Monday, February 13, 2012

फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’ की जन्मतिथि !

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

आज उर्दू के मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की जन्मतिथि है। इस मौक़े पर पेश है कुछ चुनिंदा ग़ज़लें : बीइंग पोएट

1.
तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं
किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं

हदीस-ए-यार के उनवाँ निखरने लगते हैं

तो हर हरीम में गेसू सँवरने लगते हैं

हर अजनबी हमें महरम दिखाई देता है

जो अब भी तेरी गली से गुज़रने लगते हैं

सबा से करते हैं ग़ुर्बत-नसीब ज़िक्र-ए-वतन

तो चश्म-ए-सुबह में आँसू उभरने लगते हैं

वो जब भी करते हैं इस नुत्क़-ओ-लब की बख़ियागरी

फ़ज़ा में और भी नग़्में बिखरने लगते हैं

दर-ए-क़फ़स पे अँधेरे की मुहर लगती है

तो "फ़ैज़" दिल में सितारे उतरने लगते हैं

2.
कहीं तो कारवाँ-ए-दर्द की मंज़िल ठहर जाए
किनारे आ लगे उम्र-ए-रवाँ या दिल ठहर जाए

अमाँ कैसी कि मौज-ए-ख़ूँ अभी सर से नहीं गुज़री

गुज़र जाए तो शायद बाज़ू-ए-क़ातिल ठहर जाए

कोई दम बादबाँ-ए-कश्ती-ए-सहबा को तह रखो

ज़रा ठहरो ग़ुबार-ए-ख़ातिर-ए-महफ़िल ठहर जाए

हमारी ख़मोशी बस दिल से लब तक एक वक़्फ़ा है

ये तूफ़ाँ है जो पल भर बस लब-ए-साहिल ठहर जाए

निगाह-ए-मुंतज़िर कब तक करेगी आईनाबंदी

कहीं तो दश्त-ए-ग़म में यार का महमिल ठहर जाए

3.
ये किस ख़लिश ने फिर इस दिल में आशियाना किया
फिर आज किस ने सुख़न हम से ग़ायेबाना किया

ग़म-ए-जहाँ हो
, रुख़-ए-यार हो के दस्त-ए-उदू
सलोओक जिस से किया हमने आशिक़ाना किया

थे ख़ाक-ए-राह भी हम लोग क़हर-ए-तूफ़ाँ भी

सहा तो क्या न सहा और किया तो क्या न किया

ख़ुशा के आज हर इक मुद्दई के लब पर है

वो राज़ जिस ने हमें राँद-ए-ज़माना किया

वो हीलागर जो वफ़ाजू भी है जफ़ाख़ू भी

किया भी "फ़ैज़" तो किस बुत से दोस्ताना किया

4.
हम के ठहरे अजनबी इतने मदारातों के बाद
फिर बनेंगे आश्ना कितनी मुलाक़ातों के बाद

कब नज़र में आयेगी बेदाग़ सब्ज़े की बहार

ख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद

दिल तो चाहा पर शिकस्त-ए-दिल ने मोहलत ही न दी

कुछ गिले-शिकवे भी कर लेते मुनाजातों के बाद

थे बहुत बेदर्द लम्हें ख़त्म-ए-दर्द-ए-इश्क़ के

थीं बहुत बेमहर सुबहें मेहरबाँ रातों के बाद

उन से जो कहने गये थे "फ़ैज़" जाँ सदक़ा किये

अनकही ही रह गई वो बात सब बातों के बाद

5.
न गँवाओ नावक-ए-नीम-कश, दिल-ए-रेज़ रेज़ गँवा दिया
जो बचे हैं संग समेट लो, तन-ए-दाग़ दाग़ लुटा दिया

मेरे चारागर को नवेद हो
, सफ़-ए-दुश्मनाँ को ख़बर करो
वो जो क़र्ज़ रखते थे जान पर, वो हिसाब आज चुका दिया

करो कज जबीं पे सर-ए-कफ़न
, मेरे क़ातिलों को गुमाँ न हो
कि ग़ुरूर-ए-इश्क़ का बाँकपन, पस-ए-मर्ग हमने भुला दिया

उधर एक हर्फ़ कि कुश्तनी
, यहाँ लाख उज़्र था गुफ़्तनी
जो कहा तो सुन के उड़ा दिया, जो लिखा तो पड़ के मिटा दिया

जो रुके तो कोह-ए-गराँ थे हम
, जो चले तो जाँ से गुज़र गये
रह-ए-यार हमने क़दम क़दम,
तुझे यादगार बना दिया