![]() |
| प्रकृति करगेती |
विश्व
महिला दिवस के अवसर पर प्रस्तुत हैं प्रकृति करगेती (जन्म- 16 मार्च 1991) की कविताएँ। प्रकृति कम उम्र में जिस तरह की कविताएँ लिखती हैं, उन्हें पढ़ते
हुए एक विस्मय उपजता है। इनकी कविताओं मे उम्र की सतह पर तैरते हुए ऐसे अनुभव हैं, जो अक्सर अनछुए
रह जाते हैं। अपने चारों तरफ़ की हवाओं में उगते हुए गंध से इन्होंने न सिर्फ़ साहस
पूर्वक विषय छाँटे हैं, बल्कि प्रस्तुति के महत्व का भी ध्यान रखा है : बीइंग पोएट
उग्रवाद
मेरे अन्दर कुछ उग्रवादी रहते हैं
उनका होता है पाँच दिन का उग्रवाद
और कभी उससे भी कम...
उनका होता है पाँच दिन का उग्रवाद
और कभी उससे भी कम...
इनका ये रिसता उग्रवाद
कपड़ो की परतों से रिसता है
मेरी योनी से टपकता है
दाग लगाता है...
कपड़ो की परतों से रिसता है
मेरी योनी से टपकता है
दाग लगाता है...
एक कराह करके
उठती हूँ सुबह
शिकायत नहीं है
मंजूर है कि
इनका संघर्ष चलता रहे
आँखिर एक जान गई है मेरे अन्दर
एक अंडा फूटा है
विरोध में उसके,
बड़ा लाज़मी है ये बवाल
उठती हूँ सुबह
शिकायत नहीं है
मंजूर है कि
इनका संघर्ष चलता रहे
आँखिर एक जान गई है मेरे अन्दर
एक अंडा फूटा है
विरोध में उसके,
बड़ा लाज़मी है ये बवाल
धीरे धीरे अन्दर का
लोहा ही तो कम होता है बस
ये लाल रंग की क्रांति है
ये पांच दिन की क्रांति है
लोहा ही तो कम होता है बस
ये लाल रंग की क्रांति है
ये पांच दिन की क्रांति है
फिर सब शांत हो जाएगा
मैं भी भूल जाऊंगी
पर ये उग्रवादी फिर आएँगे
आएँगे मेरा लोहा कम करने
बिन बताए
चुपचाप...
मैं भी भूल जाऊंगी
पर ये उग्रवादी फिर आएँगे
आएँगे मेरा लोहा कम करने
बिन बताए
चुपचाप...
मावा
बहार निकलने पर घर से
हाथ में मावा थमाया था
मावा था आज़ादी का
थोड़ा-थोड़ा खा लिया करते थे
हाथ में मावा थमाया था
मावा था आज़ादी का
थोड़ा-थोड़ा खा लिया करते थे
अब दूसरों का मावा छिनने लगा है
हवस में किसी की चाटने लगा है
इज़्ज़त-आबरू की पन्नी लपेटी गई है
हर दूसरे मावे पर...
हवस में किसी की चाटने लगा है
इज़्ज़त-आबरू की पन्नी लपेटी गई है
हर दूसरे मावे पर...
अपने मावे को सहेज कर चलती हूँ
कि इसे हवस अगर ना भी खा सकी
तो मेरी माँ की चिंता ज़रूर खा जाएगी
कि इसे हवस अगर ना भी खा सकी
तो मेरी माँ की चिंता ज़रूर खा जाएगी
नंगी
मैं उस चाय के ठेले पर रोज़ नंगी खड़ी होती हूँ
मैं उस दारू के ठेके पर रोज़ नंगी खड़ी होती हूँ
उस सड़क पर
उस सब-वे में
उस फुटपाथ पर
ट्रेन में
बस में
ऑटो में
अपनी ही बालकनी में
सीढ़ियाँ उतरते हुए
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए
किराने की दुकान पर
सब्ज़ी के ठेले पर
सब जगह
मैं नंगी खड़ी होती हूँ
मैं उस दारू के ठेके पर रोज़ नंगी खड़ी होती हूँ
उस सड़क पर
उस सब-वे में
उस फुटपाथ पर
ट्रेन में
बस में
ऑटो में
अपनी ही बालकनी में
सीढ़ियाँ उतरते हुए
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए
किराने की दुकान पर
सब्ज़ी के ठेले पर
सब जगह
मैं नंगी खड़ी होती हूँ
वो बिन पास आए
नंगा करके जाता है
वो बिन छुए
मुझे कहाँ-कहाँ छू जाता है
उसका हल्का धक्का भी
मेरी इज्ज़त लूट ले जाता है
पर
मेरी ही तो ग़लती है
मैं ही नंगी खड़ी होती हूँ
हर रोज़।
नंगा करके जाता है
वो बिन छुए
मुझे कहाँ-कहाँ छू जाता है
उसका हल्का धक्का भी
मेरी इज्ज़त लूट ले जाता है
पर
मेरी ही तो ग़लती है
मैं ही नंगी खड़ी होती हूँ
हर रोज़।
पेशाब की थैली
पेशाब की थैली फूट पड़ती कभी
तो मूत देता हूँ
यहाँ-वहाँ
जहाँ-तहाँ
न जाने कहाँ-कहाँ!!
तो मूत देता हूँ
यहाँ-वहाँ
जहाँ-तहाँ
न जाने कहाँ-कहाँ!!
मूत देता हूँ
इस कदर कि दरो-दीवार महक उठते हैं
इस कदर कि दरो-दीवार महक उठते हैं
तुमने न ग़ौर किया होगा कभी
पर मैंने तो किया है
कि दुनिया में निशाँ छोड़ के जाना
देखो कितने निशाँ छोड़े जा रहा हूँ...महकते हुए निशाँ!
पर मैंने तो किया है
कि दुनिया में निशाँ छोड़ के जाना
देखो कितने निशाँ छोड़े जा रहा हूँ...महकते हुए निशाँ!
बड़ी मेहनत से संजोई
यह विरासत छोड़े जाऊँगा अपने पीछे
कि तुम मूतते रहना
और कुछ इस क़दर कि ज़माना देखे
यह विरासत छोड़े जाऊँगा अपने पीछे
कि तुम मूतते रहना
और कुछ इस क़दर कि ज़माना देखे
ऐ हुनरमंदों,
फुटपाथ, गलियों के कोने, पेड़ का तला, दीवारें
कुछ न छोड़ना
और वो मंच तो बिलकुल न छोड़ना
करतब दिखने के लिए
लिखा हो जिसपे
"देखो गधा मूत, रहा है"
फुटपाथ, गलियों के कोने, पेड़ का तला, दीवारें
कुछ न छोड़ना
और वो मंच तो बिलकुल न छोड़ना
करतब दिखने के लिए
लिखा हो जिसपे
"देखो गधा मूत, रहा है"
वो कहावत है,
नाचो इस तरह कि कोई न देख रहा हो
बस उसी तरह
चेन शर्म की नीचे कर
बिखेर देना सारी महक
कुछ इस तरह कि
अगली पुरवाई हो अमोनिया की
नाचो इस तरह कि कोई न देख रहा हो
बस उसी तरह
चेन शर्म की नीचे कर
बिखेर देना सारी महक
कुछ इस तरह कि
अगली पुरवाई हो अमोनिया की
और जब कभी हौसला कम हो
तो मुझे याद करना
कि कैसे मैं…
पेशाब कि थैली फूटने पर
मूत देता था
यहाँ—वहाँ
जहाँ—तहाँ
न जाने कहाँ-कहाँ!
तो मुझे याद करना
कि कैसे मैं…
पेशाब कि थैली फूटने पर
मूत देता था
यहाँ—वहाँ
जहाँ—तहाँ
न जाने कहाँ-कहाँ!
परत-दर-परत
आवाज़ में तो जैसे परतें जम गई हैं
एक परत को निकालती हूँ
तो सामने होती है एक दूसरी ही परत
काश इन परतों की गिनती होती
एक परत को निकालती हूँ
तो सामने होती है एक दूसरी ही परत
काश इन परतों की गिनती होती
बहुत समय पहले निकाली थी परत...एक काई लगी परत!
इस परत को निकलते वक़्त हाथ फिसलता था बार बार
यह परत चिकनाई भरा एहसास छोड़ कर गई है
बड़ी पुरानी बात है, पर आजतक हाथ से उसकी काई नहीं निकली
इस परत को निकलते वक़्त हाथ फिसलता था बार बार
यह परत चिकनाई भरा एहसास छोड़ कर गई है
बड़ी पुरानी बात है, पर आजतक हाथ से उसकी काई नहीं निकली
इक परत के बारे में सोचती हूँ तो सहम जाती
हूँ
नहीं सोचा था की इतनी सूखी परत से भी आवाज़ आएगी
जो आवाज़ नहीं थी, चीख़ थी
या उसकी ख़ामोशी थी जो डरा गई मुझे
उस बेचारी-सी परत ने तो शायद एक लब्ज़ भी ना बोला होगा
पर ख़ामोशियाँ भी तो चीर-सा जाती हैं न
नहीं सोचा था की इतनी सूखी परत से भी आवाज़ आएगी
जो आवाज़ नहीं थी, चीख़ थी
या उसकी ख़ामोशी थी जो डरा गई मुझे
उस बेचारी-सी परत ने तो शायद एक लब्ज़ भी ना बोला होगा
पर ख़ामोशियाँ भी तो चीर-सा जाती हैं न
एक परत, ऐसी भी थी…
जिसका कोई जिस्म नहीं था, कोई ढांचा नहीं था
आज़ाद ही कह सकते हैं इसे
वो बस आवाज़ नहीं थी, कोई धुन थी शायद
निकाला था तो बड़ी इठलाई थी
निकालते समय वो उसकी अंगड़ाई, आज भी ताज़ा है
ऐ! मस्त-मौला परत, तेरी याद आज भी ताज़ा है
जिसका कोई जिस्म नहीं था, कोई ढांचा नहीं था
आज़ाद ही कह सकते हैं इसे
वो बस आवाज़ नहीं थी, कोई धुन थी शायद
निकाला था तो बड़ी इठलाई थी
निकालते समय वो उसकी अंगड़ाई, आज भी ताज़ा है
ऐ! मस्त-मौला परत, तेरी याद आज भी ताज़ा है
बस, ऐसे ही चलता रहता है यह
परत निकालने का सिलसिला
परत-दर-परत, गहराती है यह सच्चाई
यह ज़िन्दगी की सच्चाई
परत निकालने का सिलसिला
परत-दर-परत, गहराती है यह सच्चाई
यह ज़िन्दगी की सच्चाई
अपनी आवाज़ों से इतनी परतें निकाली हैं,
अब बस उस शून्य का इंतज़ार है
जब बस ख़ामोशी ही बचेगी… वो रूहानी-सी ख़ामोशी
भले ही उसे पहले, एक परत निकलेगी…
जो असीम दर्द भरी होगी,
धड़कने तेज़ होंगी, सांस फूलेगी
आस-पास, लोग घबराएंगे…
पर मेरी आँखों को बंद होता देख,
एक ख़ामोशी छाएगी…
और अगले ही दिन, उस ख़ामोशी को जला दिया जाएगा
अब जो बची रहेगी, वो ख़ामोशी एक मटके में बंद
मेरे साथ उस शून्य में डूब जाएगी
मेरी रूह की तस्कीन होगी!
अब बस उस शून्य का इंतज़ार है
जब बस ख़ामोशी ही बचेगी… वो रूहानी-सी ख़ामोशी
भले ही उसे पहले, एक परत निकलेगी…
जो असीम दर्द भरी होगी,
धड़कने तेज़ होंगी, सांस फूलेगी
आस-पास, लोग घबराएंगे…
पर मेरी आँखों को बंद होता देख,
एक ख़ामोशी छाएगी…
और अगले ही दिन, उस ख़ामोशी को जला दिया जाएगा
अब जो बची रहेगी, वो ख़ामोशी एक मटके में बंद
मेरे साथ उस शून्य में डूब जाएगी
मेरी रूह की तस्कीन होगी!
.jpg)