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| माखनलाल चतुर्वेदी |
आज माखनलाल चतुर्वेदी (04 अप्रैल 1889 - 30 जनवरी 1968) की जन्मतिथि है। महादेवी वर्मा ने के शब्दों में, “माखनलाल चतुर्वेदी विराट भारत
की अखण्ड आत्मा हैं। उनके काव्य में हिमालय की गरिमा हरिताम्बरा धरती से बोली है।
संकल्प और भावना, बुद्धि की तीव्रता, दर्शन की दुरूहता
और जीवन की सहज छवि एक साथ ही उनके काव्य में मिलती है”। और डॉ. रामविलास शर्मा के
शब्दों में, “माखनलालजी
राजनीतिक कवि हैं। किंतु राजनीति अनुभूति बनकर उनकी कविता में प्रकट हुई है। उनका
युगांतरकारी महत्व यह है कि उन्होंने उग्र राष्ट्रीय चेतना के साथ अपने काव्य में
सूक्ष्म सौंदर्य बोध, आत्मविभोर गेयता और मोहक चित्तमयता को स्थान
दिया”। इस अवसर पर प्रस्तुत हैं कुछ कविताएँ : बीइंग पोएट
आज चाँदनी कहाँ गई
मगन गगन से भूमि तलक यह
आज चाँदनी कहाँ गयी
चलों बुला लायें उनको अब
मिला जावेगी, जहाँ गयी!
आज चाँदनी कहाँ गयी
चलों बुला लायें उनको अब
मिला जावेगी, जहाँ गयी!
वह मक्खन-सी मधुर चाँदनी
वह फैले आटे-सी प्यारी
भूतल के हीतल पर फैली
वह मधुरीली, वह सुकुमारी!
वह फैले आटे-सी प्यारी
भूतल के हीतल पर फैली
वह मधुरीली, वह सुकुमारी!
उस दिन अग-जग पर छायी थी
बेलों-सी लहलहा गयी
मगन गगन से भूमि तलक यह
आज चाँदनी कहाँ गयी?
बेलों-सी लहलहा गयी
मगन गगन से भूमि तलक यह
आज चाँदनी कहाँ गयी?
विस्मृत स्वप्न
आँख में छाए हुए से कौन हो?
बोलते हो क्यों नहीं, क्यों मौन हो?
बोलते हो क्यों नहीं, क्यों मौन हो?
हृदय-पट पर गुदगुदी-सी क्यों चली,
ले चली क्या अस्फुट-व्यथा क्या बेकली;
तड़पने तो दी भी होती साधना,
रे निठुर ! आराधना उर में जली
ले चली क्या अस्फुट-व्यथा क्या बेकली;
तड़पने तो दी भी होती साधना,
रे निठुर ! आराधना उर में जली
किसलिए अनुराग जल फिर भर चले,
नयन पुट वृथा ही क्यों झर चले,
धर चले जब साथ तट अरमान भी,
ज्ञान पर क्यों विगत स्वप्न उतर चले
नयन पुट वृथा ही क्यों झर चले,
धर चले जब साथ तट अरमान भी,
ज्ञान पर क्यों विगत स्वप्न उतर चले
मचलते उन्मुक्त से तुम कौन हो ?
बोलते हो क्यों नहीं, क्यों मौन हो?
बोलते हो क्यों नहीं, क्यों मौन हो?
फूल कहाँ हैं
चाहों के फल तुम हो
तो फिर इन चाहों के फूल कहाँ हैं?
गंधवाह जिनपर निहाल थे
इन फूलों की धूल कहाँ है?
तो फिर इन चाहों के फूल कहाँ हैं?
गंधवाह जिनपर निहाल थे
इन फूलों की धूल कहाँ है?
झुकी-झुकी डालियाँ
इन्हीं के भारों क्या झुक-झुक पड़ती हैं
फिर क्यों इस सौंदर्य-लोक में
काँटे हैं, अनियाँ गड़ती हैं?
इन्हीं के भारों क्या झुक-झुक पड़ती हैं
फिर क्यों इस सौंदर्य-लोक में
काँटे हैं, अनियाँ गड़ती हैं?
मादक मंद पवन के झोंके
झुकना आठ याम करते हैं;
राजमार्ग सूने हैं स्थिर हैं
ये किसको प्रणाम करते हैं?
झुकना आठ याम करते हैं;
राजमार्ग सूने हैं स्थिर हैं
ये किसको प्रणाम करते हैं?
माटी से रूठ कर
उठे थे नव-नव
किस तपाक से तप-तप;
फिर क्यों माटी के ढेलों पर
सीस चढ़ा फूलों गिरते हैं?
उठे थे नव-नव
किस तपाक से तप-तप;
फिर क्यों माटी के ढेलों पर
सीस चढ़ा फूलों गिरते हैं?
टूटती जंजीर
एक कहता है कि जीवन की कहानी बेगुनाह,
एक बोला चल रही साँसें – सधीं, पर बेगुनाह।
एक बोला चल रही साँसें – सधीं, पर बेगुनाह।
एक ने दोनों पलक यूँ धर दिये,
एक ने पुतली झपक ली, वर दिये।
एक ने पुतली झपक ली, वर दिये।
एक ने आलिंगनों को आस दी,
एक ने निर्माण को बनवास दी।
एक ने निर्माण को बनवास दी।
आज तारों ने नये अम्बर भरे,
टूटती जंजीर ने नव-स्वर झरे।
टूटती जंजीर ने नव-स्वर झरे।
जूठन
जो है वेदनामयी यह, जितना यह अपनापन है।
जीवन का जो धोखा, है, मन की जैसी उलझन है।
जीवन का जो धोखा, है, मन की जैसी उलझन है।
जितनी कड़वी मुस्काहट, जितना मीठा रोदन है।
जलते मसूबों की जो यह जगमगमयी तपन है।
जलते मसूबों की जो यह जगमगमयी तपन है।
मैंने उसमें चाहे कुछ भी विष अपना डाल दिया हो।
रस है यदि, तो वह, ‘तेरे’ प्राणों ही की जूठन है।
रस है यदि, तो वह, ‘तेरे’ प्राणों ही की जूठन है।

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