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Wednesday, December 14, 2011

जॉन एलिया की जन्मतिथि !

जॉन एलिया
आज उर्दू के मशहूर शायर जॉन एलिया की जन्मतिथि है। 14 दिसम्बर, 1931 को अमरोहा, उत्तर प्रदेश में जन्म लेने वाला यह शायर अपने 'अंदाज़-ए-बयां' के लिए बहुत लोकप्रिय हुआ। इनका इंतकाल 2002 में हुआ। पेश है कुछ ग़ज़लें : बीइंग पोएट   

एक

उम्र गुज़रेगी इम्तहान में क्या
दाग़ ही देंगे मुझको दान में क्या

मेरी हर बात बेअसर ही रही
नुक्स है कुछ मेरे बयान में क्या

बोलते क्यो नहीं मेरे हक़ में
आबले पड़ गये ज़बान में क्या

मुझको तो कोई टोकता भी नहीं
यही होता है खानदान मे क्या

अपनी महरूमिया छुपाते हैं
हम गरीबो की आन-बान में क्या

वो मिले तो ये पूछना है मुझे
अब भी हूँ मै तेरी अमान में क्या

यूँ जो तकता है आसमान को तू
कोई रहता है आसमान में क्या

है नसीम-ए-बहार गर्दालूद
खाक उड़ती है उस मकान में क्या

ये मुझे चैन क्यो नहीं पड़ता
एक ही शक्स था जहान में क्या  


दो

जी ही जी में वो जल रही होगी

चाँदनी में टहल रहीं होगी

चाँद ने तान ली है चादर-ए-अब्र
अब वो कपड़े बदल रही होगी

सो गई होगी वो शफ़क़ अन्दाम
सब्ज़ किन्दील जल रही होगी

सुर्ख और सब्ज़ वादियों की तरफ
वो मेरे साथ चल रही होगी

चढ़ते-चढ़ते किसी पहाड़ी पर
अब तो करवट बदल रही होगी

नील को झील नाक तक पहने
सन्दली जिस्म मल रही होगी

तीन

गाहे-गाहे बस अब तही हो क्या

तुम से मिल कर बहुत खुशी हो क्या

मिल रही हो बड़े तपाक के साथ
मुझ को अक्सर भुला चुकी हो क्या

याद हैं अब भी अपने ख्वाब तुम्हें
मुझ से मिलकर उदास भी हो क्या

बस मुझे यूँ ही एक ख़याल आया
सोचती हो तो सोचती हो क्या

अब मेरी कोई ज़िन्दगी ही नहीं
अब भी तुम मेरी ज़िन्दगी हो क्या

क्या कहा इश्क़ जाबेदानी है
आख़री बार मिल रही हो क्या

है फज़ा याँ की सोई-सोई सी
तुम बहुत तेज़ रोशनी हो क्या

मेरे सब तंज़ बेअसर ही रहे
तुम बहुत दूर जा चुकी हो क्या

दिल में अब सोज़े-इंतज़ार नहीं
शम्मे उम्मीद बुझ गई हो क्या 

चार

उसके पहलू से लग के चलते हैं
हम कहाँ टालने से टलते हैं

मैं उसी तरह तो बहलता हूँ यारों
और सब जिस तरह बहलते हैं

वो है जान अब हर एक महफ़िल की
हम भी अब घर से कम निकलते हैं

क्या तकल्लुफ़ करें ये कहने में
जो भी खुश है हम उससे जलते हैं

है उसे दूर का सफ़र दरपेश
हम सँभाले नहीं सँभलते हैं

है अजब फ़ैसले का सहरा भी
चल न पड़िए तो पाँव जलते हैं

हो रहा हूँ मैं किस तरह बर्बाद
देखने वाले हाथ मलते हैं

तुम बनो रंग, तुम बनो ख़ुशबू
हम तो अपने सुख़न में ढलते हैं