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Thursday, April 11, 2013

कुछ अपने आप से भी वो खफ़ा है मेरे लिए !

मुग़नी तबस्सुम
मुग़नी तबस्सुम (1930 - 2012) का नाम ऐसे शायरों में शुमार किया जाता है, जिन्होंने उम्र भर उर्दू की ख़िदमत की। उस्मानिया यूनीवर्सिटी में प्रोफ़ेसर रहे मुग़नी को उर्दू अकादमी आंध्रा प्रदेश के अवार्ड के अलावा, ग़ालिब अवार्ड, आलमी फ़रोग़ उर्दू अवार्ड से नवाज़ा गया। तो पेश हैं मुग़नी तबस्सुम की ग़ज़लें : बीइंग पोएट
1.
अज़ाब हो गई ज़ंजीर-ए-दस्त-ओ-पा मुझ को
जो हो सके तो कहीं दार पे चढ़ा मुझ को
तरस गया हूँ मैं सूरज के रोशनी के लिए
वो दी है साया-ए-दीवार ने सज़ा मुझ को
जो देखे तो इसी से है ज़िंदगी मेरे
मगर मिटा भी रही है यही हवा मुझ को
उसी नज़र ने मुझे तोड़ कर बिखेर दिया
उसी नज़र ने बनाया था आईना मुझ को
सराब-ए-उम्र-ए-तमन्ना की तिश्नगी हूँ मैं
अगर है चश्मा-ए-फैयाज़ तो बुझा मुझ को
कभी तो अपने बदन के चराग़ रौशन कर
कभी तो अपने लहू से भी आज़मा मुझ को
2.
फ़ज़ा में नग़मा-ए-आवाज़ पा है मेरे लिए
कराँ से ता-ब-कराँ इक निदा है मेरे लिए
मैं अपनी ज़ात में लौटा तो फिर मिला न मुझे
वो एक शख़्स जो रोता रहा है मेरे लिए
सबब है रंज का कुछ ख़ू-ए-इज़्तिराब मेरी
कुछ अपने आप से भी वो खफ़ा है मेरे लिए
फ़लक तमाम आगोश-ए-बाब-ए-महरूमी
शजर शजर यहाँ दस्त-ए-दुआ है मेरे लिए
किसी फ़िराक़ की तम्हीद बन के रह जाना
तेरे विसाल की तस्कीं भी क्या है मेरे लिए
3.
रंज-ए-गिरान-ए-शौक़ का हासिल न कह इसे
तर्क-ए-सफ़र किया है तू मंज़िल न कह इसे
ये ज़ब्त ज़ब्त-ए-ग़म नहीं इक बेदिली सी है
ये दिल हरीफ़-ए-दर्द नहीं दिल न कह इसे
तुग़यानीयाँ कुछ और हैं मौजों में रेत की
मैं डूबता हूँ इशरत-ए-साहिल न कह इसे
मरता नहीं हूँ मौत की बे-हासिली पे मैं
जीता अगर हूँ उल्फ़त-ए-हासिल न कह इसे
मिलना सफ़र का और बिछड़ना सफ़र का है
दुनिया तो रह-गुज़ार है महफ़िल न कह इसे
4.
नाम ही रह गया इक अंजुमन-आराई का
छुप गया चाँद भी अब तो शब-ए-तन्हाई का
दिल से जाती नहीं ठहरे हुए क़दमों की सदा
आँख ने स्वांग रचा रखा है बीनाई
एक इक याद को आहों से जलाता जाऊँ
काम सौंपा है अजब उस ने मसीहाई का
अब न वो लम्स निगाहों का न ख़ुश-बू की सदा
दिल ने देखा था मगर ख़्वाब शनासाई का
साअत-ए-दर्द फ़िरोज़ाँ है बहा लें आँसू
टूटने को है कड़ा वक़्त शकीबाई का
5.
क्या कोई दर्द दिल के मुक़ाबिल नहीं रहा
या एक भी दिल दर्द के क़ाबिल नहीं रहा
उन के लहू की दहर में अर्ज़ानियाँ न पूछ
जिन का गवाह दामन-ए-क़ातिल नहीं रहा
अपनी तलाश है हमें आँखों के शहर में
आईना जब से अपने मुक़ाबिल नहीं रहा
सर-गर्मी-ए-हयात है बे-मक़्सद-ए-हयात
सब रह नवर्द-ए-शौक़ हैं महमिल नहीं रहा
उस का ख़याल आता है अपने ख़याल से
अब वो भी अपनी याद में शामिल नहीं रहा
6.
छुपा रखा था यूँ ख़ुद को कमाल मेरा था
किसी पे खुल नहीं पाया जो हाल मेरा था
हर एक पा-ए-शिकस्ता में थी मेरी ज़ंजीर
हर एक दस्त-ए-तलब में सवाल मेरा था
मैं रेज़ा रेज़ा बिखरता चला गया ख़ुद ही
के अपने आप से बचना मुहाल मेरा था
हर एक सम्त से संग-ए-सदा की बारिश थी
मैं चुप रहा के यही कुछ मआल मेरा था
ता ख़याल था ताज़ा हवा के झोंके में
जो गर्द उड़ा के गई है मलाल मेरा था
मैं रो पड़ा हूँ तबस्सुम सियाह रातों में
ग़ुरुब-ए-माह में शायद ज़वाल मेरा था 

Thursday, January 10, 2013

पाकिस्तानी शायर ज़फर इक़बाल की ग़ज़लें !

मियाँ ज़फर इक़बाल
आज पेश हैं पाकिस्तानी शायर ज़फ़र इक़बाल की ग़ज़लें। पेशे से पत्रकार ज़फ़र ने ग़ज़ल की दुनिया में अपना अलग मुक़ाम बनाया है। आईए पढ़ते हैं : बीइंग पोएट
1.
ख़ामोशी अच्छी नहीं इंकार होना चाहिए
ये तमाशा अब सरे बाज़ार होना चाहिए 
ख़्वाब की ताबीर पर इसरार है जिनको अभी
पहले उनको ख़्वाब से बेदार होना चाहिए
अब वही करने लगे दीदार से आगे की बात
जो कभी कहते थे बस दीदार होना चाहिए
बात पूरी है अधूरी चाहिए ऐ जान-ए-जाँ
काम आसां है इसे दुश्वार होना चाहिए
दोस्ती के नाम पर कीजे न क्यूँ कर दुश्मनी
कुछ न कुछ आख़िर तरीकेकार होना चाहिए
झूठ बोला है तो उस पर क़ायम भी रहो ज़फ़र
आदमी को साहिब-ए-क़िरदार होना चाहिए
2.
लर्ज़िश-ए-पर्दा-ए-इज़हार का मतलब क्या है
है ये दीवार तो दीवार का मतलब क्या है 
जिसका इंकार हथेली पे लिए फिरता हूँ
जानता ही नहीं इंकार का मतलब क्या है
बेचना कुछ नहीं उसने तो ख़रीदार हैं क्यूँ
आख़िर इस गर्मी-ए-बाज़ार का मतलब क्या है
उसकी राहों में बिखर जाए ये ख़ाक़ इस तरह चश्म
और अपने लिए दीदार का मतलब क्या है
रब्त बाक़ी नहीं अल्फ़ाज़-ओ-मानी में ज़फ़र
क्या कहें उसको इस प्यार का मतलब क्या है
3.
यहाँ किसी को भी कुछ हस्ब--आरज़ू मिला
किसी को हम मिले और हम को तू मिला
गिज़ाल--अश्क सर--सुबह दूब--मिज़्गाँ पर
कब अपनी आँख खुली और लहू लहू न मिला
चमकते चाँद भी थे शहर-ए-शब के एवान में
निगार-ए-ग़म सा मगर कोई शमा-रू न मिला
उन्हीं की रम्ज़ चली है गली गली में यहाँ
जिन्हें इधर से कभी इज़्न-ए-गुफ़्तगू न मिला
फिर आज मैकदा-ए-दिल से लौट आए हैं
फिर आज हम को ठिकाने का सुबू न मिला

Thursday, December 27, 2012

मिर्ज़ा 'ग़ालिब' की जन्मतिथि !

मिर्ज़ा असदुल्लाह खाँ 'ग़ालिब'
आज मिर्ज़ा असदुल्लाह खाँ 'ग़ालिब' की जन्मतिथि (27 दिसंबर 1796 - 15 फ़रवरी 1869) है। ग़ालिब ऐसे शायर हैं जिनकी तमाम ग़ज़लें ज़्यादातर लोगों ने पढ़ रखी हैं। इसीलिए आज उनकी जन्मतिथि के मौक़े पर पेश हैं कुछ क़तआत और रुबाइयाँ। : बीइंग पोएट
क़तआत
एक अहले-दर्द ने सुनसान जो देखा क़फ़स
यों कहा आती नहीं अब क्यों सदाए-अ़न्दलीब
बाल-ओ-पर दो-चार दिखलाकर कहा सय्याद ने
ये निशानी रह गयी है अब बजाए-अन्दलीब
शब को ज़ौक़े-गुफ़्तगू से तेरा दिल बेताब था
शोख़ी-ए-वहशत से अफ़साना फ़ुसूने
-ख़्वाब था
वां हजूमे-नग़्महाए-साज़े-इशरत था
'असद'
नाख़ुने-ग़म यां सरे-तारे-नफ़स मिज़राब था
दूद को आज उसके मातम में सियहपोशी हुई
वो दिले-सोज़ाँ कि कल तक शम्ए-मातमख़ाना था
शिकवा-ए-याराँ ग़ुबारे-दिल में पिन्हाँ कर दिया
'ग़ालिब' ऐसे गंज को शायाँ यही वीराना था
रुबाइयाँ
आतिशबाज़ी है जैसे शग़्ले-अतफ़ाल
है सोज़े-ज़िगर का भी इसी तौर का हाल
था मूजीदे-इश्क़ भी क़यामत कोई
लड़कों के लिए गया है क्या खेल निकाल
दिल था की जो जाने दर्द तम्हीद सही
बेताबी-रश्क व हसरते-दीद सही
हम और फ़सुर्दन
, ऐ तज़ल्ली! अफ़सोस
तकरार रवा नहीं तो तजदीद सही
है ख़ल्क़ हसद क़माश लड़ने के लिए
वहशत-कदा-ए-तलाश लड़ने के लिए
यानी हर बार सूरते-क़ागज़े-बाद
मिलते हैं ये बदमाश लड़ने के लिए
दिल सख़्त निज़न्द हो गया है गोया
उससे गिलामन्द हो गया है गोया
पर यार के आगे बोल सकते ही नहीं
'ग़ालिब' मुंह बंद हो गया है गोया
दुःख जी के पसंद हो गया है 'ग़ालिब'
दिल रुककर बंद हो गया है
'ग़ालिब'
वल्लाह कि शब को नींद आती ही नहीं
सोना सौगन्द हो गया है
'ग़ालिब'
मुश्किल है ज़बस कलाम मेरा ऐ दिल!
सुन-सुन के उसे सुख़नवराने-कामिल
आसान कहने की करते हैं फ़रमाइश
गोयम मुश्किल वगरना गोयम मुश्किल
कहते हैं कि अब वो मर्दम-आज़ार नहीं
उश्शाक़ की पुरसिश से उसे आ़र नहीं
जो हाथ कि ज़ुल्म से उठाया होगा
क्योंकर मानूं कि उसमें तलवार नहीं
हम गरचे बने सलाम करने वाले
कहते हैं दिरंग काम करने वाले
कहते हैं कहें खुदा से
, अल्लाह अल्लाह
वो आप हैं सुबह शाम करने वाले
समाने-ख़ुरो-ख़्वाब कहाँ से लाऊं?
आराम के असबाब कहाँ से लाऊं
?
रोज़ा मेरा ईमान है
'ग़ालिब' लेकिन
ख़स-ख़ाना-ओ-बर्फ़ाब कहाँ से लाऊं
?

Tuesday, December 18, 2012

देखता हूँ 'उफ़क़ के उस पार' जा कर !

यह नज़्म 07 नवम्बर 2008 को लिखी थी मैंने। तब मैं ग्रेजुएशन का छात्र हुआ करता था। उन्हीं दिनों हिंदू कॉलेज में प्रतियोगिता के दौरान इस नज़्म को पुरस्कृत भी की गई थी। आज आपके लिए 'उफ़क़ के उस पार' : त्रिपुरारि कुमार शर्मा
देखता हूँ 'उफ़क़ के उस पार' जा कर
कहीं सफ़ेद अँधेरा
कहीं स्याह उजाला
खो दिया है दर्द ने एहसास अपना
क़
रीबी इतनी कि
देख तक नहीं सकते
कोयला सुलग रहा है
अंगीठी जल रही है बदन में
भुने हुए हर्फ़
काग़ज़ पर गिरते हैं जब
तो 'छन्' से आवाज़ आती है
गले में अटक जाता है
साँस का टुकड़ा  
मेरी पलकें नोचता है कोई
फिर देखती है नंगी आँखें
'एक छिली हुई रूह'
बिल्कुल चाँद की तरह
सोचता हूँ सन्नाटा बुझा दूँ
बहने लगती है उंगलियाँ
बिखरने लगता है वजूद
सोच पिघलती है धुआं बनकर
सहसा सूख जाती है नींद की ज़मीन
रात की दीवार में दरार हो जैसे
फ़्रेम
ख़ाली है अब तक
मुस्कराहट बाँझ हो गई
कुछ हर्फ़-सा नहीं मिलता
बहुत उदास हैं टूटे हुए नुक़्ते
समय के माथे पर ज़ख़्म-सा क्या है ?
जमने लगी है चोट की परत
चीखते हैं मुरझा हुए मौसम
अभी बाक़ी है मरासिम कोई
अब तो दिन रात यही करता हूँ
उफ़क़
से जब भी लहू रिसता है
देखता हूँ 'उफ़क़ के उस पार' जा कर। 

Saturday, December 08, 2012

नासिर काज़मी की जन्मतिथि !

'नासिर' काज़मी
आज उर्दू के मशहूर शायर नासिर काज़मी (08 दिसंबर 1925 - 02 मार्च 1972) की जन्मतिथि है। इस मौक़े पर पेश हैं कुछ ग़ज़लें : बीइंग पोएट
1.
दिल धड़कने का सबब याद आया
वो तेरी याद थी अब याद आया
आज मुश्किल था सम्भलना ऐ दोस्त
तू मुसीबत में अजब याद आया
दिन गुज़ारा था बड़ी मुश्किल से
फिर तेरा वादा-ए-शब याद आया
तेरा भूला हुआ पैमान-ए-वफ़ा
मर रहेंगे अगर अब याद आया
फिर कई लोग नज़र से गुज़रे
फिर कोई शहर-ए-तरब याद आया
हाल-ए-दिल हम भी सुनाते लेकिन
जब वो रुख़सत हुए तब याद आया
बैठ कर साया-ए-गुल में नासिर
हम बहुत रोये वो जब याद आया
2.
अपनी धुन में रहता हूँ
मैं भी तेरे जैसा हूँ
ओ पिछली रुत के साथी
अब के बरस मैं तन्हा हूँ
तेरी गली में सारा दिन
दुख के कंकर चुनता हूँ
मुझ से आँख मिलाये कौन
मैं तेरा आईना हूँ
मेरा दिया जलाये कौन
मैं तेरा ख़ाली कमरा हूँ
तू जीवन की भरी गली
मैं जंगल का रस्ता हूँ
अपनी लहर है अपना रोग
दरिया हूँ और प्यासा हूँ
आती रुत मुझे रोयेगी
जाती रुत का झोंका हूँ
3.
किसे देखें कहाँ देखा न जाये
वो देखा है जहाँ देखा न जाये
मेरी बरबादियों पर रोने वाले
तुझे महव-ए-फुगाँ देखा न जाये
सफ़र है और गुरबत का सफ़र है
गम-ए-सद-कारवाँ देखा न जाये
कहीं आग और कहीं लाशों के अंबार
बस ऐ दौर-ए-ज़मीँ देखा न जाये
दर-ओ-दीवार वीराँ, शमा मद्धम
शब-ओ-गम का सामाँ देखा न जाये
पुरानी सुहब्बतें याद आती है
चरागों का धुआँ देखा न जाये
भरी बरसात खाली जा रही है
सराबर-ए-रवाँ देखा न जाये
कहीं तुम और कहीं हम, क्या गज़ब है
फिराक-ए-जिस्म-ओ-जाँ देखा न जाये
वही जो हासिल-ए-हस्ती है नासिर
उसी को मेहरबाँ देखा न जाये
4.
कौन इस राह से गुज़रता है
दिल यूँ ही इंतज़ार करता है
देख कर भी न देखने वाले
दिल तुझे देख-देख डरता है
शहर-ए-गुल में कटी है सारी रात
देखिये दिन कहाँ गुज़रता है
ध्यान की सीढ़ियों पे पिछले पहर
कोई चुपके से पाँव धरता है
दिल तो मेरा उदास है नासिर
शहर क्यों सायँ-सायँ करता है
5.
नीयत-ए-शौक़ भर न जाये कहीं
तू भी दिल से उतर न जाये कहीं
आज देखा है तुझे देर के बाद
आज का दिन गुज़र न जाये कहीं
न मिला कर उदास लोगों से
हुस्न तेरा बिखर न जाये कहीं
आरज़ू है के तू यहाँ आये
और फिर उम्र भर न जाये कहीं
जी जलाता हूँ और ये सोचता हूँ
रायेगाँ ये हुनर न जाये कहीं
आओ कुछ देर रो ही लें नासिर
फिर ये दरिया उतर न जाये कहीं
6.
करता उसे बेकरार कुछ देर
होता अगर इख्तियार कुछ देर
क्या रोयें फ़रेब-ए-आसमाँ को
अपना नहीं ऐतबार कुछ देर
आँखों में कटी पहाड़ सी रात
सो जा दिल-ए-बेक़रार कुछ देर
ऐ शहर-ए-तरब को जाने वालों
करना मेरा इंतजार कुछ देर
बेकैफी-ए-रोज़-ओ-शब मुसलसल
सरमस्ती-ए-इंतज़ार कुछ देर
तकलीफ-ए-गम-ए-फिराक दायम
तकरीब-ए-विसाल-ए-यार कुछ देर
ये गुंचा-ओ-गुल हैं सब मुसाफिर
है काफिला-ए-बहार कुछ देर
दुनिया तो सदा रहेगी नासिर
हम लोग हैं यादगार कुछ देर
7.
तेरे मिलने को बेकल हो गये हैं
मगर ये लोग पागल हो गये हैं
बहारें लेके आये थे जहाँ तुम
वो घर सुनसान जंगल हो गये हैं
यहाँ तक बढ़ गये आलाम-ए-हस्ती
कि दिल के हौसले शल हो गये हैं
कहाँ तक ताब लाये नातवाँ दिल
कि सदमे अब मुसलसल हो गये हैं
निगाह-ए-यास को नींद आ रही है
मुसर्दा पुरअश्क बोझल हो गये हैं
उन्हें सदियों न भूलेगा ज़माना
यहाँ जो हादसे कल हो गये हैं
जिन्हें हम देख कर जीते थे नासिर
वो लोग आँखों से ओझल हो गये हैं
8.
तेरे ख़याल से लौ दे उठी है तनहाई
शब-ए-फ़िराक़ है या तेरी जल्वाआराई
तू किस ख़याल में है ऐ मंज़िलों के शादाई
उन्हें भी देख जिन्हें रास्ते में नींद आई
पुकार ऐ जरस-ए-कारवाँ-ए-सुबह-ए-तरब
भटक रहे हैं अँधेरों में तेरे सौदाई
राह-ए-हयात में कुछ मर्हले तो देख लिये
ये और बात तेरी आरज़ू न रास आई
ये सानिहा भी मुहब्बत में बारहा गुज़रा
कि उस ने हाल भी पूछा तो आँख भर आई
फिर उस की याद में दिल बेक़रार है नासिर
बिछड़ के जिस से हुई शहर-शहर रुसवाई
9.
ज़िन्दगी को न बना दें वो सज़ा मेरे बाद
हौसला देना उन्हें मेरे ख़ुदा मेरे बाद
कौन घूंघट उठाएगा सितमगर कह के
और फिर किस से करेंगे वो हया मेरे बाद
हाथ उठते हुए उनके न देखेगा
किस के आने की करेंगे वो दुआ मेरे बाद
फिर ज़माना-ए-मुहब्बत की न पुरसिश होगी
रोएगी सिसकियाँ ले-ले के वफ़ा मेरे बाद
वो जो कहता था कि 'नासिर' के लिए जीता हूं
उसका क्या जानिए, क्या हाल हुआ मेरे बाद
10.
होती है तेरे नाम से वहशत कभी-कभी
बरहम हुई है यूँ भी तबीयत कभी-कभी
ऐ दिल किसे नसीब ये तौफ़ीक़-ए-इज़्तिराब
मिलती है ज़िन्दगी में ये राहत कभी-कभी
तेरे करम से ऐ अलम-ए-हुस्न-ए-आफ़रीन
दिल बन गया है दोस्त की ख़िल्वत कभी-कभी
दिल को कहाँ नसीब ये तौफ़ीक़-ए-इज़्तिराब
मिलती है ज़िन्दगी में ये राहत कभी-कभी
जोश-ए-जुनूँ में दर्द की तुग़यानियों के साथ
अश्कों में ढल गई तेरी सूरत कभी-कभी
तेरे क़रीब रह के भी दिल मुतमईन न था
गुज़री है मुझ पे भी ये क़यामत कभी-कभी
कुछ अपना होश था न तुम्हारा ख़याल था
यूँ भी गुज़र गई शब-ए-फ़ुर्क़त कभी-कभी
ऐ दोस्त हम ने तर्क-ए-मुहब्बत के बावजूद
महसूस की है तेरी ज़रूरत कभी-कभी

Wednesday, December 05, 2012

जोश मलीहाबादी की जन्मतिथि !

'जोश' मलीहाबादी
आज उर्दू के मशहूर शायर जोश मलीहाबादी (05 दिसंबर 1898 - 22 फरवरी 1982) की जन्मतिथि है। इस मौक़े पर पेश हैं कुछ ग़ज़लें : बीइंग पोएट
1.
अशवों को चैन नहीं आफ़त किये बग़ैर
तुम, और मान जाओ शरारत किये बग़ैर
अहल-ए-नज़र को यार दिखाना राह-ए-वफ़ा
ऐ काश! ज़िक्र-ए-दोज़ख-ओ-जन्नत किये बग़ैर
अब देख उस का हाल कि आता न था करार
खुद तेरे दिल को, जिस पे इनायत किये बग़ैर
ऐ हमनशीं मुहाल है नासेह का टालना
यह, और यहाँ से जाएँ नसीहत किये बग़ैर
तुम कितने तुन्द-खू हो कि पहलू से आज तक
एक बार भी उठे न क़यामत किये बग़ैर
2.
ये दिन बहार के अब के भी रास न आ सके
कि ग़ुंचे खिल तो सके खिल के मुस्कुरा न सके
मेरी तबाही दिल पर तो रहम खा न सकी
जो रोशनी में रहे रोशनी को पा न सके
न जाने आह! कि उन आँसूओं पे क्या गुज़री
जो दिल से आँख तक आये मिश्गाँ तक आ न सके
रहें ख़ुलूस-ए-मुहब्बत के हादसात जहाँ
मुझे तो क्या मेरे नक़्श-ए-क़दम मिटा न सके
करेंगे मर के बक़ा-ए-दवाम क्या हासिल
जो ज़िंदा रह के मुक़ाम-ए-हयात पा न सके
नया ज़माना बनाने चले थे दीवाने
नई ज़मीं, नया आसमाँ बना न सके
3.
क़सम है आपके हर रोज़ रूठ जाने की
के अब हवस है अजल को गले लगाने की
वहाँ से है मेरी हिम्मत की इब्तिदा अल्लाह
जो इंतिहा है तेरे सब्र आज़माने की
फूँका हुआ है मेरे आशियाँ का हर तिनका
फ़लक को ख़ू है तो है बिजलियाँ गिराने की
हज़ार बार हुई गो मआलेगुल से दोचार
कली से ख़ू न गई फिर भी मुस्कुराने की
मेरे ग़ुरूर के माथे पे आ चली है शिकन
बदल रही है तो बदले हवा ज़माने की
चिराग़-ए-दैर-ओ-हरम कब के बुझ गए ऐ जोश
हनोज़ शम्मा है रोशन शराबख़ाने की
4.
ख़ुद अपनी ज़िन्दगी से वहशत-सी हो गई है
तारी कुछ ऐसी दिल पे इबरत-सी हो गई है
ज़ौक़े-तरब से दिल को होने लगी है वहशत
कुछ ऐसी ग़म की जानिब रग़बत-सी हो गई है
सीने पे मेरे जब से रक्खा है हाथ तूने
कुछ और दर्द-ए-दिल में शिद्दत-सी हो गई है
मुमकिन नहीं के मिलकर रसमन ही मुस्कुरा दो
तुमको तो जैसे हमसे नफ़रत-सी हो गई
अब तो है कुछ दिनों से यूँ दिल बुझा-बुझा सा
दोनों जहाँ से गोया फ़ुरसत-सी हो गई
वो अब कहाँ हैं लेकिन ऐ हमनशीं यहाँ तो
मुड़-मुड़ के देखने की आदत-सी हो गई है
जोश रफ़्ता-रफ़्ता शायद हमारे दिल से
ज़ौक़-ए-फ़सुर्दगी को उल्फ़त-सी हो गई है
5.
नक़्श-ए-ख़याल दिल से मिटाया नहीं हनोज़
बेदर्द मैंने तुझको भुलाया नहीं हनोज़
वो सर जो तेरी राहगुज़र में था सज्दा-रेज़
मैं ने किसी क़दम पे झुकाया नहीं हनोज़
महराब-ए-जाँ में तूने जलाया था ख़ुद जिसे
सीने का वो चिराग़ बुझाया नहीं हनोज़
बेहोश हो के जल्द तुझे होश आ गया
मैं बदनसीब होश में आया नहीं हनोज़
मर कर भी आयेगी ये सदा क़ब्र-ए-जोश से
बेदर्द मैंने तुझको भुलाया नहीं हनोज़
6.
सोज़े-ग़म देके उसने ये इरशाद किया
जा तुझे कश्मकश-ए-दहर से आज़ाद किया
वो करें भी तो किन अल्फ़ाज में तिरा शिकवा
जिनको तिरी निगाह-ए-लुत्फ़ ने बर्बाद किया
दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने न दिया
जब चली सर्द हवा मैंने तुझे याद किया
इसका रोना नहीं क्यों तुमने किया दिल बरबाद
इसका ग़म है कि बहुत देर में बरबाद किया
इतना मासूम हूँ फितरत से, कली जब चटकी
झुक के मैंने कहा, मुझसे कुछ इरशाद किया
मेरी हर साँस है इस बात की शाहिद-ए-मौत
मैंने ने हर लुत्फ़ के मौक़े पे तुझे याद किया
मुझको तो होश नहीं तुमको खबर हो शायद
लोग कहते हैं कि तुमने मुझे बर्बाद किया
वो तुझे याद करे जिसने भुलाया हो कभी
हमने तुझ को न भुलाया न कभी याद किया
कुछ नहीं इस के सिवा 'जोश' हारीफ़ों का कलाम
वस्ल ने शाद किया, हिज्र ने नाशाद किया
7.
वो जोश ख़ैरगी है तमाशा कहें जिसे
बेपरदा यूँ हुए हैं के परदा कहें जिसे
अल्लाह रे ख़ाकसारिए रिंदाँने बादाख्वार
रश्क-ए-ग़ुरूर-ओ-क़ैसर-ओ-कसरा कहें जिसे
बिजली गिरी वो दिल पे जिगर तक उतर गई
इस चर्ख़-ए-नाज़ से क़द-ए-बाला कहें जिसे
ज़ुल्फ़-ए-हयात नोएबशर में है आज तक
ज़ख़्म-ए-गुनाह-ए-आदम-ओ-हव्वा कहें जिसे
कितनी हक़ीक़तों से फ़ज़ूँतर है वो फ़रेब
दिल की ज़ुबाँ में वादा-ए-फ़रदा कहें जिसे
मेरा लक़ब है जिसका लक़ब है शमीम-ए-ज़ुल्फ़
मेरी नज़र है चेहरा-ए-ज़ेबा कहें जिसे
लो आ रहा है वो कोई मस्त-ए-ख़राम से
इस चाल से के लरज़िश-ए-सेहबा कहें जिसे
तेरे निशात-ए-ख़ाना-ए-अमरोज़ में नहीं
वो बुज़दिली के ख़तरा-ए-फ़रदा कहें जिसे
ख़ंजर है जोश हाथ में दामन लहू से तर
ये उसके तौर हैं के मसीहा कहें जिसे

Thursday, November 29, 2012

अली सरदार जाफ़री की जन्मतिथि !

अली 'सरदार' जाफ़री
आज ज्ञानपीठ पुरस्कार (1997) से सम्मानित मशहूर शायर अली सरदार जाफ़री (29 नवम्बर 1913 - 01 अगस्त 2000) की जन्मतिथि है। इस मौक़े पर पेश हैं कुछ ग़ज़लें : बीइंग पोएट
1.
काम अब कोई न आयेगा बस इक दिल के सिवा
रास्ते बन्द हैं सब कूचा-ए-क़ातिल के सिवा
बाइस-ए-रश्क़ है तन्हारवी-ए-रहरौ-ए-शौक़
हमसफ़र कोई नहीं दूरी-ए-मंजिल के सिवा
हम ने दुनिया की हर इक शै से उठाया दिल को
लेकिन इक शोख़ के हंगामा-ए-महफ़िल के सिवा
तेग़ मुंसिफ़ हो जहाँ दार-ओ-रसन हों शाहिद
बेगुनाह कौन है उस शहर में क़ातिल के सिवा
जाने किस रंग से आई है गुलशन में बहार
कोई नग़्मा ही नहीं शोर-ए-सिलासिल के सिवा
2.
लू के मौसम में बहारों की हवा माँगते हैं
हम क़फ़े-दस्ते-ख़िज़ाँ पर भी हिना माँगते हैं
हमनशीं सादादिली-हाए-तमन्ना मत पूछ
बेवफ़ाओं से वफ़ाओं का सिला माँगते हैं
काश कर लेते कभी काबा-ए-दिल का भी तवाफ़
वो जो पत्थर के मकानों से ख़ुदा माँगते हैं
जिसमें हो सतवते-शाहीन की परवाज़ का रंग
लबे-शाइर से वो बुलबुल की नवा माँगते हैं
ताकि दुनिया पे खुले उनका फ़रेबे-इंसाफ़
बेख़ता होके ख़ताओं की सज़ा माँगते हैं
तीरगी जितनी बढ़े हुस्न हो अफ़ज़ूँ तेरा
कहकशाँ माँग में
, माथे पे ज़िया माँगते हैं
यह है वारफ़्तगिए-शौक़ का आलम सरदार
बारिशे-संग है और बादे-सबा माँगते हैं
3.
आये हम ग़ालिब-ओ-इक़बाल के नग़्मात के बाद
मुसहफफ़े-इश्क़ो-जुनूँ हुस्न की आयात के बाद
ऐ वतन ख़ाके-वतन वो भी तुझे दे देंगे
बच गया है जो लहू अब के फ़सादात के बाद
नारे-नुम्रूद यही और यही ग़ुलज़ारे-ख़लील
कोई आतिश नहीं आतिशक़दा-ए-ज़ात के बाद
राम-ओ-गौतम की ज़मीं हुर्मते-इन्साँ की अमीं
बाँझ हो जाएगी क्या ख़ून की बरसात के बाद
हमको मालूम है वादों की हक़ीक़त क्या है
बारिशे-संगे-सितम
, ज़ामे-मुदारात के बाद
तश्नगी है कि बुझाये नहीं बुझती सरदार
बढ़ गयी कौसरो-तस्नीम की सौग़ात के बाद
4.
कोई हो मौसम थम नहीं सकता रक़्से-जुनूँ दीवानों का
ज़ंजीरों की झनकारों में शोरे-बहाराँ बाक़ी है
इश्क़ के मुजरिम ने ये मंज़र औ़ज़े-दार से देखा है
ज़िन्दाँ-ज़िन्दाँ
, महबस-महबस, हल्क़ःए-याराँ बाक़ी है
बर्गे-ज़र्द के साये में भी जूए-तरन्नुम जारी है
ये तो शिकस्ते-फ़स्ले-ख़िज़ाँ है
, सौते-हज़ाराँ बाक़ी है
मुह्तसिबों की ख़ुश्क़ी-ए-दिल पर एक ज़माना हँसता है
तर है दामन और वक़ारे-बादा-गुसाराँ बाक़ी है
फूल-से चेहरे, चाँद-से मुखड़े नज़रों से रूपोश हुए
आरिज़े-दिल पर रंगे-हिना है
, दस्ते-निगाराँ बाक़ी है
5.
एक जू-ए-दर्द दिल से जिगर तक रवाँ है आज
पिघला हुआ रगों में इक आतिश-फ़िशाँ है आज
लब सी दिये हैं ता न शिकायत करे कोई
लेकिन हर एक ज़ख़्म के मूँह में ज़बाँ है आज
तारीकियों ने घेर् लिया है हयात को
लेकिन किसी का रू-ए-हसीं दर्मियाँ है आज
जीने का वक़्त है यही मरने का वक़्त है
दिल अपनी ज़िन्दगी से बहुत शादमाँ है आज
हो जाता हूँ शहीद हर अहल-ए-वफ़ा के साथ
हर दास्तान-ए-शौक़ मेरी दास्ताँ है आज
आये हैं किस निशात से हम क़त्ल-गाह में
ज़ख़्मों से दिल है चूर नज़र गुल-फ़िशाँ है आज
ज़िन्दानियों ने तोड़ दिया ज़ुल्म का ग़ुरूर
वो दब-दबा वो रौब-ए-हुकूमत कहाँ है आज
6.
कभी ख़न्दाँ, कभी गिरियाँ, कभी रक़्साँ चलिए
दूर तक साथ तिरे
, उम्रे-गुरेज़ाँ, चलिए
ज़ौक़े-आराइश-ओ-गुलकारी-ए-अश्क़-ए-ख़ूँ से
कोई भी फ़स्ल हो
, फ़िरदौस-ब-दामाँ चलिए
रस्मे-देरीनःए-आलम को बदलने के लिए
रस्मे-देरीनःए-आलम से गुरेज़ाँ चलिए
आसमानों से बरसता है अँधेरा कैसा
अपनी पलकों पे लिए जश्ने-चराग़ाँ चलिए
शोलः-ए-जाँ को हवा देती है ख़ुद बादे-समूम
शोलः-ए-जाँ की तरह चाक-गिरीबाँ चलिए
अक़्ल के नूर से दिल कीजिए अपना रौशन
दिल की राहों से सूए-मंज़िले-इन्साँ चलिए
ग़म नयी सुब्‌ह के तारे का बहुत है लेकिन
लेके अब परचमे-ख़ुर्शीदे ज़र-अफ़शाँ चलिए
सर-ब-क़फ़ चलने की आदत में न फ़र्क़ आ जाए
कूचःए-दार में सरमस्तो-ग़ज़ल-ख़्वाँ चलिए
7.
शिकस्त-ए-शौक को तामील-ए-आरजू कहिये
के तिश्नगी को भी पैमान-ओ-सुबू कहिये
ख़याल-ए-यार को दीजिये विसाल-ए-यार का नाम
शब-ए-फिराक को गेसू-ए-मुश्कबू कहिये
चराग-ए-अंजुमन हैरत-ओ-नजारा हैं
लालारू जिनहें अब बाब-ए-आरजू कहिये
शिकायतें भी बहुत हैं हिकायतें भी बहुत
मजा तो जब है के यारों के रु-ब-रू कहिये
महक रही है गज़ल जिक्र-ए-जुल्फ-ए-खुबाँ से
नसीम-ए-सुब्ह की मानिंद कू-ब-कू कहिये
ऐ हुक्म कीजिये फिर खंजरों की दिलजारी
जहाँ-ए-जख्म से अफसाना-ए-गुलू कहिये
जुबाँ-ए-शोख से करते है पुरशिश-ए-अहवाल
और उसके बाद ये कहते हैं आरजू कहिये
है जख्म जख्म मगर क्यूँ ना जानिये उसे फूल
लहू लहू है मगर क्यूँ उसे लहू कहिये
जहाँ जहाँ भी खिजाँ है वहीं वहीं है बहार
चमन चमन यही अफसाना-ए-नुमू कहिये
जमीँ को दीजिये दिल-ए-मुद्दा तलब का पयाम
खिजाँ को वसत-ए-दामाँ-ए-आरजू कहिये
साँवरिये गज़ल अपनी बयाँ-ए-गालिब से
जबाँ-ए-मीर में भी हाँ कभू कभू कहिये
मगर वो हर्फ धड़कने लगे जो दिल की तरह
मगर वो बात जिसे अपनी गुफ्तगू कहिये
मगर वो आँख के जिसमें निगाह अपनी हो
मगर वो दिल जिसे अपनी जुस्तजू कहिये
किसी के नाम पे सरदार खो चुके हैं जिसे
उसी को अह्ल-ए-तमन्ना की आबरू कहिये