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Monday, July 08, 2013

विकास राणा ‘फ़िक्र’ की ग़ज़लें

1.
आदमी कम बुरा नहीं हूँ मैं
हाँ, मगर बेवफ़ा नहीं हूँ मैं
मेरा होना ना होने जैसा है
जल चुका हूँ, बुझा नहीं हूँ मैं
सूरतें, सीरतों पे भारी हैं
फूल हूँ, ख़ुशनुमा नहीं हूँ मैं
थोड़ा थोड़ा तो सब पे ज़ाहिर हूँ
खुद पे लेकिन खुला नहीं हूँ मैं
रास्ते पीछे छोड़ आया हूँ
रास्तो पे चला नहीं हूँ मैं
ज़िंदगी का हिसाब क्या रक्खूँ
बिन तुम्हारे जिया नहीं हूँ मैं
रोशनी मेरी भटका सकती है
हूँ मैं जुगनू, दीया नहीं हूँ मैं
धूप मुझ तक जो आ रही है ‘फ़िक्र’
यानी कि लापता नहीं हूँ मैं
2.
जब ज़मीं पर चला कीजिए
आसमां रख लिया कीजिए
क्या कहा? ज़िंदगी हो गई
जीने का हौसला कीजिए
आँसुओं से लिखा ख़त है ये
चाँदनी में पढ़ा कीजिए
दिल की सुनना ज़रूरी है क्या
अक़्ल से मशवरा कीजिए
दीजिए दिल हमें दीजिए
हो भले जो भला कीजिए
लग गया आपका हमसे दिल
जाइए अब मज़ा कीजिए
घर को घर की तसल्ली रहे
आते जाते रहा कीजिए
कोई तितली पकड़ लें अगर
फूल पर रख दिया कीजिए
आप हमसे मुहब्बत में हैं
चाहिए तो पता कीजिए
आप सा आईना भी नहीं
लीजिए सामना कीजिए
ताब्सिरा है ज़रूरी मगर
दाद भी दे दिया कीजिए
‘फ़िक्र’ गहरा हुआ किस कदर
आइए तजरुबा कीजिए
3.
मेरी ज़िंदगी है तू
फिर भी अजनबी है तू
बस नज़र नहीं आता
वरना आदमी है तू
एक ख़ुद नहीं हूँ मैं
दूसरी कमी है तू
देखने से लगता है
सोचने लगी है तू
आ मेरे सफ़ीने में
डूबती नदी है तू
तुझसे भी न पूरी हो
ऐसी क्या कमी है तू
रूह आ निकलती है
जब पुकारती है तू
एक दम ठहर जा ना
क्यूँ घड़ी-घड़ी है तू
मेरे जैसी लगती है
इतनी अजनबी है तू
4.
तू जो कर दे ये मेरा चाक गिरेबां जानां
मेरा हर काम फिर हो जाएगा आसां जानां
क्या मिला हमको मुहब्बत से अगर सोचें तो
मैं हुआ तुम भी हुई साथ परीशां जानां
रक़्स करना है तेरी याद में जी भर के मुझे
छोड़ आओ न मुझे आज ब्याबां जानां
एक भी ऐसा नहीं दोस्त कहे जो मुझको
कोई कहता भी अगर है तो है अह्सां जानां
और तो कोई नही ‘फ़िक्र’ मुझे बिन तेरे
बस कहीं मार न डाले ग़मे-ए-दौरां जानां