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| राइनेर मारिया रिल्के |
आज
जर्मन कवि राइनेर मारिया रिल्के (4 दिसंबर 1875 - 29 दिसंबर 1926) की
जन्मतिथि है। आधुनिक यूरोप के साहित्य को अपने संवेदनात्मक भाषा और शिल्प से
प्रभावित करने वाले रिल्के की काव्य शैली गीतात्मक और भावबोध में रहस्योन्मुखता
है। उनके जन्मदिन के मौक़े पर पेश हैं दो कविताएँ, जिसका
अनुवाद क्रमश: रामधारी सिंह ‘दिनकर’ और
धर्मवीर भारती ने किया है : बीइंग पोएट
काढ़ लो दोनों
नयन मेरे
काढ़ लो दोनों नयन मेरे,
तुम्हारी ओर अपलक देखना तब भी न छोड़ूँगा।
तुम्हारी ओर अपलक देखना तब भी न छोड़ूँगा।
तुम्हारे पाँव की आहट इसी
सुख से सुनूँगा,
श्रवण के द्वार चाहे बंद कर दो।
श्रवण के द्वार चाहे बंद कर दो।
चरण भी छीन लो यदि;
तुम्हारी ओर यों ही रात-दिन चलता रहूँगा।
तुम्हारी ओर यों ही रात-दिन चलता रहूँगा।
कथा अपनी तुम्हारे सामने
कहा न छोड़ूँगा,
भले ही काट दो तुम जीभ, मुझको मूक कर दो।
भले ही काट दो तुम जीभ, मुझको मूक कर दो।
भुजाएँ तोड़ कर मेरी भले
निर्भुज बना दो,
तुम्हें आलिंगनों के पाश में बाँधे रहूँगा।
तुम्हें आलिंगनों के पाश में बाँधे रहूँगा।
हृदय यदि छीन लोगे,
उठेंगी धड़कनें कुछ और होकर तीव्र मानस में।
उठेंगी धड़कनें कुछ और होकर तीव्र मानस में।
जला कर आग यदि मस्तिष्क को
भी क्षार कर दोगे,
रूधिर की वीचियों पर मैं तुम्हें ढोला फिरूँगा।
रूधिर की वीचियों पर मैं तुम्हें ढोला फिरूँगा।
मेरे बिना तुम
प्रभु
जब मेरा अस्तित्व न रहेगा, प्रभु, तब तुम क्या करोगे?
जब मैं– तुम्हारा जलपात्र, टूटकर बिखर जाऊँगा?
जब मैं तुम्हारी मदिरा सूख जाऊँगा या स्वादहीन हो जाऊँगा?
जब मैं– तुम्हारा जलपात्र, टूटकर बिखर जाऊँगा?
जब मैं तुम्हारी मदिरा सूख जाऊँगा या स्वादहीन हो जाऊँगा?
मैं तुम्हारा वेश हूँ, तुम्हारी वृत्ति हूँ
मुझे खोकर तुम अपना अर्थ खो बैठोगे?
मुझे खोकर तुम अपना अर्थ खो बैठोगे?
मेरे बिना तुम गृहहीन निर्वासित
होगे, स्वागत-विहीन
मैं तुम्हारी पादुका हूँ, मेरे बिना तुम्हारे
चरणों में छाले पड़ जाएँगे, वे भटकेंगे लहूलुहान!
मैं तुम्हारी पादुका हूँ, मेरे बिना तुम्हारे
चरणों में छाले पड़ जाएँगे, वे भटकेंगे लहूलुहान!
तुम्हारा शानदार लबादा गिर
जायेगा
तुम्हारी कृपादृष्टि जो कभी मेरे कपोलों की
नर्म शय्या पर विश्राम करती थी
निराश होकर वह सुख खोजेगी
जो मैं उसे देता था–
तुम्हारी कृपादृष्टि जो कभी मेरे कपोलों की
नर्म शय्या पर विश्राम करती थी
निराश होकर वह सुख खोजेगी
जो मैं उसे देता था–
दूर चट्टानों की ठंडी गोद
में
सूर्यास्त के रंगों में घुलने का सुख
सूर्यास्त के रंगों में घुलने का सुख
प्रभु, प्रभु मुझे आशंका होती है
मेरे बिना तुम क्या करोगे?
मेरे बिना तुम क्या करोगे?

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