Friday, October 19, 2012

मजाज़ लखनवी की जन्मतिथि !

मजाज़ लखनवी
आज उर्दू के मशहूर शायर मजाज़ लखनवी (19 अक्टूबर 1911 - 05 दिसम्बर 1955) की जन्मतिथि है। इस मौक़े पर पेश हैं कुछ ग़ज़लें : बीइंग पोएट
1.
अपने दिल को दोनों आलम से उठा सकता हूँ मैं
क्या समझती हो कि तुमको भी भुला सकता हूँ मैं
कौन तुमसे छीन सकता है मुझे क्या वहम है
ख़ुद जुलेखा से भी तो दामन बचा सकता हूँ मैं
दिल में तुम पैदा करो पहले मेरी-सी जुर्रतें
और फिर देखो कि तुमको क्या बना सकता हूँ मैं
दफ़्न कर सकता हूँ सीने मैं तुम्हारे राज़ को
और तुम चाहो तो अफ़साना बना सकता हूँ मैं
तुम समझती हो कि हैं परदे बहुत से दरमियाँ
मैं ये कहता हूँ कि हर पर्दा उठा सकता हूँ मैं
तुम कि बन सकती हो हर महफ़िल मैं फ़िरदौस-ए-नज़र
मुझ को यह दावा कि हर महफ़िल पे छा सकता हूँ मैं
2.
इज़्न-ए-ख़िराम लेते हुए आसमाँ से हम
हटकर चले हैं रहगुज़र-ए-कारवाँ से हम
क्योंकर हुआ है फ़ाश ज़माने पे क्या कहें
वो राज़-ए-दिल जो कह न सके राज़दाँ से हम
हमदम यही है रहगुज़र-ए-यार-ए-ख़ुश्ख़िराम
गुज़रे हैं लाख बार इसी कहकशाँ से हम
क्या-क्या हुआ है हम से जुनूँ में न पूछिए
उलझे कभी ज़मीं से कभी आसमाँ से हम
ठुकरा दिए हैं अक़्ल-ओ-ख़िराद के सनमकदे
घबरा चुके हैं कशमकश-ए-इम्तेहाँ से हम
बख़्शी हैं हम को इश्क़ ने वो जुर्रतें 'मजाज़'
डरते नहीं सियासत-ए-अहल-ए-जहाँ से हम
3.
कमाल-ए-इश्क़ है दीवाना हो गया हूँ मैं
ये किस के हाथ से दामन छुड़ा रहा हूँ मैं
तुम्हीं तो हो जिसे कहती है नाख़ुदा दुनिया
बचा सको तो बचा लो कि डूबता हूँ मैं
ये मेरे इश्क़ की मजबूरियाँ म'अज़-अल्लाह
तुम्हारा राज़ तुम्हीं से छुपा रहा हूँ मैं
इस इक हिजाब पे सौ बे-हिजाबियाँ सदक़े
जहाँ से चाहता हूँ तुमको देखता हूँ मैं
बताने वाले वहीं पर बताते हैं मंज़िल
हज़ार बार जहाँ से गुज़र चुका हूँ मैं
कभी ये ज़ोम कि तू मुझ से छुप नहीं सकता
कभी ये वहम कि ख़ुद भी छुपा हुआ हूँ मैं
मुझे सुने न कोई मस्त-ए-बादा-ए-इशरत
'मजाज़' टूटे हुए दिल की इक सदा हूँ मैं
4.
ख़ुद दिल में रह के आँख से पर्दा करे कोई
हाँ
, लुत्फ़ जब है पाके भी ढूँढा करे कोई
तुम ने तो हुक्म-ए-तर्क-ए-तमन्ना सुना दिया
किस दिल से आह तर्क-ए-तमन्ना करे कोई
दुनिया लरज़ गई दिल-ए-हिरमाँ नसीब की
इस तरह साज़-ए-ऐश न छेड़ा करे कोई
मुझ को ये आरज़ू वो उठायें नक़ाब ख़ुद
उन को ये इन्तज़ार तक़ाज़ा करे कोई
रन्गीनी-ए-नक़ाब में गुम हो गई नज़र
क्या बे-हिजाबियों का तक़ाज़ा करे कोई
या तो किसी को ज़ुर्रत-ए-दीदार ही न हो
या फिर मेरी निगाह से देखा करे कोई
होती है इस में हुस्न की तौहीन ऐ 'मजाज़'
इतना न अहल-ए-इश्क़ को रुसवा करे कोई
5.
निगाह-ए-लुत्फ़ मत उठा खूगर-ए-आलाम रहने दे
हमें नाकाम रहना है हमें नाकाम रहने दे
किसी मासूम पर बेदाद का इलज़ाम क्या मानी
यह वहशत-खेज़ बातें इश्क़-ए-बद-अंजाम रहने दे
अभी रहने दे दिल में शौक़-ए-शोरीदा के हंगामे
अभी सर में मोहब्बत का जुनून-ए-खाम रहने दे
अभी रहने दे कुछ दिन लुत्फ़-ए-नगमा-ए-मस्ती-ए-सहबा
अभी ये साज़ रहने दे अभी ये जाम रहने दे
कहाँ तक हुस्न भी आखिर करे पास-ए-रवादारी
अगर यह इश्क़ खुद ही फर्क-ए-खास-ओ-आम रहने दे
ब-ईं रिन्दी मजाज़ एक शायर, मजदूर, दह्कान है
अगर शहरों में वो बदनाम है, बदनाम रहने दे
6.
सारा आलम गोश बर आवाज़ है
आज किन हाथों में दिल का साज़ है
हाँ, ज़रा जुर्रत दिखा ऐ जज़्ब-ए-दिल
हुस्न को पर्दे पे अपने नाज़ है
कम्नशीं दिल की हक़ीक़त क्या कहूँ
सोज़ में डुबा हुआ इक साज़ है
आप की मख़्मूर आँखों की क़सम
मेरी मैंख़्वारी अभी तक राज़ है
हँस दिए वो मेरे रोने पर मगर
उन के हँस देने में भी एक राज़ है
छुप गए वो साज़-ए-हस्ती छेड़ कर
अब तो बस आवाज़ ही आवाज़ है
हुस्न को नाहक़ पशेमाँ कर दिया
ऐ जुनूँ ये भी कोई अन्दाज़ है
सारी महफ़िल जिस पे झूम उठी 'मजाज़'
वो तो आवाज़-ए-शिकस्त-ए-साज़ है
7.
सीने में उन के जलवे छुपाये हुए तो हैं
हम अपने दिल को तूर बनाये हुए तो हैं
तासीर-ए-जज़्ब-ए-शौक़ दिखाए हुए तो हैं
हम तेरा हर हिजाब उठाए हुए तो हैं
हाँ वो क्या हुआ वो हौसला-ए-दीद अहल-ए-दिल
देखो न वो नक़ाब उठाए हुए तो हैं
तेरे गुनाहाअर गुनाहगार ही सही
तेरे करम की आस लगाए हुए तो हैं
अल्लाह रे क़ामयाबी-ए-आवारगान-ए-इश्क़
ख़ुद गुम हुए तो क्या उसे पाए हुए तो हैं
ये तुझ को इख़्तियार है तासीर दे न दे
दस्त-ए-दुआ हम आज उठाए हुए तो हैं
मिटते हुओं को देख के क्यों रो न दें 'मजाज़'
आख़िर किसी के हम भी मिटाए हुए तो हैं
8.
हुस्न को बे-हिजाब होना था
शौक़ को कामयाब होना था
हिज्र में कैफ़-ए-इज़्तराब न पूछ
ख़ून-ए-दिल भी शराब होना था
तेरे जल्वों में घिर गया आख़िर
ज़र्रे को आफ़ताब होना था
कुछ तुम्हारी निगाह काफ़िर थी
कुछ मुझे भी ख़राब होना था
रात तारों का टूटना भी 'मजाज़'
बाइस-ए-इज़्तराब होना था
9.
हुस्न फिर फ़ित्नागर है क्या कहिए
दिल की जानिब नज़र है क्या कहिए
फिर वही रहगुज़र है क्या कहिए
ज़िन्दगी राहबर है क्या कहिए
हुस्न ख़ुद पर्दादर है क्या कहिए
ये हमारी नज़र है क्या कहिए
आह तो बे-असर थी बरसों से
नग़्मा भी बे-असर है क्या कहिए
हुस्न है अब न हुस्न के जलवे
अब नज़र ही नज़र है क्या कहिए
आज भी है 'मजाज़' ख़ाक्नशीं
और नज़र अर्श पर है क्या कहिए
10.
रह-ए-शौक़ से अब हटा चाहता हूँ
कोशिश हुस्न की देखना चाहता हूँ
कोई दिल-सा दर्द आशना चाहता हूँ
रह-ए-इश्क़ में रहनुमा चाहता हूँ
तुझी से तुझे छीनना चाहता हूँ
ये क्या चाहता हूँ ये क्या चाहता हूँ
ख़ताओं पे जो मुझ को माइल करे फिर
सज़ा और ऐसी सज़ा चाहता हूँ
वो मख़्मूर नज़रें वो मदहोश आँखें
ख़राब-ए-मुहब्बत हुआ चाहता हूँ
वो आँखें झुकीं वो कोई मुस्कुराया
पयाम-ए-मुहब्बत सुना चाहता हूँ
तुझे ढूंढता हूँ तेरी जुस्तजू है
मज़ा है ख़ुद गुम हुआ चाहता हूँ
कहाँ का करम और कैसी इनायत
'मजाज़' अब जफ़ा ही जफ़ा चाहता हूँ