Showing posts with label उदय प्रकाश. Show all posts
Showing posts with label उदय प्रकाश. Show all posts

Tuesday, January 01, 2013

उदय प्रकाश की जन्मतिथि !

उदय प्रकाश
आप सब को नया साल बहुत मुबारक़ हो। आज मेरे प्रिय कवि-कथाकार और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित उदय प्रकाश की जन्मतिथि (जन्म : 01 जनवरी 1951) है। कथाकार के रूप में अधिक प्रसिद्धि पाने वाले उदय प्रकाश मूलत: कवि हैं। उदय जी को ख़ूब सारी शुभकामनाओं सहित इस अवसर पर प्रस्तुत हैं कुछ छोटी कविताएँ : बीइंग पोएट
पत्थर
इस पत्थर के भीतर
एक देवता ज़रूर है
उस देवता के मंत्र से
यह पत्थर है
जैसे हम सब
पत्थर हैं किसी देवता के मंत्र से।  
व्यवस्था
दोस्त चिट्ठी में
लिखता है--
'मैं सकुशल हूँ।'
मैं लिखता हूँ--
'मैं सकुशल हूँ।'
दोनों आश्चर्यचकित हैं।
खेल
जो लड़का
सिपाही बना था
उससे दूसरे लड़के ने
अकड़कर कहा--
'अबे राजा की पूँछ के बाल
मैं चोर नहीं हूँ'
और खेल
बिगड़ गया।
गांधीजी
गांधी जी
कहते थे--
'अहिंसा'
और डंडा लेकर
पैदल घूमते थे।
वसंत
रेल गाड़ी आती है
और बिना रुके
चली जाती है।
जंगल में
पलाश का एक गार्ड
लाल झंडियाँ
दिखाता रह जाता है।
पिंजड़ा
चिड़िया
पिंजड़े में नहीं है।
पिंजड़ा गुस्से में है
आकाश ख़ुश।
आकाश की ख़ुशी में
नन्हीं-सी चिड़िया
उड़ना सीखती है।
कुतुबमीनार की ऊँचाई
कुतबुद्दीन ऎबक को
अब ऊपर से
नीचे देख पाने के लिए
चश्मे की ज़रूरत पड़ती
इतनी ऊँचाई से गिर कर
चश्मा
टूट जाता।
रात
इतने घुप्प अंधेरे में
एक पीली पतंग
धीरे-धीरे
आकाश में चढ़ रही है।
किसी बच्चे की नींद में है
उसकी गड़ेरी
किसी माँ की लोरियों से
निकलती है डोर!
मारना
आदमी
मरने के बाद
कुछ नहीं सोचता।
आदमी
मरने के बाद
कुछ नहीं बोलता।
कुछ नहीं सोचने
और कुछ नहीं बोलने पर
आदमी
मर जाता है।
रंगा-बिल्ला
एक था रंगा
एक था बिल्ला
दोनों भाई-भाई नहीं थे
लेकिन दोनों को फाँसी हो गयी।
एक थे टाटा
एक है बिरला
दोनों भाई-भाई हैं
लेकिन दोनों को फाँसी नहीं हुई।
क़ैदी
वे तीन थे
और जैसे किसी जेल में थे
भीतर थी एक संकरी-सी कोठरी
जिसके भीतर सिर्फ़ उनका ही संकरा-सा जीवन
और उनकी ही थोड़ी-सी साँसे थीं
एक संतरी की तरह टहलता था
दूसरा वार्डेन की तरह देता था हिदायतें
कविता के सख़्त क़ायदों के बारे में
तीसरे को
दोनों ऎसे देखते थे
जैसे देखा जाता है कोई क़ैदी।
शरारत
छत पर बच्चा
अपनी माँ के साथ आता है।
पहाड़ों की ओर वह
अपनी नन्हीं उंगली दिखाता है।
पहाड़ आँख बचा कर
हल्के-से पीछे हट जाते हैं 
माँ देख नहीं पाती।
बच्चा 
देख लेता है।
वह ताली पीटकर उछलता है
--देखा माँदेखा
उधर अभी
सुबह हो जाएगी।
झाड़ी
इसी बग़ीचे में किसी पेड़ के पीछे
छुपा बैठा होगा
थानू
मैं पुकारता हूँ
बीस साल की दूरी से
...था ... नू...
उस पेड़ के पीछे झड़ियों के बीच
फँस कर अटका होगा समय
वहाँ अभी तक
थानू छिपा होगा
थानू और मृत्यु के बीच
अभी भी ज़रूर
एक दूरी होगी।
बस में पिता
मैंने बिल्कुल साफ़-साफ़ देखा
उस बस पर बैठे
कहीं जा रहे थे पिता
उनके सफ़ेद गाल, तम्बाकू भरा उनका मुँह
किसी को न पहचानती उनकी आँखें
उस बस को रोको
जो अदृश्य हो जाएगी अभी
उस बस तक
क्या
पहुँच सकती है
मेरी आवाज़?
उस बस पर बैठ कर
इस तरह क्यों चले गए पिता?
दिल्ली
समुद्र के किनारे
अकेले नारियल के पेड़ की तरह है
एक अकेला आदमी इस शहर में।
समुद्र के ऊपर उड़ती
एक अकेली चिड़िया का कंठ है
एक अकेले आदमी की आवाज़
कितनी बड़ी-बड़ी इमारतें हैं दिल्ली में
असंख्य जगमग जहाज
डगमगाते हैं चारों ओर रात भर
कहाँ जा रहे होंगे इनमें बैठे तिज़ारती
कितने जवाहरात लदे होंगे इन जहाजों में
कितने ग़ुलाम
अपनी पिघलती चरबी की ऊष्मा में
पतवारों पर थक कर सो गए होगे।
ओनासिस! ओनासिस!
यहाँ तुम्हारी नगरी में
फिर से है एक अकेला आदमी।