविता में लिखते हैं : तुम मेरी मस्ती को देखो / इतनी मस्ती, इतनी मस्ती / मैं बहका-बहका जाता हूँ। / कुछ का कुछ हूँ सुन लेता मैं / कुछ का कुछ कह जाता हूँ। / जब आती है मौज किसी की / मैं तस्वीर सजा लेता हूँ। / जब उमंग उठती है / मैं ज़ंजीर बजा लेता हूँ।
इस मस्ती की एक वजह और भी है। कवि को मालूम है कि जीवन एक यात्रा है और जन्म-मरण दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू है। इस सच से जिसका साक्षात्कार हो चुका हो वही लिख सकता है : सुंदरता अभिशाप विश्व का / सुंदरता वरदान प्रिये / इस क्षणभंगुर सुंदरता पर मत करना अभिमान प्रिये / यौवन के इस प्रखर तरणि को एक दिवस ढल जाना है / मृत्यु ताप लगते ही हिम की / इस छवि को गल जाना है। (कलापी) प्रसिद्ध आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने आरसी की कृति ‘नन्ददास’ के बारे में लिखा है, “रोमांटिक कवियों में कुछ कवि आगे चलकर अध्यात्मवाद की ओर मुड़ गए और आरसी भी उनमें से एक हैं। निराला ने ‘तुलसीदास’ की जीवन कथा के माध्यम से देशकाल के शर से विंधकर ‘जागे हुए अशेष छविधर’ छायावादी कवि की छवि देखलाकर परम्परा का विकास किया तो कवि आरसी ने ‘नन्ददास’ के माध्यम से परम्परा का पुनरालेखन किया है।”  
आरसी की कहानियों को पढ़ते हुए अक्सर जयशंकर प्रसाद का स्मरण हो उठता है। क्योंकि प्रसाद की कहानियों (उदाहरण के लिए ‘पुरस्कार’) में कई जगहों पर प्रेम और बलिदान का द्वंद्व दिखाई देता है। इस बात की पुष्टि हरीश जायसवाल के एक कथन से होती है। हरीश लिखते हैं, “आरसी बाबू की कहानियों में जहाँ प्रेम अपनी ऊँचाई पर दीख पड़ता है वहाँ बलिदान भी अपनी चरम सीमा पर स्थित मालूम होता है। सस्ते रोमांस की कमी उनकी कहानियों को और अधिक निखारने में बहुत हद तक कामयाब हुई है। प्रेम के नाम पर आधुनिक नीचता से कहानी अछूती मालूम होती है जो शुभ है।” सच तो यह है कि आरसी की कहानियों में एक विशेष प्रकार का मनोरंजक तत्व है। इसमें न सिर्फ़ भावना, कल्पना तथा यथार्थ का अद्भुत समन्वय है, बल्कि जीवन का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भी है।
जब हम एकांकी की बात करते हैं, तो इसमें भी भारतीय समाज की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आती है। उदाहरण के लिए ‘पुनर्मिलन’ और ‘वैतरणों के तीर पर’। इसके अलावा, ‘जब दुनिया अबोध थी’ एकांकी में एक अजीब तरह की ‘फैंटेसी’ देखने को मिलती है। यह ‘फैंटेसी’ आरसी के विशाल कल्पना लोक का एक हिस्सा भर है। डॉ. रामचरण महेंद्र आरसी की एकांकियों का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं, “आरसी प्रसाद सिंह एकांकियों में भी चिंतन-प्रधान गम्भीर साहित्य की सृष्टि कर सके हैं। इनमें समाज, धर्म, राजनीति, सामाजिक घटनाओं, भौतिकवाद, समाजवाद तथा साम्यवाद का विवेचन हुआ है।”  
आज के दौर में जहाँ साहित्यकार बच्चों के लिए कम लिख रहे हैं, वहीं आरसी के यहाँ बच्चों के लिए विशेष सामग्री मौजूद है। बच्चों के मनोविज्ञान पर अच्छी पकड़ रखने वाले आरसी के बारे में समालोचक प्रताप साहित्यालंकार का कहना है, “आरसी शिशुओं और बालकों की अपेक्षा किशोरों के कवि हैं। कवि की अधिकांश कविताओं की रचना 12 से 16 वर्ष की उम्र के कोमल और सुकुमार मति वाले किशोरों के लिए हुई है। यद्यपि कवि ने शिशुओं के उपयुक्त काव्य का भी निर्माण किया है, तथापि उसका हृदय किशोरों के मनोरंजन के लिए ही अधिक उन्मुख है। उसे प्रकृति की ओर से बालसुलभ हृदय उपहार में मिला है, तभी वह तथ्यों को सरल और सरस बनाने की कला में निपुण है।” बच्चों के लिए लिखी गई पुस्तकों में चंदामामा, चित्रों में लोरियाँ, ओनामासी, रामकथा, जादू की वंशी, सोने का झरना, काग़ज़ की नाव, बाल गोपाल, हीरा-मोती, कथामाला, क़लम और बंदूक, जगमग आदि प्रमुख हैं।
कहते हैं कि एक रचनाकार अपनी रचनाओं में ज़िंदा रहता है। लेकिन उनके क़रीबी और ग्रामीण श्री जीवछ प्रसाद सिंह का कहना है, “आरसी बाबू की जितनी रचनाएँ प्रकाशित हुईं हैं, उससे कहीं ज़्यादा अप्रकाशित हैं।” पता नहीं कारण क्या है? कहा तो यह भी जाता है कि पांच दर्जन से अधिक पांडुलिपियां अब भी अप्रकाशित हैं। बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग ने उनकी पांडुलिपियां जमा करवाईं, जो आज तक प्रकाशित नहीं हो सकीं। आरसी के प्रकाशित कविता संग्रह हैं : आजकल, कलापी, संचयिता, आरसी, जीवन और यौवन, नई दिशा, पांचजन्य, आरण्यक, द्वन्द्व समास, युद्ध अवश्यंभावी है, मैं किस देश में हूँ, चाणक्य शिखा, बदल रही है हवा, आस्था का अग्निकुण्ड, भारत सावित्री और पाती राम के नाम। गीतों का एकमात्र संकलन है ‘प्रेम गीत’। नंददास, संजीवनी, कुँवर सिंह, रजनीगंधा और पूर्णोदय इनके लिखे प्रबंध काव्य हैं। पंचपल्ल्व, खोटा सिक्का, काल-रात्रि, एक प्याला चाय, आँधी के पत्ते, वे तुतलाते थे और ठंडी छाया कहानी संग्रह हैं। इसके अलावा, मैथिली कविता संग्रह के नाम हैं : माटिक दीप, पूजाक फूल, मेघदूत, और सूर्यमुखी।
‘आरसी और उनके साहित्य’ पर समग्र विचार करना अब भी शेष है। मेरी दृष्टि में आरसी ऐसे रचनाकार हैं, जिनके पाँव छायावाद की जड़ में जमे हैं और उंगलियाँ प्रगतिशीलता के पत्तों को छूती हैं। जो रोमांस के पेड़ों पर भारतीय दर्शन-चिंतन के फूल उगाते चलते हैं। जिनकी रचनाओं में न सिर्फ़ दैनिक जीवन की फ़िक्र है, बल्कि उसे सँवारने के उपाय भी। इन सबसे बढ़कर जो एक बात सामने आती है, वह है आम आदमी को एक इंसान के रूप में व्याख्यायित करना। उसके दुख-सुख को नजदीक से देखना और पार जाने के रास्ते भी बताना। इसीलिए मैं आरसी को ‘प्रेम और प्रगतिशीलता’ का कवि कहना चाहूँगा। बागमती नदी के किनारे बसे गाँव एरौत की पावन धरती पर 19 अगस्त 1911 को जन्मे आरसी प्रसाद सिंह 15 नवम्बर 1996 को दुनिया से चले गए। उनकी सुलगती हुई साँसें अपने आप में सिमट कर बुझ गईं और चाहने वालों के ज़ेहन में कतराती हुई कतरनें फूटती रहीं। जब भी मुझे आरसी का ख़याल उभरता है, मेरी आँखों का कुँवारापन टूट जाता है और नींदें धज्जी-धज्जी हो जाती हैं।

Monday, May 20, 2013

Poems by Jennifer Reeser

Jennifer Reeser's poems are restless phrases, appears with a new expression. Jennifer is an author boasts a wilderness; waiting for the rain. When the rain comes, all the stitches of the memories opened. Growing forest move toward the ocean. A shaken in the ocean happens and becomes a shuddering original sound in poetry, which can be felt between Murmurs within words. Jennifer is the author of An Alabaster Flask (For this she won Word Press 2002 First Book Prize), Winterproof (2005) and Sonnets from the Dark Lady and Other Poems (2012). She born in 1968 and currently lives in southern Louisiana - Tripurari Kumar Sharma

Souvenir 
So many mornings I awoke in tears from
one more dream of crying at her grave,
but she was always there, secure and strong,
perfumed with talc, or Oriental spice,
with perfect words and comfort cold as ice—
the only love I ever held too long.
Proper Creole Farewells
He said I had to teach him our goodbye
following that long silence parting brings,
then let his coffee steam against the air.
Career, it was, to look at him— but why
should two blue eyes be such off-limit things,
and differences breed inconsequence?
The city seemed to me no more aware
of our resplendent history than I
lamented what lay waiting in its wings;
but, after midnight, words and love both share
the latitude to be relieved of tense,
and, shining on the terraces— though dim—
stood streetlamps destined to confound me, since
their light could never cede the sight of him.
Tempted to doubt your love...
Tempted to doubt your love, I wept at last,
and flirted with the pleasures of despair,
exulted in the insults of the past,
then touched the newest silver in my hair,
finally pleased with your neglectful days,
affording, as they do, my chance to muse
so much the more on those incumbent ways
I dream you’d die for me, by bit or bruise.
Your silence will not wound me, and the words
of malice you might use are better spent
dissuading ardor from the bees and birds,
since whether or not you speak, I am content,
detecting in my circumstance a tinge
of something like the sweetness in revenge.
For A Friend Gone Mute
I cannot know what reason now incites
your silence—but while I await some fall
of correspondent tenor, I recall
your laughter in the old New Orleans rites,
the complement of silken attitude
which inclined me to call you friend that day.
An open shop beside the Vieux Carre`
still holds me in a fleeting latitude
you placed there, turning spritely in a dress
of black and beadwork.  There was no ring
of jazz blown through the Quarter on a wind—
the cobblestones were paused, as if to guess
your steps—and then, as now, no birds to sing
as if best love were that heard by a friend.
Sonnet for Maxim
I dreamed his death, where all his tiny limbs—
surrendered underneath a window ledge
to war I neither loved nor knew by name—
lay so far from those lullabies and hymns
I longed to sing him one last time in pledge,
that distance, in itself, turned into dream.
To touch his face and innocence became
my sole necessities, my only whims,
till, just as he unfolded at the edge
of reach, my own sobs woke me with the shame
of grief, and more: that, in the global scheme,
he craved such little space in which to die.
But most: that, after battle, it would seem
no one—no one—would glance at him, or cry.
I've been pondering Eternity Again
While I was still a child, at night I lay
in stillness on my bed, stubborn to see
the farthest vestige of eternity
Until within my mind, day piled on day,
each second piled thereafter, soon gave way
to such a paralyzing fear in me,
I'd countermand those thoughts impatiently—
knowing, (in time), forever couldn't stay.
By seeking paradigms outside their moment,
I'd tried to force forever to successions
of hours, as children might mistake atonement
for nothing more than sorry introspections,
then turned my bedside candle off to sleep,
with full faith that its lightlessness would keep.
To Hold Dawn
The day circles her lilies, and twines
up the wreathing barks of her trees;
morning stretches through frosting on slender new vines
as I touch you, another time, on waking's knees,
while the dew mote lifts,
and the breeze.
These smooth, silver joints of lifetime's news
bend easily now in our decade's flex—
and if I were alone, once again, I would choose
to choose you where evening and promise connect,
where strength's strong
and direct.
I've watched you, in the heart of dark, of hush,
your hands free from all sharpness of the living knife,
wishing that innocence could forever brush
against every expression in your convex life,
to strain the dim
and strife.
I've seen your eyes sleep; it looked as though
their lids were soft blinds my fingers drew,
obscuring the shades of the landscape, 'To Know,'
but obscuring, also, their winking, their blue,
and shrinking sight
as dreaming grew.
I've wished, in the vacuum of a silent thought,
that the bath of time could scour sorrow,
hoping the water running seconds have brought
could wash us together in pure tomorrow—
to buy our joys, not borrow—
could rinse the ceaseless band of anxieties clean,
washing through frailty to diurnal white.
My idea is no more than a bursting seam,
but for this moment's blink, it holds, in spite
of stubborn sun
and light.
Louisiana Broke My Sleep
Louisiana broke my sleep this morning
and drew me down her autumn waterways.
The cypress moss a-sway, the bayou yawning,
Louisiana broke my sleep this morning.
White egrets fell across the suns cape dawning,
as into skies of humid, coral haze,
Louisiana broke my sleep this morning,
and drew me down her autumn waterways.
Compass Rose
I'd buy you a Babushka doll, my heart,
and brush your ash-blonde hair until it gleams,
were Russia and our land not laid apart
by ocean so much deeper than it seems.
I have an oval pin, though—glossy lacquer
hand-made in Moscow, after glasnost came,
with fine, deft roses on a background blacker
perhaps, than history's collective shame.
I've done my best to compass you with roses:
the tablecloth, the walls, the pillowcase,
the western side-yard only dusk discloses
briefly, in Climbing Blaze and Queen Anne's lace.
May they suffice for peace when you discover
your love is not enough to turn the earth.
I dream I saw a handful of them hover
against my pane the morning of your birth.
The Figure in My Parlor
She’s Asian, that’s for certain, and the glint
of gold paint gilds a basket at her knees.
Her face rests on one palm, without a hint
whether she might be Thai or Japanese.
My glass shelves suit her, somehow, in her glaze
of fluid, alabaster dress, the folds
of sleeve dropped from her shoulder and her sprays
of plum—no doubt the darling of the molds.
And look still closer: you will see she’s lost
the wispy middle fingers of each hand,
which brought her price to half its virgin cost,
and hence a mistress, too, to understand.
Who knows but that the riddle of her nature
won’t keep me occupied for years to come?
A changing continent in every feature,
a satisfying secret in their sum.

Thursday, March 21, 2013

नज़्म कहते हो तो कहो मगर ये याद रहे !


दोस्तों! आज विश्व कविता दिवस (21 मार्च) है। यूनेस्को द्वारा 1999 में घोषित यह दिन अलग-अलग देशों में अलग-अलग तारीख को मनाया जाता है। यूरोप के कुछ देशों ने रोम के महान कवि विर्गिल (पब्लियस वर्गिलिउस मारो) के जन्मतिथि 15 अक्टूबर को विश्व कविता दिवस के रूप में चुना। कनाडा और कुछ देशों में कविता दिवस नवम्बर में भी मनाने की रिवायत है। इस मौक़े पर पेश कर रहा हूँ अपनी ही एक नज़्म जिसका उनवान है मशवरा : त्रिपुरारि कुमार शर्मा    
नज़्म कहते हो तो कहो मगर ये याद रहे
कि तुम कह रहे हो नज़्म ये जिसकी ख़ातिर
उसके आँसू की कोई बूँद न आने पाए
नज़्म गीली जो अगर हो गई किसी कारण
तुम्हारी आँख की पुतली से चिपक जाएगी
सूख जाएगी जैसे सूखे लहू का धब्बा
खुरच दो भी अगर दाग़ तो रह जाएगा
एक उँगली के इशारे से लोग पूछेंगे
तुम्हारे दाग़ में दुनिया किसी की देखेंगे
जो आँख मूँद भी लो फिर भी भीगी पलकों पर
एक टूटा हुआ चेहरा किसी का उभरेगा
तुम्हारी साँस के सीने पे पाँव रखेगा
तुम्हारी धड़कनों की धज्जियाँ उड़ाते हुए
सफ़ेद ओस के टुकड़ों को भर के मुट्ठी में
चमकती चुप्पियों को चाँद में चुनवाएगा
कैसे देखोगे अपनी आह को तुम मरते हुए
अपनी आवाज़ को तुम किस तरह दफ़नाओगे
ऐसे हालात में एक नज़्म भी कह पाओगे

Wednesday, August 15, 2012

आज़ादी का अर्थ

प्यार को समझाना और बता पाना मुमकिन नहीं है। इसे सिर्फ़ जाना, जीया और महसूस किया जा सकता है। जैसे किसी उड़ती हुई चिड़िया से पूछा जाए कि आकाश क्या है? तो वह कहेगी मेरे चारों तरफ जो है, वही आकाश है। मगर आकाश की परिभाषा मुश्किल है : त्रिपुरारि कुमार शर्मा 

आज़ादी का अर्थ जानने के लिए सबसे पहले ग़ुलामी का मतलब समझना बहुत ज़रूरी है। हम ग़ुलाम सिर्फ़ तभी नहीं होते जब हमें जेल या जंज़ीर में क़ैद कर दिया जाता है। हम ग़ुलाम तब भी होते हैं जब किसी नाम, धर्म, पार्टी, समाज, सम्प्रदाय, सीमा, सरहद, शादी या ऐसी किसी भी चीज़ से बंध जाते हैं। अगर कोई कहता है कि मैं आस्तिक हूँ तो वह भगवान से बंध जाता है। कोई कहता है कि मैं नास्तिक हूँ तब भी वह भगवान के न होने से जुड़ जाता है। बेहतर ये होगा कि हम किसी चीज़ के होने और न होने की उलझन से बचें। ये हक़ीक़त है कि जब कोई परेशानी या तकलीफ़ हमें गले से लगाती है तो हम बेचैन हो जाते हैं और घबराकर किसी दामन को थामना चाहते हैं। उस वक़्त एक उंगली अगर हमारी तरफ बढ़ता है तो हम पकड़ना चाहते हैं। यह नहीं सोचते कि हम बंध रहे हैं। हम ग़ुलाम हो रहे हैं।

सच तो ये है कि हम आज़ाद होना ही नहीं चाहते। जब तक हम नासमझ होते हैं हमारे माँ- बाप, समाज हर कोई हमें क़ैद करना चाहता है। समझदार होने के बाद, उम्र की हर दहलीज़ पर हम ख़ुद क़ैद होना चाहते हैं। इसका आग़ाज़ कुछ इस तरह से होता है। पैदा होते ही हमारा नाम रख दिया जाता है। हमें बताया जाता है कि ये तुम्हारी माँ है। ये बाप है। चाहे कोई अपना फ़र्ज़ निभाये या नहीं। सिर्फ़ पैदा करने वाले को माँ-बाप कहना कहाँ तक लाज़िमी है? कौन क्या है? किसे क्या कहा जाता है? दुनिया में सही और ग़लत की परिभाषा। बहुत कुछ बताया जाता है हमें। काश! कभी ऐसा हो भी कि सबको सबकुछ ख़ुद ही समझने का मौक़ा दिया जाये। दरअसल, हम जीने के लिए किसी न किसी सहारे की तलाश करते हैं। ऐसे में हम अपने आप को खो देते हैं। हम भूल जाते हैं कि इस दुनिया में न कोई हमें नुकसान पहुँचा सकता है और न ही फ़ायदा। बस अपनी सोच को फ़लक की एक छोटी-सी फ़ांक अदा करने की ज़रूरत है।

मुझे बहुत हंसी आती है जब कोई धर्म, पार्टी, समाज, सम्प्रदाय, सरहद बग़ैरह के नाम पर लड़ाई करने को अमादा हो जाता है। आज के दौर में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन बग़ैरह ढ़ूँढ़ना बहुत आसान है मगर एक इंसान की खोज बहुत मुश्किल है। लोगों को अपने से अलग किसी और चीज़ से जुड़े रहने में न जाने क्या खुशी होती है। लोग ग़ुलाम रहने में एक अजीब तरह का मज़ा महसूस करते हैं। यही ग़ुलामी सारी तकलीफ़ों का सबब है। एक बार अगर हम इन बंदिशों से निकल जायें तो हम सारे दर्द ख़त्म हो जायेंगे। ज़िंदगी की परेशानी फ़ना हो जायेगी। इन बंदिशों से आज़ाद होते ही हम ज़िंदगी के मूल रूप को उपलब्ध हो जाते है। ज़िंदगी को पा लेते हैं। पैदा होना और मर जाना, इस दर्मियान हम कई दफ़ा पैदा होते हैं और मरते हैं। आज इंसान सबकुछ बनना चाहता है सिवा इंसान के। ज़मीन, ताक़त, पैसा, पद पता नहीं क्या-क्या चाहिए एक तथाकथित इंसान को। क्या इंसान होने से बड़ा कोई पद है?

हम उम्र भर प्यार की जूस्तज़ू करते हैं। हमेशा अपने से बाहर तलाशते हैं। कभी ख़ुद की जानिब मुड़ कर नहीं देखते। कभी अपनी रूह को नहीं टटोलते। क्या आपने कभी ख़ुद को पहचानने की कोशिश की है। एक बार दिल में झाँक कर, उतर कर देखें। कितना सकून हासिल होगा, इस बात का अंदाज़ा भी आप नहीं लगा सकते। दरअसल, आज के इंसान की हालत उस मृग की मानिंद हो गई है जिसकी नाभि में कस्तूरी होता है और वह तमाम जगह ढ़ूँढ़ता रहता है। अकसर लोग पूछते हैं कि प्यार क्या है? प्यार को समझाना और कहना मुमकिन नहीं है। इसे सिर्फ़ जाना, जीया और महसूस किया जा सकता है। जैसे किसी उड़ती हुई चिड़िया से पूछा जाये कि आकाश क्या है? तो वह कहेगी मेरे चारों तरफ जो है वही आकाश  है। मगर आकाश की परिभाषा मुश्किल है।

अगर सबकुछ छोड़ कर हम अपने में डूबने की कोशिश करें। प्यार में डूबने की कोशिश करें तो मुमकिन है कि हम इंसानियत को हासिल कर सकेंगे। कोई कहता है कि वह एक इंसान से प्यार और दूसरे से नफ़रत करता है तो वह किसी से प्यार नहीं करता। प्यार तो हमारी फ़ितरत है। अगर हममें प्यार है तो वह सबकी ख़ातिर होगा। फिर वह कोई भी हो। अमीर, ग़रीब, इंसान, जानवर, सबके लिए। सच्चे अर्थों में हम तब ही आज़ाद हो पायेंगे। यह मेरा अपना तज़ुर्बा है। मैं अपने आप को सिर्फ़ और सिर्फ़ एक इंसान मानता हूँ। आज़ादी मेरे लिए सबसे ज़्यादा क़ीमती है। यही मेरी खुशी है। यही मेरे होने का अर्थ है।

Sunday, August 05, 2012

तुम साँस के सिक्के उछालती रहना


दोस्तों की ख़्वाहिश है कि यह नज़्म पेश करूँ। उनवान है 'तुम साँस के सिक्के उछालती रहना' : त्रिपुरारि कुमार शर्मा

तुम साँस के सिक्के उछालती रहना
मैं गले का गुल्लक सम्भाले रक्खूँगा

तुम धमनियों में धीमा लहू बन जाना
मैं टूटी धड़कनों को सीने में चिपकाऊँगा

तुम आँख के आँगन में छुपा लेना मुझे
मैं अपनी उम्र सारी खेलकर गुज़ारूँगा

पीली धूप से जब तुम पकाओगी मौसम
लम्हा तोड़कर मैं लम्बा छाता बुन लूँगा

सूखी बारिश से जब टूटेगा प्यासा पानी
तुम्हारे होंठ के बारे में फिर से सोचूँगा

गीली रेत में जिस तरह बूँद बसती है
तुम्हारे जिस्म में अपना वजूद खोजूँगा

तुम साँस के सिक्के उछालती रहना
मैं गले का गुल्लक सम्भाले रखूँगा 

Tuesday, July 17, 2012

मैं जब भी तुमसे बात करना चाहता हूँ


इस नज़्म का उनवान है 'अनाथ-सी आवाज़', इसके बारे में क्या कहूँ? आप ख़ुद समझ सकते हैं : त्रिपुरारि कुमार शर्मा  

मैं जब भी तुमसे बात करना चाहता हूँ
देर तक देखता रहता हूँ ख़लाओं में कहीं
एक अनाथ-सी आवाज़ आह भरती है
अपनी आँख में तब बात बोया करता हूँ
मेरे ख़याल के खेतों में ओस गिरती है
सफ़ेद बर्फ़-सी जम जाती है पुतली पर

लहूलुहान नज़र आती है ज़ुबान मेरी
मगर पुकार में कोई थकन नहीं मिलती
बस उम्मीद की छाती पर छाले उगते हैं
अभी तो फ़ासलों के फ़र्श पर लेटा हुआ हूँ
साँस लेती हुई हर सोच सिहर उठती है
मेरे दिमाग़ में कुछ दर्द-सा दम भरता है
बदन में बहता हुआ लाल लहू ज़िंदा है
जाने क्या सोचकर किस बात से शर्मिंदा है
मेरी
पलकों ने तुम्हें जब भी चूमना चाहा
मैंने फ़ासलों की हर फसल जलाई है
जैसे होली से पहले जलाए रात कोई
जैसे होंठ में दफ़नाई जाए बात कोई
जैसे प्यास में पोशीदा हो बरसात कोई
जैसे ख़्वाब के खेतों में मुलाक़ात कोई
जैसे नीलाम-सी हो जाए नीली ज़ात कोई 
जैसे जीत में जम्हाई ले-ले मात कोई
सिवाय इसके मुझे कुछ भी नहीं कहना है
तुम्हारी आँख के आँचल के तले रहना है

Monday, April 09, 2012

ठीक नहीं है तबीयत मेरी इन दिनों


पिछले महीने दिल्ली में हुए एक आयोजन के दौरान मैंने एक कविता पढ़ी थी 'तबीयत'। कुछ मित्र जो उस 'काव्य संध्या' का हिस्सा नहीं बन पाए थे, उनका आदेश हुआ कि वह कविता पोस्ट करूँ। तो पेश है  'तबीयत' : त्रिपुरारि कुमार शर्मा

ठीक नहीं है तबीयत मेरी इन दिनों
यह कहा है डॉक्टर ने मुझे
खाना कम खाओ
अधिक ग़म खाओ
सुबह, सूरज की एक बूँद
आधा गिलास पानी के साथ
और रात को सोते समय
चम्मच भर चाँदनी, बिना पानी के
अगर हो सके तो
एक मुट्ठी छाँव की
थोड़ी-सी मिट्टी गाँव की
मिला के करना मालिश
सूख गये हैं कुछ पेड़ आम के
चिड़ियों का चहकना नीलाम हुआ क्या?
बिक गई क्या बच्चों की मुस्कुराहट भी?
एक नया अनाथालय जन्मा फिर
फिर जवान हो गया वृद्धाआश्रम
किसी का पेट भरा हो या भूखा
कोई प्लेटफॉर्म पर सोये या पार्क में
उसे क्या मतलब?
कोई गरीब है, परेशान है
कहीं माथे पर सिन्दूर नहीं
किसी के घर में तन्दूर नहीं
वह क्यों पूछने जाए?
क्या है तुम्हारा दुख?
वह जिसे जानता नहीं
अंधेरा खेलता है साथ उसके
एक खेल है पतंग-सा
जब चूमता है कोई आकाश को
वह दाँतों से काटता है साँस को
सर पटकती है सूखी इच्छाएँ
ओस से बुझती है प्यास अनुभव की
धीमी आँच पर आँखें पिघलती है
करवटें लेता है स्वप्न-सा कुछ
देखता हूँ तब भी, अब भी देखता हूँ
अब भी लाल है लहू
बदन में दफ़्न है सिहरन
पानी अब भी गीला है
गगन ही रास्ता था तब
तलवे घायल हैं, तारा चुभा शायद
चाँद था कि जली रोटी थी माँ के हाथ में
मेरे होठों पर था खून का धब्बा
फेर लिया गीला तौलिया यूँ ही
टेबल पर पड़ी है बाबूजी की चिट्ठी
अगर समय होता अवश्य पढ़ता
क्यों सोचने लगा हूँ ऐसी बातों को
ऐसी बातें क्यों मुझे सोचती है
कोई मरता है तो मरे
कोई रोता है तो रोए
मुझे क्या?
मैं तो डॉक्टर की सलाह मानूँगा
बीतते हुए पलों से जीवन छानूँगा
ठीक नहीं है तबीयत मेरी इन दिनों
यह कहा है डॉक्टर ने मुझे।

Thursday, March 15, 2012

बहुत फ़र्क है तुम्हारे और मेरे भारत में !



इस बात से इंकार करना मुश्किल है कि भारत में दो-दो भारत बसते हैं। मेरे लिए भारत के क्या मायने हैं? इस बात की ओर इशारा करती है मेरी यह कविता 'बहुत फ़र्क है तुम्हारे और मेरे भारत में' : त्रिपुरारि कुमार शर्मा


तुम्हारा भारत- 
एक डंडे की नोक पर फड़फड़ाता हुआ तीन रंगों का चिथड़ा है
जो किसी दिन अपने ही पहिए के नीचे आकर
तोड़ देगा अपना दम
तुम्हारे दम भरने से पहले।
मेरा भारत-
चेतना की वह जागृत अवस्था है
जिसे किसी भी चीज़ (शरीर) की परवाह नहीं
जो अनंत है, असीम है
और बह रही है निरंतर।

तुम्हारा भारत-
सफ़ेद काग़ज़ के टुकड़े पर
महज कुछ लकीरों का समन्वय है
जो एक दूसरे के ऊपर से गुज़रता हुआ  
आपस में ही उलझ कर मर जाएगा एक दिन।
मेरा भारत-
एक स्वर विहीन स्वर है
एक आकार विहीन आकार है
जो
सिमटा हुआ है ख़ुद में
और फैला हुआ है सारे अस्तित्व पर।

तुम्हारा भारत-
सरहदों में सिमटा हुआ ज़मीन का एक टुकड़ा है
जिसे तुम
माँ शब्द की आड़ में छुपाते रहे
और करते रहे बलात्कार हर एक लम्हा
लाँघकर निर्लज्जता की सारी सीमाओं को।
मेरा भारत-
शर्म के साए में पलती हुई एक युवती है
जो सुहागरात में उठा देती है अपना घुँघट
प्रेमी की आगोश में बुनती है एक समंदर
एक नए जीवन को जन्म देने के लिए। 

तुम्हारा भारत-
राजनेताओं और तथा-कथित धर्म के ठेकेदारों
दोनों की मिली-जुली साज़िश है
जो टूटकर बिखर जाएगी किसी दिन
अपने ही तिलिस्म के बोझ से दब कर।

मेरा भारत
-
कई मोतियों के बीच से गुज़रता हुआ
माला की शक्ल में वह धागा है
जो मोतियों के बग़ैर भी अपना वजूद रखता है।

बहुत फ़र्क है तुम्हारे और मेरे भारत में!
 

Monday, February 20, 2012

अध्यात्म और मीडिया


इस लेख के जरिए मैंने बहुत पहले अध्यात्म और मीडिया के बीच के सम्बंध को समझने और समझाने का प्रयास किया था। उस वक़्त एक अख़बार में इसका एक अंश प्रकाशित हुआ था। आज प्रस्तुत है पूरा लेख : त्रिपुरारि कुमार शर्मा

अध्यात्म और मीडिया
ऐसे शब्द हैं जिसका अर्थ समझना और कहना दोनों मुश्किल मगर नामुमकिन नहीं है। मुमकिन इसलिए कि मैं आज, इस वक़्त आपसे मुख़ातिब हूँ और आप मुझसे। दरअसल, ये दोनों आपस में जुड़े हुए हैं। वर्तमान में इनका सम्बंध और भी गहरा हो गया है। अध्यात्म और मीडिया में एक बात कॉमन है। इंसान की ज़िंदगी पर सीधा असर होता है। क्योंकि दोनों की वजह से इंसान की ज़िंदगी में क्रांति मुमकिन है। एक आध्यात्मिक व्यक्ति हर तरह से आज़ाद होता है। अगर हम हर तरह से आज़ाद हो जायें तो आध्यात्मिक हो सकते हैं। और इस यात्रा में मीडिया बहुत बड़ा मददगार साबित हो सकता है। मुझे मीडिया से बहुत उम्मीदें हैं। हमारा देश बहुत सालों तक ग़ुलाम रहा। आज हम आज़ाद तो हैं मगर यह सिर्फ़ राजनीतिक आज़ादी है। हम आज भी मानसिक रूप से ग़ुलाम हैं। हम आज भी पूरी तरह से आज़ाद नहीं हैं। जो लोग कहते हैं कि मैं आज़ाद हूँ, उन्हें शायद आज़ादी का अर्थ मालूम नहीं है। मैं इस पर थोड़ी-सी रौशनी डालना चाहुँगा।

आज़ादी का अर्थ जानने के लिए सबसे पहले ग़ुलामी का मतलब समझना बहुत ज़रूरी है। हम ग़ुलाम सिर्फ़ तभी नहीं होते जब हमें जेल या जंज़ीर में क़ैद कर दिया जाता है। हम ग़ुलाम तब भी होते हैं जब किसी नाम
, धर्म, जाति, पार्टी, समाज, सम्प्रदाय, सीमा, सरहद, शादी या ऐसी किसी भी चीज़ से बंध जाते हैं। अगर कोई कहता है कि मैं आस्तिक हूँ तो वह भगवान से बंध जाता है। कोई कहता है कि मैं नास्तिक हूँ तब भी वह भगवान के न होने से जुड़ जाता है। बेहतर ये होगा कि हम किसी चीज़ के होने और न होने की उलझन से बचें। ये हक़ीक़त है कि जब कोई परेशानी या तकलीफ़ हमें गले से लगाती है तो हम बेचैन हो जाते हैं और घबराकर किसी दामन को थामना चाहते हैं। उस वक़्त एक उंगली अगर हमारी तरफ बढ़ती है तो हम पकड़ना चाहते हैं। यह नहीं सोचते कि हम बंध रहे हैं। हम ग़ुलाम हो रहे हैं।

हम सुख और शांति पाने के लिए अध्यात्म का रास्ता इख़्तियार करते हैं। उम्र भर प्यार की जूस्तज़ू करते हैं। हमेशा अपने से बाहर तलाशते हैं। कभी ख़ुद की जानिब मुड़ कर नहीं देखते। कभी अपनी रूह को नहीं टटोलते। क्या आपने कभी ख़ुद को पहचानने की कोशिश की है। एक बार दिल में झाँक कर
, उतर कर देखें। कितना सकून हासिल होगा, इस बात का अंदाज़ा भी आप नहीं लगा सकते। अध्यात्म हमें ख़ुद से मुलाक़ात का एक मौक़ा देता है। अगर बाहर भटकना छोड़ कर हम अपने में डूबने की कोशिश करें। प्यार में डूबने की कोशिश करें तो मुमकिन है कि हम इंसानियत को हासिल कर सकेंगे। इसके लिए हमें कहीं और जाने की ज़रूरत नहीं है। हम जहाँ हैं वहीं रह कर इसे हासिल किया जा सकता है। हिमालय की गुफ़ाओं या किसी घने जंगल में जा कर शांति की तलाश करना, अपने फ़र्ज़ से मुकर जाना है।

मैं शुक्रगुज़ार हूँ उन तमाम चैनलों का जिस पर आध्यात्मिक प्रोग्राम दिखाये जाते हैं। आज बहुत से अख़बार हैं
जिसमें आध्यात्म या ज़िंदगी से जुड़ी हुई बातों को बड़ी गम्भीरता से लिखा जाता है। मगर यहाँ पर थोड़ी-सी कमी रह गई है। आज तथा-कथित आध्यात्मिक गुरू अपनी सस्ती लोकप्रियता के लिए मीडिया का सहारा लेते हैं। यह सब प्री-पेड और प्री-प्लान्ड होता है। एक तथा-कथित बाबा अपनी पत्नी की जन्मतिथि का उत्सव मनाने के लिए एक आयोजन करता है। एक दुर्घटना होती है। वहाँ पर सैकड़ों लोगों की मौत हो जाती है। बाबा मुस्कुराते हुए कहता है – उन लोगों को उनकी मौत यहाँ तक खींच लाई थी। एक दूसरा तथा-कथित बाबा बग़ैर प्रशासन की इजाज़त के अपना हेलीकॉप्टर कहीं भी उतरवा लेता है। और माला पहनाने के लिए घंटों से इंतज़ार कर रही महिला को धक्का दे कर आगे बढ़ जाता है। फिर मंच पर हाथ में माइक लिए हुए आध्यात्म की बात करता है। यह कहाँ तक लाज़िमी है। यह फैसला आप पर छोड़ता हूँ। मैं मुबारक़वाद देता हूँ उन तमाम मीडिया हाउस को जिन्होंने अपने को भगवान बताने वाले तथा-कथित बाबाओं के काले कारनामों का पर्दाफ़ाश किया है। अध्यात्म की आड़ में सेक्स रैकेट चलाने वालों की कमी नहीं है। वक़्त-वक़्त पर इसका ख़ुलासा भी होता रहा है। अगर मीडिया नहीं होता तो यह सब मुमकिन नहीं था। मीडिया के माध्यम से सच सामने आ रहा है। यह एक अच्छी बात है।

एक बात और। आध्यात्मिक होने का मतलब किसी धर्म विशेष के प्रति लगाव या कट्टरपन का भाव अपने अंदर पैदा कर लेना नहीं है। बल्कि तमाम धर्मों के मूल मंत्र को
, उसके आधार को जानकर सबको को बतलाना है। कभी कभी कुछ ख़ास चैनल पर देखने को मिल जाता है कि कोई कवि, लेखक या चित्रकार ज़िंदगी की खुबसूरती को बयान कर रहा है। कभी-कभी किसी ऐसे व्यक्ति की तस्वीर या रचना भी किसी अख़बार की सुर्ख़ी हो जाती है। मीडिया को इसे ही प्राथमिकता देनी चाहिए न कि बलात्कार, हत्या, चोरी, राजनीति बग़ैरह को। मैं इस बात से इंकार नहीं करता कि प्रेस के मालिक इस तरह की चीज़ों को बढ़ावा दे कर अपना नुकसान कर लेंगे। लेकिन क्या अपने फ़ायदे के लिए इंसानियत को मिट्टी में मिलाना ठीक है? महज चंद रूपयों के लिए इंसानियत को धोक़ा देना, ख़ुद से फ़रेब करना लाज़िमी है? क्या इंसान होने के नाते हमारा इंसानियत और समाज के प्रति कोई फर्ज़ नहीं बनता है? पैसे कमाने के और भी तरीक़े हैं। मुझे लगता है पत्रकारिता के दामन पर यह धब्बा लगाना ग़लत है। अगर हम अच्छी ख़बर न दे सकें तो कम से कम ऐसी ख़बर देने से ज़रूर बचना चाहिए जिससे इंसानियत को शर्मिंदा होना पड़े। आज के दौर में हमारे पास मीडिया एक ऐसा माध्यम है जिसकी मदद से ज़िंदगी को खुबसूरत बनाया जा सकता है। शर्त ये है कि इसका सही इस्तेमाल किया जाये।

इस बाबत ग्रेज़ुएशन के दौरान अपने रूम पार्टनर के मनोविज्ञान का मुझे थोड़ा-सा तज़ुर्बा है। उसे रेसलिंग मैच देखना बहुत पसंद था। मैंने नोटिस किया कि जिस दिन वह रेसलिंग मैच देखा करता था। उसके व्यवहार में थोड़ी-सी तब्दीली होती थी। वह और दिन की तरह नॉर्मल नहीं होता था। तब मुझे पता चला कि हम जिस तरह की चीज़ों को देखते हैं
, उसका असर हमारे उपर होता है। आज मीडिया जिस तरह की ख़बरें पेश करता है, मुमकिन है कि दर्शक या पाठक की संख्या में इज़ाफ़ा हो मगर यह इंसान के लिए बेहतर नहीं है। दिल्ली में रहने की वजह से मेरा अकसर मेट्रो से सफ़र करना होता है। आज तक किसी भी चेहरे पर मुस्कुराहट मुझे नज़र नहीं आई। सब परेशान-से लगे। मीडिया भी उस मुस्कान की मौत का ज़िम्मेदार हैएक लड़का और एक लड़की भी अगर साथ हैं तो एक ख़ौफ़ उनकी पलकों पर तड़प रहा होता है कि पता नहीं अगले लम्हे में क्या होगा? शायद कोई फ़तवा ज़ारी हो जाये। शायद कोई खाप पंचायत उनके मुस्तक़बिल का फ़ैसला कर दे। शायद कोई भाई उनकी मौत का सबब बन जाये। या फिर वो ख़ुद ही ख़ुदकशी कर लें। कुछ भी नहीं कहा जा सकता। एक कहानी याद आती है। एक सड़े हुए सेब की वजह से टोकरी में रखे सारे सेब ख़राब हो गये। मीडिया को अपना फ़र्ज़ समझना चाहिए।

एक दफ़ा एक बरिष्ठ मीडियाकर्मी से बातचीत करते हुए
, उन्होंने कहा कि लोग जो चाहते हैं हम वही परोसते हैं। यह बाज़ार की माँग है। यह लोगों की ज़रूरत है। आख़िर लोगों की ज़रूरत इतनी बुरी क्यों है। उदाहरण के तौर पर हम सेक्स को ले सकते हैं। सेक्स हर इंसान की ज़रूरत है। हम इससे मुँह नहीं मोड़ सकते। मुझे याद है जब मैं हॉस्टल में था। आठवीं या नौवीं कक्षा की बात है। मेरे सहपाठी अपनी किताबों में अश्लील तस्वीर रख कर देखा करते थे, सहेज कर रखते थे। क्लास की लड़कियों पर कमेंट्स पास किया करते थे। इसमें उनकी कोई ग़लती नहीं थी। वह सब सेक्स को छुपाने का नतीज़ा था। आज मीडिया के हर माध्यम का इस्तेमाल सेक्स परोसने के लिए किया जा रहा है। चाहे वह प्रिंट हो, टेलीविज़न हो, इंटरनेट हो, मोबाइल हो। हम इस बात से इंकार नहीं कर सकते की आज के दौर में ज़रूरतें पैदा की जाती हैं। आज विज्ञापन का ज़माना है। बाज़ार में उत्पाद उतरने से पहले ही विज्ञापन नज़र आने लगता है। हम इंतज़ार करने लगते हैं। और किसी वजह से लेट हो गया तो हमारा सब्र खोने लगता है। उदाहरण के लिए नैनो कार। कहीं कोई विज्ञापन नहीं। मगर राजनीति का सहारा लेकर इसे से लोकप्रिय बनाया गया। अभी कार बाज़ार में आई भी न थी और लाखों की संख्या में अग्रिम बुकिंग हो गई।

हमारे पास दोनों चीज़ें हैं। अच्छी ख़बर भी और बुरी ख़बर भी। फूल भी
, ख़ार भी। यह हमारे उपर निर्भर करता है कि हम क्या सोचते हैं? क्या देना चाहते हैं? समाज को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं? ख़ासकर एक पत्रकार को इस बात की पूरी ज़िम्मेदारी उठानी चाहिए कि वह जो कुछ कर रहा है इंसानियत के लिए कितना फ़ायदेमंद है? मगर ऐसा नहीं हो रहा है। हाल ही में मैंने एक न्यूज़ चैनल ज्वाइन किया। मैंने पाया कि हत्या, मौत या बालात्कार की ख़बर को ज़्यादा प्राथमिकता दी जाती है। कोई किसी लड़की के साथ एक बार शारीरिक बालात्कार करता है मगर पैकेज बनाते समय और ब्रेकिंग न्यूज़ बना कर चैनल पर प्रसारित करते समय उस लड़की के साथ कई दफ़ा मानसिक बालात्कार किया जाता है। अगर यही ख़बर अख़बार में छपती है तो जितने लोग इस ख़बर को पढ़ते हैं उतनी दफ़ा बालात्कार होता है। यह ग़लत है। क्यों न ऐसी व्यवस्था बनाई जाये कि बालात्कार करने जैसी भावना ही पैदा न हो। किसी के मन में हत्या करने का विचार भी पैदा न हो। ऐसा हो सकता है।

अगर मीडिया ज़िंदगी की सच्चाई को सबके सामने लाने की कोशिश करे। एक रहनुमा बन कर। एक आध्यात्मिक गुरू बन कर। तो ज़िंदगी जन्नत हो सकती है। मीडिया के कुछ माध्यमों के द्वारा ऐसा किया भी जा रहा है। मुझे उस वक़्त बहुत अजीब लगा जब एक ऑटो ड्राईवर ने एक सफर में मुझसे कहा कि मैं किसी का ख़ून कर के अपना नाम और तस्वीर अख़बार में और अपने आप को टेलीविज़न पर देखना चाहता हूँ। एक लम्हे के लिए तो मुझे लगा कहीं वह मैं तो नहीं जिसे वो ख़ून कर देना चाहेगा। मैं बहुत दिनों तक सोचता रहा कि उसने ऐसा क्यों कहा
? शायद अब भी सोच रहा हूँ। सच तो यह है कि मीडिया समाज में ज़हर फैला रहा है। यह बात हर एक चैनल या अख़बार पर लागू नहीं होता। लेकिन मीडिया जिस रूप में आज हमारे सामने है वह बहुत ही ख़तरनाक है, इंसानियत के ख़िलाफ़ है। इसकी भी एक वजह है। मीडिया हमारी ज़मीन की पैदाईश नहीं है। हम जिस मीडिया की बात करते हैं, हमारी संस्कृति की उपज नहीं है। यह महज पश्चिम की नकल है। ठीक वैसे ही है जैसे काग़ज़ का फूल।

आज मीडिया की वजह से अध्यात्म के क्षेत्र में विस्तार हुआ है। बहुत से लोग पश्चिम से हमारे देश में आध्यात्मिकता के नाम पर खीचे चले आते हैं। क्या हम उन्हें सच्चे अध्यात्म का सबक़ पढ़ा रहे हैं। हमें अपने घरों में
, अपनी ज़मीन में मीडिया के पौधे लगाने की ज़रूरत है। पूरी तरह से एक हिन्दुस्तानी मीडिया। एक आध्यात्मिक मीडिया। जिसकी जड़ें भी हमारी हों, तना भी हमारा हो, फूल भी और फल भी सब हमारे इख़्तियार में हों। मीडिया में आध्यात्म का प्रवेश होते ही बहुत सी ख़राब चीज़ें अपने आप ख़त्म हो जायेंगी। पत्रकारिता के कोर्स में आध्यात्म के पाठ पढ़ायें जाने चाहिए। ताकि सेहतमंद पत्रकार पैदा हो और सेहतमंद पत्रकारिता की बुनियाद रखी जा सके। जिस रोज़ यह मुमकिन हो सकेगा। उस रोज़ इंसान की ज़िंदगी के इतिहास में एक बहुत बड़ी तब्दीली होगी। हर एक चेहरा मुस्कुरायेगा। हर एक आँखों में नूर नाच उठेगा। हर एक फूल महकेगा। हर तरफ प्यार ही प्यार होगा।