Saturday, January 14, 2012

अहमद ‘फ़राज़’ की जन्मतिथि !

अहमद फ़राज़
आज अहमद ‘फ़राज़’ की जन्मतिथि है। फ़राज़ उर्दू के मशहूर शायर ही नहीं बल्कि अपने वक़्त की बज़्म-ए-रौनक और मुशायरों की ज़रूरत भी थे। उनकी तुलना फ़ैज़ और इक़बाल जैसे बड़े शायरों से होती रही है मगर सच तो यह है कि हर एक शायर का अपना मुक़ाम होता है। फ़राज़ ने ज़िंदा रहते हुए जो मुक़ाम हासिल किया, वह मुक़ाम ख़ुद अपने आप पर नाज़ करता है। दरअसल शायर और शायरी को किसी सरहद की फ़िक्र नहीं होती। फ़राज़ इसके पर्याय हैं। पाकिस्तान और हिंदुस्तान दोनों देशों में इनके मुरीदों की कमी नहीं है। इसके अलावा पुरी दुनिया में इनकी शायरी को पसंद करने वाले हैं। फ़राज़ ने अपनी शायरी में मुहब्बत की सादगी के साथ-साथ सियासत की स्याही को भी उभारा है। उन्होंने वर्ष 2004 में पाकिस्तान का सबसे बड़ा सम्मान हिलाले-इम्तियाज़ लौटा कर एक नए सिलसिले की नीव रखी। फ़राज़ का जन्म 14 जनवरी 1931 को पाकिस्तान में हुआ और 25 अगस्त 2008 को वफ़ात हो गई। उनकी गज़लें और नज़्मों का संग्रह (हिंदी में) असासा है। फ़राज़ की जन्मतिथि के मौक़े पर पेश है कुछ ग़ज़लें : बीइंग पोएट

1.

उसको जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ
अब क्या कहें ये क़िस्सा पुराना बहुत हुआ

ढलती न थी किसी भी जतन से शब-ए-फ़िराक़

ऐ मर्ग-ए-नागहाँ तेरा आना बहुत हुआ


हम ख़ुल्द से निकल तो गये हैं पर ऐ ख़ुदा

इतने से वाक़ये का फ़साना बहुत हुआ


अब हम हैं और सारे ज़माने की दुश्मनी

उससे ज़रा रब्त बढ़ाना बहुत हुआ


अब क्यों न ज़िन्दगी पे मुहब्बत को वार दें

इस आशिक़ी में जान से जाना बहुत हुआ


अब तक तो दिल का दिल से तार्रुफ़ न हो सका

माना कि उससे मिलना मिलाना बहुत हुआ


क्या-क्या न हम ख़राब हुए हैं मगर ये दिल

ऐ याद-ए-यार तेरा ठिकाना बहुत हुआ


कहता था नासेहों से मेरे मुँह न आईओ

फिर क्या था एक हू का बहाना बहुत हुआ


लो फिर तेरे लबों पे उसी बेवफ़ा का ज़िक्र

अहद "फ़राज़" तुझसे कहा ना बहुत हुआ


2.

साथ रोती थी मेरे साथ हंसा करती थी
वो लड़की जो मेरे दिल में बसा करती थी

मेरी चाहत की तलबगार थी इस दर्जे की

वो मुसल्ले पे नमाज़ों में दुआ करती थी


एक लम्हे का बिछड़ना भी गिरां था उसको

रोते हुए मुझको ख़ुद से जुदा करती थी


मेरे दिल में रहा करती थी धड़कन बनकर

और साये की तरह साथ रहा करती थी


रोग दिल को लगा बैठी अंजाने में

मेरी आगोश में मरने की दुआ करती थी


बात क़िस्मत की है
फ़राज़ जुदा हो गए हम
वरना वो तो मुझे तक़दीर कहा करती थी


3.

करूँ न याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे
ग़ज़ल बहाना करूँ और गुनगुनाऊँ उसे

वो ख़ार-ख़ार है शाख़-ए-गुलाब की मानिन्द

मैं ज़ख़्म-ज़ख़्म हूँ फिर भी गले लगाऊँ उसे


ये लोग तज़्क़िरे करते हैं अपने लोगों के

मैं कैसे बात करूँ और कहाँ से लाऊँ उसे


मगर वो ज़ूदफ़रामोश ज़ूद-रंज भी है

कि रूठ जाये अगर याद कुछ दिलाऊँ उसे


वही जो दौलत-ए-दिल है वही जो राहत-ए-जाँ

तुम्हारी बात पे ऐ नासिहो गँवाऊँ उसे


जो हमसफ़र सर-ए-मंज़िल बिछड़ रहा है "फ़राज़"

अजब नहीं कि अगर याद भी न आऊँ उसे


4.

चलो ये इश्क़ नहीं चाहने की आदत है
कि क्या करें हमें दू्सरे की आदत है

तू अपनी शीशा-गरी का हुनर न कर ज़ाया

मैं आईना हूँ मुझे टूटने की आदत है


मैं क्या कहूँ के मुझे सब्र क्यूँ नहीं आता

मैं क्या करूँ के तुझे देखने की आदत है


तेरे नसीब में ऐ दिल सदा की महरूमी

न वो सख़ी न तुझे माँगने की आदत है


विसाल में भी वो ही है फ़िराक़ का आलम

कि उसको नींद मुझे रत-जगे की आदत है


ये मुश्क़िलें हों तो कैसे रास्ते तय हों

मैं ना-सुबूर उसे सोचने की आदत है


ये ख़ुद-अज़ियती कब तक "फ़राज़" तू भी उसे

न याद कर कि जिसे भूलने की आदत है


5.

कहा था किसने के अहद-ए-वफ़ा करो उससे
जो यूँ किया है तो फिर क्यूँ गिला करो उससे

ये अह्ल-ए-बज़ तुनक हौसला सही फिर भी

ज़रा फ़साना-ए-दिल इब्तिदा करो उससे


ये क्या के तुम ही ग़म-ए-हिज्र के फ़साने कहो

कभी तो उसके बहाने सुना करो उससे


नसीब फिर कोई तक़्रीब-ए-क़र्ब हो के न हो

जो दिल में हों वही बातें किया करो उससे


"फ़राज़" तर्क-ए-त'अल्लुक़ तो ख़ैर क्या होगा
यही बहुत है के कम कम मिला करो उससे


6.

जब तेरा दर्द मेरे साथ वफ़ा करता है
एक समन्दर मेरी आँखों से बहा करता है


उसकी बातें मुझे खुश्बू की तरह लगती है

फूल जैसे कोई सहरा में खिला करता है


मेरे दोस्त की पहचान ये ही काफ़ी है

वो हर शख़्स को दानिस्ता ख़फ़ा करता है


और तो कोई सबब उसकी मोहब्बत का नहीं

बात इतनी है के वो मुझसे जफ़ा करता है


जब ख़ज़ाँ आएगी तो लौट आएगा वो भी
'फ़राज़'
वो बहारों में ज़रा कम ही मिला करता है


7.

तुझसे बिछड़ के हम भी मुकद्दर के हो गये
फिर जो भी दर मिला है उसी दर के हो गये

फिर यूँ हुआ के गैर को दिल से लगा लिया

अंदर वो नफरतें थीं के बाहर के हो गये


क्या लोग थे के जान से बढ़ कर अजीज थे

अब दिल से मेह नाम भी अक्सर के हो गये


ऐ याद-ए-यार तुझ से करें क्या शिकायतें

ऐ दर्द-ए-हिज्र हम भी तो पत्थर के हो गये


समझा रहे थे मुझ को सभी नसेहान-ए-शहर

फिर रफ्ता रफ्ता ख़ुद उसी काफिर के हो गये


अब के ना इंतेज़ार करें चारगर का हम

अब के गये तो कू-ए-सितमगर के हो गये


रोते हो एक जजीरा-ए-जाँ को "फ़राज़" तुम

देखो तो कितने शहर समंदर के हो गये


8.

तुझसे मिलने को कभी हम जो मचल जाते हैं
तो ख़्यालों में बहुत दूर निकल जाते हैं

गर वफ़ाओं में सदाक़त भी हो और शिद्दत भी

फिर तो एहसास से पत्थर भी पिघल जाते हैं


उसकी आँखों के नशे में हैं जब से डूबे

लड़खड़ाते हैं क़दम और संभल जाते हैं


बेवफ़ाई का मुझे जब भी ख़याल आता है

अश्क़ रुख़सार पर आँखों से निकल जाते हैं


प्यार में एक ही मौसम है बहारों का मौसम

लोग मौसम की तरह फिर कैसे बदल जाते हैं


9.

तुम भी ख़फा हो लोग भी बरहम हैं दोस्तों
अ़ब हो चला यकीं के बुरे हम हैं दोस्तों

किसको हमारे हाल से निस्बत हैं क्या करे

आखें तो दुश्मनों की भी पुरनम हैं दोस्तों


अपने सिवा हमारे न होने का ग़म किसे

अपनी तलाश में तो हम ही हम हैं दोस्तों


कुछ आज शाम ही से हैं दिल भी बुझा बुझा

कुछ शहर के चराग भी मद्धम हैं दोस्तों


इस शहरे आरज़ू से भी बाहर निकल चलो

अ़ब दिल की रौनकें भी कोई दम हैं दोस्तों


सब कुछ सही "फ़राज़" पर इतना ज़रूर हैं

दुनिया में ऐसे लोग बहुत कम हैं दोस्तों


10.

हुई है शाम तो आँखों में बस गया फिर तू
कहाँ गया है मेरे शहर के मुसाफ़िर तू

बहुत उदास है इक शख़्स तेरे जाने से

जो हो सके तो चला आ उसी की ख़ातिर तू


मेरी मिसाल कि इक नख़्ल-ए-ख़ुश्क-ए-सहरा हूँ

तेरा ख़याल कि शाख़-ए-चमन का ताइर तू


मैं जानता हूँ के दुनिया तुझे बदल देगी

मैं मानता हूँ के ऐसा नहीं बज़ाहिर तू


हँसी ख़ुशी से बिछड़ जा अगर बिछड़ना है

ये हर मक़ाम पे क्या सोचता है आख़िर तू


"फ़राज़" तूने उसे मुश्किलों में डाल दिया
ज़माना साहिब-ए-ज़र और सिर्फ़ शायर तू