Friday, January 13, 2012

शमशेर बहादुर सिंह की जन्मतिथि !

शमशेर बहादुर सिंह
आज प्रयोगवाद और नई कविता के अग्रग्ण्य कवि शमशेर बहादुर सिंह की जन्मतिथि है। इनका जन्म 13 जनवरी 1911 ई. को मुजफ्फरनगर में हुआ था। 12 मई 1993 तक हमारे बीच रहे। शमशेर को साहित्य अकादमी पुरस्कार, मैथिली शरण गुप्त पुरस्कार, कबीर सम्मान आदि से नवाजा जा चुका है। कुछ कवि या लेखक जैसा लिखते हैं, निज़ी जीवन में वैसा नहीं होते। शमशेर का लेखन उनके जीवन का पर्याय कहा जा सकता है। इनके यहां लिखना और भोगना दोनों समान है। लेखन जितना सहज है उतना ही मुलायम भी। यही इनकी सबसे बड़ी विशेषता बन कर उभरती है। यह विशेषता स्वयं पैदा की गई है या कह सकते हैं कि परिस्थिति बस उत्पन्न हुई है। 'कुछ कविताएँ, 'कुछ और कविताएँ, 'इतने पास अपने’, 'चुका भी नहीं हूँ मैं’, 'बात बोलेगी’, 'उदिता तथा 'काल तुझसे होड़ है मेरी आदि प्रमुख काव्य संग्रह हैं। जन्मतिथि के मौक़े पर प्रस्तुत है उनकी कुछ कविताएं : बीइंग पोएट
1. प्रेम
मोटी, धुली लॉन की दूब,
साफ़ मखमल की कालीन
ठंडी धुली सुनहरी धूप
हलकी मीठी चा-सा दिन
,
मीठी चुस्की-सी बातें
,
मुलायम बाहों-सा अपनाव
पलकों पर हौले-हौले

तुम्हारे फूल से पाँव
मानो भूलकर पड़ते
हृदय के सपनों पर मेरे
अकेला हूँ आओ
2. मूंद लो आँखें
मूंद लो आँखें
शाम के मानिंद
ज़िंदगी की चार तरफ़ें
मिट गई हैं
बंद कर दो साज़ के पर्दे
चांद क्यों निकला
, उभरकर...?
घरों में चूल्हे
पड़े हैं ठंडे
क्यों उठा यह शोर
?
किसलिए यह शोर
?
छोड़ दो संपूर्ण
प्रेम,
त्याग दो सब दया सब घृणा
ख़त्म हमदर्दी
ख़त्म
साथियों का साथ
रात आएगी
मूंदने सबको
3. शिला का खून पीती थी 
वह जड़ 
जो कि पत्थर थी स्वयं
सीढियां थी बादलों की झूलती 
टहनियों-सी
और वह पक्का चबूतरा 
ढाल में चिकना :
सुतल था 
आत्मा के कल्पतरु का ?
4. एक आदमी दो पहाड़ों को कोहनियों से ठेलता
पूरब से पच्छिम को एक कदम से नापता
बढ़ रहा है
कितनी ऊंची घासें चांद-तारों को छूने-छूने को हैं
जिनसे घुटनों को निकालता वह बढ़ रहा है
अपनी शाम को सुबह से मिलाता हुआ
फिर क्यों
दो बादलों के तार
उसे महज उलझा रहे हैं ?
5. गीली मुलायम लटें
आकाश
साँवलापन रात का गहरा सलोना
स्तनों के बिंबित उभार लिए
हवा में बादल
सरकते
चले जाते हैं मिटाते हुए
जाने कौन से कवि को...
नया गहरापन
तुम्हारा
हृदय में
डूबा चला जाता
न जाने कहाँ तक
आकाश-सा
ओ साँवलेपन
ओ सुदूरपन
ओ केवल
लयगति...
6. चुका भी हूँ मैं नहीं
कहाँ किया मैनें प्रेम
अभी
जब करूँगा प्रेम
पिघल उठेंगे
युगों के भूधर
उफन उठेंगे
सात सागर
किंतु मैं हूँ मौन आज
कहाँ सजे मैनें साज
अभी
सरल से भी गूढ़
, गूढ़तर
तत्व निकलेंगे
अमित विषमय
जब मथेगा प्रेम सागर
हृदय
निकटतम सबकी
अपर शौर्यों की
तुम
तब बनोगी एक
गहन मायामय
प्राप्त सुख
तुम बनोगी तब
प्राप्य जय
 !
7. धूप कोठरी के आईने में खड़ी
हँस रही है
पारदर्शी धूप के पर्दे
मुस्कराते
मौन आँगन में
मोम सा पीला
बहुत कोमल नभ
एक मधुमक्खी हिलाकर फूल को
बहुत नन्हा फूल 
उड़ गई
आज बचपन का
उदास माँ का मुख
याद आता है
8. तुमने मुझे
तुमने मुझे और गूँगा बना दिया
एक ही सुनहरी आभा-सी
सब चीज़ों पर छा गई
मै और भी अकेला हो गया

तुम्हारे साथ गहरे उतरने के बाद
मैं एक ग़ार से निकला
अकेला
, खोया हुआ और गूँगा
अपनी भाषा तो भूल ही गया जैसे

चारों तरफ़ की भाषा ऐसी हो गई
जैसे पेड़ पौधों की होती है
नदियों में लहरों की होती है
हज़रत आदम के यौवन का बचपना
हज़रत हौवा की युवा मासूमियत
कैसी भी! कैसी भी!
ऐसा लगता है जैसे
तुम चारों तरफ़ से मुझसे लिपटी हुई हो
मैं तुम्हारे व्यक्तित्व के मुख में
आनंद का स्थायी ग्रास... हूँ
मूक
9. थरथराता रहा
थरथराता रहा जैसे बेंत
मेरा काय...कितनी देर तक
आपादमस्तक
एक पीपल-पात मैं थरथर ।
कांपती काया शिराओं-भरी
झन-झन
देर तक बजती रही
और समस्त वातावरण
मानो झंझावात
ऎसा क्षण वह आपात
स्थिति का
10. महुवा
यह अजब पेड़ है जिसमें कि जनाब
इस कदर जल्द कली फूटती है
कि अभी कल देखो
मार पतझड़ ही पतझड़ था इसके नीचे
और अब
सुर्ख दिये,सुर्ख दियों का झुरमुट
नन्हें-नन्हें,कोमल
नीचे से ऊपर तक -
झिलमिलाहट का तनोबा मानो-
छाया हुआ हैयह अजब पेड़ है
पत्ते कलियां
कत्थई पान का चटक रंग लिये -
इक हंसी की तस्वीर -
(खिलखिलाहट से मगर कम- दर्जे)
मेरी आंखों में थिरक उठती है
मुझको मालूम है, ये रंग अभी छूटेंगे
गुच्छे के गुच्छे मेरे सर पै हरी
छतरियां तानेंगेः गुच्छे के गुच्छे ये
फिर भी,फिर भी, फिर भी
एक बार और भी फिर भी शाम की घनघोर घटायें
आग-सी लगी हो जैसे हरसू
सर पै छा जाएँगी :
कोई चिल्ला के पुकारेगा ,कि देखो,देखो
यही महुवे का महावन है!