Thursday, August 30, 2012

भगवती चरण वर्मा की जन्मतिथि !

भगवती चरण वर्मा
आज भगवती चरण वर्मा (30 अगस्त 1903 - 05 अक्तूबर 1981) की जन्मतिथि है। इस अवसर पर प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कविताएँ : बीइंग पोएट
हम दीवानों की क्या हस्ती
हम दीवानों की क्या हस्ती, आज यहाँ कल वहाँ चले
मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते जहाँ चले
आए बनकर उल्लास कभी, आँसू बनकर बह चले अभी
सब कहते ही रह गए, अरे तुम कैसे आए, कहाँ चले
किस ओर चले? मत ये पूछो, बस चलना है इसलिए चले
जग से उसका कुछ लिए चले, जग को अपना कुछ दिए चले
दो बात कहीं, दो बात सुनी, कुछ हँसे और फिर कुछ रोए
छक कर सुख दुःख के घूँटों को, हम एक भाव से पिए चले
हम भिखमंगों की दुनिया में, स्वछन्द लुटाकर प्यार चले
हम एक निशानी उर पर, ले असफलता का भार चले
हम मान रहित, अपमान रहित, जी भर कर खुलकर खेल चुके
हम हँसते हँसते आज यहाँ, प्राणों की बाजी हार चले
अब अपना और पराया क्या, आबाद रहें रुकने वाले
हम स्वयं बंधे थे, और स्वयं, हम अपने बन्धन तोड़ चले
तुम अपनी हो, जग अपना है
तुम अपनी हो, जग अपना है, किसका किस पर अधिकार प्रिये
फिर दुविधा का क्या काम यहाँ, इस पार या कि उस पार प्रिये।
देखो वियोग की शिशिर रात, आँसू का हिमजल छोड़ चली
ज्योत्स्ना की वह ठण्डी उसाँस, दिन का रक्तांचल छोड़ चली।
चलना है सबको छोड़ यहाँ, अपने सुख-दुख का भार प्रिये,
करना है कर लो आज उसे, कल पर किसका अधिकार प्रिये।
है आज शीत से झुलस रहे, ये कोमल अरुण कपोल प्रिये
अभिलाषा की मादकता से, कर लो निज छवि का मोल प्रिये।
इस लेन-देन की दुनिया में, निज को देकर सुख को ले लो,
तुम एक खिलौना बनो स्वयं, फिर जी भर कर सुख से खेलो।
पल-भर जीवन, फिर सूनापन, पल-भर तो लो हँस-बोल प्रिये
कर लो निज प्यासे अधरों से, प्यासे अधरों का मोल प्रिये।
सिहरा तन, सिहरा व्याकुल मन, सिहरा मानस का गान प्रिये
मेरे अस्थिर जग को दे दो, तुम प्राणों का वरदान प्रिये।
भर-भरकर सूनी निःश्वासें, देखो, सिहरा-सा आज पवन
है ढूँढ़ रहा अविकल गति से, मधु से पूरित मधुमय मधुवन।
यौवन की इस मधुशाला में, है प्यासों का ही स्थान प्रिये
फिर किसका भय? उन्मत्त बनो, है प्यास यहाँ वरदान प्रिये।
देखो प्रकाश की रेखा ने, वह तम में किया प्रवेश प्रिये
तुम एक किरण बन, दे जाओ, नव-आशा का सन्देश प्रिये।
अनिमेष दृगों से देख रहा, हूँ आज तुम्हारी राह प्रिये
है विकल साधना उमड़ पड़ी, होंठों पर बन कर चाह प्रिये।
मिटनेवाला है सिसक रहा, उसकी ममता है शेष प्रिये
निज में लय कर उसको दे दो, तुम जीवन का सन्देश प्रिये।
आज शाम है बहुत उदास
आज शाम है बहुत उदास, केवल मैं हूँ अपने पास।
दूर कहीं पर हास-विलास, दूर कहीं उत्सव-उल्लास
दूर छिटक कर कहीं खो गया, मेरा चिर-संचित विश्वास।
कुछ भूला सा और भ्रमा सा, केवल मैं हूँ अपने पास
एक धुंध में कुछ सहमी सी, आज शाम है बहुत उदास।
एकाकीपन का एकांत, कितना निष्प्रभ, कितना क्लांत।
थकी-थकी सी मेरी साँसें, पवन घुटन से भरा अशान्त,
ऐसा लगता अवरोधों से, यह अस्तित्व स्वयं आक्रान्त।
अंधकार में खोया-खोया, एकाकीपन का एकांत
मेरे आगे जो कुछ भी वह, कितना निष्प्रभ, कितना क्लांत।
उतर रहा तम का अम्बार, मेरे मन में व्यथा अपार।
आदि-अन्त की सीमाओं में, काल अवधि का यह विस्तार
क्या कारण? क्या कार्य यहाँ पर? एक प्रशन मैं हूँ साकार।
बनना? क्यों बनकर मिटना? मेरे मन में व्यथा अपार
औ समेटता निज में सब कुछ, उतर रहा तम का अम्बार।
सौ-सौ संशय, सौ-सौ त्रास, आज शाम है बहुत उदास।
जोकि आज था तोड़ रहा वह, बुझी-बुझी सी अन्तिम साँस
और अनिश्चित कल में ही है, मेरी आस्था, मेरी आस।
जीवन रेंग रहा है लेकर, सौ-सौ संशय, सौ-सौ त्रास,
और डूबती हुई अमा में, आज शाम है बहुत उदास।
मैं कब से ढूँढ़ रहा हूँ
मैं कब से ढूँढ़ रहा हूँ अपने प्रकाश की रेखा
तम के तट पर अंकित है निःसीम नियति का लेखा
देने वाले को अब तक मैं देख नहीं पाया हूँ,
पर पल भर सुख भी देखा, फिर पल भर दुख भी देखा।
किस का आलोक गगन से रवि शशि उडुगन बिखराते?
किस अंधकार को लेकर काले बादल घिर आते?
उस चित्रकार को अब तक मैं देख नहीं पाया हूँ,
पर देखा है चित्रों को बन-बनकर मिट-मिट जाते।
फिर उठना, फिर गिर पड़ना आशा है, वहीं निराशा
क्या आदि-अन्त संसृति का अभिलाषा ही अभिलाषा?
अज्ञात देश से आना, अज्ञात देश को जाना,
अज्ञात अरे क्या इतनी है हम सब की परिभाषा ?
पल-भर परिचित वन-उपवन, परिचित है जग का प्रति कन,
फिर पल में वहीं अपरिचित हम-तुम, सुख-सुषमा, जीवन।
है क्या रहस्य बनने में? है कौन सत्य मिटने में?
मेरे प्रकाश दिखला दो मेरा भूला अपनापन।
कल सहसा यह सन्देश मिला
कल सहसा यह सन्देश मिला सूने-से युग के बाद मुझे
कुछ रोकर, कुछ क्रोधित हो कर तुम कर लेती हो याद मुझे।
गिरने की गति में मिलकर गतिमय होकर गतिहीन हुआ
एकाकीपन से आया था अब सूनेपन में लीन हुआ।
यह ममता का वरदान सुमुखि है अब केवल अपवाद मुझे
मैं तो अपने को भूल रहा, तुम कर लेती हो याद मुझे।
पुलकित सपनों का क्रय करने मैं आया अपने प्राणों से
लेकर अपनी कोमलताओं को मैं टकराया पाषाणों से।
मिट-मिटकर मैंने देखा है मिट जानेवाला प्यार यहाँ
सुकुमार भावना को अपनी बन जाते देखा भार यहाँ।
उत्तप्त मरूस्थल बना चुका विस्मृति का विषम विषाद मुझे
किस आशा से छवि की प्रतिमा! तुम कर लेती हो याद मुझे?
हँस-हँसकर कब से मसल रहा हूँ मैं अपने विश्वासों को
पागल बनकर मैं फेंक रहा हूँ कब से उलटे पाँसों को।
पशुता से तिल-तिल हार रहा हूँ मानवता का दाँव अरे
निर्दय व्यंगों में बदल रहे मेरे ये पल अनुराग-भरे।
बन गया एक अस्तित्व अमिट मिट जाने का अवसाद मुझे
फिर किस अभिलाषा से रूपसि! तुम कर लेती हो याद मुझे?
यह अपना-अपना भाग्य, मिला अभिशाप मुझे, वरदान तुम्हें
जग की लघुता का ज्ञान मुझे, अपनी गुरुता का ज्ञान तुम्हें।
जिस विधि ने था संयोग रचा, उसने ही रचा वियोग प्रिये
मुझको रोने का रोग मिला, तुमको हँसने का भोग प्रिये।
सुख की तन्मयता तुम्हें मिली, पीड़ा का मिला प्रमाद मुझे
फिर एक कसक बनकर अब क्यों तुम कर लेती हो याद मुझे?