Monday, December 19, 2011

'अन्वेषक' के बहाने प्रताप सहगल

प्रताप सहगल (दाएँ) और त्रिपुरारि कुमार शर्मा
कभी कलम कलमकार पर हावी हो जाती है, तो कभी कलमकार कलम पर हावी  जाता है। मगर इन दोनों के बीच 'कुछ है' जो निरंतर चलता रहता है। जिसे सृजन का नाम दिया जाता है। बात अगर कविता की हो तो कलाकार बेबस दिखाई देता है। कहानीउपन्यास आदि विधाओं में दोनों स्थितियाँ हो सकती हैं। मगर नाटक में कलम को अपनी चुप्पी सहलानी होती है। ‘अन्वेषक’ उसी परम्परा की एक कड़ी है जो जयशंकर प्रसाद से शुरू हो कर मोहन राकेश’ की गली से गुज़रते हुए प्रताप सहगल के ज़ेहन से जुड़ती है। वक़्त के साथ तब्दीली लाज़िमी है जो कि अन्वेषक’ में साफ नज़र आती है। कुआँ और प्यासा के बीच हमेशा प्यास का महत्व बरक़रार रहता है। एक अन्वेषक को कई स्तरों पर अलग-अलग तरह की सामाजिक समस्याओं (अंधविश्वास और अवरोध) से जुझना पड़ता है। आईए उस संघर्ष और मानसिक यातना को महसूस करते हुए बहाव की तीव्रता को देखते हैं। पेश है अन्वेषक’ के लेखक प्रताप सहगल के साथ त्रिपुरारि कुमार शर्मा की बातचीत : बीइंग पोएट 

त्रिपुरारि कुमार शर्मा : आपने यह नाटक मंचन के लिए लिखा या पढ़े जाने के लिए 

प्रताप सहगल : दरअसल इस नाटक की शुरूआत रेडियो से हुई।
 मुझे रेडियो के लिए लिखना था। सुशील बनर्जी थे उस वक़्त। उन्होंने कहा कि इस तरह का नाटक सोचिए जिस पर काम न हुआ हो। तब मेरे दिमाग़ में आर्यभट्ट का नाम आया था और आर्यभट्ट के बारे में मुझे ज़्यादा जानकारी नहीं थी। लेकिन इतना पता था कि बहुत बड़े खगोलवोद् हैं। जब लिखना तय किया तो कई सारी चीज़ें खुलनी शुरू हुईं। आर्यभट्ट की दो किताबें हैं मुझे एक मिली  आर्यभटीय’ जिसे पढ़ने पर पता चला कि उन्होंने बहुत काम किया है। लेकिन इतना काफी नहीं था। महत्वपूर्ण बात यह थी कि उन्होंने जो काम किया था वो व्यक्तित्व खोलने के साथ-साथ मैं उसको आज के समाज के साथआज के प्रश्नों के साथ जोड़ सकता हूँ या नहीं। और मुझे लगा कि जोड़ सकता हूँ। सबसे पहले तो यह नाटक रेडियो पर आया। लगभग एक घंटे का था। और उसके बाद वो पड़ा रहा। बाद में मुझे लगा कि इस नाटक को मंच पर जाना चाहिये। तब मैंने फिर इस नाटक पर काम करना शुरू किया। बहुत सारी चीज़ें बदली गईं। मंच के नज़रिये सेमंच के लिएजब आदमी सोचने लगता है तो ज़ाहिर सी बात है कि उसके मन में यह सवाल तो होता ही है कोई न कोई दर्शक वर्ग उसके सामने होगा। लेकिन कोई ऐसा टारगेटेड’ दर्शक वर्ग नहीं होता। क्योंकि अगर आप टारगेटेड’ दर्शक वर्ग को लेकर लिखते हैं तो आप सीमित हो जाते हैं। मुझे लगा कि अपनी बात कहनी चाहिए। कौन से दर्शक वर्ग तक पहूँचता है यह बाद की बात है। अब पाठक तो बीच में आ ही जाता है। क्योंकि नाटक लिखने का मतलब ही है उसका मंचित होना। उसके साथ-साथ अगर प्रकाशित होता है तो जो लोग उसे नहीं देख पाते हैं वो पढ़ते हैं। नाटक एक ऐसी विधा है जो केवल पाठ्य नहीं मंच्य भी है। इसीलिए इसे कविताकहानी या उपन्यास की तरह ट्रीट’ नहीं कर सकते। उस नज़रिये से कि लोग पढ़ेंगेनाटक नहीं लिखा गया और ना ही लिखा जाना चाहिए।  

त्रिपुरारि : 23 वर्षीय आर्यभट आपकी सोच में कैसे समाहित हुआ?

प्रताप : पहली बातमैं अभी भी अपने आप को तेईस वर्ष का समझता हूँ। यह ऐसी उम्र है जब आदमी अपने आप को एक्सप्लोर करना शुरू करता है। इस उम्र में विरोध करने की क्षमता सबसे अधिक होती है। लेकिन आर्यभट में ऐसा कुछ भी नहीं था। नाटक का ढ़ांचा खड़ा करना एक लेखक का काम होता है। मेरे सामने एक अवदान था कि आर्यभट ने ऐसा किया है। ऐसी स्थितियाँ देश में अब भी हैं और तब भी थीं। जब भी कोई नई बात होती हैनया अन्वेषन होता है या नया मूल्य सामने आता है तो हमारा समाज ऐसा है कि जल्दी से उसे स्वीकार नहीं करता। अवरोधकारी शक्तियाँ जो समाज में सक्रिय रही हैंअभी भी हैं। जिनके अपने निहित स्वार्थ हैं। और उन निहित स्वार्थों के चलते वह चाहती हैं कि जिस तरह के अंधविश्वास समाज में व्याप्त हैं। वह बना रहे। केवल अतीत में झाँकने की प्रवृति और उससे बंधे रहने की प्रवृति बनी रहे। उससे उनको लाभ होता है। मसलन ज्योतिषमेरी नज़र में कुछ भी नहीं पर वो कहेंगे कि यह बहुत बड़ा विज्ञान है। आप अज्ञानी हैं। उन्हें खुद अपना भविष्य पता नहीं होता है। पाँचवीं शताब्दी में जो आर्यभट के अवदान थे। वह महत्वपूर्ण था। यह ऐसा समय था जब ब्राह्मणत्व फिर से सिर उठा रहा था अपने पूरे कर्म-काण्ड के साथ। यहाँ पर ब्राह्मण और पुरोहित वर्ग में थोड़ा-सा फर्क कर लेना चाहिए। पुरोहित वर्ग ऐसा है जो कर्मकाण्ड में ज्यादा विश्वास करता है। ब्राह्मण तो वो है जो विद्वान हैपढ़ा लिखा हैआगे बढ़कर सोचता है। केवल कर्मकाण्ड करने से कोई ब्राह्मण नहीं हो जाता। जो दिया गया है उस पर मेरा प्रश्न चिह्न उठाने की प्रवृति थी मेरी। मैं कभी ये नहीं मान पाया कि जो पहले से है सब सही है। स्थितियाँ बदली हैं। हालात बदले हैं। नये-नये अन्वेषन सामने आये हैं। अविष्कार सामने आये हैं। ऐसे में यह कैसे सम्भव है कि हम जीयें तो आज के अविष्कारों के साथ और याद करते रहें  वो पुरानी बात जो अविष्कारों के विरोध में करते रहें।    

त्रिपुरारि : इस नाटक के जरिये धर्मांधता पर आपका प्रहार कितना सार्थक सिद्ध हुआ

प्रताप : नाटक की पहूँच ज़्यादा नहीं होती। अगर इसके दस-बीस शो होते हैं तो दस-बीस हज़ार लोग देख सकते हैं। हमारा समाज बहुत बड़ा है। मैंने यह महसूस किया है कि जब इसका मंचन हुआ था तब लोगों ने काफी पसंद किया था। लोगों ने कहा भी ऐसी चीज़ों की ज़रूरत है। वर्तमान में जिस तरह से अवरोधकारी शक्तियाँ जिस तरह से काम कर रही हैं उसके खिलाफ प्रतिरोध का भाव खड़ा हो सके। अब कितना दूर तक यह पहूँचा कहना मुश्किल है मुझे लगता है यह लेखक का दायित्व भी नहीं होता है। वह तो लिख कर समाज को दे देता है। वहाँ तक पहूँचते-पहूँचते कई सारे तत्व और शामिल हो जाते हैं। उसमें मीडिया है। प्रकाशक है। खरीदने का तंत्र है। पाठकों की अभिरूचि है।  

त्रिपुरारि : नाट्य प्रेमियों की अदम्य रंग-पीपासा को शांत करने के साथ-साथ आपकी प्यास किस हद तक बढ़ी?

प्रताप : अंवेषक के बाद मैं सोचता रहा हूँ कि कुछ और नये-नये और बेहतर नाटक लिखूँ। कुछ छोटे नाटकों पर काम किया भी है। ऐसे व्यक्तित्व मुझे ज़्यादा आकर्षित करते हैं। नेताजी को लेकर भी कुछ काम किया पर वह बीच मैं ही अधुरा रह गया। रामानुजम को लेकर कुछ काम जारी है। इस तरह के और प्रश्न जो मथते हैं। समाज के साथ जुड़े हुए हैं। उसके लिए अगर आपको ऐसा व्यक्तित्व मिल जाये जिसके माध्यम से आप अपनी बात कह सकें तो समाज जल्दी से स्वीकार कर लेता है। मसलन अन्वेषक में आर्यभट जगह अगर कोई राम लाल या श्याम लाल होते तो लोग उसकी बात इतनी ग़ौर से न सुनते। क्योंकि आर्यभट और उनके अंवेषन के माध्यम बात कही गई है। तो उसकी पहूँच ज्यादा होगी।   

त्रिपुरारि : एक विवादास्पद प्रश्न है कि नाटक में कथ्य बड़ा या शिल्पआपके लिए क्या महत्वपूर्ण है?

प्रताप : ये दोनों दरअसल एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। खाली शिल्प अगर आपके पास है और कहना कुछ नहीं है तो आप नाटक खड़ा नहीं कर सकते। इसका मतलब आपको कहना तो कुछ है। हाँशिल्प आपके पास होना चाहिए। जिन लोगों के पास शिल्प नहीं है कहना वो भी चाहते हैं। कुछ लोग कविताकहानीउपन्यास अच्छा लिखते हैं। पर नाटक नहीं लिख पाते। क्योंकि नाटक का एक अलग तरह का स्ट्रेक्चर खड़ा करना होता है। खाली सम्वादों में रचना खड़ा कर देना नाटक नहीं है। उसमें जो ग्रामेटिकल एलीमेंट्स हैंनाटकीयता हैएक शब्द है जो नाटकीय गति को भी आगे ले जाता है। उस शब्द की ज़रूरत होती है। उसके साथ-साथ एक ऐसी समझ की ज़रूरत होती है कि जब कुछ अनापेक्षित घटता है तो वह पाठक या दर्शक को अपनी पकड़ में लेता है। कि ऐसा तो मैंने सोचा ही नहीं था। अगर ये भाव आता है तो यह नाटकीय तत्व है। यह तत्व कहानी और उपन्यास में भी होता है। पर नाटक में होना ही चाहिए। लेकिन अगर आपको नाटक की शिल्प की समझ नहीं है तो कविता कहानी ठीक है, लिखिए। नाटक नहीं लिखना चाहिए। आप सिर्फ शिल्प और तकनीकि की समझ से नाटक लिख सकते हैं। पर ज्यादा लोगों तक पहूँचेगा नहीं। क्योंकि उसमें कुछ पहूँचाना है इसलिए कथा तो चाहिए ही चाहिए। अब ये है कि कथ्य पहले या शिल्प पहलेयह एक बहस है। नाटक में जो एक नरेटिव पार्ट है वो गायब हो जाता है। इसे सम्वादों के माध्यम से इस तरह भरना होता है कि वो नरेटिव होता हुआ भी गायब रहता है। बीच में जो कहीं नरेटिव होता है वह गायब होता जाता है। इसकी आपूर्ति बाद में निर्देशक और अभिनेता के ज़रिए से होता है।        

त्रिपुरारि : निर्देशक के साथ आपका सम्बंध कैसा रहा और नाटककार-निर्देशक के बीच किस तरह का सम्बन्ध होना चाहिए

प्रताप : दो स्थितियाँ हैं। एक तो एक तो नाटक लिखा गया और नाटककार उपस्थित है। दूसरानाटक है और नाटककार उपस्थित नहीं है। मान लिजिए धर्मवीर भारती का नाटक। अब वहाँ नाटककार तो है नहीं। जो कुछ भी दारोमदार है वह निर्देशक पर है। ऐसे में कोई नाटक अगर मंचन के लिए चुना जाता है तो निर्देशक को अपना नाट्यालेख तैयार करना पड़ेगा। क्योंकि नाटककार तो है नहीं। अब अच्छा बुरा सबका दायित्व उसी पर होता है। या कोई दूसरा लेखक उसका नाट्यालेख तैयार करता है। या निर्देशक खुद करे। लेकिन अगर नाटककार जीवित है और उपलब्ध भी है तब नाटककार और निर्देशक के बीच तालमेल बिठाना काफी मुश्किल काम होता है। क्योंकि दोनों सृजनात्मक व्यक्तित्व होते हैं। दोनों की अपनी-अपनी समझ और अहम हैं जो कई बार टकराते भी हैं। इसलिए एक वक़्त था कि नाटक बड़ा या निर्देशक बड़ामैं कहता हूँ यह छोटे बड़े की बहस बेकार है। अंतत: आलेख तो चाहिए ही चाहिए। आलेख होगा तो खेलेंगे न! तकनीकि जानकारियाँ ठीक हैं। उसे भरेंगे कहाँ आपरंग तो आपके पास है। भरने के लिए कैनवास ही नहीं है। कूची ही नहीं है। कैनवास एक तरह का नाटक है। अंवेषक का पहला मंचन बिहार में हुआ था। एक युवा निर्देशक हैं अखिलेश आनंद। उन्होंने इसे विज्ञान नाटक के उदय का नाम दिया। इसके बाद कुछ और नाटक आये। आइंसटीन पर और विज्ञान विषयों पर आधारित। दिल्ली में अंवेषक का मंचन सतीश आनंद के निर्देशन में हुआ। साहित्य कला परिषद का जो रंग मंडल था। वहाँ के सचिव शेखर थे। उन्होंने सतीश आनंद को यह काम दिया। तब हम एक दूसरे को नहीं जानते थे। कुछ सुझाव सतीश ने मुझे दिये। अच्छा लगा। कुछ चीज़ें जो मैं सोचता रहता था कि इसका कुछ तर्क नहीं है बन रहा। उन्हें भी ऐसा लगा। फिर हमने उसे खोजा बनाया और एक दो कविताएं डाली गईं। केतकी के क्यक्तित्व को नया रूप दिया गया। इस मायने में निर्देशक मददगार होते हैं। सृजन एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ कुछ भी अंतिम नहीं होता है। यह बात लेखन और निर्देशन पर लागू होती है।  

त्रिपुरारि : अंवेषक के दो पात्र चिंतामणि और चुड़ामणि हमेशा से हमारे समाज में रहे हैं। आपको लगता है कि ये भविष्य में भी बने रहेंगेउनकी सोच में कुछ सुधार हो पायेगा इस नाटक के माध्यम से?

प्रताप : नाटक का काम कोई सुधार करना नहीं होता। सुधार तो समाज सुधारक और राजनेता करते हैं। साहित्य कोई चूर्ण की गोली तो है नहीं कि वो समाज को सुधारेगा। साहित्य का काम तो मनुष्य और समाज को समझना है। उसके विभिन्न आयामों को पकड़ने की कोशिश करना हैखोलना है और आपके सामने रखना है। कभी-कभी हम जिस व्यक्ति को समझ रहे होते हैं कि वह बड़ा धर्मात्मा है उसके व्यक्तित्व और चरित्र के दूसरे हिस्से भी होते हैं। जिसको आप बड़ा गुण्डा समझ रहे होते हैंवह भी बहुत जगह बड़ा धर्मात्मा हो सकता है। इकहरी सोच वो व्यक्ति रखता है जिसकी दृष्टि बहुत ज्यादा खुली हुई नहीं होती है। जबकि साहित्यकार की दृष्टि खुली हुई होती है और होनी भी चाहिए। इसलिए वह कभी इकहरे तरीके से चरित्रों को पकड़ेगा तो बात बनती नहीं है। आपने चुड़ामणि और चिंतामणि की बात की। वो विरोध करते हैं लेकिन जब देश की बात आती है तो वो जान देने को भी तैयार हैं। यहाँ उसके क्यक्तित्व का दूसरा हिस्सा आ जाता है। इसका मतलब वह उस तरह का गुण्डा बदमाश नहीं है। उसके कुछ निहित स्वार्थ हैं जिसके कारण वो आर्यभट के अवदानों को स्वीकार नहीं करते हैं। पर आपस में बात करते हैं कि बात तो है लेकिन फिर भी स्वीकार नहीं करते। क्योंकि जब रोटी आपकी छिनती है तो ये मानते हुए कि बात तो सही हैपर मानें कैसेयहाँ अस्तित्व का प्रश्न आता है। पहली अनिवार्यता ज़िंदा रहती है। उनका अस्तित्व ही अंधविश्वासों पर टिका हुआ है। साहित्य खुद को समझने की कोशिश है। इस कोशिश में आदमी बेहतर होता चला जाता है। वह अपने आप में बदलाव महसूस करता है। चाहे वह साहित्य पढ़ता है या लिखता है। ऐसा नहीं है कि वह महापुरूष हो जाता है।   

त्रिपुरारि : केतकी और आर्यभट के भविष्य के बारे में कुछ पता नहीं चलता। ऐसा क्यों?

प्रताप : भविष्य तय करने के लिए रचना नहीं की जाती है। एक स्थिति है। उस स्थिति में आर्यभट को डाला है कि ये हमारा समाज एक तरह का पतनशील समाज है। पतनशील समाज में अगर कोई इस तरह के क्रांतिकारी काम करता है तो उसका इतना विरोध होता है। उस व्यक्ति की यही नियति हो सकती है। उसको समाज छोड़ कर भागना पड़ता है। यह एक तरह का कमेंट है। 

त्रिपुरारि : प्रसाद से प्रताप तक एक पाठक के रूप में आपका अनुभव कैसा रहा?

प्रताप : नाटक पढ़ने पर मुझे पता लग जाता है कि नाटक में गतिशीलता है या नहीं। यह मंच के अनुकूल है या नहीं। जैसे हरि कृष्ण प्रेमीसेठ गोविंद दास या राम कुमार वर्मा के नाटक। ये सारे स्टेटिक नाटक हैं। उसमें गतिशीलता ज्यादा नहीं है। दूसरी ओर मोहन राकेश या विजय तेंदूलकर के नाटक। इनमें गतिशीलता है जो दिखती है।

त्रिपुरारि : जो लोग नाटक लिखना चाहते हैं उन्हें कुछ कहना चाहेंगे?

प्रताप : नये लोग जो नाटक लिखना चाहते हैं। उनसे कहूँगा कि नाटक देखें। मंचित होते हुए। अच्छे बुरे सब नाटक। कहाँ ड्रैग होता हैकहाँ चुस्त हैकहाँ बिम्व हैकम से कम शब्दों में अधिक से अधिक बात कहने की क्षमता कविता में होती है या नाटक में।

त्रिपुरारि : पढ़ना-पढ़ाना और विभिन्न विधाओं में लिखना। सबके बीच संतुलन कैसे बना पाते हैं?   

प्रताप : पढ़ना तो अलग बात है। पढ़ाना अलग। जो नहीं पढ़ाते हैं वो भी पढ़ते हैं। पढ़ाने का ताल्लूक़ पढ़ने से ज़्यादा है। जो पढ़ाते हैं उन्हें ज़रूर पढ़ना चाहिए। अगर आप पढ़ कर पढ़ाते हैं तो आपका पढ़ा हुआ काफी मददगार साबित होता है। जहाँ तक मेरे लिखने प्रश्न है। विधाएं तो हमारे पास है ही। जब भी कोई सब्ज़ेक्ट मेरे हाथ लगता है। तो फिर विधा मैं चुन लेता हूँ। विधाओं के बीच संतुलन बिठाने का मेरे पास कोई फ़ार्मूला नहीं है। ये हो जाता है। लिखने से पहले हमें मालूम होता है कि हम किस विधा में लिखने जा रहे हैं। और उसी तरह की तैयारी करनी होती है। क्योंकि सबकी अपनी-अपनी डिमांड्स होती हैं। अगर आप कहानी की तर्ज़ पर नाटक लिखना शुरू करते हैं तो नाटक ड्रैग होने लगता है। जैसे उपन्यास में नरेटिव की ज़्यादा गुंजाइश है। उसमें डिटेल’ दे सकते हैं। मगर वह पात्रों से जुड़ा हुआ हो और उनको कहीं खोले। इन चीज़ों की गुंज़ाइश नाटक में नहीं होती है। ये डिटेल नाटक में अदृश्य होते हैं जो सम्वादों के माध्यम से दृश्यमान करने होते हैं।