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Thursday, April 11, 2013

कुछ अपने आप से भी वो खफ़ा है मेरे लिए !

मुग़नी तबस्सुम
मुग़नी तबस्सुम (1930 - 2012) का नाम ऐसे शायरों में शुमार किया जाता है, जिन्होंने उम्र भर उर्दू की ख़िदमत की। उस्मानिया यूनीवर्सिटी में प्रोफ़ेसर रहे मुग़नी को उर्दू अकादमी आंध्रा प्रदेश के अवार्ड के अलावा, ग़ालिब अवार्ड, आलमी फ़रोग़ उर्दू अवार्ड से नवाज़ा गया। तो पेश हैं मुग़नी तबस्सुम की ग़ज़लें : बीइंग पोएट
1.
अज़ाब हो गई ज़ंजीर-ए-दस्त-ओ-पा मुझ को
जो हो सके तो कहीं दार पे चढ़ा मुझ को
तरस गया हूँ मैं सूरज के रोशनी के लिए
वो दी है साया-ए-दीवार ने सज़ा मुझ को
जो देखे तो इसी से है ज़िंदगी मेरे
मगर मिटा भी रही है यही हवा मुझ को
उसी नज़र ने मुझे तोड़ कर बिखेर दिया
उसी नज़र ने बनाया था आईना मुझ को
सराब-ए-उम्र-ए-तमन्ना की तिश्नगी हूँ मैं
अगर है चश्मा-ए-फैयाज़ तो बुझा मुझ को
कभी तो अपने बदन के चराग़ रौशन कर
कभी तो अपने लहू से भी आज़मा मुझ को
2.
फ़ज़ा में नग़मा-ए-आवाज़ पा है मेरे लिए
कराँ से ता-ब-कराँ इक निदा है मेरे लिए
मैं अपनी ज़ात में लौटा तो फिर मिला न मुझे
वो एक शख़्स जो रोता रहा है मेरे लिए
सबब है रंज का कुछ ख़ू-ए-इज़्तिराब मेरी
कुछ अपने आप से भी वो खफ़ा है मेरे लिए
फ़लक तमाम आगोश-ए-बाब-ए-महरूमी
शजर शजर यहाँ दस्त-ए-दुआ है मेरे लिए
किसी फ़िराक़ की तम्हीद बन के रह जाना
तेरे विसाल की तस्कीं भी क्या है मेरे लिए
3.
रंज-ए-गिरान-ए-शौक़ का हासिल न कह इसे
तर्क-ए-सफ़र किया है तू मंज़िल न कह इसे
ये ज़ब्त ज़ब्त-ए-ग़म नहीं इक बेदिली सी है
ये दिल हरीफ़-ए-दर्द नहीं दिल न कह इसे
तुग़यानीयाँ कुछ और हैं मौजों में रेत की
मैं डूबता हूँ इशरत-ए-साहिल न कह इसे
मरता नहीं हूँ मौत की बे-हासिली पे मैं
जीता अगर हूँ उल्फ़त-ए-हासिल न कह इसे
मिलना सफ़र का और बिछड़ना सफ़र का है
दुनिया तो रह-गुज़ार है महफ़िल न कह इसे
4.
नाम ही रह गया इक अंजुमन-आराई का
छुप गया चाँद भी अब तो शब-ए-तन्हाई का
दिल से जाती नहीं ठहरे हुए क़दमों की सदा
आँख ने स्वांग रचा रखा है बीनाई
एक इक याद को आहों से जलाता जाऊँ
काम सौंपा है अजब उस ने मसीहाई का
अब न वो लम्स निगाहों का न ख़ुश-बू की सदा
दिल ने देखा था मगर ख़्वाब शनासाई का
साअत-ए-दर्द फ़िरोज़ाँ है बहा लें आँसू
टूटने को है कड़ा वक़्त शकीबाई का
5.
क्या कोई दर्द दिल के मुक़ाबिल नहीं रहा
या एक भी दिल दर्द के क़ाबिल नहीं रहा
उन के लहू की दहर में अर्ज़ानियाँ न पूछ
जिन का गवाह दामन-ए-क़ातिल नहीं रहा
अपनी तलाश है हमें आँखों के शहर में
आईना जब से अपने मुक़ाबिल नहीं रहा
सर-गर्मी-ए-हयात है बे-मक़्सद-ए-हयात
सब रह नवर्द-ए-शौक़ हैं महमिल नहीं रहा
उस का ख़याल आता है अपने ख़याल से
अब वो भी अपनी याद में शामिल नहीं रहा
6.
छुपा रखा था यूँ ख़ुद को कमाल मेरा था
किसी पे खुल नहीं पाया जो हाल मेरा था
हर एक पा-ए-शिकस्ता में थी मेरी ज़ंजीर
हर एक दस्त-ए-तलब में सवाल मेरा था
मैं रेज़ा रेज़ा बिखरता चला गया ख़ुद ही
के अपने आप से बचना मुहाल मेरा था
हर एक सम्त से संग-ए-सदा की बारिश थी
मैं चुप रहा के यही कुछ मआल मेरा था
ता ख़याल था ताज़ा हवा के झोंके में
जो गर्द उड़ा के गई है मलाल मेरा था
मैं रो पड़ा हूँ तबस्सुम सियाह रातों में
ग़ुरुब-ए-माह में शायद ज़वाल मेरा था 

Wednesday, March 27, 2013

कुछ काफ़िर नैन मटकते हों, तब देख बहारें होली की !


प्रिय पाठकों को होली मुबारक़। इस मौक़े पर पेश है नज़ीर अकबराबादी की नज़्म : बीइंग पोएट

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ (चंग) के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।
ख़म शीश-ए-जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की।
        महबूब नशे में छकते हों तब देख बहारें होली की ।।1।।

हो नाच रंगीली परियों का बैठे हों गुलरू रंग भरे।
कुछ भीगी तानें होली की कुछ नाज़ो-अदा के ढंग भरे।
दिल भूले देख बहारों को और कानों में आहंग भरे।
कुछ तबले खड़के रंग भरे कुछ ऐश के दम मुँहचंग भरे।
        कुछ घुँघरू ताल झनकते हों तब देख बहारें होली की ।।2।।

सामान जहाँ तक होता है इस इशरत के मतलूबों का।
वो सब सामान मुहैया हो और बाग़ खिला हो ख़ूबों का।
हर आन शराबें ढलती हों और ठठ हो रंग के डूबों का।
इस ऐश मज़े के आलम में इक ग़ोल खड़ा महबूबों का।
        कपड़ों पर रंग छिड़कते हों तब देख बहारें होली की।।3।।

गुलज़ार खिले हों परियों के, और मजलिस की तैयारी हो।
कपड़ों पर रंग के छीटों से ख़ुशरंग अजब गुलकारी हो।
मुँह लाल, गुलाबी आँखें हों, और हाथों में पिचकारी हो।
उस रंग भरी पिचकारी को, अँगिया पर तककर मारी हो।
        सीनों से रंग ढलकते हों, तब देख बहारें होली की।।4।।

इस रंग रंगीली मजलिस में, वह रंडी नाचने वाली हो।
मुँह जिसका चाँद का टुकड़ा हो औऱ आँख भी मय की प्याली हो।
बदमस्त, बड़ी मतवाली हो, हर आन बजाती ताली हो।
मयनोशी हो बेहोशी हो 'भड़ुए' की मुँह में गाली हो।
        भड़ुए भी भड़ुवा बकते हों, तब देख बहारें होली की।।5।।

और एक तरफ़ दिल लेने को महबूब भवैयों के लड़के।
हर आन घड़ी गत भरते हों कुछ घट-घट के कुछ बढ़-बढ़ के।
कुछ नाज़ जतावें लड़-लड़ के कुछ होली गावें अड़-अड़ के।
कुछ लचकें शोख़ कमर पतली कुछ हाथ चले कुछ तन फ़ड़के।
        कुछ काफ़िर नैन मटकते हों तब देख बहारें होली की।।6।।

यह धूम मची हो होली की और ऐश मज़े का छक्कड़ हो।
उस खींचा-खींच घसीटी पर और भडुए रंडी का फक्कड़ हो।
माजून शराबें, नाच, मज़ा और टिकिया, सुलफ़ा, कक्कड़ हो।
लड़-भिड़के 'नज़ीर' फिर निकला हो कीचड़ में लत्थड़-पत्थड़ हो।
        जब ऐसे ऐश झमकते हों तब देख बहारें होली की।।7।।

Thursday, March 21, 2013

नज़्म कहते हो तो कहो मगर ये याद रहे !


दोस्तों! आज विश्व कविता दिवस (21 मार्च) है। यूनेस्को द्वारा 1999 में घोषित यह दिन अलग-अलग देशों में अलग-अलग तारीख को मनाया जाता है। यूरोप के कुछ देशों ने रोम के महान कवि विर्गिल (पब्लियस वर्गिलिउस मारो) के जन्मतिथि 15 अक्टूबर को विश्व कविता दिवस के रूप में चुना। कनाडा और कुछ देशों में कविता दिवस नवम्बर में भी मनाने की रिवायत है। इस मौक़े पर पेश कर रहा हूँ अपनी ही एक नज़्म जिसका उनवान है मशवरा : त्रिपुरारि कुमार शर्मा    
नज़्म कहते हो तो कहो मगर ये याद रहे
कि तुम कह रहे हो नज़्म ये जिसकी ख़ातिर
उसके आँसू की कोई बूँद न आने पाए
नज़्म गीली जो अगर हो गई किसी कारण
तुम्हारी आँख की पुतली से चिपक जाएगी
सूख जाएगी जैसे सूखे लहू का धब्बा
खुरच दो भी अगर दाग़ तो रह जाएगा
एक उँगली के इशारे से लोग पूछेंगे
तुम्हारे दाग़ में दुनिया किसी की देखेंगे
जो आँख मूँद भी लो फिर भी भीगी पलकों पर
एक टूटा हुआ चेहरा किसी का उभरेगा
तुम्हारी साँस के सीने पे पाँव रखेगा
तुम्हारी धड़कनों की धज्जियाँ उड़ाते हुए
सफ़ेद ओस के टुकड़ों को भर के मुट्ठी में
चमकती चुप्पियों को चाँद में चुनवाएगा
कैसे देखोगे अपनी आह को तुम मरते हुए
अपनी आवाज़ को तुम किस तरह दफ़नाओगे
ऐसे हालात में एक नज़्म भी कह पाओगे

Thursday, January 10, 2013

पाकिस्तानी शायर ज़फर इक़बाल की ग़ज़लें !

मियाँ ज़फर इक़बाल
आज पेश हैं पाकिस्तानी शायर ज़फ़र इक़बाल की ग़ज़लें। पेशे से पत्रकार ज़फ़र ने ग़ज़ल की दुनिया में अपना अलग मुक़ाम बनाया है। आईए पढ़ते हैं : बीइंग पोएट
1.
ख़ामोशी अच्छी नहीं इंकार होना चाहिए
ये तमाशा अब सरे बाज़ार होना चाहिए 
ख़्वाब की ताबीर पर इसरार है जिनको अभी
पहले उनको ख़्वाब से बेदार होना चाहिए
अब वही करने लगे दीदार से आगे की बात
जो कभी कहते थे बस दीदार होना चाहिए
बात पूरी है अधूरी चाहिए ऐ जान-ए-जाँ
काम आसां है इसे दुश्वार होना चाहिए
दोस्ती के नाम पर कीजे न क्यूँ कर दुश्मनी
कुछ न कुछ आख़िर तरीकेकार होना चाहिए
झूठ बोला है तो उस पर क़ायम भी रहो ज़फ़र
आदमी को साहिब-ए-क़िरदार होना चाहिए
2.
लर्ज़िश-ए-पर्दा-ए-इज़हार का मतलब क्या है
है ये दीवार तो दीवार का मतलब क्या है 
जिसका इंकार हथेली पे लिए फिरता हूँ
जानता ही नहीं इंकार का मतलब क्या है
बेचना कुछ नहीं उसने तो ख़रीदार हैं क्यूँ
आख़िर इस गर्मी-ए-बाज़ार का मतलब क्या है
उसकी राहों में बिखर जाए ये ख़ाक़ इस तरह चश्म
और अपने लिए दीदार का मतलब क्या है
रब्त बाक़ी नहीं अल्फ़ाज़-ओ-मानी में ज़फ़र
क्या कहें उसको इस प्यार का मतलब क्या है
3.
यहाँ किसी को भी कुछ हस्ब--आरज़ू मिला
किसी को हम मिले और हम को तू मिला
गिज़ाल--अश्क सर--सुबह दूब--मिज़्गाँ पर
कब अपनी आँख खुली और लहू लहू न मिला
चमकते चाँद भी थे शहर-ए-शब के एवान में
निगार-ए-ग़म सा मगर कोई शमा-रू न मिला
उन्हीं की रम्ज़ चली है गली गली में यहाँ
जिन्हें इधर से कभी इज़्न-ए-गुफ़्तगू न मिला
फिर आज मैकदा-ए-दिल से लौट आए हैं
फिर आज हम को ठिकाने का सुबू न मिला

Thursday, December 27, 2012

मिर्ज़ा 'ग़ालिब' की जन्मतिथि !

मिर्ज़ा असदुल्लाह खाँ 'ग़ालिब'
आज मिर्ज़ा असदुल्लाह खाँ 'ग़ालिब' की जन्मतिथि (27 दिसंबर 1796 - 15 फ़रवरी 1869) है। ग़ालिब ऐसे शायर हैं जिनकी तमाम ग़ज़लें ज़्यादातर लोगों ने पढ़ रखी हैं। इसीलिए आज उनकी जन्मतिथि के मौक़े पर पेश हैं कुछ क़तआत और रुबाइयाँ। : बीइंग पोएट
क़तआत
एक अहले-दर्द ने सुनसान जो देखा क़फ़स
यों कहा आती नहीं अब क्यों सदाए-अ़न्दलीब
बाल-ओ-पर दो-चार दिखलाकर कहा सय्याद ने
ये निशानी रह गयी है अब बजाए-अन्दलीब
शब को ज़ौक़े-गुफ़्तगू से तेरा दिल बेताब था
शोख़ी-ए-वहशत से अफ़साना फ़ुसूने
-ख़्वाब था
वां हजूमे-नग़्महाए-साज़े-इशरत था
'असद'
नाख़ुने-ग़म यां सरे-तारे-नफ़स मिज़राब था
दूद को आज उसके मातम में सियहपोशी हुई
वो दिले-सोज़ाँ कि कल तक शम्ए-मातमख़ाना था
शिकवा-ए-याराँ ग़ुबारे-दिल में पिन्हाँ कर दिया
'ग़ालिब' ऐसे गंज को शायाँ यही वीराना था
रुबाइयाँ
आतिशबाज़ी है जैसे शग़्ले-अतफ़ाल
है सोज़े-ज़िगर का भी इसी तौर का हाल
था मूजीदे-इश्क़ भी क़यामत कोई
लड़कों के लिए गया है क्या खेल निकाल
दिल था की जो जाने दर्द तम्हीद सही
बेताबी-रश्क व हसरते-दीद सही
हम और फ़सुर्दन
, ऐ तज़ल्ली! अफ़सोस
तकरार रवा नहीं तो तजदीद सही
है ख़ल्क़ हसद क़माश लड़ने के लिए
वहशत-कदा-ए-तलाश लड़ने के लिए
यानी हर बार सूरते-क़ागज़े-बाद
मिलते हैं ये बदमाश लड़ने के लिए
दिल सख़्त निज़न्द हो गया है गोया
उससे गिलामन्द हो गया है गोया
पर यार के आगे बोल सकते ही नहीं
'ग़ालिब' मुंह बंद हो गया है गोया
दुःख जी के पसंद हो गया है 'ग़ालिब'
दिल रुककर बंद हो गया है
'ग़ालिब'
वल्लाह कि शब को नींद आती ही नहीं
सोना सौगन्द हो गया है
'ग़ालिब'
मुश्किल है ज़बस कलाम मेरा ऐ दिल!
सुन-सुन के उसे सुख़नवराने-कामिल
आसान कहने की करते हैं फ़रमाइश
गोयम मुश्किल वगरना गोयम मुश्किल
कहते हैं कि अब वो मर्दम-आज़ार नहीं
उश्शाक़ की पुरसिश से उसे आ़र नहीं
जो हाथ कि ज़ुल्म से उठाया होगा
क्योंकर मानूं कि उसमें तलवार नहीं
हम गरचे बने सलाम करने वाले
कहते हैं दिरंग काम करने वाले
कहते हैं कहें खुदा से
, अल्लाह अल्लाह
वो आप हैं सुबह शाम करने वाले
समाने-ख़ुरो-ख़्वाब कहाँ से लाऊं?
आराम के असबाब कहाँ से लाऊं
?
रोज़ा मेरा ईमान है
'ग़ालिब' लेकिन
ख़स-ख़ाना-ओ-बर्फ़ाब कहाँ से लाऊं
?