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| ज़फ़र गोरखपुरी |
कल
(5 मई) मशहूर शायर और गीतकार ज़फ़र गोरखपुरी की
जन्मतिथि है। फ़िल्म ‘बाज़ीगर’
के लिए ‘किताबें बहुत सी पढ़ी होंगी तुमने’ जैसा गीत लिखने वाले ज़फ़र की ग़ज़लों में शहर की परेशानी के साथ-साथ गाँव की
मासूम अदा भी है। रोज़मर्रा की बातों को शायरी में जज़्ब करने वाले 'ज़फ़र' की शायरी में हर उम्र पोशीदा है। पेश हैं कुछ ग़ज़लें : बीइंग पोएट
1.
इरादा हो अटल तो मोजज़ा ऐसा
भी होता है
दिए को ज़िंदा रखती है हव़ा, ऐसा भी होता है
दिए को ज़िंदा रखती है हव़ा, ऐसा भी होता है
उदासी गीत गाती है मज़े
लेती है वीरानी
हमारे घर में साहब रतजगा ऐसा भी होता है
हमारे घर में साहब रतजगा ऐसा भी होता है
अजब है रब्त की दुनिया
ख़बर के दायरे में है
नहीं मिलता कभी अपना पता ऐसा भी होता है
नहीं मिलता कभी अपना पता ऐसा भी होता है
किसी मासूम बच्चे के
तबस्सुम में उतर जाओ
तो शायद ये समझ पाओ, ख़ुदा ऐसा भी होता है
तो शायद ये समझ पाओ, ख़ुदा ऐसा भी होता है
ज़बां पर आ गए छाले मगर ये
तो खुला हम पर
बहुत मीठे फलों का ज़ायक़ा ऐसा भी होता है
बहुत मीठे फलों का ज़ायक़ा ऐसा भी होता है
तुम्हारे ही तसव्वुर की
किसी सरशार मंज़िल में
तुम्हारा साथ लगता है बुरा, ऐसा भी होता है
तुम्हारा साथ लगता है बुरा, ऐसा भी होता है
2.
जिस्म छूती है जब आ आ के
पवन बारिश में
और बढ़ जाती है कुछ दिल की जलन बारिश में
और बढ़ जाती है कुछ दिल की जलन बारिश में
मेरे अतराफ़ छ्लक पड़ती
हैं मीठी झीलें
जब नहाता है कोई सीमबदन बारिश में
जब नहाता है कोई सीमबदन बारिश में
दूध में जैसे कोई अब्र का
टुकड़ा घुल जाए
ऐसा लगता है तेरा सांवलापन बारिश में
ऐसा लगता है तेरा सांवलापन बारिश में
नद्दियाँ सारी लबालब थीं
मगर पहरा था
रह गए प्यासे मुरादों के हिरन बारिश में
रह गए प्यासे मुरादों के हिरन बारिश में
अब तो रोके न रुके आंख का
सैलाब सखी
जी को आशा थी कि आएंगे सजन बारिश में
जी को आशा थी कि आएंगे सजन बारिश में
बाढ़ आई थी ज़फ़र ले गई
घरबार मेरा
अब किसे देखने जाऊं मैं वतन, बारिश में
अब किसे देखने जाऊं मैं वतन, बारिश में
3.
मिले किसी से नज़र तो समझो ग़ज़ल हुई
रहे न अपनी ख़बर तो समझो ग़ज़ल हुई
रहे न अपनी ख़बर तो समझो ग़ज़ल हुई
मिला के नज़रों को वालेहाना हया से फिर
झुका ले कोई नज़र तो समझो ग़ज़ल हुई
झुका ले कोई नज़र तो समझो ग़ज़ल हुई
इधर मचल कर उन्हें पुकारे जुनूं मेरा
धड़क उठे दिल उधर तो समझो ग़ज़ल हुई
धड़क उठे दिल उधर तो समझो ग़ज़ल हुई
उदास बिस्तर की सिलवटें जब तुम्हें चुभे
न सो सको रात भर तो समझो ग़ज़ल हुई
न सो सको रात भर तो समझो ग़ज़ल हुई
वो बदगुमा हो तो शेर सूझे न शायरी
वो मेहरबां हो ‘जफ़र’ तो समझो ग़ज़ल हुई
वो मेहरबां हो ‘जफ़र’ तो समझो ग़ज़ल हुई
4.
हमेशा है वस्ल-ए-जुदाई का
धन्धा
बुतों की है उल्फ़त ख़ुदाई का धन्धा
बुतों की है उल्फ़त ख़ुदाई का धन्धा
अगर बैठें रिन्दों की
सोहबत में ज़ाहिद
तो दें छोड़ सब पारसाई का धन्धा
तो दें छोड़ सब पारसाई का धन्धा
जो होना है आख़िर वो हो कर
रहेगा
करे कौन बख़्त-आज़माई का धन्धा
करे कौन बख़्त-आज़माई का धन्धा
परेशां रही उम्र पर न
छोड़ा
तेरी ज़ुल्फ ने कज-अदाई का धन्धा
तेरी ज़ुल्फ ने कज-अदाई का धन्धा
मुबारक रईसों को
कार-ए-रियासत
गदा को है काफ़ी गदाई का धन्धा
गदा को है काफ़ी गदाई का धन्धा
नहीं ख़िज्र के पीछे गर और
झगड़े
तो है साथ इक रहनुमाई का धन्धा
तो है साथ इक रहनुमाई का धन्धा
‘ज़फ़र‘
इस से बहतर है ना-आशनाई
कि मुश्किल है ये आशनाई का धन्धा
कि मुश्किल है ये आशनाई का धन्धा
5.
मेरे बाद किधर जाएगी
तन्हाई
मैं जो मरा तो मर जाएगी तन्हाई
मैं जो मरा तो मर जाएगी तन्हाई
मैं जब रो रो के दरिया बन
जाऊँगा
उस दिन पार उतर जाएगी तन्हाई
उस दिन पार उतर जाएगी तन्हाई
तन्हाई को घर से रुख़्सत
कर तो दो
सोचो किस के घर जाएगी तन्हाई
सोचो किस के घर जाएगी तन्हाई
वीराना हूँ आबादी से आया
हूँ
देखेगी तो डर जाएगी तन्हाई
देखेगी तो डर जाएगी तन्हाई
यूँ आओ कि पावों की भी
आवाज़ न हो
शोर हुआ तो मर जाएगी तन्हाई
शोर हुआ तो मर जाएगी तन्हाई
6.
कौन याद आया ये महकारें
कहाँ से आ गईं
दश्त में ख़ुशबू की बौछारें कहाँ से आ गईं
दश्त में ख़ुशबू की बौछारें कहाँ से आ गईं
कैसी शब है एक इक करवट पे
कट जाता है जिस्म
मेरे बिस्तर में ये तलवारें कहाँ से आ गईं
मेरे बिस्तर में ये तलवारें कहाँ से आ गईं
साथ है,
मिलना अगर चाहूँ तो मिलता भी नहीं
एक घर में इतनी दीवारें कहाँ से आ गईं
एक घर में इतनी दीवारें कहाँ से आ गईं
शायद अब तक मुझमें कोई
घोंसला आबाद है
घर में ये चिड़ियों की चहकारें कहाँ से आ गईं
घर में ये चिड़ियों की चहकारें कहाँ से आ गईं
ख्वाब शायद फिर हुआ आंखों
में कोई संगसार
ज़ेरे-मिज़गां ख़ून की धारें कहाँ से आ गईं
ज़ेरे-मिज़गां ख़ून की धारें कहाँ से आ गईं
रख दिया किसने मेरे शाने
पे अपना गर्म हाथ
मुझ शिकस्ता-पा में रफ्त़ारें कहाँ से आ गईं
मुझ शिकस्ता-पा में रफ्त़ारें कहाँ से आ गईं
7.
देखें क़रीब से भी तो
अच्छा दिखाई दे
इक आदमी तो शहर में ऐसा दिखाई दे
इक आदमी तो शहर में ऐसा दिखाई दे
अब भीक मांगने के तरीक़े
बदल गए
लाज़िम नहीं कि हाथ में कासा दिखाई दे
लाज़िम नहीं कि हाथ में कासा दिखाई दे
नेज़े पे रखके और मेरा सर
बुलंद कर
दुनिया को इक चिराग़ तो जलता दिखाई दे
दुनिया को इक चिराग़ तो जलता दिखाई दे
दिल में तेरे ख़याल की
बनती है एक धनक
सूरज-सा आइने से गुज़रता दिखाई दे
सूरज-सा आइने से गुज़रता दिखाई दे
चल ज़िंदगी की जोत जगाएं,
अजब नहीं
लाशों के दरमियां कोई रस्ता दिखाई दे
लाशों के दरमियां कोई रस्ता दिखाई दे
हर शै मेरे बदन की ज़फ़र
क़त्ल हो चुकी
एक दर्द की किरन है कि ज़िंदा दिखाई दे
एक दर्द की किरन है कि ज़िंदा दिखाई दे

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